सात / आठ फरवरी को प्रस्तावित सीटीईटी की तैयारियों में जुटे हैं उम्रदराज शिक्षक
किसी का बेटा 12वीं बोर्ड परीक्षा में, किसी की बेटी नीट
सुप्रीम कोर्ट ने परिषदीय शिक्षकों के लिए अनिवार्य किया है टीईटी
प्रयागराज। वर्षों से कक्षा एक से आठ तक के बच्चों को पढ़ाने वाले सैकड़ों उम्रदराज शिक्षक आज खुद फिर से परीक्षार्थी बन गए हैं। नौकरी में बने रहने की अनिवार्यता ने उन्हें ऐसी स्थिति में ला खड़ा किया है कि वे दिन में स्कूल में बच्चों को पढ़ाते हैं और रात में खुद की पढ़ाई में जुटते हैं। बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रहे बच्चों के साथ अब उनके शिक्षक भी किताबें खोलकर बैठने को मजबूर हैं।
प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में कार्यरत बड़ी संख्या में शिक्षक, जिनकी सेवा अवधि दो दशक से अधिक हो चुकी है, शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) और अन्य अनिवार्य अर्हताओं को पूरा करने के दबाव में लगातार तैयारी कर रहे हैं। कई शिक्षक ऐसे हैं जिनके बच्चे 10वीं-12वीं की बोर्ड परीक्षा या प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं, और घर का माहौल एक साथ दो पीढ़ियों की पढ़ाई का केंद्र बन गया है।
इन शिक्षकों का कहना है कि उन्होंने जीवन का बड़ा हिस्सा बच्चों को शिक्षित करने में लगा दिया, लेकिन अब उनकी योग्यता पर प्रश्नचिह्न लगाकर उन्हें फिर से परीक्षा की कसौटी पर खड़ा कर दिया गया है। उम्र, स्वास्थ्य और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बावजूद वे सिर्फ इसलिए तैयारी कर रहे हैं ताकि वर्षों की सेवा के बाद नौकरी न छिन जाए।
शिक्षक संगठनों का मानना है कि अनुभव को दरकिनार कर केवल परीक्षा आधारित व्यवस्था थोपना शिक्षा व्यवस्था की विडंबना है। वे कहते हैं कि जो शिक्षक वर्षों से कक्षा में परिणाम दे रहे हैं, उनके लिए सम्मानजनक समाधान होना चाहिए था। मौजूदा स्थिति में शिक्षक मानसिक दबाव, असुरक्षा और अपमान की भावना से गुजर रहे हैं।
शिक्षा जगत में यह तस्वीर चिंताजनक मानी जा रही है, जहां पढ़ाने वाले खुद असुरक्षित भविष्य के डर से फिर से छात्र बन गए हैं। यह सवाल अब और तेज हो गया है कि क्या अनुभव, सेवा और समर्पण की कोई कीमत नहीं, या फिर शिक्षक को जीवन भर परीक्षा देते रहना ही उसकी नियति बना दी गई है।
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