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Sunday, April 5, 2026

शैक्षणिक दस्तावेज फर्जी तो नियुक्ति शुरू से शून्यः हाईकोर्ट

शैक्षणिक दस्तावेज फर्जी तो नियुक्ति शुरू से शून्यः हाईकोर्ट

धोखाधड़ी से मिली नियुक्ति को लंबे समय की सेवा भी वैध नहीं बना सकतीः हाईकोर्ट

मेरठ की शिक्षिका ने नियुक्ति को अवैध घोषित करने और वेतन रोकने के खिलाफ दायर की थी याचिका

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी कर्मचारी ने जालसाजी या धोखाधड़ी से सार्वजनिक रोजगार प्राप्त किया है तो दशकों तक की उसकी सेवा भी नियुक्ति को वैधता प्रदान नहीं सकती। धोखाधड़ी और न्याय कभी एक साथ नहीं रह सकते और कर जालसाजी पर टिकी कोई भी नींव कानून की नजर में शुरुआत से ही शून्य मानी जाती है। यह आदेश न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की पीठ ने मेरठ की शिक्षिका वीणा मेनन की याचिका खारिज करते हुए दिया है।


याची की नियुक्ति वर्ष 1989 में मेरठ के एक स्कूल में सहायक शिक्षक के पद पर हुई थी। विवाद तब शुरू हुआ जब मानव संपदा पोर्टल पर दस्तावेज अपलोड करने की प्रक्रिया के दौरान याची ने वर्ष 1984 की अपनी हाईस्कूल की मूल मार्कशीट और प्रमाणपत्र जारी करने के लिए आवेदन किया, जो लंबे समय से फर्जी टीसी के आधार पर बोर्ड ने रोके गए रिजल्ट की श्रेणी में डाल दिया था।

जांच में सामने आया कि याची ने हाईस्कूल परीक्षा में बैठने के लिए कक्षा-आठ का जो स्थानांतरण प्रमाणपत्र (टीसी) लगाया था, वह फर्जी था। इस आधार पर याची की नियुक्ति को अवैध घोषित करते हुए वेतन रोक दिया गया। याची ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी।


याची के अधिवक्ता ने रखा तर्क 35 वर्ष तक बिना विवाद सेवा दी

याची अधिवक्ता ने दलील दी कि शिक्षिका ने 35 वर्षों तक बिना किसी विवाद के सेवा दी है। उसकी नियुक्ति के समय दस्तावेज के सत्यापन में अधिकारियों ने चूक की है। अधिकारियों की चूक के लिए उसे जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि जब नियुक्ति का आधार ही धोखाधड़ी हो तो सेवा की अवधि का कोई महत्व नहीं रह जाता।


कोर्ट ने कहा, अधिकारियों की कथित चूक का लाभ नहीं दिया जा सकता

अपने आदेश में उच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि अधिकारियों की ओर से सत्यापन में हुई कथित देरी या चूक का लाभ उठाकर किसी भी जालसाजी को जायज नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने इस मामले में बेसिक शिक्षा अधिकारी की ओर से याची का वेतन रोकने और उसके दस्तावेजों को रद्द करने की कार्यवाही को पूरी तरह वैध करार दिया।

Friday, March 27, 2026

कटऑफ से अधिक अंक तो याची नियुक्ति की हकदार, 29334 विज्ञान गणित भर्ती में हाईकोर्ट का आदेश

कटऑफ से अधिक अंक तो याची नियुक्ति की हकदार,  29334 विज्ञान गणित भर्ती में हाईकोर्ट का आदेश

कोर्ट ने कहा, कार्यकारी निर्देश न्यायिक निर्देशों को रद्द नहीं कर सकते

प्रयागराज । इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 2013 की 29334 सहायक अध्यापक भर्ती में कटऑफ से अधिक अंक पाने वाली अभ्यर्थी (याची) की सहायक अध्यापक विज्ञान पद पर नियुक्ति के लिए विचार करने का निर्देश दिया है।


कोर्ट ने कहा कि कार्यकारी निर्देश न्यायिक निर्देशों को रद्द नहीं कर सकते, न ही वे अर्जित अधिकारों को समाप्त कर सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट नीरज कुमार पांडेय के मामले में तय कर चुका है कि सीनियर बेसिक स्कूलों में सहायक अध्यापक भर्ती में रिक्त पदों पर कटऑफ से अधिक अंक पाने वाले अभ्यर्थियों की नियुक्ति पर विचार किया जाए। ऐसे अभ्यर्थियों से कानून के अनुसार नियुक्ति की पेशकश की जानी चाहिए। 

याची शर्तों को पूरा करती है क्योंकि उसने समय रहते ही इस न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था और उसके अंक अंतिम चयनित अभ्यर्थी से अधिक हैं इसलिए याची को विचार सूची से बाहर रखने की कार्रवाई सर्वोच्च न्यायालय के बाध्यकारी निर्देशों का सीधा उल्लंघन है, जो संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत प्रवर्तनीय हैं। 

यह आदेश न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान ने दीप्ति चौहान की याचिका पर दिया है। कोर्ट ने कहा कि योग्यता और पात्रता के बावजूद याची को नियुक्ति से वंचित करना एक प्रकार का भेदभावपूर्ण व्यवहार है। याची ने कटऑफ से अधिक अंक प्राप्त किए थे तो वह नियुक्ति की हकदार है।

Monday, March 23, 2026

बिना भर्ती के अवसर की मांग करने की बीटीसी अभ्यर्थियों की याचिका खारिज

बिना भर्ती के अवसर की मांग करने की बीटीसी अभ्यर्थियों की याचिका खारिज

बेसिक शिक्षा की जब भी निकले भर्ती, उनके अभ्यर्थन पर विचार करने की थी मांग 

कोर्ट ने कहा, बिना विज्ञापन भविष्य की भर्ती के लिए निर्देश मांगना न्यायोचित नहीं

प्रयागराज । इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेसिक शिक्षा परिषद के विद्यालयों में सहायक शिक्षक पद पर नियुक्ति को लेकर दाखिल बीटीसी अभ्यर्थियों की याचिका खारिज कर दी है। यह आदेश न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान ने सुनवाई के बाद दिया है। 


राजेश कुमार श्रीवास्तव व 23 अन्य याचियों की ओर से याचिका में यह प्रार्थना की गई थी कि जब भी बेसिक शिक्षा परिषद द्वारा सहायक शिक्षक के पदों पर रिक्तियां निकाली जाएं, तब उनकी अभ्यर्थिता पर विचार करने का निर्देश संबंधित अधिकारियों को दिया जाए। 

सुनवाई के दौरान विपक्षी के अधिवक्ता ने कोर्ट को अवगत कराया कि बीटीसी प्रशिक्षित अभ्यर्थियों की पात्रता, शिक्षण अनुभव के आधार पर वरीयता और आयु में छूट जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल विशेष अनुमति याचिका में विचाराधीन हैं। इसके अलावा अब तक किसी भी प्रकार की भर्ती के लिए विज्ञापन जारी नहीं किया गया है।

याचियों की ओर से इस पर कोई ठोस प्रतिवाद नहीं किया गया। कोर्ट ने कहा कि बिना किसी विज्ञापन के भविष्य की संभावित भर्ती के लिए इस प्रकार का निर्देश मांगना न्यायोचित नहीं है। साथ ही याचिका पूरी तरह भ्रांतिपूर्ण है। कोर्ट ने इन्हीं आधारों पर याचिका को खारिज कर दिया।

Thursday, March 19, 2026

नियुक्ति से पहले शिक्षिका की विवाहित व्यक्ति से शादी दुराचरण नहीं : हाईकोर्ट, सेवा समाप्त करने वाला आदेश रद

नियुक्ति से पहले शिक्षिका की विवाहित व्यक्ति से शादी दुराचरण नहीं : हाईकोर्ट, सेवा समाप्त करने वाला आदेश रद 


प्रयागराज : इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि सरकारी स्कूल में शिक्षिका के रूप में नियुक्ति से पहले किसी महिला की विवाहित व्यक्ति से दूसरी शादी को दुराचरण नहीं माना जा सकता है। न्यायमूर्ति मंजूरानी चौहान की एकलपीठ ने इस टिप्पणी के साथ रीना नामक शिक्षिका की याचिका स्वीकार करते हुए सेवा समाप्त करने वाला आदेश रद कर दिया है और प्रतिवादी अधिकारियों को यह निर्देश दिया कि वे याची को उचित नोटिस देने के बाद नया और तर्कसंगत आदेश पारित करें।


वर्ष 2015 में याची को प्राथमिक विद्यालय में सहायक शिक्षक पद पर नियुक्त किया गया। इस शिकायत पर कि उसने ऐसे व्यक्ति से विवाह किया जो पहले से ही विवाहित था, उसकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं। इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई। कहा गया कि उसकी सेवाएं समाप्त करने से पूर्व कोई जांच नहीं की गई और उसे अपने पति के पहले विवाह के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। 


कोर्ट ने कहा, यूपी सरकारी कर्मचारी आचरण नियमावली, 1956 का नियम 29 (2) यह प्रविधान करता है कि कोई भी महिला कर्मचारी सरकार की पूर्व अनुमति के बिना ऐसे पुरुष से विवाह नहीं करेगी, जिसकी पत्नी जीवित हो। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि यूपी बेसिक शिक्षा अधिनियम, 1972 की धारा 19, राज्य सरकार को यह अधिकार देती है कि वह बोर्ड द्वारा मान्यता प्राप्त बेसिक स्कूलों में शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों के पदों पर भर्ती तथा नियुक्त व्यक्तियों की सेवा शर्तों के संबंध में नियम बनाए। 


कोर्ट ने कहा कि आचरण नियमावली की प्रयोज्यता केवल उन लोगों तक सीमित है, जो सरकारी सेवा में आ चुके हैं। नियुक्ति से पहले के चरण में किसी व्यक्ति के खिलाफ इन नियमों का हवाला नहीं दिया जा सकता। चूंकि कथित वैवाहिक अनियमितता वर्ष 2009 से संबंधित है, यानी याची की 2015 में हुई नियुक्ति से काफी पहले की बात है, इसलिए आचरण नियमावली, 1956 के नियम 29 के प्रविधान याचिकाकर्ता के मामले पर स्पष्ट रूप से लागू नहीं होते।

Tuesday, February 3, 2026

फर्जी सर्टिफिकेट के जरिए नौकरी पाने वाले शिक्षकों के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट का सख्त रुख, नियुक्तियों में मिलीभगत करने वाले अधिकारियों के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई के निर्देश

फर्जी सर्टिफिकेट के जरिए नौकरी पाने वाले शिक्षकों के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट का सख्त रुख, नियुक्तियों में मिलीभगत करने वाले अधिकारियों के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई के निर्देश



फर्जी सर्टिफिकेट के जरिए नौकरी पाने वाले शिक्षकों के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को आदेश दिया है कि ऐसे सभी असिस्टेंट टीचरों के मामलों की पूरे राज्य में व्यापक जांच कराई जाए और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई हो। जस्टिस मंजू रानी चौहान की सिंगल बेंच ने इस संबंध में राज्य सरकार को मैंडमस जारी किया है।


हाईकोर्ट ने प्रिंसिपल सेक्रेटरी, बेसिक शिक्षा को निर्देश दिया है कि यह जांच संभव हो तो छह महीने के भीतर पूरी की जाए। कोर्ट ने साफ कहा कि केवल अवैध नियुक्तियों को रद्द करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि ऐसे शिक्षकों से अब तक ली गई सैलरी की रिकवरी भी की जाए। इसके साथ ही फर्जी नियुक्तियों में मिलीभगत करने वाले अधिकारियों के खिलाफ भी सख्त विभागीय और कानूनी कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।

कोर्ट ने टिप्पणी की कि राज्य सरकार द्वारा कई सर्कुलर और निर्देश जारी किए जाने के बावजूद जिम्मेदार अधिकारी समय पर और प्रभावी कार्रवाई करने में नाकाम रहे हैं। यह निष्क्रियता न सिर्फ धोखाधड़ी को बढ़ावा देती है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की जड़ों को कमजोर करती है। कोर्ट ने कहा कि इससे छात्रों के हितों को गंभीर नुकसान होता है, जो न्यायालय के लिए सर्वोपरि है।

Thursday, January 22, 2026

परिवार पर विपदा सदस्य की उम्र देखकर नहीं आती, अनुकंपा नियुक्ति के नियमों को लचीला बनाएं – हाईकोर्ट

परिवार पर विपदा सदस्य की उम्र देखकर नहीं आती, अनुकंपा नियुक्ति के नियमों को लचीला बनाएं

हाईकोर्ट ने कहा-परिवार आर्थिक तंगी में है तो केवल अधिक आयु के आधार पर अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य अचानक आए आर्थिक संकट से परिवार को उबारना है। परिवार पर विपदा सदस्य की उम्र देखकर नहीं आती है। भर्ती नियमों की कठोरता को इसके उद्देश्यों को विफल करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इसकी नियुक्ति में आयु सीमा की बाधा को दूर करें और नियमों को लचीला बनाएं।

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) की अनुकंपा नियुक्ति समिति की एकल पीठ के खिलाफ दायर विशेष अपील पर की। कोर्ट ने समिति को निर्देश दिया है कि वह याचिकाकर्ता की आयु में छूट के अनुरोध पर एक महीने के भीतर विचार करे।

प्रतिवादी/याची एन. शांगबनाबी देवी की बहन की 2015 में बीएचयू में सेवा के दौरान मौत हो गई थी। उन्होंने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया था, जिसे विवि ने खारिज कर दिया। कहा कि उनकी आयु घटना के समय 37 वर्ष थी, जो ओबीसी श्रेणी के लिए निर्धारित अधिकतम आयु सीमा (33 वर्ष) से अधिक थी। इसे याची ने हाईकोर्ट में चुनौती दी तो एकल पीठ ने उनके पक्ष में आदेश दिया। 

इस पर बीएचयू ने एकल पीठ के पांच फरवरी 2025 के आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में विशेष अपील दायर की। कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद बीएचयू की उस दलील को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि कार्यकारी परिषद ने केवल विधवाओं या तलाकशुदा महिलाओं को आयु में छूट देने का प्रस्ताव पारित किया है। कहा कि जब तक मूल अनुकंपा नियमों में संशोधन नहीं होता, तब तक ऐसे प्रशासनिक प्रस्ताव किसी अन्य आश्रित (जैसे वहन) के अधिकार को कम नहीं कर सकते। 

कोर्ट ने कहा कि परिवार वास्तव में आर्थिक तंगी में है तो केवल अधिक आयु के आधार पर उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता। मुकदमेबाजी के दौरान हुई देरी को भी नजरअंदाज करने का निर्देश दिया है।





बीएचयू को याची की नियुक्ति के संबंध में विचार कर एक महीने में निर्णय लेने का निर्देश

भर्ती नियमों के तहत सीमित नहीं की जा सकती अनुकंपा नियुक्ति – हाईकोर्ट 


प्रयागराजः इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि अनुकंपा नियुक्ति सामान्य भर्ती प्रक्रिया का अपवाद है और इसे भर्ती नियमों से आच्छादित मानकर अस्वीकार नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह तथा न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने सुश्री नामीराकपन शांगबनाश्री देवी की नियुक्ति मामले में विचार करने संबंधी एकलपीठ के आदेश के खिलाफ दायर काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) वाराणसी की विशेष अपील निस्तारित करते हुए यह टिप्पणी की है।

कोर्ट ने कहा है कि अनुकंपा नियुक्ति के लिए मूल याची के दावे पर विचार करने से पहले देरी के मुद्दे की जांच करना आवश्यक है। कोर्ट ने बीएचयू की अनुकंपा नियुक्ति समिति को निर्देश दिया है कि वह पहले मूल याची की उम्र में छूट के अनुरोध पर विचार करे, वह भर्ती नियमों के अनुसार नहीं, बल्कि अनुकंपा नियमों के अनुसार। इसके बाद उसके दावे पर विचार किया जाए, जिसमें पारिवारिक सदस्यों की निर्भरता, वित्तीय कठिनाई और अन्य प्रासंगिक परिस्थितियों को ध्यान रखा जाए। यह निर्णय एक महीने में के भीतर करने का निर्देश दिया गया है।

कोर्ट ने कहा है कि भर्ती नियम संविधान के अनुच्छेद 16 की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए हैं, जबकि अनुकंपा नियुक्ति नियम इसके अपवाद हैं और इनका उद्देश्य वित्तीय संकट में आए पीड़ित परिवार को तात्कालिक सहायता प्रदान करना है। अनुकंपा नियुक्ति नियमों को भर्ती नियमों के तहत सीमित नहीं किया जा सकता है। इसका मतलब यह है कि अगर कोई आवेदक भर्ती नियमों की कुछ शर्तों को पूरा नहीं करता है तो भी उसकी अनुकंपा नियुक्ति के लिए बिचार किया जा सकता है बशर्ते उसके परिवार को सहायता मिलती हो। 

हाई कोर्ट की एकलपीठ के पांच फरवरी 2025 के उस आदेश को इस अपील में चुनौती दी गई थी, जिसमें बीएचयू का नौ मार्च 2018 का अनुकंपा नियुक्ति देने से इन्कार करने वाला आदेश रद कर दिया गया था। एकल न्यायाधीश ने यह भी कहा था कि भर्ती नियम अनुकंपा नियुक्ति पर लागू नहीं होते। विश्वविद्यालय का तर्क था कि अनुकंपा नियुक्ति के नियमों में भर्ती नियमों के अनुसार पात्रता शर्तें शामिल हैं। मृतक की बहन की उम्र 37 वर्ष थी, जो अधिकतम आयु सीमा से चार वर्ष अधिक है। 

यूनिवर्सिटी के कार्यकारी परिषद ने एक अन्य मामले में फैसला दिया था कि उम्र में छूट भर्ती नियमों के अनुसार ही दी जाएगी। याची की तरफ से कहा गया है कि अनुकंपा नियमों में उम्र में छूट का प्रविधान है और कार्यकारणी परिषद का फैसला इन नियमों को ओवरराइड नहीं कर सकता। भर्ती नियम केवल अन्य पात्रता शर्तों पर लागू होते हैं, न कि उम्र पर।