पांच IIT टॉप 100 यूनिवर्सिटी में बरकरार, क्यूएस एशिया रैंकिंग में सभी प्रतिष्ठित संस्थानों की रैंकिंग में पिछले साल की तुलना में गिरावट दर्ज
दिल्ली विश्वविद्यालय टाप 100 से बाहर, 95 से खिसककर 106वें स्थान पर आ गया
नई दिल्ली । नवीनतम क्यूएस एशिया रैंकिंग में भारत के लिए गर्व और आत्ममंथन दोनों करने जैसी स्थिति सामने आई है। एक ओर जहां इंडियन इंस्टीट्यूट आफ साइंस (आइआइएससी), बेंगलुरु और पांच प्रमुख भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आइआइटी) ने एशिया के शीर्ष 100 विश्वविद्यालयों में अपनी जगह बरकरार रखी है, वहीं दूसरी ओर प्रतियोगिता के इस दौर में इन सभी प्रतिष्ठित संस्थानों की रैंकिंग में पिछले साल की तुलना में गिरावट दर्ज की गई है।
लंदन स्थित क्वाक्वेरली साइमंड्स (क्यूएस) द्वारा मंगलवार को जारी रैंकिंग के अनुसार, आइआइटी दिल्ली पिछले साल 59वें स्थान से फिसलकर इस बार 66वें नंबर पर आ गया है। इसके अलावा आइआइएससी बेंगलुरु (64 से 79), आइआइटी बांबे (71 से 83), आइआइटी मद्रास (70 से 85), आइआइटी खड़गपुर (77 से 90), और आइआइटी कानपुर (77 से 97) तक सभी शीर्ष संस्थानों को पायदानों का नुकसान उठाना पड़ा है। यहां तक कि दिल्ली विश्वविद्यालय भी शीर्ष 100 से बाहर होकर 106वें स्थान पर पहुंच गया है। यह गिरावट न केवल शिक्षाविदों बल्कि देश के उज्ज्वल भविष्य के लिए चिंतित हर भारतीय को सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर एशियाई स्तर पर बढ़ती प्रतिस्पर्धा में हमारे संस्थान क्यों पिछड़ रहे हैं।
इस निराशाजनक तस्वीर के बीच एक बेहद सुखद और गौरवान्वित करने वाला पहलू यह भी है कि उच्च शिक्षा प्रणाली के मामले में भारत, चीन के बाद एशिया में दूसरा सबसे अधिक प्रतिनिधित्व करने वाला देश बना हुआ है, जिसमें 325 रैंक वाले विश्वविद्यालय शामिल हैं। क्यूएस के वरिष्ठ उपाध्यक्ष बेन सोव्टर ने सराहना करते हुए कहा कि भारत ने अनुसंधान क्षमता के मामले में उल्लेखनीय प्रगति की है। 'प्रति संकाय शोध पत्र' के मामले में भारत के संस्थान एशिया में शीर्ष 10 में सबसे आगे हैं, और 15 भारतीय विश्वविद्यालयों में पीएचडी धारक कर्मचारियों की संख्या साझा रूप से पहले स्थान पर है।
इसके साथ ही, नियोक्ता प्रतिष्ठा के मामले में आइआइटी बांबे और आइआइटी दिल्ली ने एशिया के शीर्ष 10 में क्रमशः सातवां और दसवां स्थान हासिल कर एक नया मील का पत्थर छुआ है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इस मजबूत अकादमिक और शोध नींव को अब अधिक निरंतरता के साथ वैश्विक प्रभाव और अंतरराष्ट्रीय पहचान में बदलने की आवश्यकता है। यदि हम अनुसंधान की गुणवत्ता, वैश्विक साझेदारियों और अंतरराष्ट्रीय दृश्यता में निरंतर निवेश बढ़ाएं, तो हमारे संस्थान वैश्विक पटल पर और अधिक गौरवशाली स्थान प्राप्त कर सकते हैं।
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