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Friday, January 13, 2017

इसरो के भुवन पोर्टल से सरकारी दावों की खुलेगी पोल, वेबसाइट से आएगी पारदर्शिता, अभी सरकारी प्राइमरी स्कूल में एक अदद फर्नीचर को तरस रहें बच्चें


इसरो के भुवन पोर्टल से सरकारी दावों की खुलेगी पोल, वेबसाइट से आएगी पारदर्शिता,  अभी सरकारी प्राइमरी स्कूल में एक अदद फर्नीचर को तरस रहें प्राइमरी स्कूल में एक अदद फर्नीचर को तरस रहें बच्चें

Wednesday, November 30, 2016

मथुरा : खुले आसमान के नीचे हो रही पढाई, स्कूल सुविधाओं से दूर, विद्यालय भवन जर्जर अवस्था में, चटाई और बोरे पर पढ़ रहे छात्र

खुले आसमान के नीचे हो रही पढाई, स्कूल सुविधाओं से दूर, विद्यालय भवन जर्जर अवस्था में

चंदौली : खुले आसमान के नीचे हो रही पढाई, स्कूल सुविधाओं से दूर, विद्यालय भवन जर्जर अवस्था में, शिक्षकों की कमी भी आ रही है आड़े

चंदौली : खुले आसमान के नीचे हो रही पढाई, स्कूल सुविधाओं से दूर, विद्यालय भवन जर्जर अवस्था में, शिक्षकों की कमी भी आ रही है आड़े।

हरदोई : विद्यालय बने तबेला बांधे जा रहे जानवर, काश ! फटकार से सुधर जाएं जिम्मेदार

काश ! फटकार से सुधर जाएं जिम्मेदार
घरों से बोरी लेकर आते हैं बच्चे सुप्रीम कोर्ट ने विद्यालयों के बच्चों को टाट बोरे की फट्टी पर बैठालने पर नाराजगी जताई है लेकिन देखा जाए तो जिले के कुछ प्राथमिक विद्यालयों में यह भी नहीं है। बच्चे अपने स्कूली बैंगों में घरों से बोरी लेकर आते हैं और उन्हीं पर कक्षाओं में बैठते हैं। विद्यालय विकास अनुदान में बच्चों को बैठालने के संसाधन का भी इंतजाम किया जाना चाहिए लेकिन ऐसा कुछ नहीं होता।

गायब हो चौकी और बेंच ऐसा नहीं कि बच्चों के बैठने का इंतजाम नहीं किया गया था। कुछ वर्ष पूर्व प्राथमिक के बच्चों के लिए चौकी और उच्च प्राथमिक स्कूलों में डेस्क और बेंच का इंतजाम किया गया था लेकिन कुछ विद्यालयों को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश में चौकी और बेंच गायब हो गए हैं। जहां हैं भी वह कमरे में बंद हैं और बच्चे जमीन पर बैठने को मजबूर हैं।

परिषदीय विद्यालयों की दशा देखकर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को फटकार लगाई है। देखा जाए तो इलाहाबाद में ही नहीं शायद ही ऐसा कोई जिला हो जहां पर शिक्षा के नाम पर खेल न हो रहा हो। हरदोई में तो पूरी तरह से व्यवस्था का मजाक उड़ाया जा रहा है। शिक्षा की गुणवत्ता तो दूर की बात है विद्यालयों में बच्चों को मूलभूत सुविधाएं तक नहीं मिलती हैं। बातें तो आसमान की हो रही हैं लेकिन हकीकत पूरी व्यवस्था की पोल खोल रही है। विभागीय लोगों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद में व्यवस्था सुधार का जो आदेश दिया है, पूरे प्रदेश में लागू हो जाए तो बच्चों का उनका हक मिल जाए।

बेसिक शिक्षा ही समाज की नींव है और इसके सुधार को लेकर शासन प्रशासन गंभीर है। सर्व शिक्षा अभियान में तो दिल खोलकर धनराशि खर्च हो रही है। शिक्षा की गुणवत्ता से लेकर संसाधनों पर पानी की तरह पैसा बहाया जाता है लेकिन सब कुछ कागजों पर ही हो रहा है। जिले के कुछ विद्यालयों को छोड़ दें तो अधिकांश की यही दशा है। केंद्र और प्रदेश सरकार विद्यालयों को साफ सुथरा और शौचालयों पर जोर दे रही है। बच्चों के लिए पेयजल के लिए इंडिया मार्का हैंडपंप से लेकर बाटर टैंक तक बनवाये गए हैं लेकिन देखा जाए तो जिले के करीब 40 फीसद विद्यालयों में बच्चों के शौचालयों का इंतजाम नहीं है। कागजों पर तो व्यवस्थाएं सही हैं लेकिन हकीकत में ताला पड़ा है। तो कई विद्यालयों के शौचालयों में दरवाजे तक नहीं हैं। इसी तरह हैंडपंपों में कई केवल ठूठ है तो कहीं वर्षों से खराब पड़े हैं। ऐसा नहीं कि जिम्मेदार जानते नहीं हैं। सब कुछ जानते हुए भी चुप हैं और इस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है।

मरम्मत और रंगाई पुताई पर खर्च होते हैं लाखों रुपये : विद्यालयों की मरम्मत से लेकर रंगाई पुताने के लिए प्रति वर्ष लाखों रुपये खर्च होते हैं। देखा जाए तो प्रति विद्यालय में विद्यालय विकास अनुदान पांच हजार रुपये जिसमें मरम्मत आदि का काम कराया जाता है तो प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में उनके कक्षा कक्षों के अनुसार पांच से 10 हजार 500 रुपये भेजे जाते हैं। लेकिन विद्यालयों में कुछ दिखाई नहीं देता है। कुछ विद्यालयों को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश में रंगाई पुताई तक नहीं कराई जाती है। बाउंड्रीवाल गिरी रहती है तो पानी की टंकी में ही गंदगी छाई रहती है लेकिन कोई देखने वाला नहीं है।

विद्यालय बने तबेला बांधे जा रहे जानवर : परिषदीय विद्यालयों की दशा के लिए विभाग तो जिम्मेदार है ही कुछ अभिभावक और ग्रामीण भी जिम्मेदार हैं। ग्रामीणों के बच्चे विद्यालयों में पढ़ते हैं लेकिन कोई विद्यालयों को खलिहान बना देता है तो कोई तबेला और जानवर तक बांधे जाते और तो और विद्यालयों के दरवाजे और खिड़की भी कुछ स्थानों पर तोड़ दिए जाते। शिक्षक शिक्षिकाएं चाह कर भी कुछ नहीं कर पाते और मजबूर होकर बैठे रहते हैं

सरकार कागज में ही दिखा रही सब चकाचक, ठंडक में स्कूल के नौनिहाल बैठ रहे टाट-पट्टी पर

पूरी तरह से हाईटेक होते युग और स्मार्ट होते शैक्षणिक माहौल के बीच सरकारी प्राइमरी स्कूलों में कहीं नौनिहालों के लिए टाट-पट्टी, कहीं कक्षाओं में उखड़ी हुई जमीन, कहीं दीवारों में सीलन और कहीं गंदगी के बीच भोजन बनाए जाने की व्यवस्था। इतना ही नहीं, स्कूलों में बने शौचालयों में साफ सफाई का कोई मद नहीं, कहीं-कहीं तो शौचालय ही नहीं हैं। इलाहाबाद के अधिकांश परिषदीय विद्यालयों की कुछ ऐसी ही सूरत है। पूरे जिले में परिषदीय स्कूलों की सूरत बताने के लिए जिला मुख्यालय में स्थित एक स्कूल ही काफी है। लेकिन ऐसे उदाहरण दर्जनों हैं। पीडी टंडन रोड स्थित प्राथमिक स्कूल में नौनिहाल आज भी टाट-पट्टी पर ही बैठकर शिक्षा का ककहरा सीख रहे हैं जबकि ठंडक का मौसम आ गया है। जिस रसोई में बच्चों के लिए मध्यान्ह भोजन बनता है वहां की दीवारें सीलन भरी हैं, छत में जाले लगे और फर्श पर भी सफाई के माकूल इंतजाम नहीं। ऐसा इसलिए क्योंकि रसोईघर के बगल में पानी भरा रहता है जिसकी निकासी नहीं कराई जाती। इससे कभी कोई दुर्घटना होने की आशंका भी बनी रहती है और भोजन की गुणवत्ता पर भी सवाल उठते हैं। गौरतलब है कि जिला मुख्यालय में शिक्षा विभाग के सभी बड़े अफसरों और प्रशासनिक अफसरों का कार्यालय है इसके बावजूद इस प्रकार के स्कूलों की स्थिति से सभी की बेफिक्री है।

नगरक्षेत्र में दर्जनों स्कूल चल रहे एकल : नगर क्षेत्र में दर्जनों स्कूल एकल चल रहे हैं। जबकि विभागीय नियम शिक्षकों के रिक्त पदों को भरने में रोड़ा बने हुए हैं।

शासनादेश जारी नहीं होने से नगर क्षेत्र के दर्जनों स्कूल एक ही शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। इन शिक्षकों को बच्चों की पढ़ाई, मिड डे मील पर पूरा ध्यान रखने सहित विभागीय लिखापढ़ी और अन्य सरकारी कामकाज भी करने पड़ते हैं

Wednesday, October 19, 2016

जौनपुर : किताब बांटी नहीं, लेने चले पढ़ाई-लिखाई का हिसाब, अभिभावक से लेकर छात्र परेशान

जौनपुर में किताब बांटी नहीं, लेने चले पढ़ाई-लिखाई का हिसाब।