परिषदीय स्कूलों की दशा किसी से छुपी नहीं है। मिड-डे-मील, निश्शुल्क ड्रेस जैसी तमाम सौगात देने के बावजूद सरकार गरीब बच्चों के चेहरे पर मुस्कान नहीं दे पा रही है। स्थिति यह है कि अभिभावक व बच्चे दोनों ङोप जाते हैं परिषदीय स्कूलों का नाम लेने पर। इस मिथक को तोड़ा है परिषदीय विद्यालय की शिक्षिका प्रियंका चौधरी ने। घनी झाड़िया, परिसर में गंदगी व जलजमाव, बदरंग दीवारों जैसी आकृति वाले प्राथमिक विद्यालय का हुलिया उन्होंने बदल कर रख दिया है। प्रतिमाह अपने वेतन से एक निश्चित रकम वह विद्यालय पर खर्च करती है। खुद के रुपयों से प्रियंका ने विद्यालय की बाउंड्री ऊंची करायी। बच्चे कांवेंट की भांति ड्रेस व टाई पहनते हैं। खुद व बच्चों के श्रम से विद्यालय इतना स्वच्छ हो गया है कि यह अन्य परिषदीय विद्यालयों के लिए एक नजीर है। यहां विद्यालय का व बच्चों का सिर्फ चोला ही नहीं बदला है बल्कि वह शिक्षा के साथ स्वच्छता का सबक ले रहे हैं। उस्का विकास क्षेत्र के प्राथमिक विद्यालय जगमोहनी की प्रधानाध्यापिका प्रियंका चौधरी ने ठान लिया तो विद्यालय कांवेंट की राह पर चल पड़ा। सितंबर 2013 में जब इस विद्यालय पर पहली बार तैनाती हुई तो महज 86 बच्चे नामांकित थे धीरे धीरे उन्होंने अपने सहयोगी शिक्षकों के साथ मेहनत करना शुरू किया और वर्तमान में नामांकन 142 हो गया। इसमें अहम है कि एक तिहाई बच्चे अल्पसंख्यक हैं। विद्यालय का पूरा परिवेश कांवेंट की तरह है। बच्चों व प्रांगण की सुरक्षा के लिए अपने खर्च पर चहारदीवारी को ऊंचा करा डाली। पढ़ाई के साथ यहां स्वच्छता का पाठ भी बखूबी पढ़ाया जाता है। खाने से पूर्व बच्चों का हाथ धुलना हुआ या खुले में शौच से मुक्ति का पाठ, सब कुछ बच्चे अंगीकार करते हैं। तभी तो जनपद स्तर पर स्वच्छता पुरस्कार के लिए चयनित विद्यालयों में यह विद्यालय प्रथम स्थान पर है। प्रियंका चौधरी कहती हैं कि विद्यालय के अन्य स्टाफ के सहयोग से ही विद्यालय इस मुकाम पर पहुंचा है। मुङो ग्राम प्रधान सहित स्थानीय समुदाय से काफी सहयोग मिला है।बच्चों की शिक्षा से न सिर्फ उनके जीवन में उजियारा आया है, बल्कि ग्रामीण भी सबक ले रहे हैं। वह खुले में शौच से कतराते हैं। प्रियंका कहती है कि शहर के बच्चों के लिए तमाम विद्यालय है, मगर ग्रामीण स्कूलों के बच्चों के लिए यह परिषदीय विद्यालय ही सब कुछ है। असली भारत गांवों में बसता है। ऐसे में हर शिक्षक अपने दायित्वों के प्रति गंभीर हो जाए तो गांवों से हीरे की खान निकलेगी। बीएसए अर¨वद कुमार पाठक ने बताया कि निश्चय ही प्रियंका की मेहनत अन्य शिक्षकों के लिए प्ररेणा स्नोत है
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