हर साल शिक्षा बजट 10% अनिवार्य बढ़ोतरी की सिफारिश, प्राकलन समिति ने अपनी रिपोर्ट लोकसभा को सौंपी
नई दिल्लीः केंद्र सरकार के बजट आवंटन पर पैनी नजर रखने वाली प्राक्कलन समिति ने शिक्षा के बजट में कमी पर सवाल उठाए हैं और इसे नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) की सिफारिशों के अनुरूप जीडीपी के छह प्रतिशत तक पहुंचाने के लिए सालाना दस प्रतिशत तक की अनिवार्य बढ़ोतरी की सिफारिश की है।
समिति का मानना है कि मौजूदा समय में देश में शिक्षा पर कुल जीडीपी का संयुक्त व्यय (केंद्र व राज्य दोनों का) अभी 4.1 प्रतिशत ही है, जो लक्ष्य से दूर है। यह स्थिति तब है, जब नीति का अमल अंतिम चरण में पहुंच चुका है।
लोकसभा सदस्य डा. संजय जायसवाल की अगुवाई में गठित इस 30 सदस्यीय प्राक्कलन समिति ने बुधवार को इसे लेकर अपनी रिपोर्ट लोकसभा को सौंप दी है। इसमें समिति ने कहा कि 2020 में आई नई शिक्षा नीति के प्राथमिक और बड़े उद्देश्यों में एक शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय को जीडीपी के छह प्रतिशत तक बढ़ाना था। लेकिन इसके बाद भी यह लक्ष्य से लगातार कम बना हुआ है।
2026-27 में शिक्षा मंत्रालय को 1.39 लाख करोड़ रुपये का आवंटन दिया गया था, जो पिछले वर्ष की तुलना में 8.27 प्रतिशत वृद्धि को दर्शाता है, लेकिन यह वृद्धि लक्ष्य तक पहुंचने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके लिए समयबद्ध रूपरेखा तैयार की जाए। इसमें केंद्र व राज्य दोनों अपने शिक्षा खर्च में और बढ़ोतरी करें।
शिक्षा बजट में औसत की जगह हर साल दस प्रतिशत तक अनिवार्य बढ़ोतरी सुनिश्चित करनी चाहिए। प्राक्कलन समिति हर साल बजट के आवंटन को जांचती है और देखती है कि नीति के अनुरूप आवंटन हो रहा है या नहीं।
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