DISTRICT WISE NEWS

अंबेडकरनगर अमरोहा अमेठी अलीगढ़ आगरा आजमगढ़ इटावा इलाहाबाद उन्नाव एटा औरैया कन्नौज कानपुर कानपुर देहात कानपुर नगर कासगंज कुशीनगर कौशांबी कौशाम्बी गाजियाबाद गाजीपुर गोंडा गोण्डा गोरखपुर गौतमबुद्ध नगर गौतमबुद्धनगर चंदौली चन्दौली चित्रकूट जालौन जौनपुर ज्योतिबा फुले नगर झाँसी झांसी देवरिया पीलीभीत फतेहपुर फर्रुखाबाद फिरोजाबाद फैजाबाद बदायूं बरेली बलरामपुर बलिया बस्ती बहराइच बागपत बाँदा बांदा बाराबंकी बिजनौर बुलंदशहर बुलन्दशहर भदोही मऊ मथुरा महराजगंज महोबा मिर्जापुर मीरजापुर मुजफ्फरनगर मुरादाबाद मेरठ मैनपुरी रामपुर रायबरेली लखनऊ लख़नऊ लखीमपुर खीरी ललितपुर वाराणसी शामली शाहजहाँपुर श्रावस्ती संतकबीरनगर संभल सहारनपुर सिद्धार्थनगर सीतापुर सुलतानपुर सुल्तानपुर सोनभद्र हमीरपुर हरदोई हाथरस हापुड़
Showing posts with label प्राइवेट स्कूल. Show all posts
Showing posts with label प्राइवेट स्कूल. Show all posts

Saturday, May 1, 2021

स्कूल लगातार छह घंटे तक चला रहे ऑनलाइन क्लास, बीमार हो रहे बच्चे

स्कूल लगातार छह घंटे तक चला रहे ऑनलाइन क्लास, बीमार हो रहे बच्चे


प्रयागराज : कोरोना संक्रमण के बीच शहर के निजी स्कूलों की मनमानी से अभिभावक एवं बच्चे परेशान हैं। स्कूल सुबह आठ बजे से दिन में तीन बजे तक ऑनलाइन क्लास चला रहे हैं। ऐसे में लगातार छह घंटे मोबाइल, लैपटॉप पर निगाह लगाए बच्चों की आंख, गर्दन और सिर में दर्द शुरू हो गया है। दिनभर की ऑनलाइन क्लास के फेर में बच्चे ठीक से सुबह का नाश्ता और दोपहर का खाना तक नहीं कर पा रहे हैं। 


अभिभावकों का कहना है कि छह घंटे लगातार पढ़ाई से मोबाइल का दिन भर का डाटा खर्च होने से बच्चों को परेशानी हो रही है। दो ऑनलाइन क्लास के बीच रखें 15 मिनट का अंतरालः अभिभावकों एवं बच्चों का कहना है कि स्कूल वालों को चाहिए कि वह हर क्लास के बीच में 15 मिनट का अंतराल रखें जिससे आंख पर मोबाइल का बुरा प्रभाव न पडे। मनोविज्ञानी डॉ. कमलेश तिवारी का कहना है कि ऑनलाइन क्लास के कारण भी बच्चों पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। उनके लिए काम करने वाली संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्था यूनिसेफ ने इस बारे में चेतावनी जारी की है।


यूनिसेफ ने कहा कि बच्चे जब भी मोबाइल, लैपटॉप आदि का प्रयोग करें, उस दौरान घर का कोई बड़ा उनके साथ हो। ध्यान रहे कि बच्चे लगातार आधे घंटे से अधिक मोबाइल, लैपटॉप, कंप्यूटर का प्रयोग न करें।


स्कूल कम करें ऑनलाइन क्लास

कोरोना की वजह से सभी निजी स्कूलों की ओर से अप्रैल के पहले सप्ताह से ही ऑनलाइन कक्षाएं शुरू कर दी गई हैं। मनोविज्ञानियों का कहना है कि कोरोना को लेकर बने माहौल की वजह से पूरा समाज भय के माहौल में है। ऐसे में बच्चों को मानसिक दबाव से बचाने के लिए इस समय ऑनलाइन क्लास कम करना चाहिए। 

देखा यह जा रहा है। कि बच्चे बड़े हों अथवा छोटे, सभी के लिए स्कूलों की ओर से पूरे दिन छह घंटे की ऑनलाइन क्लास चलाई जा रही है। इस दौरान छह घंटे की क्लास में बच्चों को बीच में खेलने, खाने के साथ अपने साथियों से बातचीत करने का मौका मिल जाता था। 

ऑनलाइन क्लास के दौरान तो बच्चों को लगातार मोबाइल पर आंख गड़ाकर पढ़ाई करनी पड़ रही है, ऐसे में बच्चे गर्दन में जकड़न सहित आँख में दर्द और जलन जैसी बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। इससे अभिभावकों में भय व्याप्त हो गया है।

Friday, April 30, 2021

निजी स्कूलों की मनमानी शिक्षकों पर पड़ रही भारी

निजी स्कूलों की मनमानी शिक्षकों पर पड़ रही भारी


लखनऊ: निजी अस्पताल हों या निजी स्कूल, पूरी तरह निरंकुश हो चुके हैं। कोरोना काल में निजी अस्पतालों की हकीकत किसी से छिपी न रह गई, तो वहीं रही-सही कसर निजी स्कूल पूरी कर रहे हैं।


प्रदेश सरकार ने कक्षा आठ तक के सभी परिषदीय, मान्यता व सहायता प्राप्त विद्यालयों में 20 मई तक शिक्षक, अनुदेशक व शिक्षा मित्रों के लिए वर्क फ्रॉम होम के आदेश जारी किए हैं। पहले यह अनुमति 30 अप्रैल तक थी, उसे बढ़ाया गया है। सरकार ने संक्रमण के बढ़ते मामलों को देखते हुए यह निर्णय लिया है, मगर निजी स्कूल रोजाना शिक्षकों को बुला रहे हैं। इसके चलते शिक्षक संक्रमण की चपेट में आ रहे हैं।

गंभीर बात यह है कि स्कूलों के इस तानाशाही रवैये की जानकारी प्रशासनिक अमले को भी है, मगर इनकी ऊंची रसूख के चलते कोई भी अधिकारी इन पर हाथ डालने की हिम्मत नहीं जुटा पाता।


हमारे सभी शिक्षक वर्क फ्रॉम होम पर हैं। सभी घर से ही आनलाइन क्लास ले रहे हैं, किसी शिक्षक को स्कूल नहीं बुलाया जा रहा है। जब तक स्थिति सामान्य नहीं होगी तब तक किसी को बुलाया भी नहीं जाएगा। -डा. जगदीश गांधी, संस्थापक, सिटी मांटेसरी स्कूल (सीएमएस)


किसी भी शाखा में शिक्षकों को नहीं बुलाया जा रहा है। सभी शिक्षक आनलाइन क्लास ले रहे हैं। फीस जमा करने य अन्य ऑफिस वर्क के लिए एक-दो लोग ही अल्टरनेट डेज में बुलाए जा रहे हैं। -अनिल अग्रवाल, एमडी, सेंट जोसफ ग्रुप ऑफ स्कूल्स

Sunday, April 25, 2021

ऑनलाइन क्लास के दौर में अभिभावकों से एनुअल चार्ज वसूल रहे निजी स्कूल संचालक

ऑनलाइन क्लास के दौर में अभिभावकों से एनुअल चार्ज वसूल रहे निजी स्कूल संचालक 

अभिभावकों ने कहा, स्कूल ट्यूशन फीस की जगह एनुअल चार्ज जोड़कर वसूल रहे कंपोजिट फीस


प्रयागराज : कोरोना संकट के बीच खुले स्कूलों की मनमानी जारी है। स्कूल वाले ऑफलाइन क्लास के - दौर में भी अभिभावकों से एनुअल - चार्ज वसूल रहे हैं। इसमें कंप्यूटर क्लास स्मार्ट क्लास, लाइब्रेरी, स्पोट्र्स, लैब सहित डेवलपमेंट चार्ज सहित कई दूसरे चार्ज को जोड़कर वसूला जा रहा है। शहर के अधिकतर स्कूलों ने फीस का ब्रेकअप खत्म करके सीधे वार्षिक एवं तिमाही फीस तय कर दी है। स्कूल वालों की इस मनमानी के खिलाफ अभिभावकों में जिला विद्यालय निरीक्षक तक अपनी बात | पहुंचाई है लेकिन उनके यहां से भी कोई सुनवाई नहीं हो रही है।


निजी स्कूलों की ओर से मनमाना फीस वसूली के खिलाफ जब अभिभावकों ने आवाज उठाई तो स्कूलों ने ट्यूशन फीस सहित पूरी फीस को एक में मिलाकर कंपोजिट फीस के नाम वसूलना शुरू कर दिया। बीते शैक्षिक सत्र में अभिभावकों की ओर से जब ऑनलाइन क्लास के दौर में ट्यूशन फीस के अतिरिक्त दूसरे शुल्क वसूलने का विरोध शुरू हुआ तो इससे बचाव के लिए अधिकतर स्कूलों ने एनुअल चार्ज को 'कंपोजिट फीस में शामिल कर दिया मनमाने तरीके से फीस बढ़ाने के साथ ही अभिभावकों पर एनुअल चार्ज भी थोप दिए गए हैं। 


एनुअल चार्ज को कंपोजिट फीस में शामिल करते हुए एक महीने की बजाय तीन महीने की फीस वसूली जा रही है। इस बारे में जब जिला विद्यालय निरीक्षक से संपर्क किया गया तो उन्होंने कहा कि अब दो दिन के कोरोना कर्फ्यू के बाद तीन महीने की जगह एक महीने की फीस वसूले जाने के बारे में आदेश जारी किया जाएगा।



अभिभावकों ने उठाई आवाज, कोरोना संक्रमण काल में बंद हों ऑनलाइन कक्षाएं

प्रयागराज पूरे देश में कोरोना संक्रमण की मार के बीच स्कूलों की ओर से ऑनलाइन क्लास शुरू कर दिए गए हैं। अभिभावकों को ऑनलाइन क्लास से बच्चों को जोड़ने के साथ तीन महीने की फीस जमा करने का दबाव बनाया जा रहा है। अभिभावकों ने जिलाधिकारी से ऑनलाइन क्लास पर रोक लगाने के साथ ही फीस की वसूली पर रोक लगाने की मांग की है।

Saturday, April 24, 2021

लखनऊ : कोरोना के चलते स्कूलबन्दी पर निजी स्कूल प्रबंधकों ने सरकार से आर्थिक पैकेज मांगा

लखनऊ : कोरोना के चलते स्कूलबन्दी पर निजी स्कूल प्रबंधकों ने सरकार से आर्थिक पैकेज मांगा


निजी स्कूल के शिक्षकों ने सरकार से गुहार लगाई है कि उनके लिए आर्थिक पैकेज का ऐलान करें। बीते वर्ष भी कोरोना संक्रमण के कारण अभिभावकों ने फीस देने से इनकार कर दिया था। लिहाजा शिक्षकों के सामने वेतन का संकट है।


स्कूल बीच में कुछेक दिनों के लिए खुले जरूर लेकिन नए सत्र की शुरुआत से पहले ही बंद कर दिए गए। शिक्षक संगठनों ने जुलाई से नए सत्र की मांग की है। वित्तविहीन शिक्षक महासभा के प्रदेश अध्यक्ष व शिक्षक एमएलसी उमेश द्विवेदी ने कहा है कि इन स्कूलों के 3.50 लाख शिक्षक भुखमरी की कगार पर हैं। 90 फीसदी शिक्षकों को एक साल से वेतन नहीं मिल रहा है। वे घर बैठ गए हैं क्येांकि प्रबंधकों ने नए प्रवेश होने पर ही बुलाने का आश्वासन दिया है। सरकार जुलाई से नया सत्र करे तो इससे लाभ मिल सकता है। 


प्रदेश में 21 हजार से ज्यादा निजी स्कूल हैं जो यूपी बोर्ड से जुड़े हैं। बीते वर्ष नया सत्र शुरू होने से पहले ही कोरोना संक्रमण के कारण लॉकडाउन हो गया। आप यह खबर प्राइमरी का मास्टर डॉट इन पर पढ़ रहे हैं। इस वर्ष लगभग एक महीने से भी कम समय के लिए स्कूल खुले लेकिन अभिभावक जब तक फीस जमा करते तब तक फिर स्कूल बंद कर दिए गए। इन स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के अभिभावक अमूमन निम्न आय वर्ग से आते हैं। लिहाजा बामुश्किल 10 फीसदी फीस भी नहीं जमा हो पाई। इस वर्ष भी अभिभावकों ने स्कूल खुलने पर फीस जमा करने के लिए कहा है। फीस न होने पर प्रबंधकों ने शिक्षकों को वेतन नहीं दिया था।

Tuesday, April 20, 2021

शुरू हुईं ऑनलाइन कक्षाएं, निजी स्कूल नई किताबें व यूनिफार्म खरीदने के लिए बना रहे दबाव

शुरू हुईं ऑनलाइन कक्षाएं, निजी स्कूल नई किताबें व यूनिफार्म खरीदने के लिए बना रहे दबाव


प्रयागराज : पिछले सत्र में एक भी दिन विद्यार्थी स्कूल नहीं गए। बच्चों ने ऑनलाइन पढ़ाई की। नए सत्र पर भी कोरोना की काली छाया पड़ रही है। तमाम स्कूलों में प्रवेश प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, कुछ में चल रही है। कई स्कूलों ने ऑनलाइन पढ़ाई दोबारा शुरू करा दी है। इन सब के बीच राहत वाली बात यह कि स्कूलों में किसी भी तरह का पाठ्यक्रम नहीं बदला है। विद्यार्थी पुरानी किताबें लेकर आगे की पढ़ाई कर सकते हैं।


स्कूल की तरफ से नई किताबों को खरीदने का भी दबाव नहीं बनाया जाएगा। कुछ स्कूलों ने तो पुस्तक बैंक भी बनाई है जिसमें वह पुरानी किताबें एकत्र कर जरूरतमंद बच्चों को दे रहे हैं। इसके लिए वह किसी भी तरह का शुल्क नहीं ले रहे। यह कदम कोरोना काल में अभिभावकों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को कम करने के लिए उठाया जा रहा है।


हालांकि तमाम अभिभावकों की शिकायत है कि स्कूलों की तरफ से नई किताबों को खरीदने के लिए दबाव बनाया जा रहा है। कुछ स्कूल विद्यार्थियों को ऑनलाइन पढ़ाई के दौरान यूनिफार्म पहनकर बैठने के लिए भी निर्देशित कर रहे हैं। अभिभावकों का कहना है कि जब बच्चे घर में हैं तो यूनिफार्म की क्या जरूरत है। कोरोना काल में अनावश्यक रूप से ड्रेस खरीदने का दबाव ठीक नहीं हैं।


सभी स्कूलों में दोबारा शुरू हुईं ऑनलाइन कक्षाएं, अभिभावकों की शिकायत, स्कूल नई किताबें खरीदने के लिए बना रहे दबाव


निजी स्कूल अनावश्यक रूप से दबाव बना रहे हैं। आर्थिक बोझ भी डाल रहे हैं जबकि पढ़ाई सुचारू ढंग से नहीं हो रही है। कापियों के मूल्य बढ़ने के साथ ही कुछ स्कूल नई किताब खरीदने का भी दबाव बना रहे हैं। इसके लिए खिलाफ आंदोलन किया जाएगा। - विजय गुप्त, अभिभावक एकता समिति।

मेरा पुत्र सिविल लाइंस के निजी विद्यालय में पढ़ता है। पिछले सत्र में आधा पाठ्यक्रम भी नहीं पूरा कराया जा सका। नए सत्र में फीस 15 फीसद बढ़ा दी गई है। स्कूल प्रबंधन से मांग है कि कोरोना काल में फीस माफ की जाए। ऐसा कोई कदम न उठाएं जिससे अभिभावकों पर आर्थिक बोझ पड़े। - संजय द्विवेदी, अभिभावक।

इस बार भी कक्षाएं ऑनलाइन शुरू हो गई हैं। पुरानी किताबें मिलें तो वह उसे लेकर पढ़ाई कर सकते हैं। नई किताबों का कोई दबाव नहीं है। - फादर थामस कुमार, प्रधानाचार्य सेंट जोसफ इंटर कॉलेज।

पुरानी किताबें मिल जाएं तो उसे लेकर पढ़ाई करें। हां कॉपियों को जरूर लेना होगा। इस बार कॉपियां अनिवार्य रूप से जांची जाएंगी। सुझाव भी बच्चों को दिए जाएं। -डा. विनीता इसूवियस, प्रधानाचार्य जीएचएस।

पुरानी किताबें यदि बच्चों को मिल जाएं तो वह उसे लेकर पढ़ाई कर सकते हैं। शिक्षक भी अध्ययन सामग्री बच्चों के वाट्सएप पर भेज रहे हैं, वेबसाइट पर भी मैटर है। -डेविड ल्यूक, प्रधानाचार्य, बीएचएस।

स्कूल में करीब 150 बच्चों ने पुरानी किताबें जमा कराई हैं। उसे जरूरतमंदों को दिया जा रहा है। अन्य विद्यार्थी भी स्कूल या अपने आसपास के बच्चों को किताबें दे सकते हैं। - अर्चना तिवारी, प्रधानाचार्य, टैगोर पब्लिक।

Monday, April 5, 2021

कमीशन का खेल या NCERT फेल?, निजी प्रकाशकों की किताबें खरीदने के लिए बाध्य करते निजी स्कूल


कमीशन का खेल या NCERT फेल?, निजी प्रकाशकों की किताबें खरीदने के लिए बाध्य करते निजी स्कूल


सरकारी स्कूल आज भी एनसीईआरटी की किताबें ही खरीदते हैं। अब सवाल ये हैं कि क्या निजी प्रकाशकों की किताबें एनसीईआरटी के मुकाबले ज्यादा बेहतर है या निजी स्कूल कमीशन के फेर में उनकी किताबें स्कूलों में लगवाते हैं?


नई दिल्ली । शिक्षा व्यवस्था किसी भी देश का भविष्य निर्धारित करती है। लेकिन जब शिक्षा के लिए निर्धारित पाठ्यक्रम में चलाई जाने वाले किताबों पर निजी स्कूल एनसीईआरटी (राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद) की बजाय निजी प्रकाशकों की किताबें खरीदने की मनमानी करते हैं तो अभिभावकों का परेशान होना लाजिमी है। देशभर में सीबीएसई (केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड) से संबंधित हर स्कूल के अलग कोर्स और किताबें हैं।


इन स्कूलों में पहली से आठवीं कक्षा तक एनसीईआरटी की किताबें लगवाने के बजाय निजी प्रकाशकों की महंगी किताबें लगवाई जाती है। एनसीईआरटी की किताबों का अधिकतम मूल्य अगर 50 से 150 रूपए हैं तो वहीं निजी प्रकाशकों की किताबें 300 से 600 रूपये तक की होती हैं।


वहीं, सरकारी स्कूल आज भी एनसीईआरटी की किताबें ही खरीदते हैं। अब सवाल ये हैं कि क्या निजी प्रकाशकों की किताबें एनसीईआरटी के मुकाबले ज्यादा बेहतर है या निजी स्कूल कमीशन के फेर में उनकी किताबें स्कूलों में लगवाते हैं?


एनसीईआरटी की किताबें उबाऊ और सामग्री की कमी

मयूर विहार फेज-1 स्थित एक निजी स्कूल की प्रधानाचार्या के मुताबिक एनसीईआरटी की किताबें पुराने ढर्रे पर चली आ रही है, किताबें काफी उबाऊ भी हैं और उनमें सामग्री की भी कमी है। किताब में केवल संक्षिप्त सवाल होते है, जो छात्र को प्रैक्टिस करने के लिए कम पड़ते हैं। आप यह आलेख प्राइमरी का मास्टर डॉट इन पर पढ़ रहे हैं।वहीं, द्वारका स्थित एक निजी स्कूल की प्रधानाचार्या के मुताबिक उनके स्कूल में वो फिलहाल कुछ किताबें विदेशी प्रकाशकों की इस्तेमाल कर रही हैं। उनके मुताबिक निजी प्रकाशकों की किताबें 21वीं सदी के छात्रों के हिसाब से हैं।


राजेंद्र नगर स्थित सलवान पब्लिक स्कूल के एक शिक्षक के मुताबिक एनसीईआरटी की कुछ किताबें कई बार बाजार में ही उपलब्ध नहीं होती या देरी से मिलती है। वहीं, निजी प्रकाशकों की किताबें आसानी से उपलब्ध हो जाती है इसलिए स्कूल निजी प्रकाशकों पर ज्यादा निर्भर रहते हैं। राजधानी के ज्यादातर निजी स्कूलों की निजी प्रकाशकों की किताबें इस्तेमाल करने को लेकर लगभग यही तर्क है।

प्रतियोगी और बोर्ड परीक्षा के लिए एनसीईआरटी बेहतर

इन सभी निजी स्कूलों में कक्षा नौवीं से 12वीं के छात्रों के लिए एनसीईआरटी की किताबें ही इस्तेमाल होती है। इस पर निजी स्कूलों की तर्क है कि बोर्ड की परीक्षाओं में ज्यादातर सवाल एनसीईआरटी की किताबों से ही आते हैं।

करोल बाग स्थित दिल्ली सरकार के एक सरकारी स्कूल के प्रधानाचार्य हंस राज मोदी बताते हैं कि उनके स्कूल में सभी छात्रों के लिए एनसीईआरटी की किताबें ही इस्तेमाल होती हैं। अगर किसी विषय में एनसीईआरटी की किताब नहीं है तो स्कूल छात्रों को सपोर्ट मटेरियल उपलब्ध कराता है। उनके मुताबिक स्कूल के सभी छात्र बोर्ड के साथ-साथ प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए एनसीईआरटी का ही इस्तेमाल करते हैं क्योंकि जितना अच्छा कान्सेप्ट (संकल्पना) एनसीईआरटी की किताबें से समझ आता है उतना शायद ही किसी निजी प्रकाशक की किताबों से आए।

स्कूलों का बंधा होता है कमीशन

दिल्ली अभिभावक संघ की अध्यक्ष अपराजिता गौतम के मुताबिक शासन प्रशासन के कड़े निर्देशों के बावजूद ज्यादातर निजी स्कूल एनसीईआरटी की किताबों को अपनी सूची में शामिल करने से परहेज कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि स्कूल से ही दुकान का पता बताया जाता है कि कहां से निजी प्रकाशक की किताब खरीदनी है और किताब में लिखे दाम पर ही किताब खरीदनी पड़ती है। क्योंकि स्कूलों की कमीशन बंधा होता है। उनके मुताबिक किताब वितरण के जो ठेके दुकानों को दे रखे थे उसमें भी मनमर्जी चलाई जाती है, स्कूलों को जहां से कमीशन कम हुआ वहां से हटाकर दूसरी जगह आवंटित कर दिया जाता है। 

वहीं, फेसबुक, ट्वीटर पर एनसीईआरटी बनाम निजी प्रकाशकों की किताबों को लेकर मुद्दा उठा रहे शिक्षाविद और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर निरंजन कुमार के मुताबिक आज सबसे ज्यादा परेशान निम्न मध्यम वर्गीय परिवार है। वो जैसे तैसे अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाता हैं उस पर भी स्कूलों ने निजी प्रकाशकों की महंगी किताबों को खरीदने का जो दबाव बनाया है वो अभिभावकों के लिए सही नहीं है। उनके मुताबिक स्कूलों का काम सिर्फ शिक्षा देना होना चाहिए न कि शिक्षा के नाम पर व्यापार करना।

एनसीईआरटी सचिव मेजर हर्ष कुमार ने बताया कि एनसीईआरटी की किताबें देश के प्रतिष्ठित शिक्षाविद और प्रोफेसर काफी शोध के बाद छात्रों के लिए किताबें तैयार करते हैं। इन्हें तैयार करने में भी लंबा समय लगता है। एनसीईआरटी की किताबें देशभर के 22 से ज्यादा राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों में चलती हैं और ये देशभर के छात्रों को ध्यान में रखकर तैयार की जाती है। आज सभी प्रतियोगी परीक्षाओं में छात्र इन्हीं किताबों से पढ़कर उत्तीर्ण होते हैं। इसका दाम बी निजी प्रकाशकों के मुकाबले बहुत कम होता है। निजी स्कूलों को इन किताबों को आठवीं तक की कक्षा में जरूर शामिल करना चाहिए।