पंकज द्विवेदी व डॉ.विवेक सिंह एक ही विद्यालय में साथ-साथ काम करते थे। अब दोनों अलग-अलग विद्यालयों के बच्चों को अच्छी तालीम देने में जुटे हैं। पंकज द्विवेदी ने बच्चों को पढ़ाने का नया कौशल डॉ. विवेक सिंह से ही सीखा है। दोनों ही शिक्षक अपने-अपने विद्यालय में छात्रों के प्रिय है। पंकज की तैनाती सोहावल के ठेंऊंगा के परिषदीय विद्यालय में है। पंकज खेल-खेल में छात्रों को शिक्षा देते हैं। वह भी बच्चों के अभिभावकों से संपर्क करना नहीं भूलते। वह कहते हैं कि बच्चे भगवान का स्वरूप होते हैं।
आम तौर पर परिषदीय विद्यालयों की चर्चा सिर्फ बदहाली के लिए होती है, लेकिन प्राथमिक विद्यालय उसरू आपकी इस धारणा को बदल देगा। सीमित सरकारी संसाधन का रोना छोड़ इस विद्यालय की प्रधानाध्यापक ऋतु जमाल ने खुद के प्रयासों से न केवल विद्यालय की दशा-दिशा बदली, बल्कि छात्र-छात्रओं को स्कूली बैग और कापियां भी वितरित कराई। बात संस्थाओं से संपर्क स्थापित कर चिकित्सा शिविर लगवाने की हो या फिर रंगाई-पुताई की, ऋतु जमाल किसी में भी पीछे नहीं रहीं। दो वर्षों में ही विद्यालय में गुरु-शिष्य परंपरा की नींव कर उसरू प्राथमिक पाठशाला को उन्होंने कान्वेंट स्कूलों के बराबर लाकर खड़ा कर दिया है। ऋतु जमाल बेसिक शिक्षा परिषद से पहले दो नामी निजी विद्यालयों में बतौर शिक्षक कार्य कर चुकी हैं। ‘गेट’ उत्तीर्ण कर चुकीं ऋतु बायोकमेस्ट्री से बीएससी और एमएससी पास हैं। उन्होंने एमए व बीएड् की पढ़ाई की है। मिल्कीपुर के जूनियर हाईस्कूल चकनथा में तैनात थी। चकनथा विद्यालय में पढ़ाई के स्तर को ऊंचा उठाने के बाद चर्चा में आई ऋतु जमाल को वर्ष 2015 में प्राथमिक विद्यालय उसरू को संवारने का दायित्व मिला। उन्होंने इसे भी बखूबी निभाया। अपने वेतन से प्रतिमाह दो से तीन हजार रुपये खर्च कर वह छात्र-छात्रओं की कापी-किताब, पेंसिल आदि आवश्यकताओं को पूरा करती हैं। उन्होंने सामाजिक संस्थाओं से संपर्क कर विद्यालय में करीब एक हजार स्क्वायर फिट में शेड का निर्माण कराया, जिससे छात्र-छात्रएं छांव में बैठक मध्याह्न भोजन कर सकें। यही नहीं, प्रत्येक शनिवार को एक्टिविटी-डे के रूप में स्थापित कर छात्र-छात्रओं को विभिन्न खेलों के माध्यम से पढ़ाई कराई जाती है। उनके प्रयोग यहीं नहीं रुकते।
विभिन्न अवसरों पर डाक्यूमेंट्री व फिल्में दिखाकर छात्र-छात्रओं का उत्साहवर्धन किया जाता है। इस विद्यालय में ब्लैक बोर्ड भी पुराने जमाने की बात हो चुकी है। छात्र-छात्रओं को रंगों की पहचान कराने के लिए व्हाइट बोर्ड का इस्तेमाल किया जाता है, जिस पर शिक्षक अलग-अलग रंगों की स्केच के माध्यम से छात्रों को पढ़ाते हैं। इन्हीं प्रयोगों व लगन की वजह से ऋतु जमाल अपने छात्रों की आदर्श शिक्षक और मार्गदर्शक बनीं हैं।
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