सरकार की मंशा तो अच्छी थी पर सरकारी सिस्टम की भेंट चढ़ गई। परिषदीय विद्यालयों में बच्चों की शिक्षा के साथ स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए उन्हें फल खिलाने की योजना शुरु की गई। राज्य के बजट में मुख्यमंत्री ने 200 करोड़ रुपये की मंजूरी देते हुए प्रति बच्चा चार रुपये के हिसाब से सप्ताह में एक बार उन्हें मौसमी फल खिलाने की बात कही थी। बेसिक शिक्षा सचिव ने वीडियो क्रांफ्रेसिंग में नवीन शैक्षिक सत्र से इसकी शुरुआत करने का फरमान दिया। शासन को फरमान को ध्यान में रखते हुए बिना किसी धनराशि और इंतजाम के विद्यालयों में बच्चों को जुगाड़ के फल खिलाकर इसकी शुरुआत तो कर दी गई लेकिन अब बच्चों के फल शासनादेश में लटक कर रह गए। न धनराशि जारी हुई और न शासनादेश आया, परिणाम यह हुआ कि चलने के पहले ही योजना धड़ाम हो गई है। सरकार परिषदीय विद्यालयों की तरफ बच्चों का रुझान बढ़ाने के लिए शिक्षा और सेहत सुधारने का प्रयास कर रही है। गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा और मिड-डे मील पर जोर दिया जा रहा है। बच्चों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए विद्यालयों में हर बुधवार को उन्हें दूध वितरण भी किया जाता है। इसी कड़ी में सरकार ने बच्चों को फल खिलाने की भी योजना शुरु की। वैसे देखा जाए तो दूध पिलाने के लिए कोई अतिरिक्त इंतजाम नहीं किया गया और परिवर्तन लागत से ही दूध पिलाने की व्यवस्था लागू की गई थी, लेकिन बच्चों को फल वितरण को सरकार ने गंभीरता से लिया और सप्ताह में एक दिन बच्चों को मौसमी फल खिलाने के लिए प्रति बच्चा चार रुपये का प्राविधान रखा गया। राज्य के बजट 2016-17 में युवा और शिक्षा मद में मुख्यमंत्री ने मिड-डे मील के साथ फल वितरण के लिए 200 करोड़ रुपये की स्वीकृति भी दी। सरकार से इस कदम का स्वागत किया गया और चार रुपये से कम से कम ग्रामीण क्षेत्रों के गरीब बच्चों को सप्ताह में एक दिन मौसमी फल मिल जाने की उम्मीद जागी। मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद योजना तेजी से दौड़ी, लेकिन फिर धड़ाम हो गई। मार्च के अंतिम सप्ताह में तत्कालीन बेसिक शिक्षा सचिव आशीष गोयल ने वीडियो कांफ्रेसिंग में प्रदेश के सभी जिला बेसिक शिक्षा अधिकारियों को एक अप्रैल से नवीन शैक्षिक सत्र के पहले सोमवार से ही बच्चों को मौसमी फल वितरण का निर्देश दिया था। फलों में संतरा, केला, अमरुद, सेब आदि को शामिल किया गया लेकिन अंगूर और काटकर खिलाने वाले फल जैसे तरबूज, खरबूजा, पपीता आदि न खिलाने की बात कही गई। शासन के फरमान को ध्यान में रखते हुए धनराशि जारी न होने के बाद भी जिले में जुगाड़ से फल वितरण शुरु कराया गया और चार अप्रैल को पड़े नवीन शैक्षिक सत्र के पहले सोमवार से ही विद्यालयों में बच्चों को जुगाड़ के फल खिलाए भी गए। फिर धीरे धीरे फल वितरण योजना ने गति भी पकड़ी लेकिन जिन विद्यालयों में फल वितरण नहीं शुरु किया गया उन पर शिकंजा कसने के लिए अधिकारियों ने शासनादेश खोजा।तो पता चला कि अभी न शासनादेश आया और न ही मध्यांहन भोजन प्राधिकरण की तरफ से जारी की गई ग्रांट में फलों के लिए धनराशि दी गई। हालत देखकर अधिकारियों ने भी हाथ खींच लिए और चलने के पहले ही योजना रुक गई। हालत यह हुई कि बच्चों के फल शासनादेश में अटक कर रह गए हैं। जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी डा. ब्रजेश मिश्र ने बताया कि उन्होंने मार्च को अंतिम सप्ताह में आदेश जारी कर पूरे जिले के विद्यालयों में सोमवार को फल वितरण की योजना शुरु कराई थी। 60 फीसद से अधिक विद्यालयों में बच्चों को केला खिलाया गया, लेकिन दिशा निर्देश न आने से योजना नहीं चल पा रही है। उन्होंने बताया कि योजना अच्छी है और आदेश आते ही पूरी मजबूती से लागू भी कराई जाएगी
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