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Sunday, April 26, 2026

द्विविवाह के आरोप में बर्खास्त शिक्षक को हाईकोर्ट से राहत, सेवा बहाली का आदेश, बेसिक शिक्षकों पर उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक आचरण नियमावली 1956 लागू नहीं

द्विविवाह के आरोप में बर्खास्त शिक्षक को हाईकोर्ट से राहत, सेवा बहाली का आदेश, बेसिक शिक्षकों पर उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक आचरण नियमावली 1956 लागू नहीं


इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में द्विविवाह (Bigamy) के आरोप में बर्खास्त किए गए शिक्षक को बड़ी राहत देते हुए उसकी सेवा बहाल करने का आदेश दिया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा के शिक्षकों पर उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक आचरण नियमावली, 1956 लागू नहीं होती, बल्कि वे केवल उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा (अध्यापक) सेवा नियमावली, 1981 से शासित होते हैं।

मामला तुफैल अहमद बनाम राज्य उत्तर प्रदेश से संबंधित है, जिसमें याची को 25 जुलाई 2019 को द्विविवाह के आरोप में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। आरोप था कि उन्होंने पहली पत्नी को तलाक देने के बाद दूसरी शादी की, जिस पर दूसरी पत्नी के पिता ने शिकायत दर्ज कराई थी। इसके बाद जिला प्रशासन की संस्तुति पर विभागीय कार्रवाई करते हुए बर्खास्तगी का आदेश पारित किया गया।

याची की ओर से तर्क दिया गया कि सेवा नियमावली, 1981 में द्विविवाह पर कोई स्पष्ट प्रतिबंध नहीं है और न ही 1956 की आचरण नियमावली शिक्षकों पर लागू होती है। साथ ही, दूसरी शादी का तथ्य भी न्यायालय में सिद्ध नहीं हुआ था, क्योंकि संबंधित वाद अनुपस्थिति के कारण खारिज हो चुका था।

न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करते हुए पाया कि बर्खास्तगी का आदेश नियमों के गलत अनुप्रयोग पर आधारित है। कोर्ट ने कहा कि 1956 की नियमावली को शिक्षकों पर लागू मानना विधिसम्मत नहीं है। इसके अतिरिक्त, द्विविवाह का आरोप भी विधिक रूप से सिद्ध नहीं हुआ।

इन तथ्यों के आधार पर न्यायालय ने 25 जुलाई 2019 के बर्खास्तगी आदेश को निरस्त करते हुए याची की सेवा बहाल करने और विधि अनुसार वेतन देने का निर्देश दिया। यह निर्णय बेसिक शिक्षा विभाग के शिक्षकों के सेवा संबंधी मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है।



हाईकोर्ट ऑर्डर 👇 

Wednesday, April 22, 2026

धोखाधड़ी के प्रमाण के बिना दशकों पुरानी नियुक्ति रद्द नहीं की जा सकती : हाईकोर्ट

धोखाधड़ी के प्रमाण के बिना दशकों पुरानी नियुक्ति रद्द नहीं की जा सकती : हाईकोर्ट

गौतमबुद्ध नगर के मुकेश कुमार शर्मा ने याचिका दायर कर बर्खास्तगी आदेश को हाईकोर्ट में दी थी चुनौती

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी कर्मचारी ने लंबे समय तक सेवा दी है और उसकी नियुक्ति में धोखाधड़ी या जालसाजी का कोई पुख्ता प्रमाण नहीं है तो दशकों बाद उसकी सेवा समाप्त करना पूरी तरह से अवैध है। यह टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने गौतमबुद्ध नगर के कंपोजिट विद्यालय जेवर में कार्यरत हेडमास्टर मुकेश कुमार शर्मा की बर्खास्तगी को रद्द कर दिया।


यह आदेश न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकलपीठ ने दिया है। बेसिक शिक्षा अधिकारी ने 11 दिसंबर 2025 के आदेश से याची की सेवाएं इस आधार पर समाप्त कर दी थीं कि उन्होंने शैक्षणिक सत्र 1993-94 में एक साथ दो नियमित पाठ्यक्रम शारीरिक शिक्षा प्रमाणपत्र और इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी की। याची ने बीएसए के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।

विभाग के वकील ने दलील दी कि एक ही वर्ष में दो परीक्षाएं उत्तीर्ण करना और इस तथ्य को छिपाना नियुक्ति को अवैध बनाता है। हालांकि, हाईकोर्ट ने विभाग के इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जब तक किसी अभ्यर्थी के प्रमाणपत्र सक्षम प्राधिकारी की ओर से रद्द या अवैध घोषित नहीं किए जाते, तब तक वे पूरी तरह प्रभावी माने जाएंगे।

इस मामले में याची के हाईस्कूल (1991), शारीरिक शिक्षा प्रमाणपत्र (1993-94) और इंटरमीडिएट (1995) के प्रमाणपत्र आज भी वैध हैं। कोर्ट ने कहा कि तीन दशक की निष्कलंक सेवा के बाद इस तरह की कार्रवाई अवैध और न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है।


बर्खास्तगी प्रक्रिया में पाईं गंभीर खामियां

कोर्ट ने बर्खास्तगी प्रक्रिया में गंभीर खामियां पाईं। उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियमावली, 1999 के तहत कोई नियमित विभागीय जांच नहीं की गई थी। कोर्ट ने कहा कि बिना आरोप पत्र तैयार किए और बिना साक्ष्य प्रस्तुत किए, महज नोटिस के आधार पर सेवा समाप्त करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है। इन सभी आधारों पर अदालत ने बीएसए के बर्खास्तगी आदेश को मनमाना और दोषपूर्ण करार देते हुए रद्द कर दिया और याची की रिट याचिका को स्वीकार कर लिया।

Tuesday, April 14, 2026

लंबी सेवा के बाद केवल तकनीकी आधार पर शिक्षकों की बर्खास्तगी अनुचित : हाईकोर्ट, 19 साल से कार्यरत शिक्षकों की सेवा बहाल

लंबी सेवा के बाद केवल तकनीकी आधार पर शिक्षकों की बर्खास्तगी अनुचित : हाईकोर्ट,  19 साल से कार्यरत शिक्षकों की सेवा बहाल 


प्रयागराज : इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि लंबी सेवा के बाद शिक्षकों की सेवा सिर्फ तकनीकी आधार समाप्त करना अनुचित है। राज्य सरकार और शिक्षा विभाग के कई आदेशों को अवैध ठहराते हुए कोर्ट ने निरस्त कर संबंधित शिक्षकों को सभी लाभ देने का निर्देश दिया। यह आदेश न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकलपीठ ने दिया है।


मुकदमे से जुड़े तथ्य यह हैं कि गौतमबुद्ध नगर स्थित राम सिंह विश्व चैतन्य कन्या जूनियर हाई स्कूल में वर्ष 2006 में दो सहायक शिक्षकों की नियुक्ति की गई थी। बाद में विद्यालय को अनुदान सूची में शामिल किया गया, लेकिन इन शिक्षकों को लंबे समय तक वेतन नहीं मिला। वर्ष 2014 में शासनादेश के बाद वेतन भुगतान की प्रक्रिया शुरू हुई और 2018 में क्षेत्रीय अनुमोदन समिति ने नियुक्तियों को सही मानते हुए वेतन देने का आदेश दिया। 

वर्ष 2025 में अधिकारियों ने नियुक्ति को अवैध बताते हुए सेवा समाप्त करने का आदेश दे दिया। शिक्षकों ने कोर्ट में दलील दी कि उनकी नियुक्ति नियमों के अनुरूप थी। 2018 में सक्षम प्राधिकारी द्वारा अनुमोदन मिल चुका है। उन्हें बिना सुनवाई के सेवा से रोका गया जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।  

खंडपीठ ने पहले ही केवल वेतन विवाद तक सीमित जांच का निर्देश दिया था। राज्य सरकार का कहना था कि नियुक्ति विज्ञापन में न्यूनतम योग्यता का उल्लेख नहीं था। वर्ष 2006 में बीएड योग्यता मान्य नहीं थी। इसलिए नियुक्तियां नियमों के विरुद्ध थीं। पीठ ने सभी पक्षों को सुनने के बाद कहा कि अधिकारियों ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर नियुक्ति की वैधता पर दोबारा फैसला किया है। 2018 में नियुक्ति को सही मानकर आदेश दिया जा चुका था, इसलिए इसे दोबारा नहीं खोला जा सकता।

शिक्षकों को बिना सुनवाई के सेवा से हटाना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है। शिक्षक करीब 19 वर्षों से कार्यरत हैं, ऐसे में केवल तकनीकी आधार पर सेवा समाप्त करना गलत है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि लंबे समय तक सेवा देने वाले कर्मचारियों की नियुक्ति को आसानी से रद नहीं किया जा सकता। यदि धोखाधड़ी नहीं है तो कर्मचारियों के हितों की रक्षा जरूरी है। कोर्ट ने 26 अगस्त 2025, 30 अगस्त 2025, एक सितंबर 2025 और आठ सितंबर 2025 के सभी आदेश रद करते हुए शिक्षकों की सेवा जारी रखने और सभी वेतन व अन्य लाभ देने का निर्देश दिया है।

जन्मतिथि की विसंगति मात्र सेवा समाप्ति का आधार नहीं– हाईकोर्ट

जन्मतिथि की विसंगति मात्र सेवा समाप्ति का आधार नहीं– हाईकोर्ट 

मऊ निवासी याची ने आदेश को को हाईकोर्ट में दी थी चुनौती, शिक्षक का निलंबन रद्द

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि केवल शैक्षणिक प्रमाणपत्रों में दर्ज जन्मतिथि की भिन्नता को धोखाधड़ी या जानबूझकर की गई गलतबयानी नहीं माना जा सकता। इस टिप्पणी संग कोर्ट ने मऊ के सहायक अध्यापक विजय यादव की बर्खास्तगी के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जब तक यह साबित न हो जाए कि अभ्यर्थी ने गलत जन्मतिथि का सहारा लेकर किसी प्रकार का अनुचित लाभ प्राप्त किया है, तब तक ऐसी विसंगति को सेवा समाप्ति का आधार नहीं बनाया जा सकता। यह आदेश न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकल पीठ ने दिया है।


याची की 2014 में सहायक अध्यापक के पद पर नियुक्ति की गई थी। सेवा के कई साल बाद एक शिकायत पर जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी (बीएसए) ने जांच शुरू की, जिसमें यह पाया गया कि उनकी आठवीं क्लास के रिकॉर्ड और हाईस्कूल गजट में जन्मतिथि दो जुलाई 1984 दर्ज थी। वहीं, नियुक्ति के लिए प्रस्तुत 'पूर्व मध्यमा' प्रमाणपत्र में यह तिथि सात जुलाई 1987 अंकित थी। इसी विसंगति को तथ्यों को छिपाना और धोखाधड़ी मानते हुए विभाग ने 27 जून 2019 को याची को सेवा से बर्खास्त कर दिया था। प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश भी दिया था। इस फैसले को याची ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

अधिवक्ता ने दलील दी कि याची ने कभी भी हाईस्कूल के उस प्रमाणपत्र का उपयोग नहीं किया, जिसमें 1984 की जन्मतिथि दर्ज थी। स्पष्ट किया कि याची की पूरी शैक्षणिक यात्रा और नियुक्ति पूर्व मध्यमा, उत्तर मध्यमा और शास्त्री की डिग्री पर आधारित थी, जो पूर्णतः वैध है।


दस्तावेज फर्जी मिलते हैं तो कार्रवाई को स्वतंत्र

कोर्ट ने पाया कि विभाग ने याची के किसी भी प्रमाणपत्र को फर्जी या जाली नहीं पाया गया है। यदि हाईस्कूल वाली जन्मतिथि (1984) को भी सही मान लिया जाए तो भी वह निर्धारित आयु व पात्रता के दायरे में ही है। ऐसी स्थिति में यह नहीं कहा जा सकता कि याची ने किसी गलत मंशा से इस जानकारी को छिपाया था। कोर्ट ने याची को तत्काल प्रभाव से बहाल करने का आदेश दिया। साथ ही विभाग को छूट भी दी है कि यदि भविष्य में याची के प्रस्तुत मूल दस्तावेज कभी फर्जी या जाली पाए जाते हैं तो अधिकारी कानून के अनुसार पुनः कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र होंगे।

Monday, December 8, 2025

मौत के एक साल बाद सहायक अध्यापक बर्खास्त, हाईकोर्ट ने पूछा – किस नियम के तहत मृतक कर्मचारी के खिलाफ सेवा समाप्ति आदेश पारित किया गया?

मौत के एक साल बाद सहायक अध्यापक बर्खास्त, हाईकोर्ट ने पूछा – किस नियम के तहत मृतक कर्मचारी के खिलाफ सेवा समाप्ति आदेश पारित किया गया?

शिक्षा निदेशक से व्यक्तिगत हलफनामा तलब, कहा-यह प्रशासनिक संवेदनहीनता का उदाहरण


प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेसिक शिक्षा में तैनात रहे शिक्षक को मौत के एक साल बाद बर्खास्त करने पर हैरानी जताई है। कोर्ट ने बेसिक शिक्षा निदेशक से व्यक्तिगत हलफनामा तलब कर पूछा है कि किस नियम के तहत मृतक कर्मचारी के खिलाफ सेवा समाप्ति आदेश पारित किया गया है।

कोर्ट का यह आदेश न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया की एकल पीठ ने फर्रुखाबाद में तैनात रहे मृतक शिक्षक मुकुल सक्सेना की पत्नी प्रीति सक्सेना की याचिका पर दिया है। कोर्ट ने कहा कि कोविड से मौत के एक साल बाद शिक्षक के खिलाफ बर्खास्तगी की कार्रवाई न सिर्फ गैर कानूनी है, बल्कि प्रशासनिक संवेदनहीनता का उदाहरण भी है।


सरकार बोली... फर्जी दस्तावेज से मिली थी नौकरी : सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि मृतक ने कथित रूप से जाली दस्तावेज देकर नौकरी पाई थी और उसकी नियुक्ति शुरू से ही अमान्य मानी गई। हालांकि, कोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया। कहा कि रिकॉर्ड पर कहीं भी ऐसा नहीं है कि किसी सक्षम अधिकारी ने नियुक्ति को अमान्य घोषित किया हो।


कोर्ट की टिप्पणी: मरे व्यक्ति के खिलाफ जांच या सेवा समाप्ति की कार्यवाही न तो संभव है और न ही कानून में इसका कोई आधार है। यह समझ से परे है कि अधिकारी ने 2022 में आदेश कैसे जारी कर दिया, जबकि कर्मचारी 2021 में ही नहीं रहा।

अदालत की चेतावनीः अदालत ने निदेशक बेसिक को एक हफ्ते में हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया और चेतावनी दी कि ऐसा न करने पर उन्हें अगली तारीख पर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना होगा। मामले की अगली सुनवाई 16 दिसंबर को होगी।


यह है मामला : मुकुल की नियुक्ति सहायक अध्यापक के पद पर 1996 में मृतक 2021 में कोविड-19 से उनकी मृत्यु हो गई। पत्नी को पारिवारिक पेंशन मिल रही थी पर नवंबर 2022 के बाद अचानक पेंशन रोक दी गई। जानकारी करने पर फर्रुखाबाद के बीएसए की ओर से भेजे गए पत्र में बेसिक शिक्षा निदेशक के 18 जुलाई 2022 के आदेश का हवाला दिया गया। उसमें मृत कर्मचारी की सेवाएं समाप्त करने के लिए कहा गया था। इसी आधार पर दिसंबर 2022 में ट्रेजरी विभाग ने पेंशन रोक दी। इसके खिलाफ याची ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

कोर्ट ऑर्डर 👇

Wednesday, November 19, 2025

जाली दस्तावेज पर मिली नौकरी कई साल की सेवा के बाद भी मानी जाएगी शून्य – हाईकोर्ट

जाली दस्तावेज पर मिली नौकरी कई साल की सेवा के बाद भी मानी जाएगी शून्य – हाईकोर्ट

मुरादाबाद निवासी ने निलंबन और वेतन रोकने के आदेश को दी थी चुनौती

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जाली दस्तावेज के आधार पर मिली नौकरी कई साल की सेवा के बाद भी शून्य मानी जाएगी। धोखाधड़ी हर दूषित कर देती है और गलत तरीके से प्राप्त नियुक्ति को लंबी सेवा भी वैध नहीं बना सकती। इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकल पीठ ने दीपा मैगलीना की जाली दस्तावेज के आधार पर निलंबन और वेतन रोकने के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। 


मुरादाबाद के सेंट जोसेफ गर्ल्स जूनियर हाईस्कूल में दीपा की 1991 में नियुक्ति हुई थी। स्कूल को 2015 में अनुदान प्राप्त स्कूलों की सूची में शामिल कर दिया गया। इसके बाद याची सहायक अध्यापिका के पद पर नियुक्ति प्राप्त की।

इस दौरान एक शिकायत पर जांच की गई और फजी टीईटी प्रमाणपत्र पाए जाने के आधार पर उन्हें निलंबित कर दिया और वेतन रोक दिया। इस फैसले को याची ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। याची अधिवक्ता ने दलील दी कि उनकी नियुक्ति 1991 में हुई थी। 2015 में अनुदान सूची में शामिल होने के बाद उनकी नियुक्ति को नियमित किया गया था। यह एक अल्पसंख्यक संस्थान है। इसलिए उन्हें टीईटी की आवश्यकता से छूट प्राप्त है।

राज्य के वकीलों ने दलील दी कि याची ने 2015 के विज्ञापन के तहत  आवेदन किया था, जिसमें टीईटी योग्यता अनिवार्य थी। नियुक्ति के समय याची ने जो टीईटी प्रमाण पत्र जमा किया था, उसमें उसने 91 अंक बताए थे। बोर्ड से प्राप्त सत्यापन रिपोर्ट के अनुसार याची ने केवल 63 अंक प्राप्त किए थे। इस प्रकार याची है ने जाली प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी हासिल की।

Saturday, November 1, 2025

सेवा के दौरान टीईटी पास करने वाले बर्खास्त शिक्षक बहाल, सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश को किया खारिज, जानिए पूरा मामला

सेवा के दौरान टीईटी पास करने वाले बर्खास्त शिक्षक बहाल, सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश को किया खारिज, जानिए पूरा मामला 


सुप्रीम कोर्ट ने बदले नियमों और बढ़ाए गए समय को आधार बनाते हुए बर्खास्तगी को गलत ठहराया

दोनों शिक्षकों ने 2011 और 2014 में ही टीईटी पास की थी, नियुक्ति 2012 में हुई और 2018 में बर्खास्तगी


नई दिल्लीः कानपुर के दो सहायक शिक्षकों को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने नियुक्ति के समय अनिवार्य न्यूनतम योग्यता टीईटी परीक्षा पास न करने के आधार पर नौकरी से बर्खास्त किये गए दो सहायक शिक्षकों की तत्काल बहाली के आदेश दिये हैं। सुप्रीम कोर्ट ने टीईटी परीक्षा पास करने के लिए बदले नियमों और बढ़ाए गए समय को आधार बनाते हुए नौकरी के दौरान टीईटी पास करने को पर्याप्त मानते हुए दोनों की बर्खास्तगी को गलत ठहराया है।


शीर्ष अदालत ने कहा कि बदले नियमों के मुताबिक टीईटी पास करने के लिए 31 मार्च 2019 तक का समय था जबकि दोनों शिक्षकों ने 2011 और 2014 में ही टीईटी पास कर लिया था। यहां तक कि बर्खास्तगी की तारीख 12 जुलाई 2018 को वो दोनों टीईटी कर चुके थे ऐसे में उन्हें बर्खास्तगी की तारीख पर अयोग्य मानना गलत है।

ये फैसला प्रधान न्यायाधीश बीआर गवई और के विनोद चंद्रन की पीठ ने उत्तर प्रदेश, कानपुर में भौती के ज्वाला प्रसाद तिवारी जूनियर हाईस्कूल के शिक्षक उमाकांत और एक अन्य की याचिका स्वीकार करते हुए शुक्रवार को दिया। शीर्ष अदालत ने शिक्षकों की याचिका खारिज करने का इलाहाबाद हाई कोर्ट की खंडपीठ और एकलपीठ का आदेश खारिज कर दिया है इसके साथ ही दोनों शिक्षकों की बर्खास्तगी का आदेश भी रद कर दिया है। 

पीठ ने दोनों शिक्षकों को तत्काल प्रभाव से बहाल करने का आदेश देते हुए कहा है कि दोनों शिक्षक किसी तरह के बकाया वेतन के भुगतान के अधिकारी नहीं होंगे, लेकिन बहाली के बाद उनकी नौकरी पहले से जारी नौकरी की तरह मानी जाएगी और उन्हें वरिष्ठता के सहित सारे परिणामी लाभ मिलेंगे।

इस मामले में दोनों शिक्षकों ने हाई कोर्ट की खंडपीठ के एक मई 2024 के आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें कोर्ट ने उनकी बर्खास्तगी रद कर पुनः बहाली की मांग वाली याचिका खारिज कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि बर्खास्तगी के समय दोनों शिक्षक टीईटी कर चुके थे ऐसे में उन्हें अयोग्य मानकर बर्खास्त किया जाना गलत है। 


क्या है मामला? 
नेशनल काउंसिल फार टीचर्स एजूकेशन (एनसीटीई) ने 23 अगस्त 2010 को कक्षा एक से आठ तक के शिक्षकों के लिए टीईटी की न्यूनतम योग्यता तय कर दी। राज्य सरकार को तय नियमों के तहत टीईटी परीक्षा करानी थी। इसके बाद 25 जून 2011 को भौती के सहायता प्राप्त विद्यालय ज्वाला प्रसाद तिवारी जूनियर हाई स्कूल ने सहायक शिक्षकों के चार पदों की रिक्तियां निकालीं। दोनों याचियों ने आवेदन किया। उत्तर प्रदेश में पहली बार 13 नवंबर 2011 को टीईटी परीक्षा आयोजित हुई, जिसे एक याची ने 25 नवंबर 2011 को पास कर लिया। 13 मार्च 2012 को बेसिक शिक्षा अधिकारी ने दोनों शिक्षकों का चयन मंजूर करते हुए उन्हें नियुक्ति पत्र जारी किया। दोनों शिक्षकों ने 17 मार्च 2012 को सहायक शिक्षक पद पर नौकरी ज्वाइन कर ली 124 मई 2014 को दूसरे याची ने भी टीईटी परीक्षा पास कर ली। 

इस बीच नौ अगस्त 2017 को आरटीई एक्ट की धारा 23 में संशोधन हुआ, जिसमें कहा गया कि 31 मार्च 2015 तक नियुक्त शिक्षकों में जिसने टीईटी परीक्षा पास नहीं की है वे चार साल के भीतर इसे पास कर न्यूनतम योग्यता हासिल करें। टीईटी पास करने के लिए 31 मार्च 2019 तक का समय दिया गया, लेकिन 12 मार्च 2018 को दोनों शिक्षकों को नियुक्ति के समय टीईटी पास न होने के कारण बर्खास्त कर दिया गया और उनकी नियुक्ति का आदेश वापस ले लिया गया। जिसे उन्होंने हाई कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन हाई कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी।

Saturday, October 25, 2025

बिना ठोस कारण बताए अचानक सेवा से बर्खास्तगी नहीं की जा सकती : हाईकोर्ट

बिना ठोस कारण बताए अचानक सेवा से बर्खास्तगी नहीं की जा सकती : हाईकोर्ट

वाराणसी में तैनात सहायक प्रोफेसरों की बर्खास्तगी का मामला

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि दो दशक तक लगातार कार्य करने के बाद सहायक प्रोफेसरों को बिना ठोस कारण बताए सेवा से बर्खास्त नहीं किया जा सकता। बर्खास्तगी आदेश में तार्किक कारणों का उल्लेख भी किया जाना चाहिए। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की अदालत ने वाराणसी के अग्रसेन कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय में तदर्थ रूप से कार्यरत सहायक प्रोफेसर डॉ. प्रतिभा तिवारी समेत आठ अन्य की ओर से दाखिल याचिका निस्तारित कर दी।


कोर्ट ने महाविद्यालय प्रशासन को याचियों के बर्खास्तगी आदेश पर पुनर्विचार कर नए सिरे से तार्किक व नियमानुसार आदेश पारित करने का आदेश दिया है। याचियों की दलील है कि वे लंबे समय से कॉलेज में सहायक प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं। 2019 में वित्तीय कारणों का हवाला देकर पदों को नियमित भर्ती से भरे जाने का तर्क देते हुए उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं। कोर्ट ने इसे अनुचित बताया और कहा कि जो शिक्षक इतने लंबे समय तक कॉलेज में सेवाएं देते रहे, उन्हें एक ही दिन में बिना कारण बताए बर्खास्त नहीं किया जा सकता।

Thursday, August 21, 2025

11 साल की नौकरी के बाद बाद फर्जी डिग्री वाले 22 शिक्षक बर्खास्त, जिला विद्यालय निरीक्षकों को एफआइआर दर्ज कराने के लिए निर्देश

11 साल की नौकरी के बाद बाद फर्जी डिग्री वाले 22 शिक्षक बर्खास्त, जिला विद्यालय निरीक्षकों को एफआइआर दर्ज कराने के लिए निर्देश


लखनऊः माध्यमिक शिक्षा में सहायक अध्यापक पदों पर हुईं नियुक्तियों की जांच में बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है। सत्यापन में 22 शिक्षकों के प्रमाणपत्र फर्जी पाए गए हैं। माध्यमिक शिक्षा विभाग ने उनकी सेवाएं समाप्त करते हुए वेतन की रिकवरी और उनके विरुद्ध एफआइआर दर्ज कराने का आदेश दिया है। यह सभी नियुक्तियां आजमगढ़ मंडल में अप्रैल 2014 में हुई थी। स्थानांतरण के बाद वर्तमान में ये सभी शिक्षक अलग-अलग कालेजों में कार्यरत थे।

माध्यमिक शिक्षा निदेशक की ओर से एलटी ग्रेड (प्रशिक्षित स्नातक शिक्षक) के रिक्त पदों को भरने के लिए समाचार पत्रों में विज्ञापन के माध्यम से आवेदन पत्र आमंत्रित किए थे। इन नियुक्तियों में हाईस्कूल, इंटरमीडिएट, स्नातक व प्रशिक्षण अर्हता के आधार पर मेरिट बनाकर काउंसिलिंग के जरिये चयन किया गया था। दस्तावेजों की गहन जांच में कई अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्र कूटरचित मिले। फर्जी अभिलेखों के आधार पर नियुक्त हुए 22 शिक्षकों की सेवाएं 11 वर्ष के बाद तत्काल समाप्त कर दी गईं हैं। 

इन फर्जी शिक्षकों से उनके द्वारा अब तक प्राप्त वेतन की वसूली (रिकवरी) की जाएगी। इसके अतिरिक्त संबंधित शिक्षकों के खिलाफ एफआइआर दर्ज कराने के आदेश भी जारी किए गए हैं। संबंधित जिला विद्यालय निरीक्षकों को सख्त कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।


लाखों रुपये की आएगी रिकवरी 
एलटी ग्रेड में शिक्षकों का शुरुआती वेतन करीब 55 हजार रुपये महीने है जो वरिष्ठता के हिसाब से इस समय 75 हजार रुपये महीने होगा। ऐसे में अगर औसत 60 हजार रुपये महीने के हिसाब से एक वर्ष के वेतन की गणना करें तो 7,20,000 रुपये हुए। इस तरह से नौ वर्ष में प्राप्त वेतन का आकलन करें तो यह 64,80,000 रुपये हुए। ऐसे में एक शिक्षक से करीब 64-65 लाख रुपये की रिकवरी होगी। 

सवाल यह है कि ये शिक्षक फर्जी प्रमाणपत्रों के बूते कैसे नौकरी करते रहे और सत्यापन में इतना समय लग गया। अब इन शिक्षकों से रिकवरी कैसे होगी? माध्यमिक शिक्षा निदेशक डा. महेंद्र देव ने बताया कि पहले मेरिट के आधार पर नियुक्ति होती थी।


Saturday, August 9, 2025

प्रशासनिक लापरवाही पर कर्मी को धोखाधड़ी का दोषी नहीं ठहरा सकते – हाईकोर्ट के, सहायक अध्यापक पद से बर्खास्तगी आदेश को दी थी चुनौती

प्रशासनिक लापरवाही पर कर्मी को धोखाधड़ी का दोषी नहीं ठहरा सकते – हाईकोर्ट के, सहायक अध्यापक पद से बर्खास्तगी आदेश को दी थी चुनौती


प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी सरकारी विभाग की लापरवाही से कोई त्रुटि होती है तो उसके ए कर्मचारी को धोखाधड़ी का दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इस टिप्पणी संग कोर्ट ने स्वतंत्रता सेनानी के आश्रित होने के कथित फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर बर्खास्त किए गए सहायक अध्यापक को बहाल कर दिया।

यह आदेश न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान ने बलिया के नवतेज कुमार सिंह की याचिका पर दिया। नवतेज को बलिया के जूनियर बेसिक स्कूल में स्वतंत्रता सेनानी आश्रित श्रेणी के तहत सहायक अध्यापक के पद पर नियुक्त किया गया था। उन्होंने 22 अक्तूबर 2020 को कार्यभार संभाला। दस्तावेज के सत्यापन के दौरान उनकी ओर से प्रस्तुत चार अप्रैल 2008 का स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाण पत्र बलिया के डीएम के रिकॉर्ड में क्रम संख्या 1114 पर दर्ज नहीं था। इस क्रम संख्या पर एक हरमीत सिंह का नाम था। इसके बाद उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया गया।

याची ने एक अप्रैल 2021 को डीएम के कार्यालय से एक और प्रमाण पत्र प्राप्त किया जिसमें फिर से पुष्टि की गई कि वह स्वतंत्रता सेनानी आश्रित हैं। इसके बावजूद जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने उनकी सेवाएं समाप्त कर दीं। साथ ही उन्हें प्राप्त वेतन वापस करने का भी निर्देश दिया।

हाईकोर्ट ऑर्डर 👇 


Friday, January 17, 2025

अवैध बर्खास्तगी के खिलाफ दाखिल अध्यापक की अपील खारिज किए जाने पर हाईकोर्ट ने बीएसए जौनपुर से मांगा शपथपत्र

अवैध बर्खास्तगी के खिलाफ दाखिल अध्यापक की अपील खारिज किए जाने पर हाईकोर्ट ने बीएसए जौनपुर से मांगा शपथपत्र

हाई कोर्ट ने कहा- व्यक्तिगत हलफनामा दें अथवा हाजिर हों, अब 23 को सुनवाई


प्रयागराज : इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अवैध बर्खास्तगी के खिलाफ दाखिल अध्यापक की अपील खारिज किए जाने संबंधी बेसिक शिक्षा अधिकारी (बीएसए) जौनपुर के आदेश पर नाराजगी जताई है। व्यक्तिगत शपथपत्र दाखिल कर यह बताने के लिए कहा है कि किस विवेकाधिकार से उन्होंने बिना अधिकार पारित बर्खास्तगी आदेश के खिलाफ दाखिल अपील खारिज की है। अपील मेंबर सेक्रेटरी बेसिक एजुकेशन बोर्ड के समक्ष दाखिल की गई थी, किंतु आदेश बीएसए ने पारित किया है।


यह आदेश न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया ने प्राथमिक विद्यालय हरिपुर, सुजानगंज जौनपुर में कार्यरत अध्यापक सुशील कुमार यादव की याचिका पर दिया है। याची अधिवक्ता आलोक कुमार यादव ने कहा कि बर्खास्तगी आदेश के खिलाफ दाखिल अपील पर सुनवाई का अधिकार मेंबर सेक्रेटरी बेसिक एजुकेशन बोर्ड को है न कि बीएसए को है। अनुसार याची को 27 दिसंबर 2019 को बर्खास्त कर दिया गया था। इसके खिलाफ अपील दाखिल की थी। बीएसए ने खुद अपील पर सुनवाई कर उसे खारिज कर दिया।

बीएसए के 13 नवंबर 2024 के आदेश को चुनौती दी गई है। कोर्ट ने कहा है कि यदि हलफनामा दाखिल नहीं किया जाता है तो बीएसए 23 जनवरी 2024 को कोर्ट में उपस्थित रहेंगे।

Saturday, December 21, 2024

शिक्षक के निलंबन के मामले बीएसए हरदोई के खिलाफ जांच कर तीन महीने में रिपोर्ट करें दाखिल : हाईकोर्ट

शिक्षक के निलंबन के मामले बीएसए हरदोई के खिलाफ जांच कर तीन महीने में रिपोर्ट करें दाखिल : हाईकोर्ट

शिक्षक के निलंबन के मामले में कार्रवाई को पाया अनुचित


लखनऊ। हरदोई के एक शिक्षक के निलंबन मामले में बीएसए ने हाईकोर्ट लखनऊ के आदेश की अवहेलना करते हुए आदेश पास करने पर हाईकोर्ट ने बीएसए के खिलाफ कार्रवाई के आदेश दिए हैं। अदालत ने बीएसए के खिलाफ जांच कर तीन महीने में रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया। साथ ही जांच पूरी होने तक बीएसए को कोई जिम्मेदारी न देने के भी निर्देश दिए हैं।

न्यायमूर्ति अब्दुल मोईन की एकल पीठ ने राजीव कुमार मिश्रा की याचिका पर सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई नौ अप्रैल को नियत की है।

याची के अधिवक्ता विजय कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि अदालत ने याची के खिलाफ आदेश पारित करने से पहले याची को जीवन निर्वाह भत्ता देने का आदेश दिया था। संबंधित बीएसए ने अदालत के आदेश की अवहेलना करते हुए पिछली दिनांक में फर्जी आदेश पारित कर दिया।

अदालत ने बीएसए के आदेश पर नाराजगी जताते हुए उसके खिलाफ कार्रवाई करने का आदेश दिया है। अदालत ने बीएसए द्वारा पारित 10 अप्रैल के आदेश को भी निरस्त कर दिया है।




हरदोई बीएसए को निलंबित करने का हाईकोर्ट का आदेश, निलंबित शिक्षक को बर्खास्त करने और उसके देयकों के भुगतान के बारे में उच्च न्यायालय के अवहेलना पड़ी भारी  

हरदोई। बेसिक शिक्षा अधिकारी वीपी सिंह को मनमानी भारी पड़ गई है, उनके द्वारा निलंबित शिक्षक को टर्मिनेट करने और उसके देयकों के भुगतान के बारे में उच्च न्यायालय के दो निर्देशों की अवहेलना की गाज जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी विजय प्रताप सिंह पर गिरी है। दरअसल हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के जस्टिस अब्दुल मुईन ने बीएसए वीपी सिंह को निलंबित करने का शासन को आदेश दिया है। मामला बावन ब्लॉक के सधई बेहटा परिषदीय विद्यालय में तैनात रहे अध्यापक राजीव कुमार मिश्रा से जुड़ा है। 


जानकारी के अनुसार राजीव को विभाग ने निलंबित और बाद में बर्खास्त कर दिया था। राजीव विभाग की कार्यवाही और देयकों आदि के भुगतान नहीं होने का मामला उच्च न्यायालय लखनऊ ले गए थे। बताते हैं, देयकों के भुगतान को लेकर हाई कोर्ट ने दो मर्तबा जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी विजय प्रताप सिंह को दिशा निर्देश जारी किए थे। लेकिन, वीपी सिंह ने हाई कोर्ट के निर्देश पर अमल नहीं किया। न्यायालय की अवमानना से क्षुब्ध जस्टिस अब्दुल मुईन ने हरदोई बीएसए को निलंबित करने का आदेश शासन को दिया है और भविष्य में कभी बीएसए जैसे महत्वपूर्ण पर से इन्हें दूर रखने के दिशा निर्देश सरकार को जारी किए हैं। 


🔴 देखें कोर्ट ऑर्डर 👇



Sunday, March 31, 2024

Bihar Education News: एक अप्रैल से बेरोजगार हो जाएंगे हजारों अतिथि शिक्षक? बिहार के शिक्षा विभाग के फैसले से मचा हड़कंप

Bihar Education News: एक अप्रैल से बेरोजगार हो जाएंगे हजारों अतिथि शिक्षक? बिहार के शिक्षा विभाग के फैसले से मचा हड़कंप


शिक्षा विभाग के आदेश से हजारों अतिथि शिक्षकों को रोजगार की चिंता सताने लगी है. 31 मार्च को अतिथि शिक्षकों की सेवा का उच्च माध्यमिक स्कूलों में आखिरी दिन है.


Bihar Guest Teacher Service Ends: बिहार के सरकारी स्कूलों को अब अतिथि शिक्षकों की जरूरत नहीं है. शिक्षा विभाग ने उच्च माध्यमिक स्कूलों में कार्यरत हजारों शिक्षकों को नौकरी से हटाने का फरमान सुनाया है. 31 मार्च 2024 के बाद 4257 अतिथि शिक्षक उच्च माध्यमिक स्कूलों से बाहर हो जायेंगे. माध्यमिक शिक्षा निदेशक कन्हैया प्रसाद ने सभी जिला शिक्षा पदाधिकारियों को आदेश जारी किया है.


शनिवार को जारी पत्र में कहा गया है कि 1 अप्रैल से अतिथि शिक्षकों की सेवा किसी भी परिस्थिति में नहीं ली जाये. जिला शिक्षा पदाधिकारियों को अतिथि शिक्षकों के सेवा में नहीं होने का प्रमाण पत्र भी शिक्षा विभाग को उपलब्ध कराना होगा.


सरकारी स्कूलों को अब नहीं है अतिथि शिक्षकों की जरूरत

बता दें कि अतिथि शिक्षक 6 वर्षों से राज्य के विभिन्न उच्च माध्यमिक स्कूलों में सेवा दे रहे थे. शिक्षा विभाग के फैसले से अतिथि शिक्षक बेरोजगार हो जायेंगे. अब नए सिरे से नौकरी की तलाश में दर दर की ठोकरें खानी होंगी. शिक्षा विभाग का पत्र सामने आने के बाद अतिथि शिक्षकों में हड़कंप मचा हुआ.


चिंता की लकीरें माथे पर साफ दिखाई दे रही हैं. 6 साल पहले शिक्षा विभाग ने स्कूलों में निर्धारित पारिश्रमिक पर अतिथि शिक्षकों की सेवा लेने का फैसला लिया था.


शिक्षा विक्षाग के एक फैसले ने पल भर में किया बेरोजगार

अब अतिथि शिक्षकों की सेवा को मात्र एक दिन बचा है. 31 मार्च के बाद उच्च माध्यमिक स्कूलों में अतिथि शिक्षक बच्चों को नहीं पढ़ा सकेंगे. हाल के दिनों में बिहार पब्लिक सर्विस कमीशन की तरफ से बड़े पैमाने पर शिक्षकों की बहाली हुयी है

कक्षा 9वीं-10वीं के लिए 37847 और कक्षा 11वीं-12वीं के लिए 56891 उच्च माध्यमिक स्कूलों में कुल 94738 शिक्षकों की नियुक्ति कर योगदान करा दिया गया है. शिक्षा विभाग की दलील है कि इसलिए अब अतिथि शिक्षकों की जरूरत नहीं है. 




Friday, January 12, 2024

फर्जी दस्तावेज लगाकर नौकरी कर रहे 382 शिक्षक किए जाएंगे बर्खास्त, 48 जिलों के बीएसए को STF ने जांच के बाद लिखा पत्र

फर्जी दस्तावेज लगाकर नौकरी कर रहे 382 शिक्षक किए जाएंगे बर्खास्त, 48 जिलों के बीएसए को STF ने जांच के बाद लिखा पत्र


लखनऊ : परिषदीय स्कूलों में फर्जी दस्तावेज लगाकर नौकरी करने वाले 382 शिक्षकों को बर्खास्त करने की संस्तुति यूपी एसटीएफ की ओर से की गई है। सबसे ज्यादा 52 शिक्षक देवरिया के हैं। मथुरा के 43 और सिद्धार्थनगर के 29 फर्जी शिक्षक इसमें शामिल हैं। बीते करीब पांच वर्षों से एसटीएफ फर्जी मार्कशीट व प्रमाणपत्र लगाकर नौकरी कर रहे शिक्षकों की जांच कर रही थी। बर्खास्तगी के बाद फर्जी शिक्षकों को दिए गए वेतन की वसूली भी की जाएगी।

परिषदीय स्कूलों में शिक्षक पद पर वर्ष 2006 से वर्ष 2016 तक भर्तियां हुई थीं। बीते दिनों देवरिया के 85 फर्जी शिक्षकों को बर्खास्त किया जा चुका है। अब इस जिले में 52 और फर्जी शिक्षक सामने आ गए हैं। जिन 382 फर्जी शिक्षकों को बर्खास्त करने की सिफारिश की गई है वे 48 जिलों के हैं। इन जिलों के बेसिक शिक्षा अधिकारियों को पत्र भेजकर इसकी जानकारी दे दी गई है। शिक्षक भर्ती के पूरे डाटाबेस की गहन जांच की जा रही है।



एसटीएफ की जांच के फर्जी दस्तावेजों पर नौकरी कर रहे 382 बेसिक शिक्षक होंगे बर्खास्त, सबसे ज्यादा देवरिया और मथुरा जिले के


फर्जी दस्तावेज लगाकर सरकारी नौकरी हासिल करने वाले प्रदेश के 382 शिक्षकों को जल्द बर्खास्त किया जा सकता है। यूपी एसटीएफ ने जांच के बाद दोषी पाए गए शिक्षकों को बर्खास्त करने के लिए 48 जिलों के बेसिक शिक्षा अधिकारियों को पत्र लिखा है। इन सभी की जांच बीते करीब साढ़े तीन वर्षों के दौरान की गयी है।




बता दें कि एसटीएफ बीते करीब पांच वर्ष से फर्जी दस्तावेज लगाकर शिक्षक की नौकरी हासिल करने के मामले की जांच कर रही है। एसटीएफ के अनुमान के मुताबिक प्रदेश में इस तरह के करीब 50 हजार शिक्षक हैं, जिन्होंने दूसरे की मार्कशीट लगाकर नौकरी हासिल की और सालों से काम कर रहे हैं। हाल ही में एसटीएफ ने ऐसे 382 शिक्षकों के खिलाफ जांच पूरी कर उनको बर्खास्त करने की संस्तुति की है। इनमें सर्वाधिक 52 शिक्षक देवरिया के हैं। इसके अलावा मथुरा के 43, सिद्धार्थनगर के 29 शिक्षक हैं। बाकी जिलों के शिक्षकों की सूची जल्द अपडेट हो जाएगी। 



2006 से 2016 तक हुए भर्ती

एसटीएफ के सूत्रों के मुताबिक ये भर्तियां वर्ष 2006 से 2016 के बीच हुई थी। एसटीएफ और जिला पुलिस की जांच के बाद देवरिया में बीते दिनों 85 शिक्षकों को बर्खास्त किया जा चुका है। अब एसटीएफ मुख्यालय यह पता लगाने का प्रयास कर रहा है कि किस तरह जालसाजों ने सरकारी सिस्टम को धता बताकर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नौकरी हासिल की थी। इसके लिए बेसिक शिक्षा विभाग के डाटाबेस की गहनता से पड़ताल जारी है।

Monday, January 8, 2024

विवाद बढ़ा तो तलब किया तदर्थ शिक्षकों का ब्योरा, निदेशक ने दिए सभी जेडी को आदेश, लंबित मामले तत्काल निस्तारित करें

विवाद बढ़ा तो तलब किया तदर्थ शिक्षकों का ब्योरा, निदेशक ने दिए सभी जेडी को आदेश, लंबित मामले तत्काल निस्तारित करें


लखनऊ : प्रदेश सरकार ने नवंबर 2023 को एडेड माध्यमिक विद्यालयों के 2090 तदर्थ शिक्षकों की सेवाएं समाप्त कर दीं। इसके बावजूद अभी ये मामला सुलझ नहीं रहा। लगातार शिक्षक कोर्ट जा रहे हैं। बढ़ते विवादों के बाद माध्यमिक शिक्षा निदेशक ने सभी मंडलीय शिक्षा निदेशकों (जेडी) को आदेश दिए हैं कि तदर्थ शिक्षकों के विवादित मामले तत्काल निस्तारित करके ब्योरा भेजें। यह भी सुनिश्चित करें कि अब एक भी मामला लंबित नहीं है।


 ये था मामला : प्रदेश के एडेड माध्यमिक विद्यालयों में समय समय पद तदर्थ शिक्षकों की नियुक्ति की जाती रही। लम्बे समय तक काम करने के बाद उनको नियमित भी किया जाता रहा। 2016 में एक अधिसूचना जारी कर 1993 से लेकर 2000 तक नियुक्त शिक्षकों को नियमित किया गया। इस आधार पर 2000 के बाद नियुक्त शिक्षक भी नियमित करने की मांग करने लगे। कई शिक्षक कोर्ट गए। मामला सुप्रीम कोर्ट गया। इस बीच यह बात भी आई कि कुछ शिक्षक नियमानुसार नियुक्त नहीं हैं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने नियमों की पड़ताल करते हुए सभी मामलों को निस्तारित करने के आदेश दिए। 


इस पर सभी जिलों को मामले निस्तारित करने को कहा गया। सभी जिलों से आए ब्योरे के बाद नवंबर में 2090 शिक्षकों की नियुक्ति निरस्त कर दी गई। इसमें 997 ऐसे थे जो 2000 से पहले नियुक्त थे और 1111 ऐसे थे जो बाद में नियुक्त हुए थे।


जिम्मेदार होंगे मंडलीय और जिले के अफसर : इसके बाद फिर शिक्षक हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जाने लगे। उनका तर्क है कि समान प्रकृति का मामला होने पर भी कुछ को वेतन दिया जा रहा है और कुछ को नहीं। इस आधार पर कोर्ट भी उनको राहत दे रहा है। 


कोर्ट के ही निर्देशों पर एक बार फिर से सभी मंडलीय संयुक्त शिक्षा निदेशकों को आदेश दिए हैं कि वे ऐसे मामलों का प्राथमिकता के आधार पर निस्तारण करें। यदि कोई मामला लंबित पाया जाता है तो जेडी जिम्मेदार होंगे। माध्यमिक शिक्षा निदेशक ने आदेश में सभी जेडी को दो दिन में डीआईओएस को कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। उसके बाद डीआईओएस को प्रबंधक से दो दिन में कार्रवाई करवानी है। प्रबंधक को सात दिन में डीआईओएस को पत्रावली उपलब्ध करानी होगी। उसके बाद डीआईओएस को तीन दिन में और फिर जेडी को सात दिन में मामला निस्तारित करके रिपोर्ट निदेशालय को भेजनी है।


साढ़े तीन साल से 979 तदर्थ शिक्षक बने त्रिशंकु, सभी तदर्थ शिक्षकों को निश्चित मानदेय पर समायोजित करने की चर्चा


1993 से 30 दिसंबर 2000 तक नियुक्त शिक्षकों का मामलासहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों में हुई थी नियुक्ति 

सेवा समाप्ति के आदेश के बाद मंडल स्तर पर छोड़ा निर्णय, संयुक्त शिक्षा निदेशकों को इन पर निर्णय लेने के निर्देश


प्रयागराज । सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों में सात अगस्त 1993 से 30 दिसंबर 2000 तक नियुक्त 979 तदर्थ शिक्षक साढ़े तीन साल से त्रिशंकु बने हुए हैं। संजय सिंह के मामले में सुप्रीम कोर्ट के 26 अगस्त 2020 के आदेश पर इन शिक्षकों को नौ नवंबर 2023 को बाहर कर दिया गया था जिसके खिलाफ 2000 के पूर्व नियुक्त शिक्षकों की याचिका पर हाईकोर्ट ने फिलहाल उनकी सेवाएं समाप्त करने के आदेश पर रोक लगा दी है।


इस पर माध्यमिक शिक्षा निदेशक डॉ. महेन्द्र देव ने सभी संयुक्त शिक्षा निदेशकों से तदर्थ शिक्षकों के विनियमितीकरण के निस्तारण की रिपोर्ट शिक्षा निदेशालय को उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं।

इन शिक्षकों का तर्क है कि संजय सिंह के आदेश पर वर्ष 2000 के बाद नियुक्त शिक्षकों को तो प्रशिक्षित स्नातक (टीजीटी) और प्रवक्ता (पीजीटी) भर्ती में मौका दिया गया था।

लेकिन साल 2000 से पहले नियुक्त शिक्षकों को अवसर नहीं मिला था। बिना मौका दिए सभी को बाहर का रास्ता दिखाना उचित नहीं है। सूत्रों के अनुसार सभी तदर्थ शिक्षकों को निश्चित मानदेय पर समायोजित करने की तैयारी चल रही है।


माध्यमिक स्कूलों में पढ़ा रहे तदर्थ शिक्षकों को इलाहाबाद हाईकोर्ट से बड़ी राहत, सेवाएं समाप्त करने के आदेश पर रोक 

09 नवंबर 2023 के शासनादेश को तदर्थ शिक्षकों ने दी थी चुनौती
तदर्थ शिक्षकों को हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी के माध्यमिक विद्यालयों में पढ़ा रहे तदर्थ शिक्षकों की सेवाएं समाप्त करने के शासनादेश पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है। तदर्थ शिक्षकों की ओर से दाखिल याचिकाओं में उनकी सेवा समाप्त करने के नौ नवंबर 2023 के शासनादेश को चुनौती दी गई है। कोर्ट ने शिक्षकों के पक्ष में अंतरिम आदेश में यह भी स्पष्ट किया है की यह आदेश केवल उन्हीं तदर्थ शिक्षकों पर लागू होगा, जिनकी नियुक्तियां सेकंड रिमूवल ऑफ डिफिकल्टी ऑर्डर एवं धारा 18 तथा यूपी माध्यमिक शिक्षा सेवा आयोग रूल्स 1995 के नियम 15 के तहत हुई हो।


हाईकोर्ट ने यह आदेश विनोद कुमार श्रीवास्तव व कई अन्य की याचिकाओं पर दिया है। कोर्ट ने कहा है कि अंतरिम आदेश का लाभ उन्हीं तदर्थ शिक्षकों को मिलेगा जो धारा 33 बी, सी, जी के तहत विनीयमितीकरण के हकदार होंगे। प्रदेश के माध्यमिक विद्यालयों में नियुक्त तदर्थ शिक्षकों ने याचिकाएं दाखिल कर प्रदेश सरकार द्वारा नौ नवंबर 2023 के शासनादेश को विभिन्न आधारों पर चुनौती दी है। सरकार ने इस शासनादेश से प्रदेश तदर्थ शिक्षकों को जो धारा 33 जी के तहत विनीयमितीकरण के हकदार नहीं है, उनकी सेवाएं समाप्त करने का निर्देश दिया है।



तदर्थ शिक्षकों की सेवाएं समाप्त करने पर रोक : हाईकोर्ट

प्रयागराज । इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रदेश के माध्यमिक विद्यालयों में पढ़ा रहे तदर्थ शिक्षकों की सेवाएं समाप्त करने के शासनादेश पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है। तदर्थ शिक्षकों की ओर से दाखिल याचिकाओं में उनकी सेवा समाप्त करने के नौ नवंबर 2023 के शासनादेश को चुनौती दी गई है। कोर्ट ने शिक्षकों के पक्ष में अंतरिम आदेश में यह भी स्पष्ट किया है की यह आदेश केवल उन्हीं तदर्थ शिक्षकों पर लागू होगा, जिनकी नियुक्तियां सेकंड रिमूवल ऑफ डिफिकल्टी ऑर्डर एवं धारा 18 तथा यूपी माध्यमिक शिक्षा सेवा आयोग रूल्स 1995 के नियम 15 के तहत हुई हो। 


हाईकोर्ट ने यह आदेश विनोद कुमार श्रीवास्तव व कई अन्य की याचिकाओं पर दिया है। कोर्ट ने कहा है कि अंतरिम आदेश का लाभ उन्हीं तदर्थ शिक्षकों को मिलेगा जो धारा 33 बी, सी, जी के तहत विनीयमितीकरण के हकदार होंगे। प्रदेश के माध्यमिक विद्यालयों में नियुक्त तदर्थ शिक्षकों ने याचिकाएं दाखिल कर प्रदेश सरकार द्वारा नौ नवंबर 2023 के शासनादेश को विभिन्न आधारों पर चुनौती दी है। सरकार ने इस शासनादेश से प्रदेश तदर्थ शिक्षकों को जो धारा 33 जी के तहत विनीयमितीकरण के हकदार नहीं है, उनकी सेवाएं समाप्त करने का निर्देश दिया है।


Thursday, December 21, 2023

विभागीय छवि धूमिल करने के आरोप में खंड शिक्षा अधिकारी निलंबित

विभागीय छवि धूमिल करने के आरोप में खंड शिक्षा अधिकारी निलंबित


हरदोई : बेसिक शिक्षा विभाग में विभागीय मिलीभगत से शिकायतों के नाम पर धन वसूली के आरोप में पहली बार इतनी बड़ी कार्रवाई हुई है। जिलाधिकारी के पूरा मामला संज्ञान में लेने के बाद न केवल इस मामले में तत्कालीन बीईओ समेत पांच पर एफआइआर दर्ज कराई गई थी। बल्कि बीईओ को निलंबित कर उच्च स्तरीय जांच शुरू की गई है। विभाग में ऐसे मामले तो कई बार आए, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई थी। अब हुई कार्रवाई चर्चा का विषय बनी हुई है।


हरदोई : डीएम की संस्तुति और एफआईआर के बाद बीईओ निलंबित, बैठी जांच


20 दिसंबर 2023



10 दिसंबर 2023

बीईओ के खिलाफ शासन से डीएम ने की बर्खास्तगी की संस्तुति, शिक्षा विभाग में मची खलबली

संगठित गिरोह बनाकर शिक्षक व विभागीय अधिकारियों का सूचना के अधिकार के नाम पर कर रहे थे आर्थिक व मानसिक दोहन




हरदोई। डीएम ने बीईओ की बर्खास्तगी की संस्तुति शासन से की है। वहीं, अभी कई अन्य पर भी कार्रवाई हो सकती है। इस मामले के बाद शिक्षा विभाग में खलबली है।


प्राथमिक शिक्षक संघ ने शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि कुछ लोग संगठित गिरोह बनाकर शिक्षक व विभागीय अधिकारियों का सूचना के अधिकार के नाम पर आर्थिक व मानसिक दोहन कर रहे है। इस पर जिलाधिकारी ने प्रथम दृष्टया तत्कालीन बीईओ बेंहदर अशोक यादव व कार्यालय लिपिक मधुर पाल का मोबाइल जमा करा लिया था और मोबाइल की साइबर सेल से जांच कराई थी।


जांच टीम ने पाया था कि बीईओ अशोक यादव, पिहानी के कुल्लही निवासी विमलेश शर्मा, सुभाष नगर निवासी अतुल कुमार सिंह, चांद बेहटा निवासी भगत बाबा तेज गिरि और आशा निवासी राम शरण गुप्ता से विभागीय सूचनाएं साक्षा करते हैं और उसी पर विभाग में वह लोग शिकायतें दर्ज कराके अधिकारियों व कर्मचारियों को ब्लैकमेल करते हैं। डीएम के निर्देश पर शहर कोतवाली में पांचों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई गई है।


इस मामले में जिलाधिकारी मंगला प्रसाद सिंह ने बीईओ अशोक यादव की बर्खास्तगी की संस्तुति की गई है। जिलाधिकारी ने बताया कि बीईओ के खिलाफ बर्खास्तगी की संस्तुति शासन से की गई है और पुलिस को इस मामले कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।


बीईओ व विमलेश शर्मा के बीच हुए 150 पेज की चैटिंग

जांच टीम ने पाया कि बीईओ अशोक यादव और विमलेश शर्मा के बीच व्हाट्सएप पर जो चैट की गई, उसमें बीईओ पहले जानकारी देते थे, जिस पर विमलेश शर्मा शिकायत बनाता था। इसमें बाद में बीईओ संसोधन करके वापस करते थे। वहीं, अगले दिन शिकायत सूचना के अधिकारी के रूप में विभाग में दी जाती थी। इस तरह 150 पेज की चैटिंग मिली है। इसके अलावा 32 जीवी में दोनों के बीच के वार्ता का रिकार्ड है। विमलेश ने विभाग में सूचना के अधिकार के 50, अतुल सिंह ने 60, बाबा तेज गिरी ने 30 और रामशरन ने 102 आवेदन किए हैं।


बीईओ समेत पांच पर रिपोर्ट, बर्खास्तगी की संस्तुति

हरदोई। बेसिक शिक्षा विभाग में तैनात अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ ही विभाग से संंबंधित गोपनीय जानकारियां बाहरी लोगों को देकर वसूली का संगठित गिरोह चलाने के आरोप में खंड शिक्षा अधिकारी समेत पांच लोगों के खिलाफ शहर कोतवाली में रिपोर्ट दर्ज की गई है। जांच समिति ने खंड शिक्षा अधिकारी की बर्खास्तगी की संस्तुति की है।


बीती पांच सितंबर को उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक संघ के लेटर पैड पर आलाेक कुमार मिश्र ने डीएम एमपी सिंह और बीएसए विजय प्रताप सिंह से शिकायत दर्ज कराई थी। इस शिकायत में कहा था कि पिहानी कोतवाली क्षेत्र के कुल्लही निवासी विमलेश शर्मा, शहर कोतवाली क्षेत्र के सुभाष नगर निवासी अतुल कुमार सिंह और आशा निवासी राम शरण गुप्ता एक संगठित गिरोह चलाते हैं। 


विभागीय अधिकारियों, कर्मचारियों और शिक्षकों की शिकायत कर आर्थिक शोषण करते हैं। बड़ी संख्या में कर्मचारियों और अधिकारियों से जुड़ी व्यक्तिगत जानकारियां सूचना का अधिकार के माध्यम से मांगते हैं। डीएम ने इस पत्र पर तीन सदस्यीय जांच कमेटी गठित की थी। जांच समिति में एसडीएम शाहाबाद, सीओ शाहाबाद और बीएसए शामिल थे।


टीम को पता चला कि इस पूरे खेल के पीछे कुछ विभागीय लोग भी शामिल हैं। इस जानकारी पर डीएम ने बेहंदर के तत्कालीन बीईओ अशोक कुमार यादव, कनिष्ठ लिपिक मधुर पाल के मोबाइल फोन जब्त करा लिए और साइबर सेल से इसकी जांच कराई। जांच में पता चला कि अशोक कुमार यादव, विमलेश शर्मा को लगातार विभागीय जानकारियां दे रहा था। अधिकांश शिकायतें विमलेश शर्मा, भगत बाबा तेजगिरि ही तैयार करते थे। सोशल मीडिया में शिकायतों का प्रचार प्रसार कर उगाही की जाती थी।


जांच रिपोर्ट के आधार परखंड शिक्षा अधिकारी अशोक कुमार यादव के साथ ही कुल्लही निवासी विमलेश शर्मा, सुभाष नगर निवासी अतुल कुमार सिंह, आशा निवासी राम शरण गुप्ता और चांद बेहटा निवासी भगत बाबा तेज गिरि के खिलाफ जालसाजी, भयभीत करके वसूली करने, गोपनीय दस्तावेजों को अवांछित लोगों तक पहुंचाने और दूसरों को नुकसान पहुंचाने की साजिश करने की धाराओं में रिपोर्ट दर्ज की गई है।


शिकायतें लिखते थे दो लोग, दूसरे नामों से की जाती थी शिकायत
शहर कोतवाली में दर्ज कराई एफआईआर में स्पष्ट कहा गया है कि जब अशोक कुमार यादव का मोबाइल जब्त कर जांच साइबर सेल से कराई गई तो कई महत्वपूर्ण बिंदु सामने आए। अधिकांश शिकायतें विमलेश शर्मा और भगत बाबा तेजगिरि तैयार करते थे। इन शिकायतों को तैयार करने के लिए अशोक यादव की मदद ली जाती थी। 

लोकायुक्त कार्यालय में शिकायतें मनोज कुमार द्विवेदी, उपेंद्र कुमार राजन, ब्रजेश सिंह, अमित कुमार यादव आदि नामों से की जाती थीं। इसी तरह जनसूचना अधिनियम के तहत जानकारी मांगने के लिए भी प्रश्न विमलेश और भगत बाबा तैयार करते थे, जबकि अन्य नामों से इन सूचनाओं को मांगा जाता था।


हो सकती है आजीवन कारावास तक की सजा
वरिष्ठ अधिवक्ता ओपी दीक्षित के मुताबिक जिन धाराओं में मामला दर्ज हुआ है, वे संगीन हैं। शासकीय गुप्त बात अधिनियम, 1923 की धारा पांच के तहत दोष सिद्ध होने पर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है। धारा 211 भी आरोपियों पर लगी है। इसमें सात वर्ष तक की सजा का नियम है।

Sunday, November 12, 2023

कार्रवाई: 2090 तदर्थ शिक्षकों की सेवा समाप्त, एडेड कॉलेज में हुई थीं अनियमित नियुक्तियां

कार्रवाई: 2090 तदर्थ शिक्षकों की सेवा समाप्त, एडेड कॉलेज में हुई थीं अनियमित नियुक्तियां 

■ अपर शिक्षा निदेशक ने जारी किया आदेश


प्रयागराज  | सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों में सात अगस्त 1993 से नियुक्त 2090 तदर्थ शिक्षकों की सेवाएं प्रदेश सरकार ने समाप्त कर दी हैं। अपर शिक्षा निदेशक माध्यमिक सुरेन्द्र कुमार तिवारी ने इस संबंध में 10 नवंबर को दिशा- निर्देश जारी किए हैं। संजय सिंह के मामले में सुप्रीम कोर्ट के सात दिसंबर 2021 के आदेश के अनुसार तदर्थ शिक्षकों को राजकोष से वेतन भुगतान का करना उचित नहीं है।


सर्वोच्च न्यायालय के ही 26 अगस्त 2020 के आदेश पर तदर्थ शिक्षकों को उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड की टीजीटी-पीजीटी 2021 शिक्षक भर्ती परीक्षा में अवसर दिया जा चुका है। जिसमें केवल 40 तदर्थ शिक्षक सफल हुए थे। लिहाजा शेष शिक्षकों के वेतन भुगतान की जिम्मेदारी राज्य सरकार की नहीं है। इनके भुगतान दायित्व प्रबंधतंत्र का है। इनकी नियुक्ति नियमों के विपरीत की गई थी। वहीं उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष पूर्व एमएलसी सुरेश कुमार त्रिपाठी ने आदेश की कड़ी निंदा की है।


तदर्थ शिक्षकों को हटाने का निर्णय अमानवीय, माध्यमिक शिक्षक संघ ने सरकार के निर्णय को बताया गलत


लखनऊ। शासन की ओर से एडेड माध्यमिक विद्यालयों में 25-30 साल से पढ़ा रहे तदर्थ शिक्षकों को हटाने के निर्णय पर उप्र माध्यमिक शिक्षक संघ ने नाराजगी जताई है। संघ ने इस निर्णय को अमानवीय बताया है। संघ पदाधिकारियों ने कहा कि शिक्षकों का बकाया वेतन भुगतान करने के निर्णय का तो स्वागत है, लेकिन उनकी सेवाएं समाप्त करना अनुचित है।


संघ के प्रदेश अध्यक्ष सुरेश कुमार त्रिपाठी व शिक्षक दल के नेता ध्रुव कुमार त्रिपाठी ने शासन के शिक्षकों के हटाए जाने के निर्णय की निंदा की है। उन्होंने कहा कि प्रदेश में जब शिक्षकों की काफी कमी थी, तब तदर्थ शिक्षकों को रखा गया था। अब जब 25 से 30 साल इन्होंने सेवा दी तो उनको नियमित करने की जगह हटाने का निर्णय काफी गलत है। 


संघ के महामंत्री नरेंद्र कुमार वर्मा व प्रदेश उपाध्यक्ष डॉ. आरपी मिश्र ने कहा कि संघ भी इन शिक्षकों को नियमित करने की मांग लंबे समय से कर रहा है। उन्होंने शासन से अपने निर्णय पर पुनर्विचार करने की मांग की है। संघ के प्रदेश संयोजक संजय द्विवेदी ने कहा है कि सरकार ने तदर्थ शिक्षकों को बकाया वेतन देकर उनकी सेवाएं समाप्त करने का निर्णय किया, जो अनुचित है। 


तदर्थ शिक्षकों का 17 माह का बकाया वेतनशर्तों  के साथ होगा जारी

🟣 शीर्ष कोर्ट ने लगाई थी रोक, नियम विपरीत भर्ती शिक्षक होंगे बाहर
🟣 बकाया वेतन के साथ-साथ फिलहाल आगे भी वेतन मिलता रहेगा
🟣 यूपी सरकार ने मानवीय आधार पर इन्हें वेतन देने का फैसला किया
🟣 ऐसे तदर्थ शिक्षक जो नियमों को पूरा नहीं करते उन्हें बकाया वेतन देकर नौकरी से बाहर किया जाएगा


लखनऊ। सरकार ने धनतेरस पर माध्यमिक के एडेड विद्यालयों के तदर्थ शिक्षकों को बड़ी राहत दी है। शासन ने लगभग 17 माह से रोके गए बकाया वेतन को शर्तों के साथ जारी करने का आदेश दिया है। वहीं, नियमानुसार नियुक्त न होने वाले तदर्थ शिक्षकों की सेवाएं समाप्त करने का भी निर्णय लिया गया है।

माध्यमिक के एडेड कॉलेजों में तैनात लगभग 1100 शिक्षकों का 17 माह पहले वेतन रोक दिया गया था। इन शिक्षकों का पिछले दिनों निदेशालय पर 53 दिन तक धरना भी चला। आश्वासन के बाद धरना समाप्त हुआ। इसी क्रम में माध्यमिक के अपर मुख्य सचिव दीपक कुमार ने शिक्षा निदेशक माध्यमिक को सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए बकाया वेतन 30 दिन में जारी करने का निर्देश दिया है। 

उन्होंने कहा, उनके बकाया वेतन का भुगतान स्वीकृत किया जाता है, जिनका सुप्रीम कोर्ट के 26 अगस्त, 2020 के आदेश के क्रम में रुका था। साथ ही इस तिथि तक उनकी सेवाएं, प्रमाणित व सत्यापित हों। इस परिधि में आने वाले शिक्षक, जिनकी सेवावधि में मृत्यु हो गई हो, उनके उत्तराधिकारी को मृत शिक्षक के शिक्षण कार्य किए जाने की अवधि का बकाया भुगतान भी किया जाएगा। नियमानुसार नियुक्त न होने वाले तदर्थ शिक्षकों की सेवाएं समाप्त करने का भी निर्णय लिया है। इससे 500 शिक्षक प्रभावित होंगे।

 

लखनऊ : अशासकीय सहायता प्राप्त (एडेड) माध्यमिक स्कूलों के 1,111 शिक्षकों को आखिरकार 17 महीने बाद वेतन देने के निर्देश दिए गए हैं। अब इन्हें बकाया वेतन के साथ-साथ फिलहाल आगे भी वेतन मिलता रहेगा। सुप्रीम कोर्ट ने तदर्थवाद को खत्म करने का निर्णय सुनाया था, लेकिन अब राज्य सरकार ने मानवीय आधार पर इन्हें वेतन देने का फैसला किया है। 


फिलहाल दीपावली के मौके पर 20 से लेकर 25 वर्षों से अपनी सेवाएं दे रहे इन शिक्षकों को बड़ी राहत मिल गई है। मगर ऐसे तदर्थ शिक्षक जो नियमों को पूरा नहीं करते उन्हें बकाया वेतन देकर नौकरी से बाहर भी कर दिया जाएगा।


अपर मुख्य सचिव, माध्यमिक शिक्षा दीपक कुमार की ओर से शुक्रवार को तदर्थ शिक्षकों को 17 महीने का बकाया वेतन देने का आदेश जारी कर दिया है। फिलहाल अभी आगे भी इनसे पूर्ववत सेवाएं ली जाएंगी। एडेड माध्यमिक स्कूलों में वर्ष 1994 के बाद नियमित शिक्षकों की संख्या कम होने पर प्रबंध तंत्र के माध्यम से तदर्थ शिक्षकों को पूरे वेतन पर रखकर सेवाएं लेना शुरू हुईं।


 वर्ष 2000 के बाद प्रबंध तंत्र ने गलत ढंग से तदर्थ शिक्षक भर्ती करना शुरू कर दिया जो कि वर्ष 2004 तक जारी रहा। ऐसे में नियमित पदों के सापेक्ष कार्य कर रहे इन शिक्षकों की कुल संख्या बढ़ती गई और यह दो हजार के करीब पहुंच गई। 20 से 25 वर्षों से सेवाएं दे रहे यह शिक्षक लगातार विनियमितिकरण की मांग करते रहे, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। 


गड़बड़ी माध्यमिक शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने भी की और कई जिलों में तदर्थ शिक्षकों को विनियमित कर दिया गया। वर्ष 2020 में तदर्थ शिक्षक संजय सिंह ने विनियमितिकरण को लेकर सुप्रीम कोर्ट में वाद दायर किया। 26 अगस्त 2020 और सात दिसंबर 2021 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश में तदर्थवाद को खत्म करने का निर्णय सुनाया गया और शिक्षकों को कोई राहत नहीं दी गई। 


सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षकों के खाली पदों पर भर्ती में इन्हें भारांक देने का निर्देश दिए। वर्ष 2021 में हुई भर्ती में इन्हें भारांक दिया गया लेकिन सिर्फ 12 शिक्षक ही इसका लाभ उठा सके। फिर बीते वर्षों में विनियमित किए गए शिक्षकों के मामले में आधिकारियों पर कार्रवाई शुरू हुई।


 बीते वर्ष अयोध्या के संयुक्त शिक्षा निदेशक अरविंद पांडेय को गलत ढंग से विनियमितिकरण करने के आरोप में निलंबित भी कर दिया गया। माध्यमिक शिक्षा विभाग ने जून 2022 से इन शिक्षकों का वेतन पूरी तरह रोक दिया गया।


माध्यमिक तदर्थ शिक्षक संघर्ष समिति के संयोजक राजमणि ने बताया कि इसे लेकर बीते सितंबर-अक्टूबर में माध्यमिक शिक्षा निदेशालय पर शिक्षकों ने याचना कार्यक्रम के माध्यम से 53 दिन आंदोलन चलाया, तब उन्हें आश्वासन दिया गया था कि इनके हित में कोई निर्णय होगा।

Tuesday, January 10, 2023

याची को सुनवाई का अवसर दिए बिना बर्खास्त करने पर बीएसए मिर्जापुर तलब

याची को सुनवाई का अवसर दिए बिना बर्खास्त करने पर बीएसए मिर्जापुर तलब 


प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक सहायक अध्यापिका की बर्खास्तगी मामले को लेकर मिर्जापुर के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी को याची की पत्रावली के साथ 18 जनवरी को उपस्थित होने का निर्देश दिया है।


कोर्ट ने यह आदेश सहायक अध्यापक संध्या कुमारी की याचिका पर दिया है। याची के खिलाफ आरोप है कि उसने सहायक अध्यापक भर्ती में आवेदन नहीं किया और फर्जी नियुक्ति प्राप्त कर ली है। इसकी जांच रिपोर्ट दो दिसंबर 2022 को पेश हुई और उसी दिन याची को सुनवाई का अवसर दिए बिना बर्खास्त कर दिया गया।


याची का कहना है कि उसे आरोप की सफाई का मौका मिलना चाहिए। ऐसा न करके नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लघंन किया गया है, जिसपर कोर्ट ने बीएसए मिर्जापुर को तलब किया है। 

Monday, October 17, 2022

निजी स्कूलों में शिक्षकों को हटाने से पहले मंजूरी जरूरी, दिल्ली हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

निजी स्कूलों में शिक्षकों को हटाने से पहले मंजूरी जरूरी,  दिल्ली हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

15 दिन में मंजूरी न लेने पर निलंबन रद्द हो जाएगा



नई दिल्ली। कोई निजी स्कूल किसी शिक्षक या कर्मचारी को अनुशासनहीनता के आरोप में निलंबित करता है तो दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशालय से मंजूरी लेनी होगी। दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि 15 दिन में मंजूरी नहीं ली तो निलंबन स्वतः रद्द हो जाएगा।


मुख्य न्यायाधीश सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ ने दिल्ली स्कूल शिक्षा अधिनियम की धारा आठ के बिंदु 4 और 5 के प्रावधानों को स्पष्ट करते हुए यह फैसला दिया है। 


पीठ ने कहा है कि स्कूल प्रबंधन अपने शिक्षक या कर्मचारियों को अनुशासनात्मक कार्यवाही में आम तौर पर निलंबित नहीं कर सकते । स्कूल प्रबंधन विशेष परिस्थिति में ही ऐसा कर सकता है। ऐसा करने पर शिक्षा निदेशालय से 15 दिन के भीतर मंजूरी लेना अनिवार्य है । इसमें विफल रहने पर निलंबत समाप्त हो जाएगा।

Wednesday, June 1, 2022

हाईकोर्ट ने विभागीय जांच के बगैर अध्यापक को बर्खास्त करने के बीएसए अमरोहा के आदेश को किया रद्द, बकाया वेतन का ब्याज समेत करने का आदेश

हाईकोर्ट ने विभागीय जांच के बगैर अध्यापक को बर्खास्त करने के बीएसए अमरोहा के आदेश को किया रद्द, बकाया वेतन का ब्याज समेत करने का आदेश


 
प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विभागीय जांच के बगैर अध्यापक को बर्खास्त करने के बीएसए अमरोहा के आदेश को रद्द कर दिया है। साथ ही अध्यापक को उसके निलंबन की तिथि से बकाया वेतन का भुगतान छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज की दर से करने का निर्देश दिया है।



यह आदेश न्यायमूर्ति सिद्धार्थ ने अमरोहा के नज़ाकत अली की याचिका पर दिया है। याची के अधिवक्ता का कहना था कि जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी अमरोहा ने याची को अप्रैल 2014 में निलंबित कर दिया था।