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Tuesday, August 5, 2025

निपुण प्लस एप में विसंगतियों को लेकर बेसिक शिक्षक परेशान, विभाग से की सुधार की मांग

निपुण प्लस एप में विसंगतियों को लेकर बेसिक शिक्षक परेशान, विभाग से की सुधार की मांग


उत्तर प्रदेश में बेसिक शिक्षा विभाग द्वारा हाल ही में कक्षा 1 से 8 तक के विद्यार्थियों की दक्षता जांचने के लिए 'निपुण लक्ष्य प्लस' नामक मोबाइल एप्लिकेशन लांच किया गया है। इस ऐप को डिजिटल नवाचार के रूप में प्रस्तुत किया गया है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर कार्य कर रहे शिक्षकों और छात्रों के अनुभव इसके ठीक उलट कहानी बयान कर रहे हैं। प्रदेश के विभिन्न जिलों से प्राप्त शिक्षकीय फीडबैक के अनुसार इस ऐप में कई तकनीकी और संरचनात्मक खामियाँ हैं, जो इसके उद्देश्य और प्रभावशीलता दोनों को ही प्रश्नों के घेरे में खड़ा कर रही हैं।


शिक्षकों की सबसे बड़ी शिकायत यह है कि ऐप बच्चों द्वारा दिए गए सही उत्तरों को भी गलत बता देता है, जिससे बच्चे का आत्मविश्वास प्रभावित होता है। एक भी उत्तर गलत होने पर बच्चे को 'प्रगतिशील' श्रेणी में डाल दिया जाता है, चाहे उसने अन्य सभी उत्तर सही दिए हों। इससे छात्र के वास्तविक स्तर का मूल्यांकन नहीं हो पाता और न ही उसकी मेहनत का समुचित सम्मान होता है। इससे बड़ी विडंबना यह है कि ऐप में पूछे जा रहे सवाल अक्सर उस कक्षा के उन पाठों से होते हैं जिन्हें अभी पढ़ाया ही नहीं गया होता। बच्चों से ऐसे पाठों पर आधारित सवाल पूछना जिनसे वे अभी परिचित ही नहीं हैं, एक अव्यावहारिक और अवैज्ञानिक पद्धति प्रतीत होती है, जो केवल आँकड़ों के पीछे की होड़ को दर्शाती है, न कि बच्चे की वास्तविक समझ को।


एक अन्य बड़ी समस्या संयुक्त विषय मूल्यांकन की है, जहाँ कई विषयों को एक साथ जोड़कर बच्चे का स्तर निर्धारित किया जाता है। यदि बच्चा किसी एक विषय में गलती करता है तो वह पूरे मूल्यांकन को प्रभावित कर देता है, भले ही बाकी विषयों में उसका प्रदर्शन उत्कृष्ट हो। यह तरीका न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि अधिगम मनोविज्ञान के बुनियादी सिद्धांतों के भी विरुद्ध है। शिक्षक इस बात को लेकर भी असंतुष्ट हैं कि मूल्यांकन की प्रक्रिया में कोई लचीलापन नहीं रखा गया है। स्वाभाविक है कि कोई भी बच्चा यदि 12 में से 1 या 2 सवाल गलत कर देता है, तो उसकी दक्षता को पूरी तरह खारिज नहीं किया जाना चाहिए।


शिक्षकों का कहना है कि इस ऐप को बिना फील्ड ट्रायल या उपयोगकर्ता फीडबैक के ही लागू कर दिया गया, जिससे जमीनी कठिनाइयों की पहचान ही नहीं हो सकी। निपुण प्लस ऐप के संचालन में तकनीकी खामियों की सूचना मिलने के बावजूद विभाग द्वारा अभी तक कोई स्पष्ट समाधान या दिशानिर्देश जारी नहीं किए गए हैं। 


शिक्षकों की राय है कि किसी भी ऐप के निर्माण और लांच से पहले उसका सीमित स्तर पर परीक्षण आवश्यक होता है, जिसमें विभिन्न सामाजिक, भौगोलिक और मानसिक पृष्ठभूमियों के छात्र-छात्राओं को शामिल किया जाना चाहिए। इसके साथ ही सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शिक्षक, जो इस पूरी प्रक्रिया के सबसे निकटवर्ती और अनुभवी प्रयोक्ता हैं, उनके फीडबैक को नजरअंदाज कर देना दूरदर्शिता नहीं बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता के साथ खिलवाड़ है।


वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह स्पष्ट है कि डिजिटल नवाचार का उद्देश्य केवल ऐप लांच करना नहीं होना चाहिए, बल्कि यह नवाचार तब ही सार्थक होगा जब वह व्यवहारिक, मानवीय और शिक्षाशास्त्रीय दृष्टिकोण से उपयुक्त हो। शिक्षकों की समस्याएँ, छात्रों की मानसिक स्थिति और स्थानीय शैक्षिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखे बिना किया गया कोई भी डिजिटल हस्तक्षेप शिक्षा के उद्देश्यों को पूर्ण करने के बजाय उन्हें भटका सकता है। 


अतः विभाग को चाहिए कि वह निपुण प्लस जैसे किसी भी तकनीकी उपक्रम को एक निर्देश नहीं, बल्कि सुधार की एक सतत प्रक्रिया के रूप में देखे, जिसमें शिक्षक और छात्र दोनों की सहभागिता अनिवार्य हो। तभी 'निपुण भारत मिशन' की संकल्पना सच्चे अर्थों में साकार हो पाएगी।


Monday, November 4, 2024

पढ़ाएं या 12 ऐप में ब्योरा भरते रहें 'मास्टर जी'? परिषदीय स्कूलों के शिक्षकों का अधिकांश समय बाबूगिरी में रहा बीत

पढ़ाएं या 12 ऐप में ब्योरा भरते रहें 'मास्टर जी'? परिषदीय स्कूलों के शिक्षकों का अधिकांश समय बाबूगिरी में रहा बीत


लखनऊ । प्राइमरी स्कूलों के शिक्षकों का अधिकांश समय बाबूगिरी में बीत रहा है। कक्षा में बच्चों को पढ़ाने की फुर्सत नहीं है। 12 तरह की विभागीय ऐप में ब्योरा अपलोड करने में दिन बीत रहा है। शिक्षकों के लिए ये ऐप सुविधा की बजाय बच्चों की पढ़ाई में अचड़न बन गए हैं। 


शिक्षकों का स्कूल के समय मोबाइल व टैबलेट ऑनलाइन ही रहता है। बच्चों के नामांकन, रिपोर्ट कार्ड, आधार लिंक, बच्चों व अभिभावकों का ब्योरा, बैंक डिटेल ऑन लाइन करना, दिव्यांग बच्चों की उपस्थिति से लेकर निपुण भारत समेत अन्य की फीडिंग ऑन लाइन करनी होती है। समीक्षा में सूचना समय से न भेजने पर शिक्षकों के वेतन रोकने समेत कई तरह की कार्रवाई का सामना करना पड़ता है। 


बेसिक शिक्षा विभाग में मौजूदा समय में हर काम ऑनलाइन हो रहा है। हर काम के लिए एक अलग से मोबाइल ऐप या ऑनलाइन पोर्टल बना हुआ है। सभी शिक्षकों को यू डाइस में हर बच्चे की 52 बिन्दुओं पर सूचना भरनी होती है। इसके अलावा नामांकन, निपुण, स्कूल में कायाकल्प से लेकर बच्चों से जुड़ी हर जानकारी इन्हीं ऐप और पोर्टल के माध्यम से विभाग को भेजनी होती है। शिक्षकों के सामने पढ़ाने के साथ ही समय-समय पर स्कूल की गतिविधियों सहित रोज की जानकारी मुहैया कराना चुनौती से कम नहीं है।


ये हैं ऐप और पोर्टल

बेसिक शिक्षा विभाग की ओर से प्रेरणा डीबीटी, दीक्षा, डीबीटी, निपुण, रेड एलोंग, समर्थ, पीएफएमएस, मिशन प्ररेणा, शारदा, पोर्टल जैसे ऐप में शिक्षकों को डिटेल अपलोड करनी होती है। छह ऐप में रोज कुछ न कुछ सूचना भेजनी होती है। इनमें रीड एलोंग ऐप, निपुण, प्रेरणा, डीबीटी, समर्थ, प्रेरणा यूपी डॉट इन आदि शामिल हैं। वहीं अन्य ऐप का इस्तेमाल जुलाई से सितम्बर व अप्रैल व मार्च में करना पडता है। शिक्षकों को ऐप व पोर्टल का प्रशिक्षण नहीं दिया गया है। ग्रामीण क्षेत्र में नेटवर्क की बड़ी समस्या है। ऐसे में दिक्कतें भी होती हैं।

Saturday, September 21, 2024

मोबाइल ऐप से बच्चों की निपुणता के आंकलन के तरीकों पर उठ रहे गंभीर सवाल

मोबाइल ऐप से बच्चों की निपुणता के आंकलन के तरीकों पर उठ रहे गंभीर सवाल


बेसिक शिक्षा विभाग द्वारा कक्षा 1 से 3 के बच्चों का आकलन मोबाइल ऐप ‘निपुण लक्ष्य’ के जरिए किया जा रहा है, जिस पर अभिभावकों और शिक्षकों द्वारा गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। जब बच्चों की पढ़ाई किताबों और कार्य पुस्तिकाओं के माध्यम से होती है, तो फिर आकलन मोबाइल ऐप के जरिए क्यों किया जा रहा है, यह सवाल अभिभावकों के बीच चर्चा का विषय बन गया है।


डिजिटल टेस्टिंग या किताबों से आकलन?

बेसिक शिक्षा विभाग ने बच्चों को निपुण बनाने के लिए तीन चरणों में आकलन योजना तैयार की है, जिसमें पहला चरण अगले माह आयोजित होना है। चयनित स्कूलों में टेस्ट की तैयारियां भी तेज हो गई हैं। हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया ने अभिभावकों के बीच असमंजस पैदा कर दिया है। उनका मानना है कि बच्चों का मूल्यांकन किताबों से होना चाहिए, क्योंकि उनकी पढ़ाई भी उन्हीं से होती है। इसके अलावा, मोबाइल स्क्रीन के जरिए आकलन बच्चों की मानसिकता पर गलत प्रभाव डाल सकता है।


क्या मोबाइल से बच्चों का अभ्यास पर्याप्त है?

शिक्षक जब कक्षा में बच्चों को मोबाइल ऐप के माध्यम से पढ़ाते हैं, तो हर बच्चे को पर्याप्त समय नहीं मिल पाता। अगर शिक्षक प्रतिदिन पांच से दस बच्चों को मोबाइल पर अभ्यास कराते हैं, तब भी एक महीने में एक बच्चे को आधा घंटा भी पूरा समय नहीं मिल पाता। इसके परिणामस्वरूप, आकलन के दौरान बच्चों को कठिनाई का सामना करना पड़ता है, क्योंकि वे ऐप पर पर्याप्त अभ्यास नहीं कर पाते हैं। सवाल यह भी उठ रहा है कि आखिर बच्चों का आकलन किताबी अभ्यास से क्यों नहीं कराया जा रहा?


अभिभावकों की चिंता: मोबाइल का बच्चों पर असर

अभिभावक खुलकर सवाल कर रहे हैं कि जब बच्चों को स्कूल में पढ़ाई किताबों से कराई जाती है, तो फिर मोबाइल ऐप से उनका आंकलन क्यों किया जा रहा है? मोबाइल का बच्चों पर दूरगामी प्रभाव हो सकता है, और अभिभावकों का कहना है कि बच्चों को मोबाइल स्क्रीन से दूर रखना ही बेहतर है। किताबों से मूल्यांकन ज्यादा प्रासंगिक और सुरक्षित प्रतीत होता है।


बच्चों की निपुणता या डिजिटल निर्भरता?

बच्चों की निपुणता के लिए बेसिक शिक्षा विभाग द्वारा शुरू किया गया यह ऐप क्या वास्तव में सही दिशा में है या फिर यह सिर्फ बच्चों को तकनीक पर निर्भर बना रहा है? यह सवाल अब शिक्षकों और अभिभावकों के मन में गूंज रहा है। क्या शिक्षा के नाम पर बच्चों को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ढकेलना उचित है? इन सवालों का जवाब न केवल शिक्षा विभाग को देना होगा, बल्कि बच्चों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेना होगा।




मोबाइल से परिषदीय बच्चों के आकलन पर उठे सवाल, बेसिक शिक्षा विभाग में निपुण लक्ष्य ऐप से होता आकलन

चयनित स्कूलों में निपुण टेस्ट के लिए तैयारियां तेज

बेसिक शिक्षा विभाग में कक्षा एक से तीन तक के बच्चों का आकलन मोबाइल एप्लीकेशन के जरिए किए जाने पर सवाल खड़े हो रहे हैं। अभिभावकों का कहना है कि जब विभाग बच्चों को पढ़ने के लिए किताबें देता है और स्कूल में बच्चों की पढ़ाई भी किताबों व कार्य पुस्तिकाओं के द्वारा होती है तो फिर उनका मूल्यांकन किताबों की बजाए मोबाइल ऐप द्वारा क्यों किया जाता है?


बेसिक शिक्षा विभाग में बच्चों को निपुण बनाने के लिए कार्य योजना बनाई गई है। तीन चरणों में बच्चों का निपुण आंकलन किया जाना है। पहला चरण अगले माह आयोजित होगा। इस चरण के लिए चयनित स्कूलों में निपुण टेस्ट के लिए तैयारियां तेज हो गई हैं। 


तैयारियों के बीच कई तरह के सवाल भी खड़े हो गए हैं। अभिभावकों ने पूछा है कि आखिर हमारे बच्चों का आंकलन किताबों के द्वारा क्यों नहीं कराया जा रहा है। इससे बच्चों पर खराब प्रभाव पड़ेगा।


बच्चे कितना कर पाते हैं अभ्यास?

सवाल उठाए जा रहे हैं कि कक्षा कक्ष में कक्षा एक से तीन तक के बच्चों को मोबाइल ऐप से पढ़ने का कितना अभ्यास कर पाता है। शिक्षक अपने मोबाइल से यदि प्रतिदिन पांच से दस बच्चों को पढ़ने का अभ्यास कराता है तो भी प्रत्येक बच्चे को पूरे माह में आधा घंटा समय भी नहीं मिल पाता होगा। ऐप से पर्याप्त अभ्यास न होने पर आकलन के दौरान बच्चे कठिनाई का अनुभव महसूस करते हैं।


किताबों से क्यों नहीं कराते है आकलन?

अभिभावक प्रश्न करते हैं कि जब हमारे बच्चों को स्कूल में किताबों से पढ़ाया जाता है तो फिर किताबों के द्वारा ही उनका आंकलन किया जाना चाहिए। मोबाइल स्क्रीन से तो बच्चों को वैसे भी दूर रखा जाना चाहिए।

Monday, June 24, 2024

हाईटेक होंगे प्रदेश के अनुदानित स्कूल, मोबाइल एप होगा विकसित

हाईटेक होंगे प्रदेश के अनुदानित स्कूल,  मोबाइल एप होगा विकसित


लखनऊ। प्रदेश सरकार ने अनुदानित विद्यालयों के कायाकल्प की तैयारी शुरू कर दी है। सीएम योगी की मंशा अनुसार तैयार कार्ययोजना को अमली जामा पहनाने की कवायद तेज हो चुकी है। जल्द ही प्रदेश के अनुदानित विद्यालयों को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से जोड़ते हुए विद्यार्थियों व स्टाफ के आधार व अन्य जानकारियों को शामिल करते हुए मोबाइल एप विकसित किया जाएगा। यह जियो टैगिंग व टीचिंग स्टाफ मॉड्यूल समेत कई खूबियों वाला होगा।


समाज कल्याण विभाग ने उप्र इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन लिमिटेड को एप विकसित करने का जिम्मा सौंपा है। इसके लिए ई-निविदा के माध्यम से आवेदन मांगे गए हैं।

बता दें कि इस ऑनलाइन मॉड्यूल बेस्ड मोबाइल एप से 60 हजार से ज्यादा विद्यार्थियों को ट्रैक करने और उनके डाटाबेस को वन स्टॉप डेस्टिनेशन के तौर पर एक्सेस करने का प्लेटफॉर्म तैयार हो जाएगा। इसमें उनकी जन्मतिथि, जेंडर, मोबाइल नंबर, पता, पारिवारिक पृष्ठिभूमि, सामाजिक एवं आर्थिक जानकारी, आधार, शामिल होंगे।


 स्टाफ व शिक्षकों की भी इसी प्रकार की जानकारियां अंकित होंगी। इसके साथ ही, विद्यालय का नाम व पूरा पता, प्रबंधन की जानकारी, लैटीट्यूड-लॉन्गिट्यूड समेत विभिन्न प्रकार की जानकारियां अंकित होंगी। 

Thursday, May 9, 2024

राजस्थान के स्कूलों में टीचर इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे मोबाइल, ड्यूटी के दौरान पूजा व नमाज पर गए तो होगी कार्रवाई

राजस्थान के स्कूलों में टीचर इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे मोबाइल, ड्यूटी के दौरान पूजा व नमाज पर गए तो होगी कार्रवाई


राजस्थान में शिक्षा में गुणवत्ता के लिए अब शिक्षकों पर सख्ती बरती जाएगी. शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने ड्यूटी आवर्स में शिक्षकों के मोबाइल फोन इस्तेमाल करने और परिसर छोड़कर जाने की शिकायतों पर सख्त रुख अख्तियार किया है. जानिए शिक्षा मंत्री ने क्या कहा...


 स्कूल ड्यूटी आवर्स में शिक्षक अब मोबाइल फोन का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे. यही नहीं यदि स्कूल समय में भेरुजी-बालाजी की पूजा करने या नमाज पढ़ने के नाम पर शिक्षक बिना बताए विद्यालय परिसर छोड़ता है, तो उसके खिलाफ निलंबन और बर्खास्त करने तक की कार्रवाई की जा सकती है. 


शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने  सख्त लहजे में ये बाते कहीं.शिक्षा में गुणवत्ता के लिए अब शिक्षकों पर सख्ती बरती जाएगी. शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने ड्यूटी आवर्स में शिक्षकों के मोबाइल फोन इस्तेमाल करने और परिसर छोड़कर जाने की शिकायतों पर सख्त रुख अख्तियार किया है. उन्होंने कहा कि स्कूल शिक्षा में जो पहले से आदेश, निर्देश और नियम बने हुए हैं उन सब की पालना करने का प्रयास कर रहे हैं. 


सभी विद्यालय में वातावरण ठीक करने के लिए कोशिश कर रहे हैं कि कोई भी अध्यापक स्कूल समय में भेरुजी-बालाजी की पूजा करने या नमाज पढ़ने के नाम पर विद्यालय ना छोड़े. यदि उसे जाना है तो छुट्टी लेकर जाए. बाकायदा रजिस्टर में दर्ज होगा कि शिक्षक छुट्टी लेकर गया है. अन्यथा बिना सूचना कि यदि कोई अध्यापक स्कूल छोड़ेगा तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी. शिक्षा मंत्री ने चेताया कि ऐसे अध्यापकों पर निलंबन से लेकर बर्खास्त करने तक की कार्रवाई कर सकते हैं.


 वहीं उन्होंने मोबाइल को एक बीमारी बताते हुए कहा कि विद्यालय में कई अध्यापक मोबाइल में शेयर मार्केट या सोशल मीडिया देखते रहते हैं. इस दौरान वो उसी में उलझे रहते हैं. ऐसे में ये निर्देशित किया गया है कि कोई भी शिक्षक अब विद्यालय के अंदर मोबाइल लेकर नहीं जाएगा. यदि किसी शिक्षक का गलती से मोबाइल आ भी जाता है, तो प्रिंसिपल को जमा कराएगा. स्कूल समय में केवल प्रिंसिपल का मोबाइल खुला रहेगा ताकि कोई इमरजेंसी हो जाए, तो प्रिंसिपल के फोन पर सूचना दी जा सके. 


इससे मोबाइल के कारण बच्चों की पढ़ाई का जो नुकसान हो रहा था, वो भी बचेगा. इसके साथ ही शिक्षकों को ताकीद किया जा रहा है कि वो बच्चों को पढ़ाने से पहले खुद पढ़ कर जाए. ताकि बच्चों की समस्याओं का समाधान ठीक तरह से कर सकें.इसके अलावा शिक्षा मंत्री ने कहा कि सरकारी स्कूलों में खेल के मैदानों पर हो रखे अतिक्रमणों को हटाया जाएगा. इस पर अभियान के रूप में काम करना शुरू कर दिया गया है. इस तरह के छोटे-छोटे प्रकरणों का समाधान करते हुए शिक्षा में गुणवत्ता लाने का प्रयास किया जा रहा है.

Friday, April 5, 2024

माध्यमिक विद्यालयों में प्रवेश लेने वाले छात्र/छात्राओं की ईमेल आई०डी० एवं मोबाइल नम्बर लेने एवं विद्यालयों की वेबसाइट तैयार कराये जाने के संबंध में।

9वीं से 12वीं तक के प्रवेश आवेदन में देने होंगे ईमेल व मोबाइल नंबर


लखनऊ। प्रदेश में बेसिक व माध्यमिक विद्यालयों में नए सत्र 2024-25 में प्रवेश की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। माध्यमिक शिक्षा विभाग ने कहा है कि 9वीं से 12वीं के विद्यार्थियों को प्रवेश के समय ईमेल व मोबाइल नंबर देना अनिवार्य होगा।

इससे विद्यार्थियों को समय-समय पर सूचना व सरकारी योजनाओं की जानकारी देने में आसानी होगी। विभाग को कई बार विद्यार्थियों को आवश्यक या आकस्मिक सूचना देने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती है। यही वजह है कि इस बार सत्र शुरू होने के साथ ही विभाग ने इस बाबत दिशा-निर्देश जारी किए हैं। 

माध्यमिक शिक्षा निदेशक डॉ. महेंद्र देव ने सभी डीआईओएस से कहा है कि 9वीं से 12वीं के सभी विद्यार्थियों की ईमेल आईडी और उनके मोबाइल नंबर प्रवेश आवेदन के साथ ही लिए जाएं। साथ ही इन सूचनाओं को माध्यमिक शिक्षा परिषद की वेबसाइट पर भी अपलोड किया जाए। उन्होंने यह भी कहा है कि प्रदेश के सभी माध्यमिक विद्यालयों में उनके यहां चल रहे कोर्स, वर्ग, शिक्षक व विद्यार्थियों के विवरण और विभिन्न गतिविधियों की जानकारी देने के लिए उनकी वेबसाइट तैयार कराई जा रही है। 



इंटर तक के छात्रों की बनेगी ईमेल आईडी

लखनऊ, माध्यमिक शिक्षा विभाग में कक्षा नौ से इंटरमीडिएट तक के सभी विद्यार्थियों की ईमेल आइडी बनवाने का निर्णय किया है। इसे किसी नए सत्र से लागू किया जाएगा। इसके तहत शैक्षिक सत्र 2024-25 में प्रवेश लेते समय भरवाए जाने वाले आवेदन फार्म में ईमेल आइडी व मोबाइल नंबर अनिवार्य रूप से भरवाया जाएगा। वहीं सभी माध्यमिक स्कूलों को हर हाल में 20 अप्रैल तक वेबसाइट भी बनाने के निर्देश दिए गए हैं। वेबसाइट पर विद्यालय से जुड़ी समस्त जानकारियां उपलब्ध रहेंगी।

माध्यमिक शिक्षा निदेशक डा. महेन्द्र देव की ओर से सभी जिलों के जिला विद्यालय निरीक्षकों को निर्देश दिए गए हैं कि सभी स्कूलों में इसे सख्ती से लागू कराया जाए। विद्यार्थियों को ईमेल के माध्यम से सूचनाओं का आदान-प्रदान करने की आदत पड़ेगी और वह इसका महत्व समझ सकेंगे।


माध्यमिक विद्यालयों में प्रवेश लेने वाले छात्र/छात्राओं की ईमेल आई०डी० एवं मोबाइल नम्बर लेने एवं विद्यालयों की वेबसाइट तैयार कराये जाने के संबंध में।