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Sunday, November 30, 2025

यूपी में निजी स्कूलों में पढ़ा रहे शिक्षको की शैक्षिक अर्हता की जांच होगी, बिना अर्हता ही शिक्षक रखने की शिकायत पर एनसीटीई की ओर से दिए गए जांच के आदेश

यूपी में निजी स्कूलों में पढ़ा रहे शिक्षको की शैक्षिक अर्हता की जांच होगी, बिना अर्हता ही शिक्षक रखने की शिकायत पर एनसीटीई की ओर से दिए गए जांच के आदेश


75 जिलों में जिला विद्यालय निरीक्षक निजी स्कूलों की शुरू करेंगे पड़ताल


लखनऊ। यूपी में सभी निजी स्कूलों में पढ़ा रहे शिक्षकों की शैक्षिक अर्हता की जांच कराई जाएगी। मानक विपरीत बिना अर्हता के शिक्षकों से पढ़ाई पर राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) ने नाराजगी जताई है। माध्यमिक शिक्षा विभाग अब सभी जिलों में इन विद्यालयों के शिक्षकों की जांच कर रिपोर्ट देगा।


एनसीटीई को इस मामले में झांसी के रहने वाले राहुल जैन की ओर से साक्ष्यों के साथ शिकायत की गई है, जिसमें कई निजी स्कूलों में शिक्षक बिना डीएलएड, बीएड, सीटीईटी, टीईटी पास किए बिना ही निजी स्कूलों में पढ़ाई करा रहे हैं।

एनसीटीई के अनिवार्य मानकों का पालन न किए जाने से तमाम निजी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। ऐसेमें अबसभी जिलों में जिला विद्यालय निरीक्षक निजी स्कूलों के शिक्षकों की अर्हता का ब्योरा खंगालेंगे। मानकों के विपरीत मिलने पर शिक्षक बाहर किए जाएंगे। प्रबंधतंत्र सेजवाब-तलब होगा।


मुख्य सचिव तक पहुंची मामले की शिकायत

निजी स्कूलों में बिना अर्हता शिक्षक रखने का मामला मुख्य सचिव एसपी गोयल और अपर मुख्य सचिव बेसिक व माध्यमिक शिक्षा तक पहुंचा है। एनसीटीई के पत्र के बाद शिक्षा विभाग ने जिलों में इसकी जांच कराने का निर्णय लिया। अब शासन की सख्ती के बाद जिलों में जांच शुरू होगी।

Sunday, August 31, 2025

किताबों के लिए खुले बाजार के भरोसे हैं बेसिक शिक्षा परिषद से मान्यता प्राप्त प्राइवेट स्कूलों के छात्र

किताबों के लिए खुले बाजार के भरोसे हैं बेसिक शिक्षा परिषद से मान्यता प्राप्त प्राइवेट स्कूलों के छात्र


लखनऊ: बेसिक शिक्षा परिषद के सरकारी स्कूलों में बच्चों को मुफ्त किताबें मिलती है, उसी परिषद को अपने 74 हजार से ज्यादा प्राइवेट स्कूलों की कोई फिक्र नहीं है। उनके लिए बाजार में भी परिषद की अधिकृत किताबें उपलब्ध नहीं है। परिषद अभी तक अपने अधिकृत प्रकाशकों को कवर छपवाकर नहीं दे सका है। प्राइवेट स्कूलों के बच्चों को खुले बाजार के भरोसे छोड़ दिया है। वे निजी प्रकाशकों की मनमाने दामों पर बिक रही किताबें खरीदने को मजबूर हैं।


इन छात्रों के लिए मुफ्त किताबे :
बेसिक शिक्षा परिषद के 1.32 लाख अपने सरकारी स्कूल है। वहीं 2,965 एडेड स्कूल है। इसके अलावा 746 कस्तूरबा गांधी विद्यालय है। इन सबमें पढ़ने वाले बच्चों को तो बेसिक शिक्षा विभाग मुफ्त किताबें छपवाकर देता है। इसके लिए विभाग ही टेंडर करता है और तय पाठ्य सामग्री होती है। कक्षा एक से तीन तक NCERT पाठ्यक्रम लागू है। विभाग NCERT की अनुमति से अपने अधिकृत प्रकाशकों से किताबें छपवाता है और बच्चों को मुफ्त दी जाती है। 


किताबे भी अलग-अलग बेसिक
शिक्षा परिषद प्राइवेट स्कूलों को भी मान्यता देता है। ऐसे स्कूलों की संख्या 74,471 है। ये भी उसी परिषद से मान्यता प्राप्त है। इनके लिए बाजार में अलग-अलग प्रकाशकों की किताबें मौजूद है। सबके दाम भी अलग-अलग है। इतना ही नहीं किताबें भी वे अलग-अलग तरह की छाप रहे हैं। किसी प्रकाशक की किताब में काफी कम पेज और पाठ है और किसी में ज्यादा। प्राइवेट स्कूलों के छात्र इन किताबों को ही खरीदने के लिए मजबूर है।

'समान वोर्ड तो किताबें भी समान हो'
 लखनऊ के ही एक स्कूल के प्रबंधक रामानंद सैनी कहते हैं कि बाजार में जो किताबें मिल रही है, वही बच्चे खरीद रहे है। हाल ही में विधान परिषद में भी यह मुद्दा उठाने वाले डॉ. मान सिंह कहते हैं कि सरकार ने बच्चों को बाजार के भरोसे छोड़ दिया है। शिक्षा की कोई चिंता ही नहीं है। वहीं प्राथमिक शिक्षक प्रशिक्षित स्नातक असोसिएशन के अध्यक्ष विनय कुमार सिंह कहते हैं कि एक बोर्ड और एक कोर्स है तो किताबें एक जैसी ही होनी चाहिए।


क्या है प्रक्रिया
नियम है कि प्राइवेट स्कूलों के लिए भी सरकारी की तरह समान किताबें बाजार में आएंगी। सरकारी किताबें छापने का जो टेंडर प्रकाशकों को दिया गया है, वे ही बाजार में भी किताबें बेचेंगे। उन प्रकाशकों को विभाग सरकारी प्रिंटिंग प्रेस से कवर पेज छपवाकर देगा। अप्रैल से सत्र चल रहा है लेकिन ये कवर पेज छपवाकर अभी उन प्रकाशकों को दिया ही नहीं गया है। इसका फायदा उठाकर निजी प्रकाशकों ने पहले ही अपनी किताबें बाजार में उतार दीं। बच्चों की भी मजबूरी है कि पढ़ाई करनी है तो वे किताबें खरीदें।


सरकारी किताबे जो प्रकाशक छापते है, उनको कवर पेज छपवाकर दिया जाता है। प्रक्रिया चल रही है। उनको यह कवर पेज छपवाकर दिया जाएगा। - माधव जी तिवारी, पाठ्य पुस्तक अधिकारी



तो ये पूरा खेल मुनाफे का है
यहां पूरा खेल मुनाफे का है। सरकारी किताबे बाजार में जाएंगी तो उनके रेट भी तय होंगे। उसमें उन प्रकाशकों को बहुत मुनाफा नहीं होगा। इसलिए सरकारी किताबे छापने वाले प्रकाशक भी रुचि नहीं लेते कि वे उस रेट पर किताबे बेचे। जो प्रकाशक बाजार में किताबे बेच रहे है, वे मनमाना मुनाफा लेकर अपने हिसाब से दाम तय कर रहे है। सूत्रों के अनुसार अंदर की बात तो ये है कि ये प्रकाशक स्कूलों को भी कमिशन देते है। ऐसे में मुनाफा उनका है। विभाग की लेटलतीफी और सुस्ती भी आशंका पैदा करती है। इस तरह प्राइवेट प्रकाशको के इस खेल में सबका मुनाफा है।

Friday, August 22, 2025

निजी स्कूलों में बढ़े बच्चे, ज्यादा दूरी की पेयरिंग रद्द करने में आनाकानी से परिषदीय स्कूलों में घटी हाजिरी, विभागीय मंत्री के एलान के बावजूद कई जिलों में नहीं जारी हुए पेयरिंग रद्द करने के आदेश

निजी स्कूलों में बढ़े बच्चे, ज्यादा दूरी की पेयरिंग रद्द करने में आनाकानी से परिषदीय स्कूलों में घटी हाजिरी, विभागीय मंत्री के एलान के बावजूद कई जिलों में नहीं जारी हुए पेयरिंग रद्द करने के आदेश


लखनऊः बेसिक शिक्षा विभाग ने बेहतर पढ़ाई और सुविधाओं का तर्क देकर बेसिक स्कूलों की पेयरिंग तो कर दी, लेकिन इसका फायदा बेसिक स्कूलों के बजाय निजी स्कूलों को मिल रहा है। दूरी बढ़ने के कारण पेयर किए गए सभी स्कूलों में बच्चों की हाजिरी घट गई है। बीते दिनों बेसिक शिक्षा मंत्री ने एक किमी से ज्यादा दूरी वाले स्कूलों की पेयरिंग रद्द करने का ऐलान किया था, लेकिन बेसिक शिक्षा विभाग ने अब तक कोई आदेश नहीं जारी किया है। ऐसे में तमाम अभिभावकों ने बच्चों को दूर भेजने के बजाय नजदीक के निजी स्कूलों में दाखिला करवाना शुरू कर दिया है।


8 बच्चों ने छोड़ा स्कूलः बीकेटी में प्राथमिक विद्यालय उमरभारी से करीब एक किमी दूर ज्वारगांव तरैया प्राथमिक विद्यालय है। इसके बावजूद 2.5 किमी दूर पीएस कमला बाग बड़ौली में प्राथमिक विद्यालय उमरभारी की पेयरिंग कर दी। मौजूदा सत्र में उमरभारी स्कूल में 23 बच्चे थे, लेकिन पेयरिंग के बाद इनकी तादाद 15 के आसपास हो गई है। जानकारी के मुताबिक, सात से आठ बच्चों के अभिभावकों ने इनका दाखिला नजदीक के निजी स्कूलों में करवा दिया है।


15 के आसपास बच्चो ने छोड़ा स्कूलः बीकेटी में ही पीएस पालपुर की पेयरिंग पीएस रायपुर राजा में हुई है। दोनों स्कूलों के बीच की दूरी 2.5 किमी से अधिक है। पीएस रायपुर राजा की बिल्डिंग भी अच्छी स्थिति में नहीं है। पेयरिंग से पहले पीएस पालपुर में 37 बच्चे थे। अब इनमें से दो-तीन बच्चे ही रायपुर राजा पहुंच रहे हैं। करीब 15 बच्चों के अभिभावकों ने इनका दाखिला दूसरे स्कूलों में करवा दिया है। बाकी बच्चों के अभिभावक पेयरिंग रद्द होने का इंतजार कर रहे है, ताकि बच्चों को दोबारा स्कूल भेज सकें।


 स्कूल के साथ चलेगी बाल वाटिकाः मंत्री के ऐलान के 20 दिन बाद भी बेसिक शिक्षा विभाग ने एक किमी से ज्यादा दूरी वाले स्कूलों की पेयरिंग रद्द करने का आदेश जारी नहीं किया है। विभागीय अधिकारी इस मामले में कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है। इस बीच पेयर किए गए स्कूलों में बाल वाटिका खुलने लगी है। सीडीओ बाल वाटिका खोलने के लिए 96 स्कूलों की सूची जारी की है। इसमें यह भी जिक्र है कि पेयरिंग रद्द होने के बाद एक ही भवन में स्कूल और बाल वाटिका चलाई जाएगी।

Monday, April 14, 2025

स्कूलों में मनमानी फीस पर लगेगा ब्रेक, पूरे देश के लिए मॉडल ड्राफ्ट होगा तैयार; जानिए क्या है केंद्र सरकार का प्लान?

स्कूलों में मनमानी फीस पर लगेगा ब्रेक, पूरे देश के लिए मॉडल ड्राफ्ट होगा तैयार; जानिए क्या है केंद्र सरकार का प्लान?


मंत्रालय से जुड़े सूत्रों के मुताबिक स्कूलों में फीस के निर्धारण और इसमें वृद्धि के एक स्टैंडर्ड मानक को तैयार करने की दिशा में कदम बढ़ाया गया है। इसे लेकर नीति की सिफारिशों सहित उत्तर प्रदेश सहित देश भर में स्कूली फीस को नियंत्रित करने से जुड़े कानूनों का भी अध्ययन किया गया है। केंद्र सरकार अब एक पारदर्शी और जवाबदेह व्यवस्था खड़ी करना चाहती है।


🔴 मनमाने ढंग से फीस बढ़ाने पर लगेगी लगाम
🔴 मॉडल ड्राफ्ट तैयार करने की कोशिश में जुटी सरकार
🔴 उत्तर प्रदेश में फीस को लेकर पहले से है सख्त कानून


नई दिल्ली। शिक्षा वैसे तो राज्य का विषय है, लेकिन नए शैक्षणिक सत्र के शुरू होने के साथ दिल्ली सहित देश के अधिकांश राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में स्कूलों की मनमानी फीस वृद्धि को लेकर जिस तरह से हर साल निजी स्कूल प्रबंधन और अभिभावकों के बीच टकराव की स्थिति निर्मित हो रही है, उस पर अंकुश लगाने के लिए केंद्र सरकार अब एक पारदर्शी और जवाबदेह व्यवस्था खड़ी करना चाहती है।

इसे लेकर वह एक मॉडल ड्राफ्ट तैयार करने की कोशिश में जुटी है, जिसे सभी राज्य अपने यहां स्कूलों की मनमानी फीस वृद्धि पर रोकथाम के लिए अमल में ला सकेंगे। मौजूदा समय में उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ के पास ही मनमानी फीस पर रोकथाम के लिए कानून है। इनमें सबसे सख्त कानून उत्तर प्रदेश में है, जिसे 2018 में लाया गया था।


नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत प्रयास
शिक्षा मंत्रालय ने यह पहल नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति ( एनईपी) की सिफारिशों का लागू करने के क्रम में शुरू की है। जिसमें साफ कहा गया है कि स्कूलों का लक्ष्य गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना है। नीति ने अभिभावकों के आर्थिक शोषण व शिक्षा के बढ़ते व्यवसायीकरण पर अंकुश न लगा पाने के लिए मौजूदा नियामक व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए है।

इस बीच मनमानी फीस वृद्धि पर अंकुश लगाने के लिए जो ड्राफ्ट का स्वरूप सामने आया है, उसमें सभी स्कूल अब एक ही मानक के आधार पर न फीस वसूल सकेंगे न ही फीस में वृद्धि कर सकेंगे।


शैक्षणिक प्रदर्शन से तय होगी रैंकिंग
बल्कि स्कूलों को स्टैंडर्ड के हिसाब से इस निर्धारित करने का अधिकार मिलेगा। इसके लिए सबसे पहले सभी राज्यों को अपने स्कूलों की एक रैंकिंग तैयार करने होगी। यह रैंकिंग उनके इंफ्रास्ट्राक्चर, शिक्षकों स्तर व स्कूल के शैक्षणिक प्रदर्शन से तय की जाएगी। इसके लिए प्रत्येक राज्य व केंद्र शासित प्रदेश में एक राज्य विद्यालय मानक प्राधिकरण ( ट्रिपलएसए) नामक एक स्वतंत्र निकाय स्थापित करना होगा।


साथ ही फीस का निर्धारण और वृद्धि को जिला शुल्क नियामक समिति की मंजूरी के बगैर लागू नहीं किया जा सकेगा। इस समिति में जिला अधिकारी, जिला शिक्षा अधिकारी के साथ अभिभावक संघ व स्कूल संघ के भी प्रतिनिधि शामिल होंगे।


इन मुद्दों पर हो रहा काम

फीस के अतिरिक्त और किसी भी तरह फीस स्कूल नहीं ले सकेंगे।
स्कूलों की अपनी फीस, ड्रेस, किताबों आदि से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक करनी होगी। और इसकी जानकारी हर साल सत्र शुरू होने से पहले जिला शुल्क नियामक समिति को देनी भी होगी।

स्कूल एक मुश्क साल भर की फीस नहीं ले सकेंगे। उन्हें अभिभावकों को छह, तीन और एक माह का विकल्प देना होगा।

फीस से जुड़े किसी भी विषय को अभिभावक समिति के समझ चुनौती दे सकेगा। जिस पर समिति को पंद्रह दिन के भीतर फैसला लेना होगा। समिति सिविल कोर्ट की तरह सुनवाई करेगी।

समिति का निर्णय सभी को मानना होगा। साथ ही इसे महीने भर के अंदर मंडल फीस नियामक समिति के सामने चुनौती भी दी जा सकती है। यदि उसके फैसले से भी सहमत नहीं तो राज्य फीस नियामक समिति के सामने इसे चुनौती दी जा सकती है।

इन नियमों के तहत फैसले को न मानने पर स्कूलों के खिलाफ कार्रवाई भी की जा सकती है। इनमें जुर्माना और सजा दोनों है। जुर्माना भी पहले बार एक लाख होगा। यदि दूसरी बार भी गलती की तो पांच लाख होगा।

Sunday, March 23, 2025

RTE : बच्चों का सीट एलॉटमेंट ऑनलाइन देखने का विकल्प नहीं, अभिभावकों को मेसेज से मिलती है प्रवेश की सूचना, भटक रहे अभिभावक

RTE : बच्चों का सीट एलॉटमेंट ऑनलाइन देखने का विकल्प नहीं, अभिभावकों को मेसेज से मिलती है प्रवेश की सूचना,  भटक रहे अभिभावक


23 मार्च 2025
लखनऊ। प्रदेश में निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा अधिकार अधिनियम (आरटीई) के तहत चल रही प्रवेश प्रक्रिया में सीट अलॉटमेंट की जानकारी ऑनलाइन उपलब्ध नहीं है। अभिभावकों के मोबाइल फोन पर सीट अलॉटमेंट की जानकारी दी जाती है। कई अभिभावक सूचना न मिलने से परेशान हैं।

आरटीई के तहत प्रदेश के लिए चार चरणों में आवेदन प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। तीन चरणों का सीट अलॉटमेंट कर प्रवेश दिलाया जा रहा है। इसके बावजूद कई अभिभावक भटक रहे हैं, क्योंकि बच्चे को सीट अलॉट हो गई लेकिन अभिभावक को इसकी जानकारी नहीं हुई।

अभिभावकों ने बताया कि आवेदन करते समय साइबर कैफे वाले अपना फोन नंबर डाल देते हैं। इससे मेसेज उनको नहीं मिल पाता है। वहीं, कोई और ऐसा माध्यम नहीं है, जिससे सीट अलॉटमेंट की जानकारी मिल सके। इसके लिए अभिभावक बीएसए कार्यालय का चक्कर काटते रहते हैं। बीएसए दफ्तर के कर्मचारी भी यह कहकर टरका देते हैं कि सीट अलॉटमेंट की जानकारी ऑनलाइन देखने का अधिकार सिर्फ बीएसए को है। जब वह आएंगे तो सीट अलॉटमेंट के बारे में पता चलेगा। इसलिए अभिभावक सीट अलॉटमेंट की जानकारी ऑनलाइन करने की मांग कर रहे हैं।

वहीं, समग्र शिक्षा के उप निदेशक डॉ. मुकेश कुमार सिंह ने कहा कि बड़ी संख्या होने के कारण सीट अलॉटमेंट की सूचना ऑनलाइन नहीं की जाती है। संबंधित अभिभावक या बच्चे अपना परिणाम ही देख सकते हैं। अभिभावकों को मोबाइल फोन पर सीधे मेसेज जाता है। जिला स्तर पर डाटा देखने का अधिकार बीएसए व राज्य स्तर पर हमारे पास है। अगर संबंधित बच्चे को अपनी दूसरी प्राथमिकता पर प्रवेश लेना है तो बीएसए कार्यालय में संपर्क कर आवेदन कर सकते हैं। आरटीई के तहत अधिकाधिक बच्चों के दाखिले के लिए अभियान चलाया जा रहा है। 




RTE : प्रवेश दिए बगैर ही कागज पर दिखाए दाखिले, निजी स्कूलों में बच्चों का दाखिला कराने के लिए भटक रहे अभिभावक

स्कूल प्रवेश लेने से कर रहा मना, आईजीआरएस पर की गई शिकायत

21 मार्च 2025
लखनऊ। प्रदेश में निशुल्क व अनिवार्य शिक्षा अधिनियम (आरटीई) के तहत दाखिले के लिए चार चरणों के आवेदन हो चुके हैं। यह कवायद की जा रही है कि एक अप्रैल से शुरू होने वाले सत्र से पहले सीट पाने वाले बच्चों का प्रवेश सुनिश्चित कराया जाए। किंतु जिलों में इसे लेकर लापरवाही दिख रही है।


दरअसल, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के कुछ बच्चों को प्रवेश नहीं मिला। जब इसकी शिकायत एकीकृत शिकायत निवारण प्रणाली (आईजीआरएस) पर की गई तो उनका प्रवेश दिखा दिया गया।


निदेशालय का चक्कर काट रहे अभिभावक ने बताया कि एक निजी स्कूल में प्रवेश के लिए बच्चे का आवेदन किया था लेकिन स्कूल दाखिला लेने से मना कर रहा है। जब इसकी शिकायत आईजीआरएस की तो बच्चे का प्रवेश हुआ दिखा दिया। उन्होंने दोबारा शिकायत की और अधिकारियों से मिलकर बच्चे को प्रवेश दिलाने की मांग कर रहे हैं। ऐसे कई मामले सामने आ रहे हैं।


आरटीई में निजी कॉलेजों द्वारा सीट अलॉट होने के बाद भी प्रवेश न लेने की भी शिकायत विभाग को मिल रही है। पर, विभाग व जिला स्तरीय अधिकारी कोई सख्ती नहीं कर पा रहे हैं। इससे निजी स्कूलों की मनमानी चल रही है। तीन चरणों की पूरी प्रक्रिया होने के बावजूद यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि अब तक कितने बच्चों के दाखिले सुनिश्चित हुए हैं।


बीएसए बताएंगे प्रवेश न मिलने के कारण

समग्र शिक्षा के उप निदेशक डॉ. मुकेश कुमार सिंह ने बताया कि आरटीई में ज्यादा से ज्यादा दाखिले के लिए डीएम व बीएसए के स्तर से प्रयास किए जा रहे हैं। जहां यह सूचना जानकारी मिलती है कि कोई स्कूल प्रवेश नहीं ले रहा है तो वहां स्थानीय अधिकारी वार्ता कर रहे हैं। इस बार यह व्यवस्था की गई है कि अगर सीट अलॉटमेंट के बाद भी बच्चे का प्रवेश नहीं हो रहा है तो संबंधित बीएसए को इसका कारण बताना होगा।

Wednesday, March 19, 2025

यूपी के निजी स्कूलों की वित्तीय स्थिति जांचने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने की समिति गठित, कोरोना के दौरान निजी स्कूलों को फीस का 15% समायोजित या लौटाने के हाईकोर्ट के आदेश का मामला

यूपी के निजी स्कूलों की वित्तीय स्थिति जांचने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने की समिति गठित, कोरोना के दौरान निजी स्कूलों को  फीस का 15% समायोजित या लौटाने के हाईकोर्ट के आदेश का मामला  


हाईकोर्ट ने कोरोना के दौरान निजी स्कूलों को वित्तीय 2020-2021 की अवधि के लिए अभिभावकों से वसूली फीस का 15% समायोजित या लौटाने का निर्देश दिया गया था।

■ हाईकोर्ट के पूर्व जज बने दो सदस्यीय समिति के अध्यक्ष


नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज जीपी मित्तल की अध्यक्षता में दो सदस्यीय समिति बनाई है। समिति उत्तर प्रदेश के निजी स्कूलों की वित्तीय स्थिति की जांच करेगी।

शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ निजी स्कूलों के समूह की ओर से दाखिल अपील पर यह आदेश दिया है। हाईकोर्ट ने कोरोना के दौरान निजी स्कूलों को वित्तीय 2020-2021 की अवधि के लिए अभिभावकों से वसूली फीस का 15% समायोजित या लौटाने का निर्देश दिया गया था।


मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना, संजय कुमार, के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि हर निजी स्कूल के तथ्यों और वित्तीय हालात पर विचार बिना हाईकोर्ट ने व्यापक दृष्टिकोण अपनाया, जो संभव नहीं है। हर के तथ्यों, खातों की जांच जरूरी है। हम पूर्व जज जस्टिस जीपी मित्तल और सीए आदिश मेहरा की एक समिति नियुक्त करते हैं। समिति स्कूलों के खातों की जांच करेगी और महामारी अवधि के दौरान संबंधित स्कूलों की वित्तीय स्थिति के बारे में एक रिपोर्ट पेश करेगी।