वित्तीय मदद तो लें रहीं राज्य सरकारें पर शिक्षकों के रिक्त पद भरने में कर रहीं आनाकानी, उत्तर प्रदेश में 2.17 लाख और बिहार में 1.92 लाख शिक्षकों के पद रिक्त
शिक्षकों के बिना शिक्षा (जागरण संपादकीय)
यह निराशाजनक है कि राज्यों में शिक्षकों के रिक्त पदों को लेकर शिक्षा मंत्रालय की संसदीय समिति को फिर से चिंता जतानी पड़ी। इस समिति ने पिछले वर्ष भी स्कूली शिक्षकों के खाली पड़े पदों पर चिंता जताते हुए उन्हें इस वर्ष मार्च तक भरने की आवश्यकता पर बल दिया था, लेकिन उस पर ध्यान नहीं दिया गया और इसीलिए अब इस समिति ने शिक्षकों के खाली पद भरने में देरी करने वाले राज्यों की वित्तीय मदद रोकने का सुझाव दिया है।
समिति के अनुसार जब तक राज्य शिक्षकों के खाली पद नहीं भरते, तब तक उन्हें समग्र शिक्षा अभियान के तहत प्रदान की जाने वाली वित्तीय मदद न दी जाए। यदि ऐसा किया जाता है तो यह भी संभव है कि राज्य वित्तीय सहायता के अभाव में रिक्त शिक्षकों के पद भरने में और अधिक सुस्ती दिखाएं। यह ध्यान रहे कि संसदीय समिति की तरह से शिक्षा मंत्रालय भी राज्यों से शिक्षकों के रिक्त पदों को प्राथमिकता के आधार पर भरने का आग्रह कर चुका है, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात वाला है। यह सामान्य बात नहीं कि राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में शिक्षकों के करीब दस लाख पद खाली पड़े हैं। इनमें लगभग साढ़े सात लाख पद प्राथमिक शिक्षकों के है। इसका अर्थ है कि शिक्षा की बुनियाद ही कमजोर की जा रही है।
यह एक विडंबना ही है कि शिक्षकों के रिक्त पदों को भरने में पिछले कई वर्षों से ढिलाई बरती जा रही है। यह ढिलाई यही बताती है कि राज्य सरकारें स्कूली शिक्षा की दशा-दिशा सुधारने के प्रति गंभीर नहीं। उनकी इस अगंभीरता का परिचय उन सर्वेक्षणों से मिलता है, जो प्राथमिक शिक्षा की दयनीय दशा को रेखांकित करते रहते हैं। ये सर्वेक्षण यह बताते रहे हैं कि किस तरह चौथी पांचवीं के छात्रों को सामान्य जोड़-घटाव करने में कठिनाई होती है या फिर वे दो-तीन वाक्य भी सही तरह नहीं लिख पाते।
यह ठीक नहीं कि राज्य सरकारें समग्र शिक्षा अभियान के तहत स्कूली शिक्षा को सशक्त बनाने के लिए वित्तीय मदद तो लें, पर शिक्षकों के रिक्त पद भरने में आनाकानी करें। यह विचित्र है कि जो काम प्राथमिकता के आधार पर किया जाना चाहिए, वही एजेंडे से बाहर दिखता है। इसका प्रमाण यह है कि कुछ राज्यों में कई वर्षों से बड़ी संख्या में शिक्षकों के पद खाली बने हुए हैं। जैसे उत्तर प्रदेश में 2.17 लाख पद खाली हैं। बिहार में 1.92 लाख शिक्षकों के पद रिक्त हैं तो झारखंड में 72 हजार और मध्य प्रदेश एवं पश्चिम बंगाल में 55-55 हजार। अपेक्षाकृत संपन्न और छोटे राज्य हरियाणा में भी 15 हजार शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं। शिक्षकों के खाली पद भरने में कोताही एक तरह से देश की भावी पीढ़ी के भविष्य के साथ जानबूझकर किया जा रहा खिलवाड़ ही है।
शिक्षक भर्ती न होने पर राज्यों की रुकेगी वित्तीय मदद, संसदीय समिति की सिफारिश
नई दिल्लीः स्कूलों में शिक्षकों के पदों को लंबे समय तक नहीं भरना अब राज्यों को मंहगा पड़ सकता है।- संसदीय समिति की सिफारिश पर गंभीर शिक्षा मंत्रालय अब ऐसे सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों को समग्र शिक्षा के तहत दी जाने वाली वित्तीय मदद में कटौती कर सकता है है या फिर रोक सकता है। फिलहाल देश में शिक्षकों के करीब 10 लाख पद खाली हैं। इनमें करीब साढ़े सात लाख पद अकेले प्राथमिक स्तर के शिक्षकों के हैं।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की अगुआई वाली शिक्षा मंत्रालय की संसदीय समिति ने अपनी 349वीं और 363वीं रिपोर्ट में शिक्षकों के इन खाली पदों को समयबद्ध तरीके से भरने की बार-बार सिफारिश की है। साथ ही शिक्षा मंत्रालय भी कई बार राज्यों से इन खाली पदों को भरने के लिए कह चुका है। बावजूद इसके राज्यों का रवैया जस का तस बना हुआ है। वह केंद्र से हर साल समग्र शिक्षा अभियान के तहत स्कूलों को सशक्त बनाने के लिए वित्तीय मदद ले रहे हैं, लेकिन शिक्षकों के पद खाली बने हुए हैं।
समिति का मानना है कि स्कूलों में शिक्षकों के पदों का खाली होना और भरना वैसे तो एक सतत प्रक्रिया है, लेकिन अधिकांश राज्यों में पिछले कई वर्षों से बड़ी संख्या में शिक्षकों के पद खाली बने हुए हैं। समिति ने राज्यों के इस रवैये को गंभीर बताया और मंत्रालय से सिफारिश की है कि जब तक राज्य शिक्षकों के खाली पदों को नहीं भरते हैं, तब तक उन्हें समग्र शिक्षा का पैसा नहीं दिया जाए।
वित्त वर्ष 2025-26 में केंद्र सरकार ने शिक्षा मंत्रालय को समग्र शिक्षा के तहत 41,249 करोड़ रुपये आवंटित किया था। यह राज्यों को स्कूली शिक्षा की गुणक्ता सुधारने के लिए दिया जाता है। मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, संसदीय समिति की सिफारिश पर समग्र शिक्षा के तहत दी जाने वाली वित्तीय मदद की समीक्षा की जा रही है। इस दौरान तय मानकों के अनुरूप काम न करने वाले और शिक्षकों के खाली पदों को न भरने वाली राज्यों की वित्तीय मदद रोकने जैसे कदम उठाए जा सकते हैं।
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