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Saturday, September 9, 2017

सियासत व सिफारिश की बाढ़ में शिक्षक पुरस्कारों का सूखा! 2009 में लगाई थी राष्ट्रपति पुरस्कार की हैट्रिक, उसके बाद एक अदद पुरस्कार की बाट जोह रहा जनपद

फतेहपुर :  हिन्दुस्तान संवाद : ठीक आठ साल पहले जिले के साथ समूचा शिक्षा विभाग शिक्षक दिवस पर खुशी से इतरा उठा था। खुशी भी इस कदर कि फूले नहीं समा रही थी। लोग गदगद थे कि जिले के तीन परिषदीय शिक्षकों को एक साथ राष्ट्रपति पुरस्कार हासिल करने का गौरव मिला है। खुशी के रंग कुछ समय तक बिखरे रहे लेकिन समय बीतने के साथ धूमिल भी होते चले गए। हैट्रिक से उम्मीद बंधी थी कि भविष्य में भी जनपद को यह गौरव फिर हासिल होगा लेकिन भविष्य में अतीत को हासिल नहीं किया जा सका। 

 जनपद में पड़ा शिक्षक पुरस्कारों का सूखा 
★ पुरस्कार के लिए सियासत और सिफारिश!
★ 2009 में जिले ने लगाई थी राष्ट्रपति पुरस्कार की हैट्रिक
★ जिले के तीन शिक्षकों को एक साथ अंतिम बार मिला था पुरस्कार

8 साल के सूखे ने नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। प्रश्न तैरने लगे कि आखिर यह सूखा क्यों? क्या जनपद की गोद योग्य शिक्षकों से खाली हो गई? इस खालीपन को भरने के लिए क्या किया गया? सरकार और विभाग की नीतियों ने भी शिक्षकों को पुरस्कार मांगने पर विवश कर दिया। आवेदन के जरिए फाइलों की रेस में सम्मान कहीं गुम हो गया। पुरस्कार की रेस सियासत और सिफारिश के बीच बदस्तूर जारी है। विभाग और सरकारी नीतियां इस रेस को हरी झंडी दिखाकर शिक्षकों के सम्मान को कागजों में सजा रही हैं।

■  पुरस्कार भी कोई मांगने की चीज है!
बताया जाता है कि उन्हीं शिक्षकों को पुरस्कार के लिए चयनित करने की परम्परा बन गई हैं जो अपने लिए अंदरखाने बेहतर फाइलें तैयार करा सकें। हालांकि शासनादेश में तो कहा जाता है कि किसी भी शिक्षक को पुरस्कार के लिए आवेदन करने के लिए नहीं कहा जाएगा लेकिन धरातल में शासन की मंशा का पालन नहीं हो रहा है। जनपदीय समिति प्राय: उन्हीं शिक्षकों का चयन करती है जिनकी फाइलें बेहतर आकार ले सकें। जबकि शासन की मंशा स्कूलों में बेहतर छवि, शिक्षण और व्यक्तित्व वाले शिक्षक को सम्मानित करने की होती है। 

सूत्र यह भी बताते हैं कि शिक्षक पुरस्कार अब योग्यता से नहीं बल्कि सियासत व सिफारिश के गठजोड़ से मिलते हैं। फाइलों का आखिरी चरण तक पहुंचने का रास्ता भी इसी गठजोड़ के जरिए तय होता है। ऐसे में सियासत और सिफारिश से दूर रहने वाले शिक्षक इस सम्मान से दूर ही रहते हैं। शिक्षक गलियारों में कहा जाने लगा है कि राजनीति और विभाग में बेहतर पकड़ रखने वाले शिक्षकों की फाइलें ही आगे बढ़ाई जाती हैं।

■  क्या जनपद में योग्य शिक्षकों का अकाल हो गया है?
करीब 8 वर्ष पूर्व शिक्षक दिवस की पूर्व संध्या पर जब समाचार आया कि जिले के तीन शिक्षकों को एक साथ राष्ट्रपति पुरस्कार से नवाजा जाएगा, समूचा जिला खुशियों से झूम उठा। आसमान में छाईं सावन भादों की काली घटाएं खुशी बनकर जिले के बाशिंदों  के मन मस्तिष्क पर बरसने लगी थीं। उम्मीद जगी थी कि जिले के काबिल शिक्षकों के सम्मान का दौर आगे भी जारी रहेगा लेकिन उम्मीद पिछले 8 साल से हकीकत का चोला नहीं पहन पाई। अतीत ने भविष्य को फिर से पुरस्कार की पटकथा नहीं लिखने दी। ऐसे में जेहन में कई सवाल खड़े हो गए हैं। लोगों का कहना है कि क्या जनपद में योग्य शिक्षकों का अकाल हो गया है? या फिर पुरस्कार सम्बन्धी नीतियां ही शिक्षकों को हतोत्साहित कर रही हैं? कारण जो भी हो लेकिन 8 साल का सूखा सम्मान व गौरव की उर्वर जमीन को बंजर करने पर तुला है।

■  इस तरह होता है शिक्षकों का चयन
पिछले वर्षो में बताया जाता है कि राष्ट्रीय पुरस्कार हेतु 19 एवं राजकीय पुरस्कार के लिए 17 शिक्षक शिक्षिकाओं का चयन किया जाना था। निर्धारित अनुभव को प्राप्त करने वाले सभी शिक्षकों के नाम पर जनपदीय चयन समिति विचार करती है। जनपदीय चयन समिति में डायट प्राचार्य, बीएसए और जीजीआईसी की प्रिसिंपल शामिल होती हैं। चयन के दौरान शिक्षकों के सभी पहलुओं का अध्ययन कर दस वर्ष की गोपनीय आख्या के साथ राज्य स्तरीय समिति को नाम भेजे जाते हैं।

■  कहां गए पुरस्कार प्राप्त शिक्षक!
पुरस्कार प्रक्रिया को सवालों के घेरे में खड़े करने वाले लोग यह तर्क भी दे रहे हैं कि आखिर पुरस्कार प्राप्त शिक्षकों से विभाग ने क्या सहयोग लिया? इन प्रतिष्ठित शिक्षकों के अनुभव का प्रयोग बेसिक शिक्षा के उन्नयन में लिया जा सकता था लेकिन इन्हें भी हाशिए में डाल दिया गया। व्यक्तिगत सम्मान के अलावा पुरस्कार प्राप्त शिक्षकों को विभागीय स्तर पर शिक्षकों को नवाचार से अवगत कराने का मौका नहीं दिया जाना भी विभाग को कटघरे में खड़ा कर रहा है।

पुरस्कारों के लिए शिक्षकों के नामों का चयन एक समिति के द्वारा किया जाता है। इस वर्ष पुरस्कार के लिए कोई आवेदन नहीं आया है। - शिवेन्द्र प्रताप सिंह, बीएसए फतेहपुर


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