कान्वेंट की तरह परिषदीय विद्यालयों में बच्चों के बेहतर पठन-पाठन की व्यवस्था आखिर कैसे अंजाम तक पहुंचेगी इस पर अब सवालिया निशान उठने लगा है। मुख्यमंत्री ने तो कैबिनेट की बैठक में परिषदीय विद्यालयों के बच्चों को मुफ्त में बैग देने की घोषणा कर दी लेकिन अभी तक स्कूलों में किताब नहीं पहुंची जिससे इस योजना को पलीता लगता दिख रहा है। खास बात यह है कि गिनी-चुनी पुरानी किताब और बिना नई किताब के ही त्रैमासिक परीक्षा भी हो गई और अब छमाही परीक्षा की तैयारी चल रही है। उधर, विभाग के जिम्मेदारों की माने तो किताबें धीरे-धीरे आ रहीं है जल्द ही बच्चों को वितरित कर दी जाएंगी। 1 जनपद में कुल 3250 परिषदीय विद्यालय हैं जिसमें 2267 प्राथमिक एवं 983 जूनियर हाईस्कूल हैं। एक अप्रैल से शुरू हुए नए सत्र के साढ़े पांच महीने हो गए लेकिन अभी तक बच्चों को नई किताब मयस्सर नहीं हो सकी।
खाली हाथ आए, थोड़ी देर बैठे और चल दिए घर बच्चे खाली हाथ विद्यालय आते हैं और थोड़ी देर बैठने के बाद ही घर चले जाते हैं। विभागीय जिम्मेदार को जानकारी होने के बाद भी कोई निष्कर्ष नहीं निकल रहा है। सरकार एक तरफ शिक्षा की बयार बहाने की बात कह रही है तो दूसरी ओर प्राथमिक शिक्षा का हाल बुरा है। देश के भविष्य कहे जाने वाले बच्चों को बिना किताबों के ही शिक्षित किया जा रहा है। कुछ विद्यालयों में पुरानी किताबों से पढ़ाई कराई जा रही है। - तो बच्चों की क्षमता का कैसे होगा आकलन विभाग का मानना है कि बिना किताबों के ही बच्चे शिक्षित हो जाएंगे। शायद यही कारण है कि बच्चों की त्रैमासिक परीक्षा भी पिछले 8, 9, 10 अगस्त को करा ली गई। अब छमाही की तैयारी है। हर महीने के अंत में मासिक परीक्षा कराए जाने का विभागीय आदेश किसी तुगलकी फरमान से कम नहीं लगता। बिना किताबों के पढ़ने वाले बच्चों की क्षमता का आकलन नहीं हो सकेगा।
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