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Tuesday, October 21, 2025
MDM में तिथि भोजन योजना का यूपी में नहीं हो पा रहा सफल क्रियान्वयन, प्रयागराज की रिपोर्ट ने खोला सच
MDM में तिथि भोजन योजना का यूपी में नहीं हो पा रहा सफल क्रियान्वयन, प्रयागराज की रिपोर्ट ने खोला सच
उत्तर प्रदेश के विद्यालयों में तिथि भोजन योजना को लेकर फिर से सवाल उठने लगे हैं। सरकार और विभागीय अधिकारी इस योजना को सामुदायिक सहभागिता और बच्चों में पोषण के प्रति जागरूकता का माध्यम मानते हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत अभी भी उम्मीदों से बहुत दूर है। प्रयागराज से आई रिपोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि योजना के दिशा-निर्देशों और वास्तविक क्रियान्वयन के बीच गहरी खाई मौजूद है।
प्रयागराज से प्रकाशित अखबारी खबरों के अनुसार, परिषदीय स्कूलों में तिथि भोजन के लिए विशेष निर्देश जारी किए गए हैं कि विद्यालय परिसर के भीतर केवल पका हुआ भोजन ही बच्चों को दिया जाए और फास्ट फूड या तले हुए पदार्थों को पूरी तरह प्रतिबंधित रखा जाए। विद्यालय प्रबंधन समिति (एसएमसी) के सदस्यों की जिम्मेदारी तय की गई है कि वे भोजन की गुणवत्ता और वितरण प्रक्रिया की निगरानी करें। यहां तक कि भोजन कराने वाला व्यक्ति भी बच्चों के साथ बैठकर भोजन करेगा, ताकि बच्चों में समानता और सहभागिता की भावना विकसित हो।
लेकिन, योजना की भावनात्मक और प्रशासनिक गंभीरता के बावजूद, राज्य के अधिकांश जिलों में यह पहल अपेक्षित रूप से सफल नहीं हो पाई है। प्रयागराज की न्यूज रिपोर्ट में साफ उल्लेख किया गया है कि बीएसए देवेंद्र सिंह के निर्देशों के बावजूद, तिथि भोजन कराने के इच्छुक लोगों की संख्या बहुत कम है। कई विद्यालयों में महीनों से कोई तिथि भोजन कार्यक्रम आयोजित नहीं हुआ है।
सूत्र बताते हैं कि ग्रामीण इलाकों में आर्थिक सीमाएँ, समय की कमी और अभिभावकों की अनिच्छा इसके प्रमुख कारण हैं। कई स्थानों पर एसएमसी सदस्य और ग्राम पंचायतें भी सक्रिय भूमिका नहीं निभा पा रही हैं। जिन विद्यालयों में तिथि भोजन होता भी है, वहाँ अक्सर मात्रा और गुणवत्ता दोनों पर सवाल उठते हैं।
विभागीय अधिकारी मानते हैं कि तिथि भोजन की भावना अत्यंत नेक है, लेकिन बिना सामुदायिक भागीदारी के यह योजना केवल कागज़ों पर ही सजीव रह जाएगी। प्रयागराज की तरह कई जिलों में जब तक स्थानीय समाज और अभिभावक सक्रिय भागीदारी नहीं निभाते, तब तक यह योजना अपने वास्तविक उद्देश्य — सामाजिक एकता, स्वच्छता और पोषण सुधार — को हासिल नहीं कर सकेगी।
इस पूरे परिदृश्य में सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि योजनाओं का मसौदा और क्रियान्वयन प्रक्रिया प्रायः ज़मीनी सच्चाइयों को जाने बिना तैयार की जाती है। विद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों से न तो व्यावहारिक सुझाव लिए जाते हैं, न ही स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर योजना बनाई जाती है। नतीजतन, ऐसी योजनाएँ जमीनी हकीकत से कटकर केवल “अच्छे इरादों के दस्तावेज़” बनकर रह जाती हैं। तिथि भोजन जैसी सामाजिक रूप से सार्थक पहल को सफल बनाने के लिए आवश्यक है कि शिक्षक, अभिभावक, ग्राम प्रतिनिधि और प्रशासन — सभी एक साथ मिलकर व्यवहारिक ढंग से आगे बढ़ें, वरना यह योजना भी अन्य अनेक योजनाओं की तरह केवल आदेशों और फाइलों में सिमट कर रह जाएगी।
Thursday, July 31, 2025
Friday, November 1, 2024
बिना पक्ष सुने वेतन रोकने के बीएसए के मनमाने आदेश पर हाईकोर्ट की रोक, जानें पूरा मामला
बिना पक्ष सुने वेतन रोकने के बीएसए के मनमाने आदेश पर हाईकोर्ट की रोक, जानें पूरा मामला
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट की फटकार के बाद बेसिक शिक्षा अधिकारी प्रयागराज ने कंपोजिट विद्यालय दारागंज की प्रधानाध्यापिका रुकैया अब्बासी का वेतन रोकने का आदेश वापस ले लिया।
न्यायमूर्ति अजय भनोट ने यह आदेश बीएसए के वकील कूष्मांडेय साही के वेतन रोकने के आदेश को वापस लेने की जानकारी देने के बाद दिया। याची के अधिवक्ता लक्ष्मीकांत त्रिगुणायत का कहना था कि याची का पक्ष सुने बगैर शिकायत पर बीएसए ने जांच कमेटी की संस्तुति पर वेतन रोकने का मनमाना आदेश जारी किया है।
ज्योति कैनवास, गुंजन श्रीवास्तव व मीनू श्रीवास्तव ने आईजीआरएस पोर्टल पर ऑनलाइन शिकायत कर आरोप लगाया कि रुकैया अब्बासी ने अध्यापिका रहते हुए परास्नातक व पीएचडी की डिग्री हासिल की है। इस पर गठित कमेटी के वेतन रोकने की संस्तुति पर बीएसए ने एक सप्ताह का समय दिया।
Thursday, October 28, 2021

DBT की राह में रुकावट बने एडेड विद्यालय, परिषदीय बच्चों के अभिभावकों को मिलने हैं 1100 रुपये
DBT की राह में रुकावट बने एडेड विद्यालय,
● परिषदीय बच्चों के अभिभावकों को मिलने हैं 1100 रुपये
● इससे दो सेट ड्रेस, स्वेटर, बैग जूता और मोजा खरीदना है
प्रयागराज : कक्षा एक से आठ तक के छात्र-छात्राओं को मिलने वाले नि:शुल्क बैग आदि में अशासकीय सहायता प्राप्त विद्यालय रुकावट बने हैं। प्रदेश के 4166 स्कूलों ने अब तक एक भी बच्चे के अभिभावक के खाते का सत्यापन नहीं किया है। इनमें से 2191 से अधिक सहायता प्राप्त स्कूल हैं। इससे दो लाख बच्चे प्रभावित हो रहे हैं।
बेसिक शिक्षा निदेशक डॉ. सर्वेन्द्र विक्रम बहादुर सिंह ने 26 अक्तूबर को यह आंकड़े जारी करते हुए सभी मंडलीय सहायक बेसिक शिक्षा निदेशकों से सत्यापन का कार्य डीबीटी एप के माध्यम से तत्काल पूरा कराने का निर्देश दिया है। प्रदेश सरकार ने बच्चों को मिलने वाली दो सेट यूनिफॉर्म, स्वेटर, बैग, जूता और मोजा इस सत्र में अपनी ओर से देने की बजाय 1100 रुपये अभिभावकों के खाते में डीबीटी एप के माध्यम से भेजने का निर्णय लिया है, ताकि वे स्वयं खरीद सकें। हालांकि अभी यह तय नहीं है कि किस चीज के लिए क्या रेट तय किया गया है।
इसके लिए भारत सरकार के पब्लिक फाइनेंस मैनेजमेंट सिस्टम पोर्टल पर स्कूल की ओर से खाते और आधार नंबर की सूचनाएं अपलोड की जा रही हैं। सूचनाएं अपडेट होने के बाद अभिभावकों के खाते में सीधे रुपये भेजे जाएंगे। बीएसए प्रवीण कुमार तिवारी ने बताया कि शासन के निर्देश पर सुनिश्चित किया जा रहा है कि जिन खातों का सत्यापन हुआ है वे सक्रिय हैं।
1100 रुपये में कैसे खरीदेंगे दो सेट ड्रेस, स्वेटर, बैग, जूता-मोजा: अभिभावकों के खाते में रुपये जाने के बावजूद बच्चों के यूनिफॉर्म में स्कूल आने पर संशय है। सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि क्या अभिभावक 1100 रुपयों में गुणवत्तापूर्ण सामान बच्चों को दिला पाएंगे। स्कूलों से जब ये सामान मिलते थे या सरकार टेंडर करती थी तो काफी मात्रा होने के कारण सस्ते पड़ते थे। स्कूलों को प्रति जोड़ी यूनिफॉर्म के लिए 300 रुपये (दो सेट का 600 रुपये) और स्वेटर के लिए 200 मिलते थे। बैग और जूते की खरीद सरकार अपने स्तर से करती थी जो प्रति नग 100 और 135 रुपये के आसपास पड़ते थे। मोजे 21 रुपये में दो जोड़ी पड़ते थे। प्रति छात्र लगभग 1056 रुपये खर्च पड़ता था। अब सरकार ने प्रति छात्र के हिसाब से 1100 रुपये देने का निर्णय लिया है।
प्रयागराज के 91 स्कूल डिफॉल्टर
जिले के 91 स्कूल ऐसे हैं जिन्होंने एक भी छात्र की सूचना अपडेट नहीं की है। इनमें से 90 प्रतिशत से अधिक सहायता प्राप्त विद्यालय हैं। जवाहरलाल नेहरू इंटर कॉलेज भूपतपुर सहसों, मोतीलाल नेहरू इंटर कॉलेज बहादुरपुर, शिवाजी इंटर कॉलेज, बहादुरपुर आदि स्कूलों ने सूचनाएं अपडेट नहीं की है। अधिकांश परिषदीय प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक स्कूलों की सूचनाएं अपडेट हो चुकी हैं।
सात महीने बीते यूनिफॉर्म मिला न बैग
शैक्षणिक सत्र 2021-22 शुरू हुए सात महीने बीत चुके हैं, लेकिन अब तक बच्चों को नि:शुल्क यूनिफॉर्म, स्वेटर, स्कूल बैग एवं जूता-मोजा नहीं मिल सका है। पहले जून के अंत से ही बच्चों को ड्रेस बंटने लगती थी। इस बार नवंबर आने वाला है, लेकिन ड्रेस का कुछ पता नहीं। इसका नतीजा यह हो रहा है कि जो सक्षम बच्चे हैं वह तो अच्छे कपड़े बदलकर पहनते हैं। परंतु जो गरीब हैं वह एक ही कपड़े को रोज पहनकर आते हैं। इससे उनके अंदर कहीं न कहीं हीन भावना पैदा हो रही है या वह अपनी गरीबी को कोसते हैं। शिक्षकों की मानें तो बिना ड्रेस के बच्चे विद्यालय के लगते नहीं है।
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