प्रदेश के लाखों लोगों के शैक्षिक अभिलेख खतरे में हैं। इन अभिलेखों को संरक्षित करने के लिए शासन स्तर पर सहमति बनी थी लेकिन वित्त विभाग ने अड़ंगा लगा दिया है। इससे यूपी बोर्ड के हाईस्कूल व इंटरमीडिएट के अंकपत्रों व प्रमाणपत्रों तथा अन्य रिकार्ड का डिजिटाइजेशन अधर में पड़ गया है। माध्यमिक शिक्षा परिषद यानी यूपी बोर्ड 1923 से लगातार हाईस्कूल व इंटर की परीक्षाएं कराता आ रहा है। इनमें हर वर्ष लाखों की तादाद में परीक्षार्थी शामिल होते हैं। उनके शैक्षिक अभिलेखों का प्रयोग जन्म तारीख निर्धारण के साथ जीवन के विविध क्षेत्रों में होता है। परिषद मुख्यालय और क्षेत्रीय कार्यालयों में यह अनमोल रिकॉर्ड इस तरह रखे जाते हैं कि वह सालों-साल जिंदा रहें। जैसे-जैसे यहां के कर्मचारी सेवानिवृत्त हो रहे हैं, उसी गति से पुराने रिकॉर्ड तलाश पाने में कठिनाई आ रही थी और उन्हें सुरक्षित रखना भी दुरूह कार्य हो गया था। इस खतरे को देखते हुए हाईकोर्ट की तर्ज पर शैक्षिक रिकॉर्डो को संरक्षित करने के लिए अफसरों ने डिजिटाइजेशन कराने की कार्य योजना तैयार की। अब सवाल उठा कि इसके लिए धन कहां से आए। बोर्ड को मिलने वाला अधिकांश बजट हर साल परीक्षा कराने में खत्म हो जाता है। ऐसे में हाईस्कूल व इंटर की वर्षो पुराने परीक्षा एवं पंजीकरण शुल्क को बढ़ाने का प्रस्ताव भेजा गया। बढ़े पंजीकरण शुल्क में से 20 रुपये परिषद सचिव के खाते में जमा करने का निर्णय हुआ। शासन ने इसकी मंजूरी भी दे दी और चालू शैक्षिक सत्र में नया पंजीकरण एवं परीक्षा शुल्क लिया भी जा रहा है, लेकिन परिषद सचिव का अलग से खाता खोलने व उसमें धन जमा कराने पर वित्त विभाग से मंजूरी नहीं मिली है, जबकि प्रस्ताव में यह भी कहा गया था कि इस धन का हर साल अलग से उच्च स्तरीय ऑडिट कराया जाए, ताकि रुपये की हेरफेर न हो और वह सही दिशा में खर्च किया जाए। सचिव परिषद की ओर से इस संबंध में शासन में पैरवी करने के साथ ही कई पत्र भी भेजे गए लेकिन वित्त विभाग के अफसरों का तर्क है कि सरकारी विभाग में इस तरह के खाते खोलने की अनुमति नहीं दी जा सकती। इससे यह प्रकरण अधर में अटका है। परिषद सचिव शैल यादव ने बताया कि मंजूरी न मिलने के कारण अब तक प्रति छात्र-छात्र 20 रुपये शुल्क कालेज प्रधानाचार्यो के पास है। अनुमति मिलने पर ही आगे बढ़ेंगे। उल्लेखनीय है कि यूपी बोर्ड के वर्षो पुराने रिकॉर्ड पर खतरा दो तरफ से है। जहां वे सड़-गल कर नष्ट हो रहे हैं, वहीं अभिलेखों में हेराफेरी करके उनके बदले जाने का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।
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