जागरण टीम, जगदीशपुर : इसे मजबूरी कहें या खुदगर्जी। बात जो भी हो पर तस्वीर तो यही इशारा कर रही है कि यहां शिक्षा व्यवस्था के हालात ठीक नहीं हैं। पिछले नौ दिनों से स्कूलों में नया शिक्षण सत्र चल रहा है पर बच्चों की उपस्थिति न के बराबर है। यह तब है जब बेसिक शिक्षा महकमा पूरे दम खम के साथ गांव-गांव स्कूल चलो अभियान के तहत रैलियां निकाल रहा है। ऐसा भी नहीं कि गांव के प्राइवेट स्कूलों में बच्चों की भरमार हो। वहां भी अभी बच्चों का सूखा ही दिख रहा है। हां यह बात दीगर है कि शहर के कान्वेंट स्कूलों में बच्चों की अच्छी खासी तादात पहुंचने लगी है। यहां के गांवों में आलम यह है कि दो जून की रोटी की जुगत में बड़े तो खेतों में मजदूरी कर अपना पसीना बहा ही रहे हैं उनके बच्चे भी खेतों में पड़ी गेहूं की बालियां बीन कर घर चलाने में अपनों की मदद करने की कोशिश कर रहे हैं। इन तमाम कोशिशों के बीच जीवन का सबसे अहम हिस्सा शिक्षा ही उनसे दूर होता जा रहा है। कहने को तो जिले के सरकारी स्कूलों में दो लाख बच्चे शिक्षा हासिल कर रहे हैं। इस तस्वीर के साथ ही नए शिक्षण सत्र में बच्चों की उपस्थिति की पड़ताल करें तो कई चौकाने वाले सच सामने आ जाते हैं। स्कूलों में पिछले नौ दिनों में कहने मात्र को बच्चे आ रहे हैं। कहीं भी 50 फीसद से अधिक उपस्थिति नहीं है। यह वह आंकड़े हैं जो बेसिक शिक्षा महकमें ने खुद जुटाए हैं। हालात तो इससे भी बदतर हैं। दोपहर का भोजन व शासन की तमाम योजनाओं के बाद बच्चों की स्कूलों से यह बेरुखी तमाम सवाल खड़े करने वाली है। अम्मी अब्बू की मदद को बीन रहे गेहूं की बाली शनिवार को सुबह से ही गर्मी सबाब पर थी। जगदीशपुर क्षेत्र के रमजानी के पुरवा गांव में तेज धूप में छोटे-छोटे बच्चे शाइमा व कैफ आसमान से बरस रही आग की चिंता किए बगैर नन्हें नन्हें हाथों से कटे हुए गेहूं के खेत में छूट गई बालियों को एकत्र कर उन्हें बोरी में भर रहे थे। बच्चों में अपने अभिभावकों के प्रति प्रेम, स्नेह व जिम्मेदारी की झलक साफ नजर आ रही थी।
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