शिक्षक भर्ती न होने पर राज्यों की रुकेगी वित्तीय मदद, संसदीय समिति की सिफारिश
नई दिल्लीः स्कूलों में शिक्षकों के पदों को लंबे समय तक नहीं भरना अब राज्यों को मंहगा पड़ सकता है।- संसदीय समिति की सिफारिश पर गंभीर शिक्षा मंत्रालय अब ऐसे सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों को समग्र शिक्षा के तहत दी जाने वाली वित्तीय मदद में कटौती कर सकता है है या फिर रोक सकता है। फिलहाल देश में शिक्षकों के करीब 10 लाख पद खाली हैं। इनमें करीब साढ़े सात लाख पद अकेले प्राथमिक स्तर के शिक्षकों के हैं।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की अगुआई वाली शिक्षा मंत्रालय की संसदीय समिति ने अपनी 349वीं और 363वीं रिपोर्ट में शिक्षकों के इन खाली पदों को समयबद्ध तरीके से भरने की बार-बार सिफारिश की है। साथ ही शिक्षा मंत्रालय भी कई बार राज्यों से इन खाली पदों को भरने के लिए कह चुका है। बावजूद इसके राज्यों का रवैया जस का तस बना हुआ है। वह केंद्र से हर साल समग्र शिक्षा अभियान के तहत स्कूलों को सशक्त बनाने के लिए वित्तीय मदद ले रहे हैं, लेकिन शिक्षकों के पद खाली बने हुए हैं।
समिति का मानना है कि स्कूलों में शिक्षकों के पदों का खाली होना और भरना वैसे तो एक सतत प्रक्रिया है, लेकिन अधिकांश राज्यों में पिछले कई वर्षों से बड़ी संख्या में शिक्षकों के पद खाली बने हुए हैं। समिति ने राज्यों के इस रवैये को गंभीर बताया और मंत्रालय से सिफारिश की है कि जब तक राज्य शिक्षकों के खाली पदों को नहीं भरते हैं, तब तक उन्हें समग्र शिक्षा का पैसा नहीं दिया जाए।
वित्त वर्ष 2025-26 में केंद्र सरकार ने शिक्षा मंत्रालय को समग्र शिक्षा के तहत 41,249 करोड़ रुपये आवंटित किया था। यह राज्यों को स्कूली शिक्षा की गुणक्ता सुधारने के लिए दिया जाता है। मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, संसदीय समिति की सिफारिश पर समग्र शिक्षा के तहत दी जाने वाली वित्तीय मदद की समीक्षा की जा रही है। इस दौरान तय मानकों के अनुरूप काम न करने वाले और शिक्षकों के खाली पदों को न भरने वाली राज्यों की वित्तीय मदद रोकने जैसे कदम उठाए जा सकते हैं।
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