इलाहाबाद : सामाजिक चेतना के केंद्र व साधन के रूप में विद्यालय व पाठ्य पुस्तकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसे में हमारी पाठ्य पुस्तकें इतनी आनंददायी खुशनुमा व मजेदार हों कि बच्चे अनिच्छा से नहीं बल्कि मन से पढ़ना चाहें। वह अपनी कल्पना की उड़ान भर सकें। यह बातें लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति प्रोफेसर रूपरेखा वर्मा ने राज्य शिक्षा संस्थान उप्र इलाहाबाद में कही।
संस्थान में इन दिनों पाठ्य पुस्तक समीक्षा के साथ ही विकास कार्यशाला भी चल रही है।1पूर्व कुलपति ने कहा कि पुस्तकों के माध्यम से बच्चों में प्रश्न पूछने, खोज करने, तर्क व कल्पना करने की क्षमता विकास पर ध्यान देना चाहिए। पाठ्य पुस्तकों की विषय वस्तु में लैंगिक समानता, मानवीय संवेदना, मूल्य चेतना आदि से संबंधित भावों को और अधिक स्पष्टता के साथ झलकना चाहिए।
संस्थान के प्राचार्य दिव्यकांत शुक्ल ने कहा कि यह सुझाव पुस्तक विकास कार्यशाला में अत्यंत सार्थक व उपयोगी हैं और इन बातों का समावेश करके हम अपनी पाठ्य पुस्तकों को अधिक समसामयिक बनाने का प्रयास करेंगे। कार्यशाला का संचालन नीलम मिश्र ने किया।
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