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Saturday, September 5, 2020

उच्च शिक्षा : कॉलेज से विवि आते ही घट गया प्रोफेसरों का वेतन, वेतन संरक्षण लाभ से हैं वंचित

उच्च शिक्षा : कॉलेज से विवि आते ही घट गया प्रोफेसरों का वेतन, वेतन संरक्षण लाभ से हैं वंचित।

लखनऊ : प्रदेश के राज्य विश्वविद्यालयों में एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर के पद पर नियुक्त होने वाले कई शिक्षक एक साल से भी ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी वेतन संरक्षण के लाभ से वंचित हैं। मामला शासन स्तर पर लंबित होने के कारण वे पहले से कम वेतन पर काम कर रहे हैं।

कई विश्वविद्यालयों ने लगभग एक साल पहले असिस्टेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर व प्रोफेसर के रिक्त पदों पर नियुक्ति की थी। इसमें कई शिक्षक महाविद्यालयों की नौकरी छोड़कर विश्वविद्यालयों में नियुक्त हुए थे। महाविद्यालयों में एसोसिएट प्रोफेसर के पद कार्यरत कई शिक्षक विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर पद पर तो कई एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर ही नियुक्त हुए थे। महाविद्यालयों में कार्यरत रहते हुए ये एसोसिएट प्रोफेसर वरिष्ठता के कारण कई वार्षिक वेतन वृद्धियों की बदौलत ज्यादा वेतन पा रहे थे।विश्वविद्यालयों में एसोसिएट प्रोफेसर व प्रोफेसर के मूल पद पर कार्यभार ग्रहण करने से उनका वेतन कम हो गया। पहले से शासनादेश है कि ऐसे मामलों में वेतन संरक्षण का लाभ दिया जाता है। इसमें यह व्यवस्था भी है कि पांच या उससे ज्यादा वेतन वृद्धियां होने पर शासन की अनुमति लेनी होती है। इस तरह वेतन संरक्षण की अनुमति के लिए शासन को प्रस्ताव भेजे गए हैं।


शिक्षक संगठनों ने जताई नाराजगी : शासन के उच्च शिक्षा विभाग में वेतन संरक्षण के कई प्रस्ताव लंबित पड़े हैं। कुछ मामलों में शासन स्तर से मांगी गई और जानकारियां भी विश्वविद्यालयों ने भेज दी हैं। बावजूद इसके ऐसे कई मामले अभी भी लंबित हैं। संबंधित विश्वविद्यालयों के शिक्षकों के संगठन इस पर लगातार नाराजगी भी जता रहे हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय संबद्ध महाविद्यालय शिक्षक संघ (लुआक्टा) के अध्यक्ष डॉ. मनोज पांडेय का कहना है कि महाविद्यालयों से विश्वविद्यालयों में गए शिक्षकों को आर्थिक क्षति उठानी पड़ रही है। इन मामलों को जल्द ही उप मुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा के सामने उठाया जाएगा।

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एक साल से लंबित हैं वेतन संरक्षण के मामले

लखनऊ -राज्य मुख्यालय : प्रदेश के राज्य विश्वविद्यालयों में एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर के पद पर नियुक्त होने वाले कई शिक्षक एक साल से भी ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी वेतन संरक्षण के लाभ से वंचित हैं। मामला शासन स्तर पर लंबित होने के कारण वे फिलहाल पहले से कम वेतन पर काम कर रहे हैं। कई विश्वविद्यालयों ने लगभग एक साल पहले असिस्टेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर व प्रोफेसर के रिक्त पदों पर नियुक्ति की थी।




इसमें कई शिक्षक महाविद्यालयों की नौकरी छोड़कर विश्वविद्यालयों में नियुक्त हुए थे। महाविद्यालयों में एसोसिएट प्रोफेसर के पद कार्यरत कई शिक्षक विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर पद पर तो कई एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर ही नियुक्त हुए थे। महाविद्यालयों में कार्यरत रहते हुए ये एसोसिएट प्रोफेसर वरिष्ठता के कारण कई वार्षिक वेतन वृद्धियों की बदौलत ज्यादा वेतन पा रहे थे। विश्वविद्यालयों में एसोसिएट प्रोफेसर व प्रोफेसर के मूल पद पर कार्यभार ग्रहण करने से उनका वेतन कम हो गया। पहले से शासनादेश है कि ऐसे मामलों में वेतन संरक्षण का लाभ दिया जाता है।


 इसमें यह व्यवस्था भी है कि पांच या उससे ज्यादा वेतन वृद्धियां होने पर शासन की अनुमति लेनी होती है। इस तरह वेतन संरक्षण की अनुमति के लिए विश्वविद्यालयों की तरफ से शासन को प्रस्ताव भेजे गए हैं। सूत्रों के अनुसार शासन के उच्च शिक्षा विभाग में वेतन संरक्षण के कई प्रस्ताव लंबित पड़े हैं। कुछ मामलों में शासन स्तर से मांगी गई और जानकारियों भी विश्वविद्यालयों भेज दी हैं। बावजूद इसके ऐसे कई मामले अभी भी लंबित हैं। संबंधित विश्वविद्यालयों के शिक्षकों के संगठन इस पर लगातार नाराजगी भी जता रहे हैं।


लखनऊ विश्वविद्यालय संबद्ध महाविद्यालय शिक्षक संघ (लुआक्टा) के अध्यक्ष डॉ. मनोज पांडेय का कहना है कि महाविद्यालयों से विश्वविद्यालयों में गए शिक्षकों को आर्थिक क्षति उठानी पड़ रही है। इन मामलों को जल्द ही उप मुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा के सामने उठाया जाएगा।


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