समायोजन 3.0 पर यथास्थित बनाए रखने का हाईकोर्ट का आदेश, जिला स्तरीय समिति एक माह में करे निर्णय
🔴 कोर्ट ने दिए यह निर्देश
तबादले सत्यापित एवं अद्यतन आंकड़ों पर आधारित हों।
जिलास्तर पर स्वीकृत पद, कार्यरत शिक्षकों की संख्या और छात्र नामांकन का समेकित डेटा अनिवार्य रूप से देखा जाए।
प्रक्रिया पारदर्शी, निष्पक्ष और गैर-भेदभावपूर्ण हो।
समायोजन को दंडात्मक या उत्पीडन के औजार के रूप में इस्तेमाल न किया जाए।
प्रशासनिक आवश्यकता और छात्र हित सर्वोपरि रहे।
शिक्षकों के समायोजन में अपनाई जाए पारदर्शी प्रक्रियाः हाईकोर्ट
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रदेश परिषदीय स्कूलों में शिक्षकों के समायोजन और स्थानांतरण में पारदर्शी प्रक्रिया अपनाने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि जिलास्तरीय कमेटी शिक्षकों से प्रत्यावेदन लेकर विद्यालयों में छात्र-शिक्षक अनुपात के हिसाब से समायोजन की प्रकिया पूरी करे। तब तक विद्यालयों में यथास्थिति कायम रखी जाए। प्रदेश के कई जिलों के सैकड़ों शिक्षकों की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह आदेश न्यायमूर्ति मंजूरानी चौहान ने दिया है। याचिकाओं में शिक्षकों के समायोजन एवं तबादला संबंधी 14 नवंबर 2025 के शासनादेश को चुनौती दी गई थी।
याचियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक खरे, नवीन शर्मा और अन्य वकीलों का कहना था कि समायोजन और स्थानांतरण की प्रक्रिया मनमाने तरीके से अपनाई जा रही है। नियमावली में दिए निर्देशों का पालन नहीं करने के कारण हर जिले में अपने-अपने तरीके से प्रक्रिया अपनाई जा रही है। मध्य सत्र में समायोजन का औचित्य नहीं जबकि वर्तमान सत्र मार्च में समाप्त होने वाला है। कोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद विस्तृत निर्णय में कहा कि स्थानांतरण सेवा की एक सामान्य शर्त है और अदालतें आमतौर पर तबादला आदेशों में दखल नहीं देतीं। कोर्ट ने कहा कि यह स्थापित सिद्धांत है कि नीतिगत मामलों में अदालतें अपील प्राधिकरण की तरह कार्य नहीं कर सकतीं और न ही यह जांच सकती हैं कि कोई अन्य नीति अधिक उचित या बेहतर हो सकती थी।
कोर्ट ने कहा कि न्यायिक समीक्षा का उद्देश्य नीति की बुद्धिमत्ता का पुनर्मूल्यांकन करना नहीं, बल्कि यह देखना है कि निर्णय प्रक्रिया कानून के अनुरूप है या नहीं। कोर्ट ने कहा कि कि यू-डायस पोर्टल पर उपलब्ध आंकड़ों की सत्यता और सत्यापन को लेकर अस्पष्टता है, जिससे शैक्षिक ढांचे पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
याचियों को प्रत्यावेदन देने का निर्देश
अदालत ने कहा कि याचिकाओं में संस्थानवार स्वीकृत पद, कार्यरत संख्या और अधिशेष/कमी का स्पष्ट विवरण प्रस्तुत नहीं किया गया है। ऐसे में व्यक्तिगत तथ्यों की जांच प्रशासनिक स्तर पर ही संभव है। इसलिए प्रत्येक याचिकाकर्ता एक सप्ताह के भीतर जिलाधिकारी की अध्यक्षता में गठित जिला स्तरीय समिति के समक्ष पृथक एवं विस्तृत प्रत्यावेदन प्रस्तुत करे। कोर्ट ने समिति को एक माह के भीतर कारणयुक्त आदेश पारित करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि एक माह तक या सक्षम प्राधिकारी द्वारा निर्णय लिए जाने तक यथा स्थिति कायम रखी जाए। कोर्ट ने संबंधित प्राधिकारी को यू-डायस पोर्टल पर उपलब्ध आंकड़ों का तत्काल सत्यापन एवं अद्यतन करने तथा संशोधित आंकड़ों के आधार पर शिक्षकों की तैनाती सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है।
छात्र-शिक्षक अनुपात के साथ UDISE पोर्टल को करें अपडेट : हाई कोर्ट
पुनर्व्यवस्थापन आदेश को चुनौती देने वाले शिक्षकों को ताकालिक राहत, यथास्थिति का निर्देश
जिलाधिकारी की कमेटी महीने भर में याचियों के प्रत्यावेदन पर नियमानुसार निर्णय ले
17 फरवरी 2026
प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि संबंधित प्राधिकारी यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफार्मेशन सिस्टम फार एजुकेशन (यूडीआइएसई अथवा यू-डायस) पोर्टल पर सही व प्रमाणित डेटा सत्यापित कर इसके अनुरूप ही सहायक अध्यापकों-प्रधानाध्यापकों की नियुक्ति करें ताकि निर्धारित छात्र-शिक्षक अनुपात बनाए रखा जा सके। कोर्ट ने जिलाधिकारी की अध्यक्षता वाली कमेटी को याचियों के प्रत्यावेदन पर एक माह में निर्णय लेने का आदेश दिया है और तब तक इन अध्यापकों की वर्तमान स्थिति कायम रखने को कहा है। न्यायमूर्ति मंजूरानी चौहान की एकलपीठ ने यह आदेश देते हुए 157 उन शिक्षकों को तात्कालिक तौर पर राहत दी है जिन्होंने राज्य सरकार के 14 नवंबर 2025 के आदेश के क्रम में अपने पुनर्व्यवस्थापन को चुनौती दी थी।
कोर्ट ने कहा, याचीगण ने आवश्यक तथ्यात्मक जानकारी नहीं दी है, जिससे कार्रवाई की वैधता की जांच करना मुश्किल हो रहा है। याचीगण को संस्थान-वार विवरण देना होगा, जिसमें स्वीकृत संख्या, कार्यरत संख्या और शिक्षकों की अधिकता या कमी की जानकारी हो। प्रशासनिक कार्रवाई में तथ्यात्मक त्रुटियों के कारण प्रणालीगत असंतुलन हो सकता है और इससे छात्रों का हित प्रभावित होने की आशंका है। ऐसे में निष्पक्षता और तर्कसंगतता सुनिश्चित करने के लिए सीमित जांच करनी होगी। कोर्ट ने कहा, पुनर्वितरण मामलों में हस्तक्षेप करने के लिए सावधानी बरतनी चाहिए, लेकिन कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं है। यदि कार्रवाई मनमानी है, गैर मौजूद या असत्यापित डेटा पर आधारित है तथा इससे सार्वजनिक हित गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है तो संवैधानिक अदालतें शवितहीन नहीं हैं। अदालत ने पाया कि नवंबर 2025 के सरकारी आदेश के अनुसार पुनर्वितरण के लिए निर्धारित मानदंडों का पालन किया गया है या नहीं, यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है।
याचीगण के अधिवक्ता ने कहा कि पूर्व में आदेश था कि जिलाधिकारी हर साल जुलाई से पहले शिक्षकों की स्वीकृत संख्या की समीक्षा कर आवश्यकता अनुसार पुनर्वितरण करते थे, लेकिन नवंबर का आदेश 23 मई 2025 के आदेश से अलग है। याचीगण का कहना था कि बच्चों के निश्शुल्क और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार अधिनियम, 2009 के प्रविधानों की अनदेखी की जा रही है। अदालत ने पाया कि प्रत्येक संस्थान में कम से कम दो शिक्षकों की आवश्यकता है। छात्र संख्या के आधार पर अतिरिक्त शिक्षकों की आवश्यकता है। जूनियर बेसिक स्कूल में 150 तथा सीनियर बेसिक स्कूल में 100 से अधिक छात्रों के लिए एक प्रधानाध्यापक की आवश्यकता है। अरुण प्रताप सिंह व 37 अन्य, संगीता सिंह पटेल और 42 अन्य, अभिषेक कुमार त्रिपाठी व 11 अन्य, स्वदेश कुमार व 57 अन्य तथा अमन राज व पांच अन्य की याचिकाओं को एक साथ सुना गया था।
परिषदीय शिक्षकों के समायोजन पर हाईकोर्ट की रोक 17 फरवरी तक बढ़ी
3 फरवरी 2026
लखनऊ। हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने प्राथमिक व कंपोजिट विद्यालयों में समायोजन में याची शिक्षकों की समायोजन प्रक्रिया पर 13 जनवरी को लगी अंतरिम रोक अगली सुनवाई तक बढ़ा दी है।
अगली सुनवाई 17 फरवरी को होगी। यह आदेश न्यायमूर्ति श्री प्रकाश सिंह की एकल पीठ ने कुल 130 अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए पारित किया। सोमवार को पक्षकारों ने जवाबी शपथ पत्र व प्रत्युत्तर शपथ पत्र दाखिल किया। इस पर न्यायालय ने अंतिम सुनवाई के लिए 17 फरवरी की तारीख तय कर तब तक के लिए अंतरिम रोक बढ़ा दी।
प्राथमिक शिक्षकों के समायोजन 3.0 पर आगे की कार्यवाही पर 2 फरवरी तक रोक बढ़ी, हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को दिया जवाब दाखिल करने का समय
प्राथमिक शिक्षकों के समायोजन/स्थानांतरण-3 के शासनादेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर दिया आदेश
लखनऊ। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने सोमवार को प्राथमिक शिक्षकों के समायोजन-3 मामले में आगे किसी भी प्रकार की कार्यवाही। पर लगी रोक को 19 जनवरी से बढ़ाकर 2 फरवरी तक कर दिया है। साथ ही राज्य सरकार को मामले में जवाब दाखिल करने के लिए समय प्रदान किया है।
याची शिक्षकों की ओर से अधिवक्ता मीनाक्षी सिंह परिहार ने बताया कि कोर्ट ने अगली सुनवाई 2 फरवरी को निर्धारित करते हुए अंतरिम आदेश दिया है कि तब तक बेसिक शिक्षा विभाग के अधिकारी समायोजन-3 के संबंध में आगे की कार्यवाही नहीं करेंगे।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस अंतरिम आदेश का लाभ इस याचिका से संबद्ध अन्य याचिकाओं के याची शिक्षकों को भी मिलेगा। यह आदेश प्राथमिक शिक्षकों के समायोजन/स्थानांतरण-3 के शासनादेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर दिया गया है। न्यायमूर्ति श्रीप्रकाश सिंह की एकल पीठ ने यह आदेश बाराबंकी की संगीता पाल सहित 29 प्राथमिक शिक्षकों द्वारा दाखिल याचिका पर पारित किया।
याचिकाओं में 14 नवंबर 2025 को बेसिक शिक्षा विभाग द्वारा जारी शिक्षकों के समायोजन/स्थानांतरण संबंधी शासनादेश को चुनौती देते हुए उसे निरस्त करने की मांग की गई है। याचियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एचजीएस परिहार ने नियम 21 का हवाला देते हुए कहा कि शिक्षक की सहमति के बिना समायोजन नहीं किया जा सकता। मामले में राज्य सरकार की ओर से भी अधिवक्ता उपस्थित हुए। कोर्ट ने अगली सुनवाई तक याचियों को मिली अंतरिम राहत को बढ़ाते हुए राज्य सरकार को जवाब दाखिल करने के लिए समय प्रदान किया है।
मध्य सत्र में बेसिक शिक्षकों के समायोजन पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब
प्रयागराजः इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेसिक शिक्षा परिषद और राज्य सरकार से प्राथमिक विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों और सहायक अध्यापकों का मध्य सत्र में स्थानांतरण और समायोजन करने के मामले में जवाब मांगा है। कोर्ट ने कहा कि इस दौरान अध्यापकों के विरुद्ध कोई उत्पीड़नात्मक कार्रवाई न की जाए। यह आदेश न्यायमूर्ति मंजूरानी चौहान ने अरुण प्रताप व 37 अन्य अध्यापकों की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।
कोर्ट ने जवाब के लिए एक सप्ताह का समय दिया है। याचिका के अनुसार याची चित्रकूट के प्राथमिक विद्यालयों में हेड मास्टर और सहायक अध्यापक हैं। उन्हें उन विद्यालयों में समायोजित किया जा रहा है, जहां या कोई अध्यापक नहीं है या फिर बंद हो चुके हैं। याचियों का कहना है कि मध्य सत्र में समायोजन का कोई औचित्य नहीं है जबकि सत्र अप्रैल में प्रारंभ होता है। यह यूपी आरटीई एक्ट 2011 के नियम 21 का उल्लंघन भी है। याचियों को शीघ्र पदन करने का निर्देश दिया गया है।
अमेठी, बाराबंकी और श्रावस्ती में भी समायोजन 3.0 पर लगी रोक, पुरानी याचिकाओं के साथ कनेक्ट करते हुए 19 जनवरी को होगी अगली सुनवाई, देखें कोर्ट ऑर्डर
शिक्षकों की समायोजन प्रक्रिया पर 19 जनवरी तक अंतरिम रोक
लखनऊ । हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने प्राथमिक व कंपोजिट विद्यालयों में समायोजन के मामले में महत्वपूर्ण आदेश देते हुए याची शिक्षकों के समायोजन प्रक्रिया पर 19 जनवरी तक के लिए अंतरिम रोक लगा दी है। न्यायालय ने कहा है कि 19 जनवरी को वह मामले पर अंतिम सुनवाई करेगी।
यह आदेश न्यायमूर्ति श्री प्रकाश सिंह की एकल पीठ ने शिक्षकों की ओर से दाखिल 12 अलग-अलग याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए पारित किया। न्यायालय ने राज्य सरकार को जवाबी हलफनामा दाखिल करने का भी आदेश दिया है। साथ ही यह भी आदेश दिया है कि याची शिक्षकों के संबंध में कोई अग्रिम कार्यवाही न की जाए। याचिकाओं में तीसरे चरण के समायोजन में नियमों की अनदेखी को आधार बनाया गया है।
कहा गया है कि पहले चरण के समायोजन में विभिन्न जिलों के तमाम स्कूल एकल हो गए थे, उसके बाद अगस्त में दूसरे चरण का समायोजन तो हुआ लेकिन विसंगतियां दूर नहीं हो सकी तथा मनमाने तरीके से कुछ जिलों में वरिष्ठ तो कुछ में कनिष्ठ शिक्षकों को दूसरे स्कूलों में भेज दिया गया।
परिषदीय शिक्षकों के समायोजन 3.0 में आगे की कार्यवाही पर 19 तक हाईकोर्ट की रोक, अगली सुनवाई 19 जनवरी को, देखें कोर्ट ऑर्डर
लखनऊ। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने मंगलवार को प्राथमिक शिक्षकों के समायोजन-3 मामले में किसी भी आगे की कार्रवाई पर 19 जनवरी तक रोक लगा दी है। कोर्ट ने अगली सुनवाई की तारीख 19 जनवरी निर्धारित की और अंतरिम आदेश दिया कि तब तक बेसिक शिक्षा विभाग के अधिकारी समायोजन-3 मामले में कोई कदम नहीं उठाएंगे।
कोर्ट ने यह अंतरिम राहत इस याचिका से जुड़ी 11 अन्य याचिकाओं के याचियों को भी उपलब्ध कराई है। यह आदेश प्राथमिक शिक्षकों के समायोजन/स्थानांतरण-3.0 के शासनादेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर दिया गया। न्यायमूर्ति श्रीप्रकाश सिंह की एकल पीठ ने बाराबंकी की संगीता पाल समेत 29 शिक्षकों की याचिका पर यह आदेश पारित किया। याचिकाओं में 14 नवंबर 2025 के बेसिक शिक्षा विभाग द्वारा जारी समायोजन/स्थानांतरण के शासनादेश को रद्द करने का अनुरोध किया गया है।
याचियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एचजीएस परिहार ने कहा कि यह शासनादेश आरटीई अधिनियम और बेसिक शिक्षा अधिनियम, 1981 के नियमों का उल्लंघन करता है। नियम 21 के तहत शिक्षक की सहमति के बिना उन्हें समायोजित नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि इस समायोजन से शिक्षकों की वरिष्ठता प्रभावित हो रही है और अन्य विसंगतियां भी उत्पन्न हो रही हैं।