यूपी बोर्ड की परीक्षाओं में नकल से परेशान सरकार 'अक्ल से नकल' की आजादी देने पर विचार कर रही है। माध्यमिक शिक्षा विभाग को ओपन बुक एग्जाम की संभावनाओं पर काम करने को कहा गया है। उच्च स्तरीय बैठक में हुई चर्चा में विशेषज्ञों से कहा गया है कि वह देखें की यूपी में यह प्रणाली कितनी कारगर और व्यवहारिक हो सकती है।
यूपी बोर्ड की परीक्षाएं तमाम दावों के बाद नकल का शिकार होती हैं। रिजल्ट भले ही बेहतर बन जाए लेकिन अंतत: इसको स्किल में बदलना संभव नहीं होता है। इंजीनियरिंग- मेडिकल की प्रतियोगी परीक्षाओं में यूपी बोर्ड की सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकंडरी एजुकेशन ने आंशिक तौर पर 9वीं और 11वीं क्लास में ओपन टेक्सट बुक असेसमेंट (ओटीबीए) लागू किया है। हालांकि हर विषय में इसकी भागीदारी केवल 10 नंबर तक ही सीमित है। इसमें सीबीएसई स्टूडेंट्स को सब्जेक्ट की थीम पहले उपलब्ध करा देती है। परीक्षा के दौरान पेपर में सब्जेक्ट मटिरियल उपलब्ध होता है जिससे जुड़े सवाल पूछे जाते हैं। दो साल पहले लॉन्च हुए ओटीबीए को सीबीएसई अभी तक व्यापक तौर पर लागू नहीं कर सकी है।
ऐसे में गुणवत्ता सीधे तौर पर सवालों में होती है। पिछले सप्ताह सीएम अखिलेश यादव की अध्यक्षता में हुई उच्च स्तरीय बैठक में ओपन बुक एग्जाम की कवायद पर भी विचार हुआ। इसके अंतर्गत परीक्षा में आने वाला सब्जेक्ट मटेरियल पहले से परीक्षार्थी को उपलब्ध करा दिया जाता है और उसमें से ही सवाल पूछे जाते हैं। हालांकि यह सिस्टम कॉपी-पेस्ट पर आधारित नहीं होता। सब्जेक्ट मटेरियल का पढ़ना और पेचीदा सवालों का जवाब तलाशने के लिए काफी अक्ल लगानी पड़ता है।
यूपी में फेल हो चुका है यह प्रयोग
क्वींस इंटर कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ़ आरपी मिश्र बताते हैं कि वर्ष 1989-90 में नारायण दत्त तिवारी सरकार ने सह पुस्तक परीक्षा प्रणाली लागू की थी। एक साल ही यह कवायद चली लेकिन शिक्षक संगठनों ने इसका कड़ा विरोध किया। छात्रों ने पढ़ाई ही बंद कर दी कि परीक्षा में किताब मिलनी ही है। इसके बाद सरकार ने यह व्यवस्था वापस ले ली और यह प्रयोग लाने वाले प्रमुख सचिव शिक्षा जगदीश चंद पंत को विभाग से हटा दिया गया।
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