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Tuesday, October 13, 2026

प्रदेश में शिक्षकों के वेतन से ईपीएफ कटौती नहीं कर रहे निजी स्कूल, अपना अंशदान बचाने के लिए खेल कर रहे स्कूल संचालक

प्रदेश में शिक्षकों के वेतन से ईपीएफ कटौती नहीं कर रहे निजी स्कूल, अपना अंशदान बचाने के लिए खेल कर रहे स्कूल संचालक

कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के क्षेत्रीय कार्यालय ने यूपी बोर्ड के 2847 व 505 महाविद्यालयों को भेजा पत्र

लखनऊ: निजी स्कूल संचालक बच्चों का भविष्य बनाने वाले शिक्षकों का वर्तमान सुधार रहे न भविष्य। मानदेय कम होने के बाद भी शिक्षकों को भविष्य निधि के माध्यम से आर्थिक सुरक्षा दी जाती है, लेकिन स्कूल संचालक शिक्षकों के पीएफ की कटौती ही नहीं कर रहे ताकि संचालकों को नियोक्ता का अंशदान न देना पड़े। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के क्षेत्रीय कार्यालय ने यूपी बोर्ड के 2847 व 505 महाविद्यालयों को पत्र भेजकर पीएफ पंजीकरण कराने का अनुरोध किया है। स्कूल संचालक श्रम सुविधा पोर्टल पर पंजीकरण कर सकते हैं।


कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) लखनऊ क्षेत्र में सीतापुर, लखनऊ, बाराबंकी, हरदोई, रायबरेली व लखीमपुर खीरी जिले आते हैं लेकिन यही हाल पूरे प्रदेश में है। छह जिलों में माध्यमिक शिक्षा परिषद (यूपी बोर्ड ) से मान्यता प्राप्त हाईस्कूल व इंटरमीडिएट स्तर के 2847 विद्यालय और 600 से अधिक महाविद्यालय चल रहे हैं. इनमें से अधिकांश प्रधानाचार्य से अनुचर तक के पीएफ अंशदान की कटौती नहीं करते। कुछ तो सिर्फ कागज पर कर रहे हैं।

क्या है नियम
स्कूल या संस्थान जहां भी 20 या उससे अधिक कर्मचारी किसी भी रूप में कार्यरत है उनके वेतन से पेंशन कटौती अनिवार्य है। कर्मचारी संख्या 20 से कम होने पर स्वेच्छा से कटौती कर सकते हैं। केंद्र ने पिछले महीने ही वेतन सीमा 15 से 25 हजार प्रतिमाह कर दी है।

नियोक्ता अंशदान बचाने का खेल : वेतन या मानदेय की धनराशि पर 12 प्रतिशत कर्मचारी और इतनी ही धनराशि नियोक्ता को जमा करनी पड़ती है। अधिकांश नियोक्ता अपना अंशदान बचाने के लिए कटौती ही नहीं कर रहे हैं। ईपीएफओ के क्षेत्रीय भविष्य निधि आयुक्त द्वितीय आशीष कुमार ने बताया, सभी स्कूल प्रबंधकों व प्रधानाचार्यों से शिक्षक व अन्य स्टाफ की पीएफ कटौती का अनुरोध किया है।

लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलसचिव ने सभी महाविद्यालयों  को पत्र भेजा है। ईपीएफओ के क्षेत्रीय भविष्य निधि आयुक्त प्रथम अश्विनी कुमार गुप्ता ने बताया, 2009 से अब तक संचालित ऐसे संस्थान जिन्होंने 20 कर्मचारी होने पर भी पीएफ जमा नहीं किया वह 31 अक्टूबर तक नियोक्ता का अंशदान जमा कर ईपीएफओ कोड पा सकते हैं। 31 के बाद निरीक्षण करके अंशदान जमा न करने वालों पर जुर्माना लगेगा। 


Saturday, October 3, 2026

निजी विद्यालय के शिक्षक की बर्खास्तगी के खिलाफ रिट याचिका पोषणीय नहीं: हाईकोर्ट

निजी विद्यालय के शिक्षक की बर्खास्तगी के खिलाफ रिट याचिका पोषणीय नहीं: हाईकोर्ट

हाईकोर्ट ने कहा-निजी संस्था के खिलाफ सार्वजनिक प्रकृति के कर्तव्य का पालन कराने के लिए ही जारी की जा सकती है रिट


प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि निजी ट्रस्ट की ओर से संचालित गैर-सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थान के कर्मचारियों की सेवाओं से जुड़े मामलों के लिए अनुच्छेद-226 के तहत रिट याचिका पोषणीय नहीं है। क्योंकि, यह मूलतः नियोक्ता और कर्मचारी के बीच संविदात्मक प्रकृति का निजी विवाद होता है।


इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकल पीठ ने आजमगढ़ निवासी शिक्षिका नूतन राय की बर्खास्तगी को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी निजी संस्था के खिलाफ रिट जारी की जा सकती है। यदि उससे सार्वजनिक प्रकृति के कर्तव्य का पालन कराया जाना हो। लेकिन सेवा अनुबंध से उपजा विवाद पूरी तरह से निजी विवाद होने के कारण रिट अधिकार क्षेत्र से बाहर है।

मामले में याची ने निजी शिक्षण संस्थान से अपनी सेवा समाप्त किए जाने को चुनौती दी थी। प्रतिवादियों ने प्रारंभिक आपत्ति उठाते हुए कहा कि संस्थान एक निजी ट्रस्ट है। संस्थान को सरकार से कोई सहायता या अनुदान नहीं मिलता।

याची ने अंडी मुक्ता सद्‌गुरु श्री मुक्ताजी वंदास स्वामी सुवर्ण जयंती महोत्सव स्मारक ट्रस्ट मामले का हवाला दिया। कहा कि सार्वजनिक कर्तव्य निभाने वाली निजी संस्था के खिलाफ रिट याचिका दायर की जा सकती है। वहीं, संस्थान ने सेंट मैरी एजुकेशन सोसाइटी, आर्मी वेलफेयर एजुकेशन सोसाइटी और दिलीप कुमार पांडे के मामलों का हवाला दिया। कहा कि जब सेवा शर्तें किसी वैधानिक प्रावधान से नियंत्रित न हों तो कर्मचारी को रिट के असाधारण अधिकार क्षेत्र का सहारा नहीं मिल सकता।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शिक्षा भले ही सार्वजनिक महत्व का विषय हो, लेकिन इससे निजी शिक्षण संस्थान में नियोक्ता-कर्मचारी संबंध का प्रत्येक पहलू सार्वजनिक कानून के दायरे में नहीं आ जाता। यदि सेवा शर्तों को नियंत्रित करने वाला कोई वैधानिक ढांचा नहीं है तो संबंध अनुबंध पर आधारित रहेगा।

Thursday, August 13, 2026

शिक्षकों को कम वेतन देने में फंसे निजी स्कूल, शिक्षा के व्यवसायीकरण संबंधी जांच समिति ने उठाए सवाल, फीस से हुई आमदनी का 75 फीसदी वेतन में नहीं कर रहे भुगतान

शिक्षकों को कम वेतन देने में फंसे निजी स्कूल, शिक्षा के व्यवसायीकरण संबंधी जांच समिति ने उठाए सवाल, फीस से हुई आमदनी का 75 फीसदी वेतन में नहीं कर रहे भुगतान

प्रयागराज, लखनऊ, आगरा, अलीगढ़, गोरखपुर की मांगी रिपोर्ट


प्रयागराज। शिक्षकों को कम वेतन देने में दर्जनों निजी स्कूल फंस गए हैं। विधान परिषद की शिक्षा का व्यवसायीकरण संबंधी जांच समिति ने इस पर सवाल उठाया है। प्रयागराज की रिपोर्ट में गड़बड़ी मिलने पर प्रयागराज समेत लखनऊ, आगरा, अलीगढ़ और गोरखपुर के निजी स्कूलों की भी जांच कराने के आदेश दिए गए हैं। नियम है कि प्राइवेट स्कूलों को फीस से हुई आय की 75 प्रतिशत धनराशि शिक्षकों के वेतन मद में व्यय करनी चाहिए, लेकिन 2024 में प्रस्तुत शहर की रिपोर्ट में कई स्कूल इस मानक पर खरे नहीं उतरे हैं।


जिले के 35 स्कूलों से आमदनी और शिक्षकों के वेतन मद में भुगतान के संबंध में रिपोर्ट मांगी गई है। समिति का मानना है कि इस तरह की गड़बड़ी कई अन्य जनपदों में भी होने की संभावना है। समिति ने वर्ष 2021 से 2024 तक तीन वित्तीय वर्षों की रिपोर्ट भी मांगी है। इसमें कई स्कूल ऐसे हैं जिन्होंने अपनी आमदनी का आधा भी खर्च नहीं किया है।

समिति ने प्रमुख सचिव से यह अपेक्षा की है कि अपनी आख्या एक महीने के अंदर प्रस्तुत करें। जांच के आदेश मिलने पर बीएसए ने शहर के 35 निजी स्कूलों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।

Sunday, August 31, 2025

किताबों के लिए खुले बाजार के भरोसे हैं बेसिक शिक्षा परिषद से मान्यता प्राप्त प्राइवेट स्कूलों के छात्र

किताबों के लिए खुले बाजार के भरोसे हैं बेसिक शिक्षा परिषद से मान्यता प्राप्त प्राइवेट स्कूलों के छात्र


लखनऊ: बेसिक शिक्षा परिषद के सरकारी स्कूलों में बच्चों को मुफ्त किताबें मिलती है, उसी परिषद को अपने 74 हजार से ज्यादा प्राइवेट स्कूलों की कोई फिक्र नहीं है। उनके लिए बाजार में भी परिषद की अधिकृत किताबें उपलब्ध नहीं है। परिषद अभी तक अपने अधिकृत प्रकाशकों को कवर छपवाकर नहीं दे सका है। प्राइवेट स्कूलों के बच्चों को खुले बाजार के भरोसे छोड़ दिया है। वे निजी प्रकाशकों की मनमाने दामों पर बिक रही किताबें खरीदने को मजबूर हैं।


इन छात्रों के लिए मुफ्त किताबे :
बेसिक शिक्षा परिषद के 1.32 लाख अपने सरकारी स्कूल है। वहीं 2,965 एडेड स्कूल है। इसके अलावा 746 कस्तूरबा गांधी विद्यालय है। इन सबमें पढ़ने वाले बच्चों को तो बेसिक शिक्षा विभाग मुफ्त किताबें छपवाकर देता है। इसके लिए विभाग ही टेंडर करता है और तय पाठ्य सामग्री होती है। कक्षा एक से तीन तक NCERT पाठ्यक्रम लागू है। विभाग NCERT की अनुमति से अपने अधिकृत प्रकाशकों से किताबें छपवाता है और बच्चों को मुफ्त दी जाती है। 


किताबे भी अलग-अलग बेसिक
शिक्षा परिषद प्राइवेट स्कूलों को भी मान्यता देता है। ऐसे स्कूलों की संख्या 74,471 है। ये भी उसी परिषद से मान्यता प्राप्त है। इनके लिए बाजार में अलग-अलग प्रकाशकों की किताबें मौजूद है। सबके दाम भी अलग-अलग है। इतना ही नहीं किताबें भी वे अलग-अलग तरह की छाप रहे हैं। किसी प्रकाशक की किताब में काफी कम पेज और पाठ है और किसी में ज्यादा। प्राइवेट स्कूलों के छात्र इन किताबों को ही खरीदने के लिए मजबूर है।

'समान वोर्ड तो किताबें भी समान हो'
 लखनऊ के ही एक स्कूल के प्रबंधक रामानंद सैनी कहते हैं कि बाजार में जो किताबें मिल रही है, वही बच्चे खरीद रहे है। हाल ही में विधान परिषद में भी यह मुद्दा उठाने वाले डॉ. मान सिंह कहते हैं कि सरकार ने बच्चों को बाजार के भरोसे छोड़ दिया है। शिक्षा की कोई चिंता ही नहीं है। वहीं प्राथमिक शिक्षक प्रशिक्षित स्नातक असोसिएशन के अध्यक्ष विनय कुमार सिंह कहते हैं कि एक बोर्ड और एक कोर्स है तो किताबें एक जैसी ही होनी चाहिए।


क्या है प्रक्रिया
नियम है कि प्राइवेट स्कूलों के लिए भी सरकारी की तरह समान किताबें बाजार में आएंगी। सरकारी किताबें छापने का जो टेंडर प्रकाशकों को दिया गया है, वे ही बाजार में भी किताबें बेचेंगे। उन प्रकाशकों को विभाग सरकारी प्रिंटिंग प्रेस से कवर पेज छपवाकर देगा। अप्रैल से सत्र चल रहा है लेकिन ये कवर पेज छपवाकर अभी उन प्रकाशकों को दिया ही नहीं गया है। इसका फायदा उठाकर निजी प्रकाशकों ने पहले ही अपनी किताबें बाजार में उतार दीं। बच्चों की भी मजबूरी है कि पढ़ाई करनी है तो वे किताबें खरीदें।


सरकारी किताबे जो प्रकाशक छापते है, उनको कवर पेज छपवाकर दिया जाता है। प्रक्रिया चल रही है। उनको यह कवर पेज छपवाकर दिया जाएगा। - माधव जी तिवारी, पाठ्य पुस्तक अधिकारी



तो ये पूरा खेल मुनाफे का है
यहां पूरा खेल मुनाफे का है। सरकारी किताबे बाजार में जाएंगी तो उनके रेट भी तय होंगे। उसमें उन प्रकाशकों को बहुत मुनाफा नहीं होगा। इसलिए सरकारी किताबे छापने वाले प्रकाशक भी रुचि नहीं लेते कि वे उस रेट पर किताबे बेचे। जो प्रकाशक बाजार में किताबे बेच रहे है, वे मनमाना मुनाफा लेकर अपने हिसाब से दाम तय कर रहे है। सूत्रों के अनुसार अंदर की बात तो ये है कि ये प्रकाशक स्कूलों को भी कमिशन देते है। ऐसे में मुनाफा उनका है। विभाग की लेटलतीफी और सुस्ती भी आशंका पैदा करती है। इस तरह प्राइवेट प्रकाशको के इस खेल में सबका मुनाफा है।

Monday, April 14, 2025

स्कूलों में मनमानी फीस पर लगेगा ब्रेक, पूरे देश के लिए मॉडल ड्राफ्ट होगा तैयार; जानिए क्या है केंद्र सरकार का प्लान?

स्कूलों में मनमानी फीस पर लगेगा ब्रेक, पूरे देश के लिए मॉडल ड्राफ्ट होगा तैयार; जानिए क्या है केंद्र सरकार का प्लान?


मंत्रालय से जुड़े सूत्रों के मुताबिक स्कूलों में फीस के निर्धारण और इसमें वृद्धि के एक स्टैंडर्ड मानक को तैयार करने की दिशा में कदम बढ़ाया गया है। इसे लेकर नीति की सिफारिशों सहित उत्तर प्रदेश सहित देश भर में स्कूली फीस को नियंत्रित करने से जुड़े कानूनों का भी अध्ययन किया गया है। केंद्र सरकार अब एक पारदर्शी और जवाबदेह व्यवस्था खड़ी करना चाहती है।


🔴 मनमाने ढंग से फीस बढ़ाने पर लगेगी लगाम
🔴 मॉडल ड्राफ्ट तैयार करने की कोशिश में जुटी सरकार
🔴 उत्तर प्रदेश में फीस को लेकर पहले से है सख्त कानून


नई दिल्ली। शिक्षा वैसे तो राज्य का विषय है, लेकिन नए शैक्षणिक सत्र के शुरू होने के साथ दिल्ली सहित देश के अधिकांश राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में स्कूलों की मनमानी फीस वृद्धि को लेकर जिस तरह से हर साल निजी स्कूल प्रबंधन और अभिभावकों के बीच टकराव की स्थिति निर्मित हो रही है, उस पर अंकुश लगाने के लिए केंद्र सरकार अब एक पारदर्शी और जवाबदेह व्यवस्था खड़ी करना चाहती है।

इसे लेकर वह एक मॉडल ड्राफ्ट तैयार करने की कोशिश में जुटी है, जिसे सभी राज्य अपने यहां स्कूलों की मनमानी फीस वृद्धि पर रोकथाम के लिए अमल में ला सकेंगे। मौजूदा समय में उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ के पास ही मनमानी फीस पर रोकथाम के लिए कानून है। इनमें सबसे सख्त कानून उत्तर प्रदेश में है, जिसे 2018 में लाया गया था।


नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत प्रयास
शिक्षा मंत्रालय ने यह पहल नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति ( एनईपी) की सिफारिशों का लागू करने के क्रम में शुरू की है। जिसमें साफ कहा गया है कि स्कूलों का लक्ष्य गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना है। नीति ने अभिभावकों के आर्थिक शोषण व शिक्षा के बढ़ते व्यवसायीकरण पर अंकुश न लगा पाने के लिए मौजूदा नियामक व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए है।

इस बीच मनमानी फीस वृद्धि पर अंकुश लगाने के लिए जो ड्राफ्ट का स्वरूप सामने आया है, उसमें सभी स्कूल अब एक ही मानक के आधार पर न फीस वसूल सकेंगे न ही फीस में वृद्धि कर सकेंगे।


शैक्षणिक प्रदर्शन से तय होगी रैंकिंग
बल्कि स्कूलों को स्टैंडर्ड के हिसाब से इस निर्धारित करने का अधिकार मिलेगा। इसके लिए सबसे पहले सभी राज्यों को अपने स्कूलों की एक रैंकिंग तैयार करने होगी। यह रैंकिंग उनके इंफ्रास्ट्राक्चर, शिक्षकों स्तर व स्कूल के शैक्षणिक प्रदर्शन से तय की जाएगी। इसके लिए प्रत्येक राज्य व केंद्र शासित प्रदेश में एक राज्य विद्यालय मानक प्राधिकरण ( ट्रिपलएसए) नामक एक स्वतंत्र निकाय स्थापित करना होगा।


साथ ही फीस का निर्धारण और वृद्धि को जिला शुल्क नियामक समिति की मंजूरी के बगैर लागू नहीं किया जा सकेगा। इस समिति में जिला अधिकारी, जिला शिक्षा अधिकारी के साथ अभिभावक संघ व स्कूल संघ के भी प्रतिनिधि शामिल होंगे।


इन मुद्दों पर हो रहा काम

फीस के अतिरिक्त और किसी भी तरह फीस स्कूल नहीं ले सकेंगे।
स्कूलों की अपनी फीस, ड्रेस, किताबों आदि से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक करनी होगी। और इसकी जानकारी हर साल सत्र शुरू होने से पहले जिला शुल्क नियामक समिति को देनी भी होगी।

स्कूल एक मुश्क साल भर की फीस नहीं ले सकेंगे। उन्हें अभिभावकों को छह, तीन और एक माह का विकल्प देना होगा।

फीस से जुड़े किसी भी विषय को अभिभावक समिति के समझ चुनौती दे सकेगा। जिस पर समिति को पंद्रह दिन के भीतर फैसला लेना होगा। समिति सिविल कोर्ट की तरह सुनवाई करेगी।

समिति का निर्णय सभी को मानना होगा। साथ ही इसे महीने भर के अंदर मंडल फीस नियामक समिति के सामने चुनौती भी दी जा सकती है। यदि उसके फैसले से भी सहमत नहीं तो राज्य फीस नियामक समिति के सामने इसे चुनौती दी जा सकती है।

इन नियमों के तहत फैसले को न मानने पर स्कूलों के खिलाफ कार्रवाई भी की जा सकती है। इनमें जुर्माना और सजा दोनों है। जुर्माना भी पहले बार एक लाख होगा। यदि दूसरी बार भी गलती की तो पांच लाख होगा।

Sunday, March 23, 2025

RTE : बच्चों का सीट एलॉटमेंट ऑनलाइन देखने का विकल्प नहीं, अभिभावकों को मेसेज से मिलती है प्रवेश की सूचना, भटक रहे अभिभावक

RTE : बच्चों का सीट एलॉटमेंट ऑनलाइन देखने का विकल्प नहीं, अभिभावकों को मेसेज से मिलती है प्रवेश की सूचना,  भटक रहे अभिभावक


23 मार्च 2025
लखनऊ। प्रदेश में निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा अधिकार अधिनियम (आरटीई) के तहत चल रही प्रवेश प्रक्रिया में सीट अलॉटमेंट की जानकारी ऑनलाइन उपलब्ध नहीं है। अभिभावकों के मोबाइल फोन पर सीट अलॉटमेंट की जानकारी दी जाती है। कई अभिभावक सूचना न मिलने से परेशान हैं।

आरटीई के तहत प्रदेश के लिए चार चरणों में आवेदन प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। तीन चरणों का सीट अलॉटमेंट कर प्रवेश दिलाया जा रहा है। इसके बावजूद कई अभिभावक भटक रहे हैं, क्योंकि बच्चे को सीट अलॉट हो गई लेकिन अभिभावक को इसकी जानकारी नहीं हुई।

अभिभावकों ने बताया कि आवेदन करते समय साइबर कैफे वाले अपना फोन नंबर डाल देते हैं। इससे मेसेज उनको नहीं मिल पाता है। वहीं, कोई और ऐसा माध्यम नहीं है, जिससे सीट अलॉटमेंट की जानकारी मिल सके। इसके लिए अभिभावक बीएसए कार्यालय का चक्कर काटते रहते हैं। बीएसए दफ्तर के कर्मचारी भी यह कहकर टरका देते हैं कि सीट अलॉटमेंट की जानकारी ऑनलाइन देखने का अधिकार सिर्फ बीएसए को है। जब वह आएंगे तो सीट अलॉटमेंट के बारे में पता चलेगा। इसलिए अभिभावक सीट अलॉटमेंट की जानकारी ऑनलाइन करने की मांग कर रहे हैं।

वहीं, समग्र शिक्षा के उप निदेशक डॉ. मुकेश कुमार सिंह ने कहा कि बड़ी संख्या होने के कारण सीट अलॉटमेंट की सूचना ऑनलाइन नहीं की जाती है। संबंधित अभिभावक या बच्चे अपना परिणाम ही देख सकते हैं। अभिभावकों को मोबाइल फोन पर सीधे मेसेज जाता है। जिला स्तर पर डाटा देखने का अधिकार बीएसए व राज्य स्तर पर हमारे पास है। अगर संबंधित बच्चे को अपनी दूसरी प्राथमिकता पर प्रवेश लेना है तो बीएसए कार्यालय में संपर्क कर आवेदन कर सकते हैं। आरटीई के तहत अधिकाधिक बच्चों के दाखिले के लिए अभियान चलाया जा रहा है। 




RTE : प्रवेश दिए बगैर ही कागज पर दिखाए दाखिले, निजी स्कूलों में बच्चों का दाखिला कराने के लिए भटक रहे अभिभावक

स्कूल प्रवेश लेने से कर रहा मना, आईजीआरएस पर की गई शिकायत

21 मार्च 2025
लखनऊ। प्रदेश में निशुल्क व अनिवार्य शिक्षा अधिनियम (आरटीई) के तहत दाखिले के लिए चार चरणों के आवेदन हो चुके हैं। यह कवायद की जा रही है कि एक अप्रैल से शुरू होने वाले सत्र से पहले सीट पाने वाले बच्चों का प्रवेश सुनिश्चित कराया जाए। किंतु जिलों में इसे लेकर लापरवाही दिख रही है।


दरअसल, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के कुछ बच्चों को प्रवेश नहीं मिला। जब इसकी शिकायत एकीकृत शिकायत निवारण प्रणाली (आईजीआरएस) पर की गई तो उनका प्रवेश दिखा दिया गया।


निदेशालय का चक्कर काट रहे अभिभावक ने बताया कि एक निजी स्कूल में प्रवेश के लिए बच्चे का आवेदन किया था लेकिन स्कूल दाखिला लेने से मना कर रहा है। जब इसकी शिकायत आईजीआरएस की तो बच्चे का प्रवेश हुआ दिखा दिया। उन्होंने दोबारा शिकायत की और अधिकारियों से मिलकर बच्चे को प्रवेश दिलाने की मांग कर रहे हैं। ऐसे कई मामले सामने आ रहे हैं।


आरटीई में निजी कॉलेजों द्वारा सीट अलॉट होने के बाद भी प्रवेश न लेने की भी शिकायत विभाग को मिल रही है। पर, विभाग व जिला स्तरीय अधिकारी कोई सख्ती नहीं कर पा रहे हैं। इससे निजी स्कूलों की मनमानी चल रही है। तीन चरणों की पूरी प्रक्रिया होने के बावजूद यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि अब तक कितने बच्चों के दाखिले सुनिश्चित हुए हैं।


बीएसए बताएंगे प्रवेश न मिलने के कारण

समग्र शिक्षा के उप निदेशक डॉ. मुकेश कुमार सिंह ने बताया कि आरटीई में ज्यादा से ज्यादा दाखिले के लिए डीएम व बीएसए के स्तर से प्रयास किए जा रहे हैं। जहां यह सूचना जानकारी मिलती है कि कोई स्कूल प्रवेश नहीं ले रहा है तो वहां स्थानीय अधिकारी वार्ता कर रहे हैं। इस बार यह व्यवस्था की गई है कि अगर सीट अलॉटमेंट के बाद भी बच्चे का प्रवेश नहीं हो रहा है तो संबंधित बीएसए को इसका कारण बताना होगा।