DISTRICT WISE NEWS

अंबेडकरनगर अमरोहा अमेठी अलीगढ़ आगरा आजमगढ़ इटावा इलाहाबाद उन्नाव एटा औरैया कन्नौज कानपुर कानपुर देहात कानपुर नगर कासगंज कुशीनगर कौशांबी कौशाम्बी गाजियाबाद गाजीपुर गोंडा गोण्डा गोरखपुर गौतमबुद्ध नगर गौतमबुद्धनगर चंदौली चन्दौली चित्रकूट जालौन जौनपुर ज्योतिबा फुले नगर झाँसी झांसी देवरिया पीलीभीत फतेहपुर फर्रुखाबाद फिरोजाबाद फैजाबाद बदायूं बरेली बलरामपुर बलिया बस्ती बहराइच बागपत बाँदा बांदा बाराबंकी बिजनौर बुलंदशहर बुलन्दशहर भदोही मऊ मथुरा महराजगंज महोबा मिर्जापुर मीरजापुर मुजफ्फरनगर मुरादाबाद मेरठ मैनपुरी रामपुर रायबरेली लखनऊ लख़नऊ लखीमपुर खीरी ललितपुर वाराणसी शामली शाहजहाँपुर श्रावस्ती संतकबीरनगर संभल सहारनपुर सिद्धार्थनगर सीतापुर सुलतानपुर सुल्तानपुर सोनभद्र हमीरपुर हरदोई हाथरस हापुड़
Showing posts with label शिक्षा. Show all posts
Showing posts with label शिक्षा. Show all posts

Tuesday, August 11, 2020

कोरोना काल में ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों को समाचार पत्रों के जरिए पढ़ाने का संसदीय सामिति का प्रस्ताव

कोरोना काल में ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों को समाचार पत्रों के जरिए पढ़ाने का संसदीय सामिति का  प्रस्ताव

 
नई दिल्ली : कोरोना संकट काल में घरों में बैठे स्कूली बच्चों को पढ़ाने के लिए सरकार वैसे तो सभी जरूरी कदम उठा रही है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों तक उसकी पहुंच अभी भी अधूरी है। शिक्षा मंत्रलय की संसदीय मामलों की स्थायी समिति ने सोमवार को इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। साथ ही सुझाव दिया है कि ग्रामीण और दूर-दराज क्षेत्रों के बच्चों को पढ़ाने के लिए समाचार पत्रों की मदद ली जाए।


समिति का कहना था कि इस संकट काल में भी गांव-गांव तक समाचार पत्र पहुंच रहे हैं। ऐसे में छात्रों तक उसके जरिए अध्ययन सामग्री पहुंचाई जाए। शिक्षा मंत्रलय से जुड़ी स्थायी समिति की बैठक भाजपा के वरिष्ठ सांसद डा.विनय सहत्रबुद्धे की अगुवाई में हुई। इसके कुल 30 सदस्यों में से करीब 17 बैठक में पहुंचे थे। 


संसद भवन परिसर में हुई इस बैठक में मंत्रलय के सामने परीक्षाओं के तरीकों को लेकर भी चर्चा हुई। जिसमें क्वेश्चन बैंक आधारित सिस्टम को अपनाने पर जोर दिया गया। इस पर मंत्रलय ने अपनी सहमति दे दी है। साथ ही समाचार पत्रों के जरिए दूर-दराज और ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों तक पहुंचने के सुझाव पर भी अपनी सहमति जताई है।

Wednesday, August 5, 2020

कोविड-19 ने इतिहास में शिक्षा क्षेत्र में अब तक का सबसे लंबा अवरोध किया पैदा, दुनिया में 1.6 अरब छात्र प्रभावित, 2.38 करोड़ स्कूली बच्चे छोड़ सकते हैं बीच मे पढ़ाई

कोविड-19 ने इतिहास में शिक्षा क्षेत्र में अब तक का सबसे लंबा अवरोध किया पैदा, दुनिया में 1.6 अरब छात्र प्रभावित, 2.38 करोड़ स्कूली बच्चे छोड़ सकते हैं बीच मे पढ़ाई।

संयुक्त राष्ट्र : कोरोना महामारी से पूरी दुनिया जूझ रही है। भारत समेत अधिकतर देशों में स्कूल और कालेज बंद हैं। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने कहा कि कोविड-19 ने इतिहास में शिक्षा के क्षेत्र में अब तक का सबसे लंबा अवरोध पैदा किया है। इस बीमारी से दुनियाभर के सभी देशों और महाद्वीपों के करीब 1.6 अरब छात्र प्रभावित हुए है।



एक दस्तावेज जारी करते हुए गुटेरेस ने कहा, कोरोना के चलते अतिरिक्त 2.38 करोड़ बच्चे अगले साल स्कूल की पढ़ाई बीच में छोड़ सकते हैं। शिक्षा व्यक्तिगत विकास और समाज के भविष्य की कुंजी है। यह अवसर खोलती है और असमानता को दूर करती है। यह ज्ञानवान, सहिष्णु समाज के सतत विकास का प्राथमिक संचालक होती है। उन्होंने कहा कि जुलाई के मध्य में 160 से अधिक देशों में स्कूल बंद कर दिए गए, जिससे एक अरब से अधिक छात्र प्रभावित हुए और दुनियाभर में कम से कम चार करोड़ बच्चे अपने स्कूल के शुरुआती महत्वपूर्ण समय में शिक्षा प्राप्त नहीं कर सके। इस महामारी ने शिक्षा में असमानता को बढ़ाया है। लंबे समय तक स्कूलों के बंद रहने से पढ़ाई को हुए नुकसान से पिछले कुछ दशकों में हुई प्रगति के बेकार होने का खतरा है।


 व्हाट्सप के जरिये जुड़ने के लिए क्लिक करें।

Saturday, August 1, 2020

नई शिक्षा नीति में 5वीं तक मातृभाषा में शुरुआती पढ़ाई से उपजेगी समझ : शिक्षा मंत्री निशंक से इंटरव्यू

नई शिक्षा नीति में 5वीं तक मातृभाषा में शुरुआती पढ़ाई से उपजेगी समझ : शिक्षा मंत्री निशंक से इंटरव्यू

 
अरसे से अटकी नई शिक्षा नीति जमीन पर कितनी सरलता से उतरेगी यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन केंद्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक का मानना है कि यह पूरे देश में शिक्षा व्यवस्था के सकारात्मक बदलाव के लिए जरूरी है। शिक्षा मंत्री निशंक से  बातचीत के प्रमुख अंश


नई शिक्षा नीति में 5वीं तक मातृभाषा में पढ़ाई की बात की गई है, इसे कैसे लागू किया जाएगा? खासकर जब अंग्रेजी मीडियम स्कूलों की संख्या बड़ी है?

छोटे बच्चे मातृभाषा में चीजों को जल्दी सीखते और समझते हैं। इसीलिए नई शिक्षा नीति में कहा गया है कि कम से कम कक्षा पांच तक और अगर संभव हो तो कक्षा आठ व उसके बाद भी शिक्षा का माध्यम मातृभाषा, स्थानीय भाषा या क्षेत्रीय भाषा होगी। अगर संभव हो तो कक्षा आठ के बाद भी स्थानीय भाषा की एक अन्य भाषा के रूप में पढ़ाई जारी रखी जाएगी। ऐसा सरकारी व निजी दोनों प्रकार के स्कूलों द्वारा किया जाएगा। विज्ञान सहित अन्य उच्च गुणवत्ता वाली पाठ्य पुस्तकें मातृभाषा या स्थानीय भाषा में उपलब्ध कराई जाएंगी। शुरुआती शिक्षा में भी बच्चों को अलग-अलग भाषाएं पढ़ाई जाएंगी, लेकिन विशेष जोर मातृभाषा पर होगा। कक्षा तीन तक लिखना और पढ़ना मातृभाषा में सिखाया जाएगा। इसके बाद से दूसरी भाषाओं में लिखना और पढ़ना सिखाकर कौशल विकास किया जाएगा।


5वीं के बाद क्या इंग्लिश मीडियम होगा? क्या एकबारगी बदलाव से परेशानी नहीं बढ़ेगी?

हम प्रयास करेंगे कि उच्च गुणवत्ता यानी बेहतर पाठ्य सामग्री वाली किताबें तथा विज्ञान व गणित की पठन-पाठन सामग्री दो भाषाओं में हो, ताकि सभी छात्र उन विषयों को अंग्रेजी के साथ-साथ स्थानीय भाषा में भी पढ़ और समझ सकें।

त्रिभाषा को लेकर पहले विवाद रहा। शायद इसीलिए अब उसे नरम कर दिया गया है, लेकिन राष्ट्रभाषा हंिदूी की राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता का क्या होगा?

संवैधानिक प्रावधानों, लोगों व क्षेत्रों की आकांक्षाओं को ध्यान में रखते हुए तीन भाषा वाला फॉर्मूला लागू किया जाएगा। इस फॉर्मूले में अधिक लचीलापन होगा। किसी भी राज्य पर कोई भाषा थोपी नहीं जाएगी। बच्चों द्वारा सीखी जाने वाली तीन भाषाएं राज्य, क्षेत्र व स्वाभाविक रूप से स्वयं बच्चे ही तय करेंगे, लेकिन उनमें से दो भारतीय होनी चाहिए।

शिक्षा नीति में संस्कृति की बात की गई है। पाठ्यक्रम में किस तरह का बदलाव होगा? क्या हमें वैसी सामग्री ज्यादा मिलेंगी, जिनमें भारत की महानता का वर्णन हो?

हम अभी-अभी नीति लेकर आए हैं। अब यह नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क कमेटी को तय करना है कि कौन-कौन से विषय पारंपरिक भारतीय ज्ञान प्रणाली का हिस्सा होंगे। हां, इतना जरूर है कि जनजातीय ज्ञान तथा सीखने के देसी व पारंपरिक तरीकों को बढ़ावा दिया जाएगा।

विदेशी उच्च शिक्षण संस्थानों को देश में कैंपस खोलने की इजाजत से भारतीय संस्थानों को विश्वस्तरीय बनाने की कोशिश प्रभावित तो नहीं होगी?

नीति में कहा गया है भारत को ऐसे वैश्विक स्थान के रूप में विकसित किया जाएगा, जहां गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कम पैसों में उपलब्ध कराई जा सके। भारतीय संस्थानों को उच्च गुणवत्ता वाले विदेशी संस्थानों के साथ अनुसंधान व शिक्षण सहयोग तथा शिक्षक व छात्र आदान-प्रदान की सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी। उनके साथ प्रासंगिक समझौते किए जाएंगे।

नीति में फीस को लेकर कैपिंग की बात कही गई है। यह कब तक और किस तरह होगी? इसके दायरे में क्या उच्च शिक्षण संस्थान और स्कूल दोनों आएंगे?

स्कूली व उच्च शिक्षा के व्यावसायीकरण को रोकने के लिए विभिन्न प्रकार के तंत्र स्थापित किए जाएंगे। विभिन्न संस्थानों की अधिकतम फीस तय करने के लिए पारदर्शी तंत्र विकसित किया जाएगा, ताकि निजी संस्थानों पर भी प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। किसी भी छात्र के आवेदन के दौरान फीस व अन्य शुल्कों में मनमानी वृद्धि नहीं करनी दी जाएगी। शुल्क निर्धारण तंत्र लागत की उचित वसूली सुनिश्चित करने के साथ यह भी तय करेगा कि उच्च शिक्षण संस्थान अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करते रहें।

Saturday, July 25, 2020

'स्टे इन इंडिया और स्टडी इन इंडिया’ के लिए HRD मंत्रालय ने गठित की कमेटी, पढ़े पूरी डिटेल

स्टे इन इंडिया और स्टडी इन इंडिया’ के लिए HRD मंत्रालय ने गठित की कमेटी,


केंद्र सरकार ने विदेश में पढ़ाई की चाह रखने वाले युवाओं को देश में ही बेहतर शिक्षा के मौके उपलब्ध कराने के लिए एक कमेटी का गठन किया है। इस कमेटी का उद्देश्य है कि ज्यादा से ज्यादा स्टूडेंट्स को देश में रहें और यहीं पर रहकर पढ़ाई करने के लिए प्रेरित किया जाए। इसके अलावा जो स्टूडेंट्स विदेश में पढ़ाई कर रहे थे और उनकी शिक्षा कोविड-19 संक्रमण की वजह से प्रभावित हुई है, उनके प्रोगाम को देश में रहकर पूरा करने के लिए जरूरी संसाधन मुहैया कराए जाए।




केंद्र सरकार की ओर से बनाई गई इस कमेटी का नेतृत्व यूजीसी के चेयरमैन कर रहे हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के अध्यक्ष की अध्यक्षता में बनाई जाने वाली समिति देश में शिक्षा के उचित अवसर प्रदान करने और कोविड-19 संक्रमण की वजह से विदेश से लौटने वाले छात्रों को उनके कार्यक्रमों को पूरा करने के लिए उन्हें जरूरी सहायता प्रदान करने के लिए संबोधित करेगी। केंद्र सरकार ने इस पहल को ‘स्टे इन इंडिया और स्टडी इन इंडिया’ का नया नारा दिया दिया है।


वहीं मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने समिति के गठन के संबंध में एक सत्र आयोजित किया था। मानव संसाधन विकास मंत्री ने इस दौरान कहा कि साल 2019 के दौरान लगभग 7.5 लाख छात्र अपनी पढ़ाई करने के लिए विदेश गए और इस वजह से मूल्यवान विदेशी मुद्रा भारत से बाहर चली गई और साथ ही साथ कई उज्ज्वल छात्र विदेश चले गए। इसलिए हमें कोशिश करनी चाहिए कि छात्रों को देश में ही ज्यादा से ज्यादा बेहतर अवसर उपलब्ध कराए जाएं।

इस बैठक में मानव संसाधन विकास मंत्रालय के स्वायत्त और तकनीकी संगठनों के वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया था। इसके अलावा एचआरडी राज्य मंत्री संजय धोत्रे, उच्च शिक्षा सचिव अमित खरे, यूजीसी अध्यक्ष डीपी सिंह; एआईसीटीई अध्यक्ष अनिल सहस्रबुद्धे, संयुक्त सचिव (आईसीसी), नीता प्रसाद और एआईयू महासचिव पंकज मित्तल ने भी भाग लिया था।

 व्हाट्सप के जरिये जुड़ने के लिए क्लिक करें।

Saturday, July 18, 2020

पहले बच्चों की सुरक्षा फिर शिक्षा, बोले MHRD मिनिस्टर

पहले बच्चों की सुरक्षा फिर शिक्षा, बोले MHRD मिनिस्टर


केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने शुक्रवार को कहा कि कोरोना काल में हमारी प्राथमिकता पहले बच्चों की सुरक्षा, फिर शिक्षा है। वे 'जीतेगा हिन्दुस्तान' श्रृंखला के वेबिनार में हिन्दुस्तान के प्रधान संपादक शशि शेखर के साथ रूबरू थे। निशंक ने कहा कि इस वक्त 40% बच्चे ऑनलाइन शिक्षा का लाभ नहीं ले पा रहे हैं, लेकिन देश के अंतिम छोर तक बच्चों को शिक्षा मुहैया कराने के प्रयास जारी हैं। 


बंद के दौरान भी हमने राज्यों के साथ मिलकर शैक्षिक गतिविधियों को जारी रखा है। उन्होंने कहा,करीब 33 करोड़ बच्चों को ऑनलाइन शिक्षा मुहैया कराई जा रही है। ई-विद्या के तहत हम 'वन क्लास, वन चैनल' अभियान में स्वयं प्रभा' के 32 चैनल ला रहे हैं। जो टीवी के हर प्लेटफार्म पर दिखेंगे। जिन बच्चों के पास इंटरनेट नहीं है, हमें वहां जाना है। मानव संसाधन विभाग मिशन मोड में काम कर देखें।


हम नहीं चाहते किसी बच्चे पर कोरोना डिग्री का ठप्पा लगे: निशंक

केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने शुक्रवार को यूजीसी की रिवाइज्ड गाइडलाइंस को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि यूजीसी द्वारा फाइनल ईयर की परीक्षा कराने का निर्णय अचानक नहीं लिया गया है। इसके लिए टास्क फोर्स बनाई गई थी। गहन मंथन के बाद यह तय किया गया कि फर्स्ट और सेकेंड ईयर के मार्क्स आंतरिक मूल्यांकन और पिछली परीक्षाओं से हो सकते हैं लेकिन फाइनल ईयर की परीक्षाएं तो आयोजित होंगी। 'जीतेगा हिन्दुस्तान' कार्यक्रम सीरीज में हिन्दुस्तान के प्रधान संपादक शशि शेखर के साथ खास बातचीत में रमेश पोखरियाल निशंक ने कहा कि फाइनल ईयर की परीक्षा आयोजित किए बिना डिग्री देने से उस डिग्री पर कोरोना डिग्री का ठप्पा लग जाएगा।

डॉ. निशंक ने कहा कि नौकरी के लिए इंटरव्यू के समय कोरोना डिग्री वालों को अलग से छांट लिया जाएगा कि कहीं ये कोरोना काल का तो नहीं है। इससे उन्हें भविष्य में नौकरी मिलने में दिक्कत होगी। उनकी काबिलियत को कम करके आंका जाएगा। 

उन्होंने कहा कि यूजीसी के फैसले का शिक्षाविदों और कुलपतियों ने स्वागत किया है। कौन कहेगा बिना परीक्षा कराए डिग्री दे दी जाए। बच्चे हमारा भविष्य है। हम कोई ऐसा काम नहीं करना चाहते जिससे आज की दिक्कत उसे भविष्य में झेलनी पड़े। 

आपको बता दें कि यूजीसी ने कुछ दिनों पहले रिवाइज्ड गाइडलाइंस जारी कर कहा था कि यूनिवर्सिटी और कॉलेजों की अंतिम सेमेस्टर की परीक्षाएं अनिवार्य हैं। सितंबर के अंत तक सभी यूनिवर्सिटी और कॉलेजों की अंतिम सेमेस्टर की परीक्षाएं करानी हैं। इस पर कई राज्यों ने विरोध दर्ज कराया है।

ऑनलाइन शिक्षा पर बोले निशंक- 30-40 फीसदी छात्रों तक अभी पहुंच बाकी

ऑनलाइन शिक्षा के प्रसार को लेकर उन्होंने कहा कि मेरी राज्यों से बातचीत होती है। वहां के शिक्षा मंत्रियों से बात होती है। इससे पता चलता है कि राज्यों ने बहुत अच्छे से काम किया है। अभी करीब 40 फीसदी तक ऑनलाइन शिक्षा की छात्रों तक पहुंच होनी है। इसके लिए हम राज्यों के साथ काम कर रहे हैं। अंतिम छोर वाले बच्चे के लिए काम कर रहे हैं। अभी व्हाट्सऐप, अध्यापक अन्य तरीकों से भी उन बच्चों तक पहुंच के लिए काम कर रहे हैं।

Friday, June 19, 2020

साक्षात्कार : नई शिक्षा नीति से निकलेगी स्वर्णिम भविष्य की राह : निशंक


साक्षात्कार : नई शिक्षा नीति से निकलेगी स्वर्णिम भविष्य की राह : निशंक


कोरोना संक्रमण की आंच जब भारत में पड़ने लगी, वह छात्रों के लिए परीक्षाओं का काल था। दसवीं, बारहवीं के बाद भविष्य के सपने देखने और बुनने का काल था। लेकिन कोरोना और लॉकडाउन ने सब कुछ बीच में ही रोक दिया। चिंता बड़ी थी। परीक्षा के नतीजों के लिए अभी इंतजार हो रहा है, लेकिन अच्छी बात यह हुई कि पढ़ाई नहीं रुकी। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने इसे सुनिश्चित किया। दैनिक जागरण के संपादक मंडल के साथ निशंक ने नई शिक्षा नीति, भविष्य के रोडमैप को लेकर बातचीत की। प्रस्तुत है एक अंश :


सवाल : लॉकडाउन के बाद पढ़ाई तो हो रही है, लेकिन स्कूलों के खुलने को लेकर असमंजस है। स्कूलों को कब तक खोलने की योजना है?
जवाब : कोरोना संकट के कठिन समय में हमने चुनौतियों को अवसर में तब्दील करने की कोशिश की है। हम ऑनलाइन माध्यम से छात्रों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। रही बात स्कूलों को खोलने की, तो परिस्थितियों के आधार पर इस बारे में फैसला लिया जाएगा। जब भी स्कूल खोले जाएंगे, गृह और स्वास्थ्य मंत्रलय के निर्देशों के बाद ही यह फैसला लिया जाएगा।


सवाल : देश के कई हिस्सों में कोरोना संक्रमण की स्थिति उतनी व्यापक नहीं है। ऐसी स्थिति में इन क्षेत्रों में स्कूलों को खोलने में क्या संकोच है?
जवाब- कोरोना संक्रमण को लेकर प्रधानमंत्रीजी लगातार राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ चर्चा कर रहे हैं। मैं भी राज्यों के शिक्षा मंत्रियों और छात्रों के साथ संवाद कर रहा हूं। राज्यों की जो परिस्थितियां होंगी, उसके आधार पर वे निर्णय ले सकते हैं। लेकिन, उन्हें गृह और स्वास्थ्य मंत्रलय के साथ चर्चा करके ही यह फैसला लेना होगा।


सवाल- ऑनलाइन के जरिये क्या शिक्षा की मंशा पूरी हो पाएगी? फिलहाल यह पढ़ाई छात्रों पर बोझ जैसा दिखने लगा है, जिसमें घंटों कंप्यूटर के सामने बच्चे बैठे होते हैं।
जवाब- ऐसी परिस्थितियों में हम कर भी क्या सकते हैं? ऑनलाइन के अलावा कोई विकल्प ही नहीं है। हम कहना चाहते हैं, कि ऑनलाइन शिक्षा भी अब जरूरी है। दूरस्थ शिक्षा के जरिये पहले से ही शिक्षा दी जा रही है। जब स्थिति सामान्य होगी, तब ऑनलाइन और क्लास रूम दोनों के जरिये शिक्षा कैसे और कितने समय देनी है, इस पर फैसला लिया जाएगा।


सवाल- लेकिन दूरस्थ शिक्षा की गुणवत्ता हमेशा से कठघरे में रही है। इसे दोयम दर्जे का माना जाता है।
जवाब- ऑनलाइन और दूरस्थ शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर हम काफी सचेत हैं। इसकी गुणवत्ता को और बेहतर बनाने से जुड़े सभी जरूरी कदमों पर विचार करने को कहा गया है। दूरस्थ शिक्षा के स्तर में कोई कमी नहीं होने देंगे। हर तीन महीने में अपने स्तर पर इसकी समीक्षा करेंगे।


सवाल- दूरदराज या ग्रामीण क्षेत्रों के ऐसे बच्चे जिनके पास कंप्यूटर नहीं हैं, उनके लिए ऑनलाइन शिक्षा का कोई मतलब नहीं है। ऐसे में उन्हें पढ़ाने की क्या योजना है?
सवाल- यह बात सही है कि अब भी बड़ी संख्या में छात्रों के पास कंप्यूटर और इंटरनेट नहीं है। ऐसे में हम दूसरे माध्यमों से भी उन तक पहुंचने और उन्हें पढ़ाने की योजना पर काम कर रहे है। हाल ही में हमने स्वयंप्रभा के 32 चैनलों में से स्कूलों के लिए 12 नए चैनल शुरू करने का फैसला लिया है। पीएम-ई-विद्या के तहत वन क्लास-वन चैनल योजना है। इसमें पहली से बारहवीं तक के प्रत्येक क्लास के लिए एक चैनल होगा। फिर भी जो छात्र इसमें भी छूटेंगे, उन्हें रेडियो से जरिये पढ़ाने को लेकर भी काम कर रहे हैं।


सवाल- नई शिक्षा नीति में निजी क्षेत्र को स्वायत्तता न देने जैसी आशंका जताई जा रही है। हकीकत क्या है?
जवाब- नहीं ऐसा नहीं है। हम तो स्वायत्तता के पक्षधर हैं। मोदी सरकार के आने के बाद हम ज्यादा से ज्यादा संस्थानों को स्वायत्तता दे रहे हैं। हाल ही में 20 संस्थानों को विश्वस्तरीय बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। इनमें 10 सरकारी और 10 निजी संस्थान हैं।


सवाल- उच्च शिक्षण संस्थान में प्रवेश के लिए कट ऑफ 98 फीसद या उससे ज्यादा जा रहा है। ऐसे में आवेदन करने वाले बड़ी संख्या में छात्रों को प्रवेश नहीं मिलता है। इस विसंगति को कैसे ठीक करेंगे?
जवाब- सभी संस्थानों के प्रवेश के अपने नियम हैं और अपनी क्षमता है। इसके अलावा हम सौ शीर्ष संस्थानों में ऑनलाइन कोर्स शुरू करने जा रहे हैं। इसके शुरू होने से यह गैप खत्म होगा और जिन्हें रेगुलर प्रवेश नहीं मिल पाएगा, वे ऑनलाइन या दूरस्थ के जरिये इन संस्थानों से पढ़ाई कर सकेंगे।


सवाल- उच्च शिक्षण संस्थानों को लेकर जब भी दुनिया की कोई रैंकिंग जारी होती है, वह दिन शर्मिदगी भरा होता है, क्योंकि हमारे संस्थान उस रैंकिंग में नहीं दिखते हैं। इसे लेकर क्या कर रहे हैं?
जवाब- देश के लोगों को अब शर्मिदा होने की जरूरत नहीं है। जो स्थिति आप बता रहे हैं, वह 2013 के पहले की स्थिति थी। लेकिन अब हमारे संस्थान क्यूएस रैंकिंग और टाइम रैंकिंग दोनों में आते हैं। हमारे संस्थानों से पढ़े बच्चे आज दुनियाभर की शीर्ष कंपनियों में अग्रणी भूमिका में हैं।


सवाल- क्या पाठ्यक्रम में बदलाव की भी कोई योजना है?
जवाब- हमेशा प्रत्येक पांच वर्ष में पाठ्यक्रम में परिवर्तन होता है। नई शिक्षा नीति में हमारा फोकस ज्ञान, विज्ञान और अनुसंधान के साथ भारत केंद्रित होगा। ऐसे में जब हम भारत केंद्रित की बात कर रहे हैं, तो पाठ्यक्रम में भी बदलाव होगा। उसे जोड़ेंगे। जो भारत के लिए गौरव की बात है। नई शिक्षा नीति संस्कारों से युक्त होगी।