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Wednesday, August 12, 2026

यूपी बेसिक शिक्षा में शिक्षकों के 60,958 पद रिक्त, नगर क्षेत्र के 11508 पदों पर भर्ती का प्रस्ताव प्रेषित

यूपी बेसिक शिक्षा में शिक्षकों के 60,958 पद रिक्त,  नगर क्षेत्र के 11508 पदों पर भर्ती का प्रस्ताव प्रेषित 

लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा के तृतीय सत्र 2026 के प्रथम मंगलवार को विधायक श्री तेज प्रताप सिंह (करहल) द्वारा पूछे गए अतारांकित प्रश्न संख्या-51 के जवाब में बेसिक शिक्षा विभाग ने प्रदेश में छात्र-शिक्षक अनुपात और शिक्षकों के रिक्त पदों को लेकर महत्वपूर्ण आंकड़े सामने रखे हैं।

प्रश्न के जवाब में राज्य सरकार ने बताया कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 में निर्धारित मानक के अनुसार प्राथमिक विद्यालयों में छात्र-शिक्षक अनुपात 30:1 तथा उच्च प्राथमिक विद्यालयों में 35:1 है।

विधानसभा में पूछे गए सवाल में शिक्षकों के स्वीकृत पदों और वर्तमान रिक्तियों की जानकारी भी मांगी गई थी। विभाग के अनुसार प्राथमिक विद्यालयों में सहायक अध्यापकों की सीधी भर्ती के कुल 3,27,804 स्वीकृत पदों के सापेक्ष वर्तमान में 60,958 पद रिक्त हैं।

रिक्त पदों पर भर्ती के सवाल पर सरकार ने बताया कि उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग के गठन के लिए शासन की अधिसूचना संख्या-415/79-शि0-1-2023-1-क-14-2023, दिनांक 21 अगस्त 2023 जारी की जा चुकी है। इसी क्रम में बेसिक शिक्षा परिषद के अधीन संचालित परिषदीय प्राथमिक विद्यालयों में नगर क्षेत्र के सहायक अध्यापकों के 11,508 पदों पर सीधी भर्ती के लिए बेसिक शिक्षा निदेशक कार्यालय द्वारा 17 मई 2026 को अधियाचन उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग, प्रयागराज को भेजा गया है।

इससे स्पष्ट है कि सरकार के सामने बेसिक शिक्षा विभाग में बड़ी संख्या में रिक्त शिक्षक पदों का मुद्दा मौजूद है और भर्ती प्रक्रिया के लिए कम से कम 11,508 पदों का अधियाचन आयोग को भेजे जाने की जानकारी विधानसभा में दी गई है।

हालांकि प्रश्नोत्तरी में यह भी उल्लेखनीय है कि रिक्त पदों पर भर्ती किए जाने के संबंध में पूछे गए प्रश्न के बाद “यदि नहीं, तो क्यों?” का प्रश्न ही नहीं उठता, और विभागीय उत्तर में भी आगामी भर्ती की समयसीमा अथवा सभी 60,958 रिक्त पदों को भरने की कोई स्पष्ट समयसीमा नहीं बताई गई है।

विधानसभा में प्रस्तुत यह जवाब ऐसे समय में सामने आया है जब प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग में स्वीकृत पदों और कार्यरत शिक्षकों के बीच रिक्तियों का आंकड़ा हजारों में है। ऐसे में 30:1 और 35:1 के निर्धारित छात्र-शिक्षक अनुपात को जमीन पर बनाए रखने के लिए रिक्त पदों को भरना कितना जरूरी है, यह सवाल भी इस प्रश्नोत्तरी के आंकड़ों के साथ एक बार फिर सामने आता है।




प्राथमिक शिक्षकों के 11508 रिक्त पदों का अधियाचन पोर्टल पर अपलोड, करीब 30 वर्ष बाद नगरीय विद्यालयों के लिए अधियाचन प्रेषित

प्रयागराज। प्रदेश के बेसिक शिक्षा परिषद के विद्यालयों में शिक्षक भर्ती प्रक्रिया जल्द शुरू होने के आसार हैं। नगर क्षेत्र के परिषदीय विद्यालयों के लिए 11,508 पदों का अधियाचन राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (एनआईसी) के ई-पोर्टल पर अपलोड किया गया है। नगरीय विद्यालयों में इतनी संख्या में रिक्त पदों पर अधियाचन करीब 30 वर्ष बाद अपलोड किए गए हैं।

ग्रामीण अंचल के विद्यालयों के लिए 48 हजार पदों का अधियाचन अपलोड करने की तैयारी की सूचना है। उप्र शिक्षा सेवा चयन आयोग अधियाचन का परीक्षण कर करीब 59 हजार से अधिक पदों पर भर्ती प्रक्रिया को तेज कर सकता है।

प्रदेश में प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तर के 2.25 लाख से अधिक विद्यालय हैं। आंकड़ों के मुताबिक, इनमें डेढ़ लाख से अधिक शिक्षकों के पद रिक्त हैं। जून में बेसिक शिक्षा परिषद के सचिव सुरेंद्र तिवारी ने नगरीय क्षेत्र के लिए प्रत्यक्ष रूप से अधियाचन भेजा था। विधानसभा में पूछे गए सवालों के जवाब में पदों की पुष्टि की गई थी।

नगर क्षेत्र में 15 हजार तक हैं रिक्तियां
नगरीय विद्यालयों में 12 से 15 हजार शिक्षकों के पद रिक्त हैं। बेसिक शिक्षा परिषद ने 11,508 पदों के लिए अधियाचन ई-पोर्टल पर अपलोड किया है। 2010 के बाद ग्रामीण अंचल में शिक्षकों की कमी को देखते हुए नगरीय क्षेत्रों के अध्यापकों के तबादले किए गए थे। इस वजह से नगरीय विद्यालयों में पद रिक्त हो गए थे। अब उन्हें भरने की कवायद तेज हो गई है।




उत्तर प्रदेश में 60,958 सहायक अध्यापक पद रिक्त, नगर क्षेत्र के 11,508 पदों पर सीधी भर्ती की प्रक्रिया शुरू

लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा के तृतीय सत्र में पूछे गए अतारांकित प्रश्न संख्या-153 के उत्तर में बेसिक शिक्षा विभाग ने प्रदेश में सहायक अध्यापकों के रिक्त पदों और भर्ती की स्थिति स्पष्ट की है।

सरकार के अनुसार वर्ष 2017 से 9 मार्च 2026 तक कुल 5,35,389 प्रशिक्षुओं को डीएलएड (D.El.Ed.) का प्रशिक्षण प्रदान किया गया, जबकि 1,26,371 प्रशिक्षुओं को शिक्षक पद पर नियुक्ति दी गई है।

विभाग ने बताया कि वर्तमान में परिषदीय विद्यालयों में ग्रामीण क्षेत्र में सहायक अध्यापकों के 48,883 तथा नगर क्षेत्र में 12,075 सीधी भर्ती के पद रिक्त हैं।

रिक्त पदों पर भर्ती के संबंध में सरकार ने बताया कि उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग अधिनियम-2023 लागू होने के बाद परिषदीय विद्यालयों में सहायक अध्यापक पदों पर चयन एवं नियुक्ति की प्रक्रिया अब उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग के माध्यम से की जाएगी।

इसी क्रम में नगर क्षेत्र के 11,508 सहायक अध्यापक पदों पर सीधी भर्ती के लिए 17 मई 2026 को शिक्षा निदेशक (बेसिक) कार्यालय द्वारा अधियाचन उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग, प्रयागराज को भेजा जा चुका है। सरकार ने संकेत दिया है कि आगे की भर्ती प्रक्रिया आयोग के माध्यम से नियमानुसार संपन्न कराई जाएगी।


Sunday, April 5, 2026

शैक्षणिक दस्तावेज फर्जी तो नियुक्ति शुरू से शून्यः हाईकोर्ट

शैक्षणिक दस्तावेज फर्जी तो नियुक्ति शुरू से शून्यः हाईकोर्ट

धोखाधड़ी से मिली नियुक्ति को लंबे समय की सेवा भी वैध नहीं बना सकतीः हाईकोर्ट

मेरठ की शिक्षिका ने नियुक्ति को अवैध घोषित करने और वेतन रोकने के खिलाफ दायर की थी याचिका

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी कर्मचारी ने जालसाजी या धोखाधड़ी से सार्वजनिक रोजगार प्राप्त किया है तो दशकों तक की उसकी सेवा भी नियुक्ति को वैधता प्रदान नहीं सकती। धोखाधड़ी और न्याय कभी एक साथ नहीं रह सकते और कर जालसाजी पर टिकी कोई भी नींव कानून की नजर में शुरुआत से ही शून्य मानी जाती है। यह आदेश न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की पीठ ने मेरठ की शिक्षिका वीणा मेनन की याचिका खारिज करते हुए दिया है।


याची की नियुक्ति वर्ष 1989 में मेरठ के एक स्कूल में सहायक शिक्षक के पद पर हुई थी। विवाद तब शुरू हुआ जब मानव संपदा पोर्टल पर दस्तावेज अपलोड करने की प्रक्रिया के दौरान याची ने वर्ष 1984 की अपनी हाईस्कूल की मूल मार्कशीट और प्रमाणपत्र जारी करने के लिए आवेदन किया, जो लंबे समय से फर्जी टीसी के आधार पर बोर्ड ने रोके गए रिजल्ट की श्रेणी में डाल दिया था।

जांच में सामने आया कि याची ने हाईस्कूल परीक्षा में बैठने के लिए कक्षा-आठ का जो स्थानांतरण प्रमाणपत्र (टीसी) लगाया था, वह फर्जी था। इस आधार पर याची की नियुक्ति को अवैध घोषित करते हुए वेतन रोक दिया गया। याची ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी।


याची के अधिवक्ता ने रखा तर्क 35 वर्ष तक बिना विवाद सेवा दी

याची अधिवक्ता ने दलील दी कि शिक्षिका ने 35 वर्षों तक बिना किसी विवाद के सेवा दी है। उसकी नियुक्ति के समय दस्तावेज के सत्यापन में अधिकारियों ने चूक की है। अधिकारियों की चूक के लिए उसे जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि जब नियुक्ति का आधार ही धोखाधड़ी हो तो सेवा की अवधि का कोई महत्व नहीं रह जाता।


कोर्ट ने कहा, अधिकारियों की कथित चूक का लाभ नहीं दिया जा सकता

अपने आदेश में उच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि अधिकारियों की ओर से सत्यापन में हुई कथित देरी या चूक का लाभ उठाकर किसी भी जालसाजी को जायज नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने इस मामले में बेसिक शिक्षा अधिकारी की ओर से याची का वेतन रोकने और उसके दस्तावेजों को रद्द करने की कार्यवाही को पूरी तरह वैध करार दिया।

Friday, March 27, 2026

कटऑफ से अधिक अंक तो याची नियुक्ति की हकदार, 29334 विज्ञान गणित भर्ती में हाईकोर्ट का आदेश

कटऑफ से अधिक अंक तो याची नियुक्ति की हकदार,  29334 विज्ञान गणित भर्ती में हाईकोर्ट का आदेश

कोर्ट ने कहा, कार्यकारी निर्देश न्यायिक निर्देशों को रद्द नहीं कर सकते

प्रयागराज । इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 2013 की 29334 सहायक अध्यापक भर्ती में कटऑफ से अधिक अंक पाने वाली अभ्यर्थी (याची) की सहायक अध्यापक विज्ञान पद पर नियुक्ति के लिए विचार करने का निर्देश दिया है।


कोर्ट ने कहा कि कार्यकारी निर्देश न्यायिक निर्देशों को रद्द नहीं कर सकते, न ही वे अर्जित अधिकारों को समाप्त कर सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट नीरज कुमार पांडेय के मामले में तय कर चुका है कि सीनियर बेसिक स्कूलों में सहायक अध्यापक भर्ती में रिक्त पदों पर कटऑफ से अधिक अंक पाने वाले अभ्यर्थियों की नियुक्ति पर विचार किया जाए। ऐसे अभ्यर्थियों से कानून के अनुसार नियुक्ति की पेशकश की जानी चाहिए। 

याची शर्तों को पूरा करती है क्योंकि उसने समय रहते ही इस न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था और उसके अंक अंतिम चयनित अभ्यर्थी से अधिक हैं इसलिए याची को विचार सूची से बाहर रखने की कार्रवाई सर्वोच्च न्यायालय के बाध्यकारी निर्देशों का सीधा उल्लंघन है, जो संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत प्रवर्तनीय हैं। 

यह आदेश न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान ने दीप्ति चौहान की याचिका पर दिया है। कोर्ट ने कहा कि योग्यता और पात्रता के बावजूद याची को नियुक्ति से वंचित करना एक प्रकार का भेदभावपूर्ण व्यवहार है। याची ने कटऑफ से अधिक अंक प्राप्त किए थे तो वह नियुक्ति की हकदार है।

Monday, March 23, 2026

बिना भर्ती के अवसर की मांग करने की बीटीसी अभ्यर्थियों की याचिका खारिज

बिना भर्ती के अवसर की मांग करने की बीटीसी अभ्यर्थियों की याचिका खारिज

बेसिक शिक्षा की जब भी निकले भर्ती, उनके अभ्यर्थन पर विचार करने की थी मांग 

कोर्ट ने कहा, बिना विज्ञापन भविष्य की भर्ती के लिए निर्देश मांगना न्यायोचित नहीं

प्रयागराज । इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेसिक शिक्षा परिषद के विद्यालयों में सहायक शिक्षक पद पर नियुक्ति को लेकर दाखिल बीटीसी अभ्यर्थियों की याचिका खारिज कर दी है। यह आदेश न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान ने सुनवाई के बाद दिया है। 


राजेश कुमार श्रीवास्तव व 23 अन्य याचियों की ओर से याचिका में यह प्रार्थना की गई थी कि जब भी बेसिक शिक्षा परिषद द्वारा सहायक शिक्षक के पदों पर रिक्तियां निकाली जाएं, तब उनकी अभ्यर्थिता पर विचार करने का निर्देश संबंधित अधिकारियों को दिया जाए। 

सुनवाई के दौरान विपक्षी के अधिवक्ता ने कोर्ट को अवगत कराया कि बीटीसी प्रशिक्षित अभ्यर्थियों की पात्रता, शिक्षण अनुभव के आधार पर वरीयता और आयु में छूट जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल विशेष अनुमति याचिका में विचाराधीन हैं। इसके अलावा अब तक किसी भी प्रकार की भर्ती के लिए विज्ञापन जारी नहीं किया गया है।

याचियों की ओर से इस पर कोई ठोस प्रतिवाद नहीं किया गया। कोर्ट ने कहा कि बिना किसी विज्ञापन के भविष्य की संभावित भर्ती के लिए इस प्रकार का निर्देश मांगना न्यायोचित नहीं है। साथ ही याचिका पूरी तरह भ्रांतिपूर्ण है। कोर्ट ने इन्हीं आधारों पर याचिका को खारिज कर दिया।

Thursday, March 19, 2026

नियुक्ति से पहले शिक्षिका की विवाहित व्यक्ति से शादी दुराचरण नहीं : हाईकोर्ट, सेवा समाप्त करने वाला आदेश रद

नियुक्ति से पहले शिक्षिका की विवाहित व्यक्ति से शादी दुराचरण नहीं : हाईकोर्ट, सेवा समाप्त करने वाला आदेश रद 


प्रयागराज : इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि सरकारी स्कूल में शिक्षिका के रूप में नियुक्ति से पहले किसी महिला की विवाहित व्यक्ति से दूसरी शादी को दुराचरण नहीं माना जा सकता है। न्यायमूर्ति मंजूरानी चौहान की एकलपीठ ने इस टिप्पणी के साथ रीना नामक शिक्षिका की याचिका स्वीकार करते हुए सेवा समाप्त करने वाला आदेश रद कर दिया है और प्रतिवादी अधिकारियों को यह निर्देश दिया कि वे याची को उचित नोटिस देने के बाद नया और तर्कसंगत आदेश पारित करें।


वर्ष 2015 में याची को प्राथमिक विद्यालय में सहायक शिक्षक पद पर नियुक्त किया गया। इस शिकायत पर कि उसने ऐसे व्यक्ति से विवाह किया जो पहले से ही विवाहित था, उसकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं। इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई। कहा गया कि उसकी सेवाएं समाप्त करने से पूर्व कोई जांच नहीं की गई और उसे अपने पति के पहले विवाह के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। 


कोर्ट ने कहा, यूपी सरकारी कर्मचारी आचरण नियमावली, 1956 का नियम 29 (2) यह प्रविधान करता है कि कोई भी महिला कर्मचारी सरकार की पूर्व अनुमति के बिना ऐसे पुरुष से विवाह नहीं करेगी, जिसकी पत्नी जीवित हो। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि यूपी बेसिक शिक्षा अधिनियम, 1972 की धारा 19, राज्य सरकार को यह अधिकार देती है कि वह बोर्ड द्वारा मान्यता प्राप्त बेसिक स्कूलों में शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों के पदों पर भर्ती तथा नियुक्त व्यक्तियों की सेवा शर्तों के संबंध में नियम बनाए। 


कोर्ट ने कहा कि आचरण नियमावली की प्रयोज्यता केवल उन लोगों तक सीमित है, जो सरकारी सेवा में आ चुके हैं। नियुक्ति से पहले के चरण में किसी व्यक्ति के खिलाफ इन नियमों का हवाला नहीं दिया जा सकता। चूंकि कथित वैवाहिक अनियमितता वर्ष 2009 से संबंधित है, यानी याची की 2015 में हुई नियुक्ति से काफी पहले की बात है, इसलिए आचरण नियमावली, 1956 के नियम 29 के प्रविधान याचिकाकर्ता के मामले पर स्पष्ट रूप से लागू नहीं होते।

Tuesday, February 3, 2026

फर्जी सर्टिफिकेट के जरिए नौकरी पाने वाले शिक्षकों के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट का सख्त रुख, नियुक्तियों में मिलीभगत करने वाले अधिकारियों के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई के निर्देश

फर्जी सर्टिफिकेट के जरिए नौकरी पाने वाले शिक्षकों के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट का सख्त रुख, नियुक्तियों में मिलीभगत करने वाले अधिकारियों के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई के निर्देश



फर्जी सर्टिफिकेट के जरिए नौकरी पाने वाले शिक्षकों के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को आदेश दिया है कि ऐसे सभी असिस्टेंट टीचरों के मामलों की पूरे राज्य में व्यापक जांच कराई जाए और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई हो। जस्टिस मंजू रानी चौहान की सिंगल बेंच ने इस संबंध में राज्य सरकार को मैंडमस जारी किया है।


हाईकोर्ट ने प्रिंसिपल सेक्रेटरी, बेसिक शिक्षा को निर्देश दिया है कि यह जांच संभव हो तो छह महीने के भीतर पूरी की जाए। कोर्ट ने साफ कहा कि केवल अवैध नियुक्तियों को रद्द करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि ऐसे शिक्षकों से अब तक ली गई सैलरी की रिकवरी भी की जाए। इसके साथ ही फर्जी नियुक्तियों में मिलीभगत करने वाले अधिकारियों के खिलाफ भी सख्त विभागीय और कानूनी कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।

कोर्ट ने टिप्पणी की कि राज्य सरकार द्वारा कई सर्कुलर और निर्देश जारी किए जाने के बावजूद जिम्मेदार अधिकारी समय पर और प्रभावी कार्रवाई करने में नाकाम रहे हैं। यह निष्क्रियता न सिर्फ धोखाधड़ी को बढ़ावा देती है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की जड़ों को कमजोर करती है। कोर्ट ने कहा कि इससे छात्रों के हितों को गंभीर नुकसान होता है, जो न्यायालय के लिए सर्वोपरि है।

Thursday, January 22, 2026

परिवार पर विपदा सदस्य की उम्र देखकर नहीं आती, अनुकंपा नियुक्ति के नियमों को लचीला बनाएं – हाईकोर्ट

परिवार पर विपदा सदस्य की उम्र देखकर नहीं आती, अनुकंपा नियुक्ति के नियमों को लचीला बनाएं

हाईकोर्ट ने कहा-परिवार आर्थिक तंगी में है तो केवल अधिक आयु के आधार पर अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य अचानक आए आर्थिक संकट से परिवार को उबारना है। परिवार पर विपदा सदस्य की उम्र देखकर नहीं आती है। भर्ती नियमों की कठोरता को इसके उद्देश्यों को विफल करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इसकी नियुक्ति में आयु सीमा की बाधा को दूर करें और नियमों को लचीला बनाएं।

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) की अनुकंपा नियुक्ति समिति की एकल पीठ के खिलाफ दायर विशेष अपील पर की। कोर्ट ने समिति को निर्देश दिया है कि वह याचिकाकर्ता की आयु में छूट के अनुरोध पर एक महीने के भीतर विचार करे।

प्रतिवादी/याची एन. शांगबनाबी देवी की बहन की 2015 में बीएचयू में सेवा के दौरान मौत हो गई थी। उन्होंने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया था, जिसे विवि ने खारिज कर दिया। कहा कि उनकी आयु घटना के समय 37 वर्ष थी, जो ओबीसी श्रेणी के लिए निर्धारित अधिकतम आयु सीमा (33 वर्ष) से अधिक थी। इसे याची ने हाईकोर्ट में चुनौती दी तो एकल पीठ ने उनके पक्ष में आदेश दिया। 

इस पर बीएचयू ने एकल पीठ के पांच फरवरी 2025 के आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में विशेष अपील दायर की। कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद बीएचयू की उस दलील को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि कार्यकारी परिषद ने केवल विधवाओं या तलाकशुदा महिलाओं को आयु में छूट देने का प्रस्ताव पारित किया है। कहा कि जब तक मूल अनुकंपा नियमों में संशोधन नहीं होता, तब तक ऐसे प्रशासनिक प्रस्ताव किसी अन्य आश्रित (जैसे वहन) के अधिकार को कम नहीं कर सकते। 

कोर्ट ने कहा कि परिवार वास्तव में आर्थिक तंगी में है तो केवल अधिक आयु के आधार पर उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता। मुकदमेबाजी के दौरान हुई देरी को भी नजरअंदाज करने का निर्देश दिया है।





बीएचयू को याची की नियुक्ति के संबंध में विचार कर एक महीने में निर्णय लेने का निर्देश

भर्ती नियमों के तहत सीमित नहीं की जा सकती अनुकंपा नियुक्ति – हाईकोर्ट 


प्रयागराजः इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि अनुकंपा नियुक्ति सामान्य भर्ती प्रक्रिया का अपवाद है और इसे भर्ती नियमों से आच्छादित मानकर अस्वीकार नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह तथा न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने सुश्री नामीराकपन शांगबनाश्री देवी की नियुक्ति मामले में विचार करने संबंधी एकलपीठ के आदेश के खिलाफ दायर काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) वाराणसी की विशेष अपील निस्तारित करते हुए यह टिप्पणी की है।

कोर्ट ने कहा है कि अनुकंपा नियुक्ति के लिए मूल याची के दावे पर विचार करने से पहले देरी के मुद्दे की जांच करना आवश्यक है। कोर्ट ने बीएचयू की अनुकंपा नियुक्ति समिति को निर्देश दिया है कि वह पहले मूल याची की उम्र में छूट के अनुरोध पर विचार करे, वह भर्ती नियमों के अनुसार नहीं, बल्कि अनुकंपा नियमों के अनुसार। इसके बाद उसके दावे पर विचार किया जाए, जिसमें पारिवारिक सदस्यों की निर्भरता, वित्तीय कठिनाई और अन्य प्रासंगिक परिस्थितियों को ध्यान रखा जाए। यह निर्णय एक महीने में के भीतर करने का निर्देश दिया गया है।

कोर्ट ने कहा है कि भर्ती नियम संविधान के अनुच्छेद 16 की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए हैं, जबकि अनुकंपा नियुक्ति नियम इसके अपवाद हैं और इनका उद्देश्य वित्तीय संकट में आए पीड़ित परिवार को तात्कालिक सहायता प्रदान करना है। अनुकंपा नियुक्ति नियमों को भर्ती नियमों के तहत सीमित नहीं किया जा सकता है। इसका मतलब यह है कि अगर कोई आवेदक भर्ती नियमों की कुछ शर्तों को पूरा नहीं करता है तो भी उसकी अनुकंपा नियुक्ति के लिए बिचार किया जा सकता है बशर्ते उसके परिवार को सहायता मिलती हो। 

हाई कोर्ट की एकलपीठ के पांच फरवरी 2025 के उस आदेश को इस अपील में चुनौती दी गई थी, जिसमें बीएचयू का नौ मार्च 2018 का अनुकंपा नियुक्ति देने से इन्कार करने वाला आदेश रद कर दिया गया था। एकल न्यायाधीश ने यह भी कहा था कि भर्ती नियम अनुकंपा नियुक्ति पर लागू नहीं होते। विश्वविद्यालय का तर्क था कि अनुकंपा नियुक्ति के नियमों में भर्ती नियमों के अनुसार पात्रता शर्तें शामिल हैं। मृतक की बहन की उम्र 37 वर्ष थी, जो अधिकतम आयु सीमा से चार वर्ष अधिक है। 

यूनिवर्सिटी के कार्यकारी परिषद ने एक अन्य मामले में फैसला दिया था कि उम्र में छूट भर्ती नियमों के अनुसार ही दी जाएगी। याची की तरफ से कहा गया है कि अनुकंपा नियमों में उम्र में छूट का प्रविधान है और कार्यकारणी परिषद का फैसला इन नियमों को ओवरराइड नहीं कर सकता। भर्ती नियम केवल अन्य पात्रता शर्तों पर लागू होते हैं, न कि उम्र पर।

विवाहित पुत्री भी मृतक आश्रित कोटे में नियुक्ति पाने की हकदारः हाईकोर्ट

विवाहित पुत्री भी मृतक आश्रित कोटे में नियुक्ति पाने की हकदारः हाईकोर्ट

कोर्ट ने सिद्धार्थनगर के बीएसए को दो माह में आदेश पारित करने का दिया निर्देश


प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मृतक आश्रित कोटे में नियुक्ति को लेकर महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा है कि विवाहित पुत्री भी नियुक्ति पाने की पात्र है। कोर्ट ने सिद्धार्थनगर के बीएसए को निर्देश दिया है कि वह परिवार की आर्थिक स्थिति और आश्रितों की संख्या को ध्यान में रखते हुए दो माह में निर्णय लेकर आदेश पारित करें। यह आदेश न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकल पीठ ने नीतू अनिता देवी की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया।


अधिवक्ता ने दलील दी कि याची के पिता सिद्धार्थनगर के इटवा गौरा में प्राथमिक विद्यालय में प्रधानाध्यापक के पद पर कार्यरत थे। सेवाकाल के दौरान आठ जनवरी 2020 को उनका निधन हो गया। परिवार में केवल बेटी थी, जिसने मृतक आश्रित कोटे में नियुक्ति के लिए आवेदन किया। निर्णय न होने पर याची ने हाईकोर्ट में अपील की थी। जिस पर हाईकोर्ट ने पहले ही बीएसए को आदेश पारित करने का निर्देश दिया था, लेकिन इसके बाद बीएसए ने यह कहते हुए नियुक्ति से इन्कार कर दिया कि विवाहित पुत्री परिवार की सदस्य नहीं है।

इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। याची ने दलील दी कि विमला श्रीवास्तव सहित कई मामलों में हाईकोर्ट पहले ही विवाहिता बेटी को परिवार का सदस्य मान चुका है। साथ ही 12 नवंबर 2021 की अधिसूचना के जरिये सरकार ने नियमावली से अविवाहित शब्द हटा दिया है। कोर्ट ने सक्षम प्राधिकारी को दो माह में निर्णय लेने का आदेश दिया है।

Monday, January 12, 2026

फर्जी नियुक्तियों पर रोक लगाने के लिए आउटसोर्सिंग की भर्तियों में सत्यापन अनिवार्य, वर्तमान में कार्यरत कर्मियों के दस्तावेजों की जांच भी तीन महीने के अंदर पूरी करने के निर्देश

फर्जी नियुक्तियों पर रोक लगाने के लिए आउटसोर्सिंग की भर्तियों में सत्यापन अनिवार्य, वर्तमान में कार्यरत कर्मियों के दस्तावेजों की जांच भी तीन महीने के अंदर पूरी करने के निर्देश

 राज्यमंत्री असीम अरुण ने दिए निर्देश

लखनऊ। मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना के अंतर्गत कुछ कोर्स कोऑर्डिनेटरों द्वारा फर्जी अभिलेखों के आधार पर नियुक्ति प्राप्त किए जाने के प्रकरण पर समाज कल्याण राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) असीम अरुण ने सख्त रुख अपनाया है। उन्होंने भविष्य में ऐसी किसी भी अनियमितता को रोकने के लिए विभाग में आउटसोर्सिंग से जुड़े मामलों में स्पष्ट शासनादेश जारी करने के निर्देश दिए हैं।


शासनादेश के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाएगा कि आउटसोर्सिंग के जरिये की जाने वाली सभी नियुक्तियां पूरी तरह निर्धारित नियमों, मानकों और प्रक्रिया के अनुरूप हों। साथ ही आउटसोर्सिंग के माध्यम से नियुक्त सभी कर्मियों के शैक्षिक और अन्य जरूरी दस्तावेजों की जांच और पुलिस सत्यापन भी कराया जाएगा। उन्होंने वर्तमान में विभाग में कार्यरत आउटसोर्सिंग कर्मियों के दस्तावेजों की भी अगले तीन महीने के अंदर जांच पूरी करने के निर्देश दिए हैं, ताकि किसी तरह की गड़बड़ी की संभावना न रहे। उन्होंने कहा कि विभाग में किसी भी तरह की गड़बड़ी स्वीकार नहीं की जाएगी। सभी नियुक्तियां पारदर्शी और नियमों के अनुसार होंगी। ब्यूरो

Monday, October 27, 2025

फर्जी नियुक्तियों की जांच तीन माह बाद भी अधर में, गोंडा के सहायता प्राप्त जूनियर हाई स्कूलों में फर्जी नियुक्तियों की एसआईटी और निदेशालय कर रहे जांच

फर्जी नियुक्तियों की जांच तीन माह बाद भी अधर में, गोंडा के सहायता प्राप्त जूनियर हाई स्कूलों में फर्जी नियुक्तियों की एसआईटी और निदेशालय कर रहे जांच

नहीं खुल सका फर्जी वेतन भुगतान का राज, अधिकारी और प्रबंधक जांच में बने रोड़ा


प्रयागराज। गोंडा जिले के लगभग 28 सहायता प्राप्त जूनियर हाई स्कूलों में सृजित पदों से अधिक पदों पर की गईं नियुक्तियों और फर्जी वेतन भुगतान का मामला अब भी अनसुलझा है। एसआईटी (विशेष जांच दल) और बेसिक शिक्षा निदेशालय इस मामले की जांच कर रहे हैं लेकिन अब तक किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पाए हैं। फर्जी नियुक्तियों का खुलासा ठंडे बस्ते में चला गया है। निदेशालय की जांच तीन माह बाद भी अधर में है।


गोंडा निवासी आरपी मिश्रा ने जुलाई 2025 में महानिदेशक स्कूल शिक्षा लखनऊ को एक शिकायती पत्र भेजा था। उन्होंने आरोप लगाया था कि जिले के कई सहायता प्राप्त जूनियर हाई स्कूलों में छात्र संख्या बहुत कम होने के बावजूद 35 से 85 अध्यापक और शिक्षणेत्तर कर्मचारी नियुक्त किए गए हैं। यह भी दावा किया कि फर्जी वेतन भुगतान का खेल लेखा कार्यालय के लिपिकों और स्कूल प्रबंधकों की मिलीभगत से चल रहा है।


शिकायत पर कार्रवाई करते हुए महानिदेशक स्कूल शिक्षा ने प्रयागराज के अपर शिक्षा निदेशक (बेसिक) कामता प्रसाद पाल को जांच का निर्देश दिया। उन्होंने तीन जुलाई 2025 को सहायक शिक्षा निदेशक/उप शिक्षा निदेशक डॉ. बृजेश मिश्र को जांच सौंपी। डॉ. मिश्र जब जांच के लिए गोंडा पहुंचे तो कार्यालय ही गायब मिला। उन्होंने 22 अगस्त को जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी अतुल कुमार तिवारी को पत्र भेजकर पूछा कि छह अगस्त को मांगी गई सूचना अभी तक क्यों उपलब्ध नहीं कराई गई।


उन्होंने लिखा कि बीएसए ने 15 विद्यालयों के प्रतिनिधियों को कार्यालय में बुलाने की बात कही थी लेकिन कोई भी उपस्थित नहीं हुआ। यहां तक कि लिपिक भी नहीं आए। डॉ. मिश्र ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि यह लापरवाही और उदासीनता फर्जी नियुक्तियों और वेतन भुगतान में बीएसए कार्यालय की संलिप्तता की ओर इशारा करती है। उन्होंने 23 अगस्त को 28 विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों को फिर से निर्देश दिया कि आवश्यक अभिलेखों सहित बीएसए कार्यालय में उपस्थित हों। 

उधर बीएसए कार्यालय ने केवल औपचारिकता निभाने के लिए चार राज्य कर्मचारियों और छह परिषदीय कर्मचारियों को पत्र भेजकर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया। डॉ. मिश्र ने छह अगस्त और 16 अगस्त को दोबारा पत्र भेजकर जानकारी मांगी लेकिन कोई ठोस जवाब नहीं मिला। निदेशालय द्वारा शुरू की गई जांच तीन महीने बाद भी किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी है। अपर शिक्षा निदेशक डॉ. बृजेश मिश्र ने कहा कि जांच जारी है, जल्द ही इसे पूरा करने का प्रयास किया जाएगा। वहीं अपर शिक्षा निदेशक (बेसिक) कामता प्रसाद पाल ने बताया कि एसआईटी जांच के चलते विभागीय जांच कुछ समय के लिए शिथिल हो गई है।

Friday, September 12, 2025

बेसिक शिक्षा के अफसरों को मनमानी की आदत, हाईकोर्ट ने कहा–याचियों को परेशान करने की नीयत से नहीं करते आदेश का पालन, अफसरों को हाजिर होने का निर्देश

बेसिक शिक्षा के अफसरों को मनमानी की आदत, हाईकोर्ट ने कहा–याचियों को परेशान करने की नीयत से नहीं करते आदेश का पालन, अफसरों को हाजिर होने का निर्देश 


प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेसिक शिक्षा विभाग के अधिकारियों की कार्यशैली पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि उन्हें मनमाने ढंग से काम करने की आदत है। अधिकारी याचियों को परेशान करने के लिए जानबूझकर कोर्ट के आदेशों का पालन नहीं करते हैं। कोर्ट ने यह टिप्प्णी 2018 के आदेश का अब तक पालन नहीं करने पर की। साथ ही कहा कि यदि 2018 के आदेश का पालन नहीं किया जाता तो अगली सुनवाई पर अपर मुख्य सचिव, प्रधान सचिव बेसिक शिक्षा और राज्य शैक्षिक अनुसंधान व प्रशिक्षण परिषद के निदेशक को उपस्थित होना होगा।



यह आदेश न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान ने उज्जमा व एक अन्य की याचिका पर दिया है। रामपुर की याची उज्जमा व चेतना सैनी 2011 में प्रशिक्षु शिक्षक भर्ती में शामिल हुई थीं। जाति प्रमाण पत्र में गड़बड़ी का आरोप लगाते हुए बेसिक शिक्षा विभाग ने उन्हें नियुक्ति पत्र देने से मना कर दिया। इसे याचिका में चुनौती दी गई। हाईकोर्ट ने 2018 के आदेश से याचियों के पक्ष में आदेश दिया लेकिन आदेश का पालन नहीं किया गया। इस पर याचियों दोबारा याचिका दाखिल की। 


हाईकोर्ट ने इस पर गंभीर चिंता जताई कि बेसिक शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने 2018 के आदेश का पालन करने का इरादा ही नहीं दिखाया। इसकी बजाय उन्होंने 2019 में अनंतिम नियुक्ति पत्र पेश कर दावा किया कि आदेश का पालन हो गया है। कोर्ट ने इस कृत्य को न्यायालय को गुमराह करने वाला माना। साथ ही कहा कि याचियों को नियुक्ति पत्र जारी करने के कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद उन्हें परेशान किया गया और उन्हें दो बार अवमानना याचिकाएं और तीन रिट याचिकाएं करने के लिए मजबूर किया गया।

Wednesday, September 10, 2025

प्रदेश के अशासकीय सहायता प्राप्त उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में अध्यापकों की नियुक्ति हेतु निर्धारित शैक्षिक अर्हता को निरस्त करते हुए संशोधित शैक्षिक अर्हता निर्धारित किये जाने के संबंध में।

इंटर कॉलेजों में प्रवक्ता के लिए पीजी के साथ बीएड अनिवार्य, शासनादेश जारी, 

जीव विज्ञान के सहायक अध्यापक की अर्हता भी शामिल

लखनऊ। प्रदेश के इंटर कॉलेजों में प्रवक्ता बनने के लिए अब स्नातकोत्तर (पीजी) के साथ बीएड अनिवार्य कर दिया गया है। इस संबंध में मंगलवार को शासन ने आदेश जारी कर दिया।

विशेष सचिव कृष्ण कुमार गुप्त की ओर से माध्यमिक शिक्षा निदेशक एवं माध्यमिक शिक्षा परिषद के सभापति को भेजे गए आदेश में कहा गया है कि अभी तक इंटर कॉलजों में प्रवक्ता पद पर शिक्षकों की योग्यता स्नातकोत्तर की डिग्री ही मान्य थी, जिसमें संशोधन कर दिया गया है। अब पीजी के साथ बीएड को भी अनिवार्य कर दिया गया है। आदेश में यह भी कहा गया है कि प्रदेश के अशासकीय मान्यता/सहायता प्राप्त उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में अध्यापकों की नियुक्ति के लिए निर्धारित शैक्षिक अर्हता को निरस्त कर नए सिरे से इसके लिए आदेश जारी कर दिए गए हैं।

उल्लेखनीय है कि पूर्व में 22 अप्रैल 2025 को जारी आदेश में हाई स्कूल में जीव विज्ञान विषय के सहायक अध्यापक की अर्हता को शामिल नहीं किया गया था, जिसे नए आदेश में शामिल कर लिया गया है। अब हाईस्कूल में जीव विज्ञान के सहायक अध्यापक पद के लिए भी बाकि विषयों की तरह ही स्नातक के साथ बीएड पास को अर्हता में शामिल किया गया है।

इस प्रकार से अब अशासकीय मान्यता / सहायता प्राप्त संस्थाओं के अध्यापकों की नियुक्ति व पदोन्नति के लिए इंटरमीडिएट शिक्षा अधिनियम-1921 के अध्याय-2 के विनियम-1 के परिशिष्ट "क" में स्थापित हाईस्कूल के सहायक अध्यापक एवं इण्टरमीडिएट प्रवक्ता पद के लिए विषयवार शैक्षिक अर्हता निर्धारित कर दिया गया है।



विशेष सचिव ने शिक्षक भर्ती की संशोधित अर्हता जारी की, एडेड कॉलेजों की टीजीटी भर्ती में बायो फिर शामिल, प्रवक्ता नागरिक शास्त्र में अब राजनीति विज्ञान व राजनीति शास्त्र मान्य


प्रयागराज । उत्तर प्रदेश के 4512 सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों (एडेड) में प्रशिक्षित स्नातक शिक्षक (टीजीटी) भर्ती में जीव विज्ञान विषय को फिर से शामिल कर लिया गया है। इसी के साथ जन्तु विज्ञान और वनस्पति विज्ञान से स्नातक डिग्री तथा बीएड करने वालों को टीजीटी भर्ती में मौका मिल गया है।

पोस्ट ग्रेजुएट टीचर (पीजीटी) भूगोल की अर्हता में संशोधन करते हुए बीएड के साथ परास्नातक में भूगोल विषय को अनिवार्य कर दिया गया है। अभी तक इससे संबंधित विषय से स्नातकोत्तर करने वाले अभ्यर्थी अर्ह थे। इसी प्रकार पीजीटी नागरिक शास्त्र विषय के लिए अब बीएड के साथ ही राजनीति विज्ञान अथवा राजनीति शास्त्र विषय में परास्नातक आवश्यक होगा। इस संबंध में विशेष सचिव कृष्ण कुमार गुप्त ने आदेश जारी कर शिक्षा निदेशक माध्यमिक एवं सभापति माध्यमिक शिक्षा परिषद (यूपी बोर्ड) को भेजा है।


शिक्षकों की सभी मांगें मानीं, टीजीटी बायो पद बहाल

प्रयागराज। शिक्षकों की शैक्षिक अर्हता संबंधी मांगों पर शासन ने ठकुराई गुट के सुझाव स्वीकार कर लिए हैं। शिक्षक संघ ने बताया कि नए शासनादेश में ठकुराई गुट की 8 मांगों के आधार पर संशोधन किया गया है। इसके साथ ही सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों में टीजीटी जीव विज्ञान विषय का पद भी पुनः बहाल कर दिया गया है। प्रदेश महामंत्री लालमणि द्विवेदी ने बताया कि शासन ने संगठन के सभी सुझावों को स्वीकार कर लिया है। संगठन ने शासन और यूपी बोर्ड के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया है। लाल मणि ने बताया कि 22 अप्रैल 2025 को जारी आदेश में शिक्षकों और प्रधानाचार्यों की अर्हताओं में बड़े बदलाव किए गए थे, जिन पर संगठन ने कई कमियां बताई थीं। इसके बाद संगठन ने 24 जून, 8 जुलाई और 31 जुलाई को शासन व बोर्ड के अधिकारियों से मुलाकात कर आपत्तियां दर्ज कराई थी। बोर्ड ने एक अगस्त को संशोधन का प्रस्ताव शासन को भेजा था।




प्रदेश के अशासकीय सहायता प्राप्त उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में अध्यापकों की नियुक्ति हेतु निर्धारित शैक्षिक अर्हता को निरस्त करते हुए संशोधित शैक्षिक अर्हता निर्धारित किये जाने के संबंध में















Tuesday, August 26, 2025

नियुक्ति से ही शून्य मानी जाएगी जाली दस्तावेज से मिली नौकरी, हाईकोर्ट ने नियुक्ति रद्द कर वेतन वसूली के बीएसए के आदेश को वैध बताया

नियुक्ति से ही शून्य मानी जाएगी जाली दस्तावेज से मिली नौकरी, हाईकोर्ट ने नियुक्ति रद्द कर वेतन वसूली के बीएसए के आदेश को वैध बताया


प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति जाली दस्तावेज के आधार पर सरकारी नौकरी पाता है तो उसकी नियुक्ति से ही शून्य मानी जाएगी। ऐसे में उसे प्राप्त धनराशि वापस करनी होगी। साथ ही वह अन्य लाभों पर भी कोई कानूनी दावा नहीं कर सकता। यह आदेश न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान ने कमलेश कुमार निरंकारी की याचिका पर दिया है।


बलिया के बेल्थरा रोड तहसील के हल्दीरामपुर गांव निवासी कमलेश एक प्राथमिक विद्यालय में सहायक अध्यापक के पद पर कार्यरत थे। शिकायत पर जांच में जाली दस्तावेज के आधार पर नौकरी पाने की पुष्टि होने के बाद बेसिक शिक्षा अधिकारी ने छह अक्तूबर 2022 के आदेश से उनकी नियुक्ति रद्द कर दी। साथ ही वेतन की वसूली का आदेश दिया। याची ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।

अधिवक्ता ने दलील दी कि 10 अगस्त 2010 को याची को सहायक शिक्षक नियुक्त किया गया था। उसने सभी शैक्षिक दस्तावेज जमा किए थे लेकिन बिना उचित सुनवाई के नियुक्ति रद्द कर दी गई। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है। उसके पैन कार्ड, आधार कार्ड और शैक्षिक प्रमाणपत्रों में नाम में अंतर था। यह संबंधित प्राधिकारियों की त्रुटि के कारण था। याची ने कोई जालसाजी नहीं की है। कोर्ट ने कहा इस मामले में विस्तृत जांच की जरूरी नहीं है।

Saturday, August 9, 2025

प्रशासनिक लापरवाही पर कर्मी को धोखाधड़ी का दोषी नहीं ठहरा सकते – हाईकोर्ट के, सहायक अध्यापक पद से बर्खास्तगी आदेश को दी थी चुनौती

प्रशासनिक लापरवाही पर कर्मी को धोखाधड़ी का दोषी नहीं ठहरा सकते – हाईकोर्ट के, सहायक अध्यापक पद से बर्खास्तगी आदेश को दी थी चुनौती


प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी सरकारी विभाग की लापरवाही से कोई त्रुटि होती है तो उसके ए कर्मचारी को धोखाधड़ी का दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इस टिप्पणी संग कोर्ट ने स्वतंत्रता सेनानी के आश्रित होने के कथित फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर बर्खास्त किए गए सहायक अध्यापक को बहाल कर दिया।

यह आदेश न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान ने बलिया के नवतेज कुमार सिंह की याचिका पर दिया। नवतेज को बलिया के जूनियर बेसिक स्कूल में स्वतंत्रता सेनानी आश्रित श्रेणी के तहत सहायक अध्यापक के पद पर नियुक्त किया गया था। उन्होंने 22 अक्तूबर 2020 को कार्यभार संभाला। दस्तावेज के सत्यापन के दौरान उनकी ओर से प्रस्तुत चार अप्रैल 2008 का स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाण पत्र बलिया के डीएम के रिकॉर्ड में क्रम संख्या 1114 पर दर्ज नहीं था। इस क्रम संख्या पर एक हरमीत सिंह का नाम था। इसके बाद उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया गया।

याची ने एक अप्रैल 2021 को डीएम के कार्यालय से एक और प्रमाण पत्र प्राप्त किया जिसमें फिर से पुष्टि की गई कि वह स्वतंत्रता सेनानी आश्रित हैं। इसके बावजूद जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने उनकी सेवाएं समाप्त कर दीं। साथ ही उन्हें प्राप्त वेतन वापस करने का भी निर्देश दिया।

हाईकोर्ट ऑर्डर 👇 


किसी चूक के लिए 14 साल बाद अनुकंपा नियुक्ति रद्द करना गलत, हाईकोर्ट ने बर्खास्त करने के आदेश को किया रद्द

मनमाने तौर पर निरस्त नहीं कर सकते नियमित नियुक्ति : हाई कोर्ट



 प्रयागराज : इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि अधिकारी अपनी लापरवाही के लिए 14 वर्ष बाद विहित प्रक्रिया से की गई अनुकंपा नियुक्ति को निरस्त नहीं कर सकते। याची पर फ्राड या मिथ्या तथ्य देकर नियुक्ति पाने का आरोप नहीं है, उसने अपनी मां के सहायक अध्यापक होने का तथ्य भी नियुक्ति के समय छिपाया नहीं था। अधिकारियों ने सभी दस्तावेजों का सत्यापन करके नियुक्ति की थी।

विभाग में ही कार्यरत मां के बारे में पता न लगा पाने वाले अधिकारी लंबे अंतराल के बाद तथ्य छिपाने के आरोप में याची लिपिक की अनुकंपा नियुक्ति निरस्त नहीं कर सकते।

नियुक्ति का ऐसा कोई फार्मेट नहीं था जिसमें मां के सरकारी सेवा में होने का जिक्र किया जाता, ऐसा करना बाध्यकारी नहीं था। नियमित नियुक्ति को बिना कानूनी प्रक्रिया के मनमाने तौर पर निरस्त नहीं

किया जा सकता। सभी दस्तावेजों की समीक्षा के बाद हुई नियुक्ति वापस नहीं ली जा सकती। यह आदेश न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकलपीठ ने शिवकुमार की याचिका स्वीकार करते हुए दिया है। कोर्ट ने हाथरस में वरिष्ठ लिपिक शिव कुमार के खिलाफ 31 मई 2023 का बर्खास्तगी आदेश रद कर सभी सेवाजनित परिलाभों के साथ तत्काल बहाली का निर्देश बेसिक शिक्षा अधिकारी को दिया है।




किसी चूक के लिए 14 साल बाद अनुकंपा नियुक्ति रद्द करना गलत, हाईकोर्ट ने बर्खास्त करने के आदेश को किया रद्द 

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति में कोई धोखाधड़ी या महत्वपूर्ण तथ्य नहीं छिपाया गया है तो वर्षों बाद नियुक्ति को निरस्त नहीं किया जा सकता। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने मां के सरकारी स्कूल में शिक्षिका होने के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति के तहत क्लर्क के पद पर कार्यरत कर्मचारी को बर्खास्त करने के आदेश को रद्द कर दिया। यह आदेश न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकलपीठ ने शिव कुमार की याचिका पर दिया।

हाथरस निवासी शिव कुमार के पिता सहायक अध्यापक थे। उनके निधन के बाद 2001 में शिव कुमार को अनुकंपा के आधार पर जूनियर क्लर्क पद पर नियुक्ति मिली। बाद में सीनियर क्लर्क बने। वहीं, 31 मई 2023 में उनकी सेवा यह कहकर समाप्त कर दी गई कि नियुक्ति के समय यह तथ्य नहीं बताया था कि उनकी मां सरकारी नौकरी में हैं। शिव कुमार ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी।

अधिवक्ता ने दलील दी कि नियुक्ति आवेदन के समय कोई निर्धारित फॉर्म नहीं था जिसमें परिवार के सदस्यों की नौकरी की जानकारी देना आवश्यक हो। फिर भी उनकी मां ने हलफनामा देकर बताया था कि वे सरकारी विद्यालय में शिक्षिका हैं। दस्तावेजों की जांच की गई थी। ऐसे में अधिकारियों की किसी भी चूक के लिए याची जिम्मेदार नहीं है। 

कोर्ट ने कहा कि नियुक्ति से पहले सभी दस्तावेज की जांच की गई है और कोई धोखाधड़ी नहीं पाई गई। ऐसे में 14 साल बाद की गई कार्रवाई न्यायसंगत नहीं है।

देखें कोर्ट ऑर्डर 👇 

Saturday, August 2, 2025

रिंकू सिंह के बीएसए बनने में लगा ब्रेक, शैक्षिक योग्यता के चलते फाइल अटकी


रिंकू सिंह के बीएसए बनने में लगा ब्रेक, शैक्षिक योग्यता के चलते फाइल अटकी

01 अगस्त 2025
क्रिकेटर रिंकू सिंह को एक महीने में दूसरा झटका लगा है। पहले बीएसए बनने के लिए चल रही प्रक्रिया रुक गई। अब चुनाव आयोग ने उन्हें मतदाता जागरूकता अभियान से हटा दिया है। चुनाव आयोग ने उन्हें मतदाता शिक्षा एवं निर्वाचन सहभागिता कार्यक्रम का आईकन नामित किया था। समाजवादी पार्टी की सांसद प्रिया सरोज से सगाई के कारण चुनाव आयोग ने शुक्रवार को उन्हें अपने कार्यक्रम से अलग करने का फैसला किया। हालांकि बीएसए बनाने के लिए फाइल रोके जाने के पीछे रिंकू सिंह की शैक्षिक योग्यता को कारण बताया गया था। पिछले दिनों रिंकू सिंह की फाइल सीएम योगी के सामने रखी गई थी। उसके बाद फाइल रोक दी गई है।


दरअसल खेलों के लिए सुविधाओं के विकास और खिलाड़ियों के प्रोत्साहन को प्रदेश सरकार प्रतिबद्ध है। विगत आठ सालों में एक तरफ ग्रामीण स्तर तक स्पोर्ट्स इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास हुआ है तो दूसरी तरफ पदक विजेता खिलाड़ियों को सम्मानजनक पुरस्कार राशि देने के साथ उन्हें सरकारी नौकरी की सुविधा दी जा रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलों के माध्यम से देश-प्रदेश का मान बढ़ाने वाले खिलाड़ियों को सरकारी नौकरी देने के मामले में उत्तर प्रदेश देश का अग्रणी राज्य बना हुई है।

इसी क्रम में एक माह पहले पूर्व मुख्य सचिव मनोज कुमार सिंह ने 11 खिलाड़ियों को विभिन्न विभागों में नौकरी ऑफर किया था। इसमें रिंकू सिंह को बेसिक शिक्षा अधिकारी के पद पर जॉइनिंग करने की स्वीकृति दी गई थी। इसके बाद रिंकू सिंह से तमाम दस्तावेज मांगे गए थे। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि रिंकू सिंह की फाइल मुख्यमंत्री के समक्ष रखी गई थी, पर शैक्षिक योग्यता न होने से रोक दी गई है।

बेसिक शिक्षा निदेशक प्रताप सिंह बघेल का कहना है कि रिंकू सिंह से उनकी शैक्षिक योग्यता के डॉक्यूमेंट प्रस्तुत करने के लिए पत्र भेजा गया था। इसके बाद पूरी फाइल मुख्यमंत्री को संस्तुति के लिए भेजी गई थी। लेकिन शैक्षिक योग्यता की कमी के चलते फाइल रोक दी गई। उनका कहना है कि अभी उनके नौकरी की प्रक्रिया को फिलहाल स्थगित कर दिया गया है। आगे जो भी निर्देश होंगे, उससे अवगत कराया जाएगा।

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा विभाग के नियमों के अनुसार बीएसए पद पर तैनाती के लिए अभ्यर्थी को पोस्ट ग्रेजुएट होना अनिवार्य है। रिंकू सिंह केवल आठवीं पास है। यदि इस पद पर नियुक्ति मिल भी जाती तो उन्हें सात साल के अंदर पोस्ट ग्रेजुएट की डिग्री हासिल करनी पड़ती। पर उनकी मौजूदा शैक्षिक योग्यता और सरकार द्वारा तय समय अवधि की सीमा में योग्यता पूरी करना संभव नहीं दिखता है। यही वजह है कि उनकी नियुक्ति को फिलहाल रोक दी गई है।




क्रिकेटर रिंकू सिंह के बीएसए बनने की राह में नियमावली का रोड़ा, तैनाती का अभी अंतिम फैसला नहीं
 
27 जून 2025
क्रिकेटर रिंकू सिंह के बीएसए (बेसिक शिक्षा अधिकारी) बनने की राह में अभी कई मुश्किलें हैं, जिसे दूर करना उनके लिए आसान नहीं होगा। बीएसए की नियमावली उनकी प्रस्तावित नौकरी की राह में सबसे बड़ी अड़चन बन सकती है। क्योंकि बीएसए की नियमावली के अनुसार इस पद के लिए पोस्ट ग्रेजुएट होना अनिवार्य है जबकि क्रिकेटर ने अभी हाईस्कूल भी पास नहीं किया है। 


शैक्षिक अर्हता पूरी करने के लिए सात वर्षों की शिथिलता का प्रावधान है, जिसका लाभ लेने के बाद भी रिंकू सिंह इस पद के लिए जरूरी शैक्षिक अर्हता पूरी नहीं कर सकेंगे क्योंकि वर्तमान समय के हिसाब से भी अगर गणना की जाए तो पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल करने में उन्हें कम से कम आठ वर्ष लगेंगे जो शिथिलता वाली अवधि से अधिक है।

जानकारों का कहना है कि प्रदेश के अन्तराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ियों को सरकारी नौकरी दिए जाने की नीति के तहत मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली कमेटी ने जिन सात खिलाड़ियों को श्रेणी-2 के अधिकारियों के पदों पर नियुक्ति करने की संस्तुति की है। उसमें अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर रिंकू सिंह का नाम तो प्रमुखता से है लेकिन उन्हें बेसिक शिक्षा अधिकारी के पद पर तैनात करने के प्रस्ताव पर विभाग में उच्च स्तर पर अभी कोई अन्तिम निर्णय नहीं हो सका है। ऐसे में मशहूर क्रिकेटर रिंकू सिंह की नियुक्ति वाले विभाग में बदलाव किए जाने की भी सम्भावना व्यक्त की जा रही है।


सात खिलाड़ियों को बनाया जाना है राजपत्रित अधिकारी

बुधवार को क्रिकेटर रिंकू सिंह समेत सात खिलाड़ियों को यूपी अंतरराष्ट्रीय पदक विजेता भर्ती नियमावली-2022 के नियम-7 के तहत श्रेणी-2 के राजपत्रित अधिकारी के पद पर नियुक्ति किए जाने संबंधी पत्रों के वायरल होने के बाद इस पर चर्चा का माहौल गरम है। पत्र के अनुसार क्रिकेटर रिंकू सिंह को बेसिक शिक्षा विभाग में बेसिक शिक्षा अधिकारी बनाए जाने के साथ छह अन्य खिलाड़ियों को भी राजपत्रित अधिकारी के पद पर नियुक्ति किए जाने की जानकारी दी गई थी।



Cricketer Rinku Singh: क्रिकेटर रिंकू सिंह सीधी भर्ती से बनेंगे BSA, कई अन्य खिलाड़ी भी पाएंगे नियुक्ति

25 जून 2025
लखनऊ। टीम इंडिया के स्टार क्रिकेटर रिंकू सिंह बेसिक शिक्षा विभाग में बेसिक शिक्षा अधिकारी बनेंगे। खेल विभाग की अंतरराष्ट्रीय पदक विजेता सीधी भर्ती के तहत उन्हें इस पद पर तैनाती दी जाएगी। इसके लिए विभाग ने आवश्यक तैयारी शुरू कर दी है। साथ ही रिंकू सिंह को पत्र भेजकर इससे जुड़ी आवश्यक औपचारिकता पूरी करने को कहा है। 


क्रिकेटर रिंकू सिंह भारतीय टी-20 टीम के सदस्य हैं। मूल रूप से अलीगढ़ निवासी रिंकू सिंह की हाल ही में समाजवादी पार्टी की सांसद प्रिया सरोज के साथ सगाई हुई है। जल्द ही उनकी शादी की तिथि भी तय की जाएगी। पिछले दिनों मुख्य सचिव मनोज कुमार सिंह की अध्यक्षता में उत्तर प्रदेश अंतरराष्ट्रीय पदक विजेता सीधी भर्ती के खाली पदों को भरने के लिए चयन समिति की बैठक हुई। इसमें खाली पदों के सापेक्ष सात खिलाड़ियों व एथलीट को विभिन्न विभागों में नियुक्त करने की संस्तुति की गई। इसमें रिंकू सिंह को बेसिक शिक्षा विभाग में बीएसए, पैरा एथलीट प्रवीण कुमार को गृह विभाग में पुलिस उप अधीक्षक, हॉकी खिलाड़ी राजकुमार पाल को गृह विभाग में पुलिस उपाधीक्षक पद पर नियुक्ति की संस्तुति की गई। 


इसी क्रम में पैरा एथलीट अजीत सिंह को पंचायती राज विभाग में जिला पंचायती राय अधिकारी, पैरा एथलीट सिमरन को पंचायती राज विभाग में जिला पंचायती राज अधिकारी, पैरा एथलीट प्रीति पाल को ग्रामीण विकास विभाग में खंड विकास अधिकारी, एथलीट किरन बालियान को वन विभाग में क्षेत्रीय वन अधिकारी के रूप में तैनाती की संस्तुति दी गई। खेल एवं युवा कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव मनीष चौहान की ओर से जारी निर्देश में कहा गया है कि इन आवेदकों से उनकी शैक्षिक अर्हता से जुड़ी जानकारी ली जाएगी। 


Wednesday, July 30, 2025

दिव्यांग, असाध्य बीमारी वाले शिक्षकों को तैनाती में वरीयता, शासन ने माध्यमिक शिक्षा विभाग को दिए निर्देश

दिव्यांग, असाध्य बीमारी वाले शिक्षकों को तैनाती में वरीयता, शासन ने माध्यमिक शिक्षा विभाग को दिए निर्देश


लखनऊ। प्रदेश के राजकीय माध्यमिक विद्यालयों में दिव्यांग, असाध्य बीमारी, कैंसर प्रभावित व दो साल से कम सेवाकाल वाले शिक्षकों को पदस्थापन (तैनाती) में वरीयता दी जाएगी। शासन ने माध्यमिक शिक्षा विभाग को इसके लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं।


विभाग ने मई में एलटी और प्रवक्ता ग्रेड के शिक्षकों को प्रधानाध्यापक पद पर पदोन्नत किया था। इसमें से 30 फीसदी शिक्षकों ने ही जॉइन किया । शिक्षक अपने पास के विद्यालयों में ही जाना चाहते थे। काफी संख्या में शिक्षकों ने अपनी पारिवारिक व स्वास्थ्य स्थितियों का हवाला देते हुए पदस्थापन में संशोधन के लिए विभाग में आवेदन किया था।

विभाग की ओर से जारी निर्देश में कहा गया है कि दिव्यांग, असाध्य बीमारी, कैंसर प्रभावित शिक्षक या उनके आश्रित को उनके द्वारा मांगे गए स्थान पर पदस्थापन किया जाएगा। यदि पद खाली न हो तो वरिष्ठता के क्रम में पास के विद्यालयों में पदस्थापन दिया जाएगा।

जिन कार्मिकों का सेवाकाल दो साल से कम है, उनको उनकी अपेक्षानुसार खाली स्थान या पास के विद्यालयों में भेजा जाएगा। विशेष सचिव ने माध्यमिक शिक्षा निदेशक को निर्देश दिया है कि इसके अनुसार वरीयता के आधार पर दिए गए विकल्प के सापेक्ष पदस्थापन किया जाए। ऐसे में प्रधानाध्यापक के खाली पदों को भरने का रास्ता भी साफ हो गया है।


जॉइन कराकर कर दिया तबादला, विभाग निदेशालय द्वारा में खेल
विशेष सचिव ने अपने पत्र में इस बात पर नाराजगी भी जताई है कि जब पदस्थापन के लिए सूची शासन को भेजी गई थी तो कुछ कार्मिकों को जॉइन कराकर फिर तबादला किस आधार पर किया गया? उन्होंने इसके लिए दोषी अधिकारियों के बारे में भी जानकारी मांग ली है। इसके बाद से विभाग में हड़कंप मचा हुआ है। माना जा रहा है कि शासन इस मामले में विभागीय अधिकारियों की जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई भी कर सकता है।

Monday, July 7, 2025

अनुदानित प्रबंधकीय विद्यालयों में प्रधानाध्यापक, सहायक अध्यापक और लिपिक पद पर नियुक्तियों में फर्जीवाड़ा करने के आरोप में पूर्व बीएसए समेत 18 पर मुकदमा दर्ज

अनुदानित प्रबंधकीय विद्यालयों में प्रधानाध्यापक, सहायक अध्यापक और लिपिक पद पर नियुक्तियों में फर्जीवाड़ा करने के आरोप में पूर्व बीएसए समेत 18 पर मुकदमा दर्ज

अभी सुल्तानपुर डायट में तैनात हैं हरिकेश यादव, स्कूलों में फर्जी नियुक्तियां के आरोप में हुई कार्रवाई


वाराणसी । अनुदानित प्रबंधकीय विद्यालयों में प्रधानाध्यापक, सहायक अध्यापक और लिपिक पद पर नियुक्तियों में फर्जीवाड़ा करने के आरोप में वाराणसी के तत्कालीन बीएसए हरिकेश यादव, चार खंड शिक्षाधिकारियों समेत 18 लोगों पर सतर्कता अधिष्ठान में नामजद केस दर्ज किया गया है।


आरोपियों में सात विद्यालय प्रबंधक और प्रधानाध्यापक भी शामिल हैं। मामला 2015-16 और 2016-17 शैक्षणिक सत्र का है। हरिकेश यादव वर्तमान में सुल्तानपुर जिले के डायट में तैनात हैं। शासन से सतर्कता अनुभाग को साल 2021 में जांच संबंधी पत्र दिया गया था। इसमें बीएसए और सात विद्यालयों के प्रबंधकों आदि पर प्रधानाध्यापक, अध्यापक एवं लिपिक की नियुक्ति में अनियमितता बरतने, राजकीय धन के अपव्यय और गबन के जांच के आदेश मिले थे।

 जांच में सभी आरोपियों के खिलाफ आरोप सत्य पाए जाने के बाद उप्र सतर्कता अधिष्ठान, वाराणसी इकाई ने मुकदमा दर्ज किया है। शिक्षा सत्र 2015-16 और 2016-17 में नियुक्ति में तत्कालीन बीएसए हरिकेश यादव ने चयन प्रक्रिया के नियमों का पालन नहीं किया।

Monday, June 9, 2025

अस्वीकृत पदों पर नियुक्ति के लिए राज्य जिम्मेदार, कर्मचारी नहीं : हाईकोर्ट, राज्य सरकार की लापरवाही का खामियाजा कर्मचारियों को नहीं भुगतने दिया जा सकता

अस्वीकृत पदों पर नियुक्ति के लिए राज्य जिम्मेदार, कर्मचारी नहीं : हाईकोर्ट, राज्य सरकार की लापरवाही का खामियाजा कर्मचारियों को नहीं भुगतने दिया जा saktaa

एकल पीठ के आदेश को रद्द करते हुए हमीरपुर के शिक्षकों की विशेष अपील की स्वीकार


प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि वैध स्वीकृत पदों पर अस्थायी कर्मचारियों के नियमितीकरण के बाद उन्हें इस आधार पर सेवा से बाहर नहीं किया जा सकता कि उनकी मौलिक नियुक्ति अवैध थी। अस्वीकृत पदों पर नियुक्ति के लिए राज्य जिम्मेदार है कर्मचारी नहीं।


वर्षों तक निरंतर सेवा के बाद उनकी नौकरी पर प्रश्नचिह्न लगाना ठीक नहीं है। इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने एकल पीठ के आदेश को रद्द करते हुए शिक्षक देवेंद्र सिंह और शिक्षक जुझार सिंह की विशेष अपील स्वीकार कर ली।


हमीरपुर स्थित पीएनवी इंटर कॉलेज चिल्ली (मुस्करा) में जुझार सिंह को वर्ष 1987 1987 और देवेंद्र सिंह को 1989 में अस्थायी तौर पर नियुक्त किया गया था। कुछ वर्षों बाद यह कहते हुए उनकी सेवायें समाप्त कर दी गईं कि जिन पदों पर उन्हें नियुक्त किया गया था, वे स्वीकृत नहीं थे। इसके खिलाफ दोनों ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। 


कोर्ट ने अंतरिम आदेश से तत्काल प्रभाव से उनकी बर्खास्तगी पर रोक लगा दी और 2006 में उन्हें स्वीकृत पदों पर समायोजित कर लिया गया। लेकिन वर्ष 2010 में उनकी याचिका को एकल पीठ ने अंतिम रूप से खारिज कर दिया। इस आदेश के खिलाफ उन्होंने विशेष अपील के जरिए खंडपीठ का दरवाजा खटखटाया था।


कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए कहा कि अपीलकर्ताओं की सेवा को 2006 में वैध रिक्तियों पर समायोजित कर दिया गया था। ऐसे में उनकी नियुक्ति में शुरू में यदि कोई अनियमितता रही भी हो, तो उसे अब गलत नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि राज्य सरकार को कोई आपत्ति थी, तो उसे समय रहते कार्रवाई करनी चाहिए थी।


कर्मचारियों की कोई व्यक्तिगत गलती नहीं

कर्मचारियों की कोई व्यक्तिगत गलती नहीं थी। उन्हें बाद में स्वीकृत पदों पर समायोजित कर दिया गया था। इतने वर्षों की निरंतर सेवा के बाद उनकी नौकरी पर प्रश्नचिह्न लगाना उचित नहीं है। राज्य सरकार की लापरवाही का खामियाजा कर्मचारियों को नहीं भुगतना चाहिए। एक बार नियमित होने के बाद, पिछली तकनीकी खामियों को भुला देना ही न्यायसंगत है। - इलाहाबाद हाईकोर्ट

Saturday, April 19, 2025

सहायता प्राप्त संस्कृत महाविद्यालयों और माध्यमिक संस्कृत विद्यालयों में नियमित शिक्षकों की नियुक्ति एक बार फिर प्रबंधकों को देने की तैयारी

सहायता प्राप्त संस्कृत महाविद्यालयों और माध्यमिक संस्कृत विद्यालयों में नियमित शिक्षकों की नियुक्ति एक बार फिर प्रबंधकों को देने की तैयारी

∎ शिक्षा निदेशालय ने प्रदेश सरकार को भेजा प्रस्ताव 
∎ वर्तमान में किसी संस्था के पास नहीं भर्ती का जिम्मा


प्रयागराज । प्रदेश के 403 सहायता प्राप्त संस्कृत महाविद्यालयों और 570 माध्यमिक संस्कृत विद्यालयों में नियमित शिक्षकों की नियुक्ति एक बार फिर प्रबंधकों को देने की तैयारी है। शिक्षा निदेशालय की ओर से सरकार को प्रस्ताव भेजा गया है कि सहायता प्राप्त संस्कृत विद्यालयों महाविद्यालयों में पूर्व की तरह प्रबंधकों के माध्यम से ही शिक्षकों की नियुक्ति की जाए। पिछले कई सालों से इन संस्थाओं में शिक्षकों की नियुक्ति नहीं हुई है। शिक्षकों की कमी से जूझ रहे स्कूलों में तीन साल पहले स्थायी शिक्षकों की मानदेय पर नियुक्ति हुई थी।


सरकार ने 28 मार्च 2018 को उत्तर प्रदेश माध्यमिक संस्कृत शिक्षा परिषद (संस्थानों के प्रधानों, अध्यापकों एवं संस्थानों के अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति एवं सेवा शर्ते) विनियमावली -2009 में संशोधन के बाद सहायता प्राप्त संस्कृत विद्यालयों में शिक्षकों के चयन का अधिकार उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड को दिया था। उसके बाद 2019 में माध्यमिक शिक्षा विभाग ने संस्कृत माध्यमिक विद्यालयों में 1282 शिक्षकों के रिक्त पदों की सूचना भेजी थी।


इसी प्रकार महाविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति की जिम्मेदारी उत्तर प्रदेश उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग को दी गई थी। हालांकि इन दोनों ही संस्थाओं का नवगठित उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग में विलय हो चुका है। नवगठित आयोग को संस्कृत शिक्षकों की नियुक्ति की जिम्मेदारी नहीं मिली है। ऐसे में स्थायी शिक्षकों की चयन की समस्या दूर करने के लिए शिक्षा निदेशालय ने नए सिरे से शासन को प्रस्ताव भेजा है।


संस्कृत महाविद्यालय में शिक्षकों के आधे पद खाली

संस्कृत विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में स्थायी शिक्षकों के लगभग आधे पद खाली हैं। 17 मार्च 2023 को शासन में हुई बैठक में प्रस्तुत रिपोर्ट के अनुसार एडेड संस्कृत माध्यमिक विद्यालयों में अध्यापकों के सृजित 2085 पदों में से 1064 कार्यरत थे और 1021 खाली थे। प्रधानाचार्यों के सृजित 570 पदों में से 263 कार्यरत और 307 रिक्त थे। महाविद्यालयों में प्राचार्य के 403 पदों में से 154 कार्यरत और 249 रिक्त थे और शिक्षकों के 1889 पदों में से 960 कार्यरत और 929 खाली थे। बड़ी संख्या में शिक्षक सेवानिवृत्त हुए हैं।