परिवार पर विपदा सदस्य की उम्र देखकर नहीं आती, अनुकंपा नियुक्ति के नियमों को लचीला बनाएं
हाईकोर्ट ने कहा-परिवार आर्थिक तंगी में है तो केवल अधिक आयु के आधार पर अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य अचानक आए आर्थिक संकट से परिवार को उबारना है। परिवार पर विपदा सदस्य की उम्र देखकर नहीं आती है। भर्ती नियमों की कठोरता को इसके उद्देश्यों को विफल करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इसकी नियुक्ति में आयु सीमा की बाधा को दूर करें और नियमों को लचीला बनाएं।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) की अनुकंपा नियुक्ति समिति की एकल पीठ के खिलाफ दायर विशेष अपील पर की। कोर्ट ने समिति को निर्देश दिया है कि वह याचिकाकर्ता की आयु में छूट के अनुरोध पर एक महीने के भीतर विचार करे।
प्रतिवादी/याची एन. शांगबनाबी देवी की बहन की 2015 में बीएचयू में सेवा के दौरान मौत हो गई थी। उन्होंने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया था, जिसे विवि ने खारिज कर दिया। कहा कि उनकी आयु घटना के समय 37 वर्ष थी, जो ओबीसी श्रेणी के लिए निर्धारित अधिकतम आयु सीमा (33 वर्ष) से अधिक थी। इसे याची ने हाईकोर्ट में चुनौती दी तो एकल पीठ ने उनके पक्ष में आदेश दिया।
इस पर बीएचयू ने एकल पीठ के पांच फरवरी 2025 के आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में विशेष अपील दायर की। कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद बीएचयू की उस दलील को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि कार्यकारी परिषद ने केवल विधवाओं या तलाकशुदा महिलाओं को आयु में छूट देने का प्रस्ताव पारित किया है। कहा कि जब तक मूल अनुकंपा नियमों में संशोधन नहीं होता, तब तक ऐसे प्रशासनिक प्रस्ताव किसी अन्य आश्रित (जैसे वहन) के अधिकार को कम नहीं कर सकते।
कोर्ट ने कहा कि परिवार वास्तव में आर्थिक तंगी में है तो केवल अधिक आयु के आधार पर उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता। मुकदमेबाजी के दौरान हुई देरी को भी नजरअंदाज करने का निर्देश दिया है।
भर्ती नियमों के तहत सीमित नहीं की जा सकती अनुकंपा नियुक्ति – हाईकोर्ट
प्रयागराजः इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि अनुकंपा नियुक्ति सामान्य भर्ती प्रक्रिया का अपवाद है और इसे भर्ती नियमों से आच्छादित मानकर अस्वीकार नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह तथा न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने सुश्री नामीराकपन शांगबनाश्री देवी की नियुक्ति मामले में विचार करने संबंधी एकलपीठ के आदेश के खिलाफ दायर काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) वाराणसी की विशेष अपील निस्तारित करते हुए यह टिप्पणी की है।
कोर्ट ने कहा है कि अनुकंपा नियुक्ति के लिए मूल याची के दावे पर विचार करने से पहले देरी के मुद्दे की जांच करना आवश्यक है। कोर्ट ने बीएचयू की अनुकंपा नियुक्ति समिति को निर्देश दिया है कि वह पहले मूल याची की उम्र में छूट के अनुरोध पर विचार करे, वह भर्ती नियमों के अनुसार नहीं, बल्कि अनुकंपा नियमों के अनुसार। इसके बाद उसके दावे पर विचार किया जाए, जिसमें पारिवारिक सदस्यों की निर्भरता, वित्तीय कठिनाई और अन्य प्रासंगिक परिस्थितियों को ध्यान रखा जाए। यह निर्णय एक महीने में के भीतर करने का निर्देश दिया गया है।
कोर्ट ने कहा है कि भर्ती नियम संविधान के अनुच्छेद 16 की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए हैं, जबकि अनुकंपा नियुक्ति नियम इसके अपवाद हैं और इनका उद्देश्य वित्तीय संकट में आए पीड़ित परिवार को तात्कालिक सहायता प्रदान करना है। अनुकंपा नियुक्ति नियमों को भर्ती नियमों के तहत सीमित नहीं किया जा सकता है। इसका मतलब यह है कि अगर कोई आवेदक भर्ती नियमों की कुछ शर्तों को पूरा नहीं करता है तो भी उसकी अनुकंपा नियुक्ति के लिए बिचार किया जा सकता है बशर्ते उसके परिवार को सहायता मिलती हो।
हाई कोर्ट की एकलपीठ के पांच फरवरी 2025 के उस आदेश को इस अपील में चुनौती दी गई थी, जिसमें बीएचयू का नौ मार्च 2018 का अनुकंपा नियुक्ति देने से इन्कार करने वाला आदेश रद कर दिया गया था। एकल न्यायाधीश ने यह भी कहा था कि भर्ती नियम अनुकंपा नियुक्ति पर लागू नहीं होते। विश्वविद्यालय का तर्क था कि अनुकंपा नियुक्ति के नियमों में भर्ती नियमों के अनुसार पात्रता शर्तें शामिल हैं। मृतक की बहन की उम्र 37 वर्ष थी, जो अधिकतम आयु सीमा से चार वर्ष अधिक है।
यूनिवर्सिटी के कार्यकारी परिषद ने एक अन्य मामले में फैसला दिया था कि उम्र में छूट भर्ती नियमों के अनुसार ही दी जाएगी। याची की तरफ से कहा गया है कि अनुकंपा नियमों में उम्र में छूट का प्रविधान है और कार्यकारणी परिषद का फैसला इन नियमों को ओवरराइड नहीं कर सकता। भर्ती नियम केवल अन्य पात्रता शर्तों पर लागू होते हैं, न कि उम्र पर।
No comments:
Write comments