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Wednesday, September 9, 2026

विद्यालयों में लगेगी संसद पक्ष-विपक्ष की भूमिका में होंगे छात्र, कक्षा छह से दस तक के छात्र-छात्राएं देश-प्रदेश और राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर चर्चा करेंगे

विद्यालयों में लगेगी संसद पक्ष-विपक्ष की भूमिका में होंगे छात्र, कक्षा छह से दस तक के छात्र-छात्राएं देश-प्रदेश और राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर चर्चा करेंगे


लखनऊ। प्रदेश के माध्यमिक विद्यालयों में अब युवा संसद प्रतियोगिता आयोजित की जाएगी। इसमें कक्षा छह से दस तक के छात्र-छात्राएं देश-प्रदेश और राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर चर्चा करेंगे। वे सदन में अपना पक्ष रखने के साथ विपक्ष को भी घेरेंगे। 50 से 55 विद्यार्थियों वाले सदन में छात्रों को ही अध्यक्ष, मंत्री, विपक्ष के नेता और अन्य भूमिकाएं दी जाएंगी। उन्हें संसदीय कार्यवाही के संचालन, सवाल पूछने, जवाब देने, चर्चा करने और प्रस्ताव रखने का पूर्वाभ्यास कराया जाएगा।


युवा संसद के जरिये विद्यार्थियों को संसद और संसदीय प्रक्रियाओं के साथ लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की जानकारी दी जाएगी। इससे उनमें लोकतांत्रिक मूल्यों, अनुशासन और दूसरों के विचारों के प्रति सम्मान की भावना विकसित करने पर जोर रहेगा। युवा संसद के लिए राज्य स्तर पर राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एससीईआरटी) और जिला स्तर पर डीआईओएस को नोडल बनाया गया है। एससीईआरटी आयोजन के लिए मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराएगा।


विवादरहित विषयों पर होगी चर्चा : युवा संसद में सामाजिक न्याय, सामाजिक सुधार, आर्थिक विकास, सांप्रदायिक सद्भाव, शिक्षा, स्वास्थ्य, छात्र अनुशासन, कल्याणकारी योजनाएं, स्वच्छता, पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन और ग्रामीण विकास जैसे विवादरहित विषयों पर चर्चा होगी। किसी राजनीतिक दल या वर्तमान अथवा पूर्व नेता पर टिप्पणी नहीं की जाएगी। कार्यक्रम में शिष्टाचार और अनुशासन का विशेष ध्यान होगा।


डीआईओएस विद्यालयों को निर्देश देने के साथ आयोजन का पर्यवेक्षण करेंगे। महानिदेशक स्कूल शिक्षा मोनिका रानी ने निर्देश दिए हैं कि युवा संसद विद्यालय या छात्रों की सुविधा वाले स्थल पर हो। आयोजन एक घंटे से अधिक का नहीं होगा। छात्रों को वास्तविक संसदीय कार्यप्रणाली का अनुभव कराने पर विशेष जोर रहेगा। कार्यक्रम में सांसद, पूर्व सांसद, विधायक, पूर्व विधायक या एमएलसी को मुख्य अतिथि बनाया जा सकता है। वे विद्यार्थियों को संसदीय कार्यप्रणाली की जानकारी देंगे। 

Sunday, July 26, 2026

3,890 विद्यालयों पर अभी भी हाईटेंशन तारों का खतरा, अनहोनी की आशंका में पढ़ाई के लिए विवश विद्यार्थी

3,890 विद्यालयों पर अभी भी हाईटेंशन तारों का खतरा, अनहोनी की आशंका में पढ़ाई के लिए विवश विद्यार्थी


 लखनऊ : प्रदेश में बहुत बड़ी संख्या में स्कूली बच्चे आज भी ऐसे सरकारी प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ाई करने के लिए मजबूर हैं, जिनके ऊपर से 11 हजार वोल्ट की हाईटेंशन बिजली लाइनें गुजर रही हैं। बेसिक शिक्षा विभाग ने चालू वित्तीय वर्ष की जिला शुरुआत में प्रदेश के 9,009 ऐसे सरकारी विद्यालय चिह्नित किए थे, जिनके ऊपर से हाईटेंशन लाइनें गुजर रही थीं। बिजली विभाग ने अब तक 5,119 विद्यालयों के ऊपर से इन लाइनों को हटा दिया है, लेकिन 3,890 विद्यालय अब भी खतरे की जद में हैं।


हाईटेंशन लाइन का खतरे झेल रहे ऐसे सर्वाधिक 270 विद्यालय प्रयागराज में हैं। दूसरे स्थान पर जौनपुर है जहां ऐसे 267 विद्यालय हैं। इसके अलावा बस्ती में ऐसे 222, आजमगढ़ में 172, गाजीपुर में 169, सोनभद्र में 156, झांसी में 136, सिद्धार्थनगर में 119, फतेहपुर में 115, रायबरेली में 116 और बलिया में 102 विद्यालय इस समस्या से जूझ रहे हैं। 

विभागीय अधिकारियों के अनुसार कई विद्यालय परिसरों के भीतर बिजली के पोल और ट्रांसफार्मर भी लगे हुए हैं, जिससे दुर्घटना की आशंका लगातार बनी रहती है। इसी को देखते हुए बेसिक शिक्षा विभाग ने पिछले वर्ष ऊर्जा विभाग के अपर मुख्य सचिव को पत्र लिखकर स्कूल परिसरों से बिजली ढांचा हटाने का अनुरोध किया था।

विद्यार्थियों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए प्रदेश सरकार ने स्कूल परिसरों से बिजली ढांचा स्थानांतरित करने के लिए विद्युत निगमों को 100 करोड़ रुपये उपलब्ध कराए हैं। इसमें से 80 प्रतिशत राशि जारी की जा चुकी है। इस संबंध में बेसिक शिक्षा विभाग का कहना है कि वह लगातार ऊर्जा विभाग के संपर्क में है और प्रयास है कि जल्द ही किसी भी विद्यालय के ऊपर से हाईटेंशन लाइन न गुजरे।

Sunday, July 12, 2026

छात्रों को जंक फूड और स्क्रीन टाइम पर किया जाएगा जागरूक, परिषदीय, कस्तूरबा, मान्यता प्राप्त विद्यालय में भेजी जाएंगी "माई हेल्थ वर्ल्ड" किताबें

छात्रों को जंक फूड और स्क्रीन टाइम पर किया जाएगा जागरूक,  परिषदीय, कस्तूरबा, मान्यता प्राप्त विद्यालय में भेजी जाएंगी  "माई हेल्थ वर्ल्ड"  किताबें


लखनऊ। प्रदेश के परिषदीय, केजीबीवी व मान्यता प्राप्त विद्यालयों के छात्रों को अब मुख्य पढ़ाई के साथ ही जंक फूड के दुष्प्रभाव व स्क्रीन टाइम के संतुलित प्रयोग की भी जानकारी दी जाएगी। इसके लिए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से माई हेल्थ वर्ल्ड नाम से एक किताब तैयार की गई है। हिंदी-अंग्रेजी दोनों माध्यमों में उपलब्ध यह किताब प्रदेश के विद्यालयों में भी उपलब्ध कराई गई है।


इस किताब में छात्रों को संतुलित व पौष्टिक आहार लेने, नियमित शारीरिक गतिविधियों, योग व खेलकूद के महत्व के बारे में जागरूक किया जाएगा। साथ ही बच्चों को डिजिटल उपकरणों के सुरक्षित व बेहतर प्रयोग, पर्याप्त नींद लेने के फायदे के बारे में भी जागरूक किया जाएगा। महानिदेशक स्कूल शिक्षा मोनिका रानी ने इसके बेहतर प्रयोग के निर्देश दिए हैं। अध्ययन सामग्री https://eatrightindia.gov.in/ पर भी उपलब्ध हैं। विद्यालयों में बैगलेस डे का आयोजन किया जाए।

Tuesday, June 23, 2026

मदरसों में घटते जा रहे विद्यार्थी, बढ़ गए शिक्षक, मदरसों में छात्रों की संख्या चार लाख से घटकर 63 हजार पर सिमटी

मदरसों में घटते जा रहे विद्यार्थी, बढ़ गए शिक्षक, मदरसों में छात्रों की संख्या चार लाख से घटकर 63 हजार पर सिमटी 

अनुदान सूची में 558 मदरसे शामिल, शिक्षक हैं 10 हजार


लखनऊ : मदरसों में छात्रों के नामांकन की गहन जांच से फर्जी नामांकन कम हो रहे या मुस्लिम अभिभावक बच्चों को मदरसों में पढ़ाने में दिलचस्पी नहीं ले रहे ? साल दर साल मदरसों में छात्रों की संख्या घटने से यह सवाल उठ रहा है। 10 वर्ष पहले प्रदेश के मदरसों में छात्रों की संख्या चार लाख से अधिक थी, जो घटकर अब 63 हजार रह गई है।


दूसरी तरफ, पिछले वर्ष शिक्षकों की भर्ती पर रोक लगने से पहले तक उनकी संख्या लगातार बढ़ती रही। वर्तमान में मदरसों में तकरीबन 10 हजार शिक्षक हैं।

प्रदेश में सरकार की अनुदान सूची में 558 मदरसे शामिल हैं। इनमें फर्जी छात्र नामांकन, अनुदान राशि में हेरफेर की शिकायतों पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जांच के निर्देश दिए। जांच में मानकों व नियमों के उल्लंघन पर 15 मदरसों की मान्यता निलंबित कर उनके अनुदान को रोका गया लेकिन 543 मदरसों को अनुदान मिल रहा है। सभी में एनसीईआरटी पाठ्यक्रम लागू किया गया लेकिन छात्रों की संख्या में गिरावट जारी है। 

मदरसा शिक्षा बोर्ड की रजिस्ट्रार अंजना सिरोही स्वीकारती हैं कि छात्रों की संख्या घट रही है। कहती हैं कि कामिल, फाजिल (स्नातक) डिग्री की मान्यता नहीं होना भी इसका एक कारण है। वह कहती हैं कि संभवतः जो अभिभावक बच्चों को स्नातक, परास्नातक तक पढ़ाना चाहते हैं, वह मदरसों में दाखिले से बच रहे हैं क्योंकि मुंशी व मौलवी की पढ़ाई के बाद आगे की शिक्षा के लिए इस बोर्ड की व्यवस्था नहीं है। कामिल, फाजिल की डिग्री को सुप्रीम कोर्ट असंवैधानिक करार दे चुका है।

मदरसा सुधार आंदोलन के तलहा अंसारी का कहना है कि अभिभावक यह समझ रहे हैं कि प्रतिस्पर्धा के दौर में बिना गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के रोजगार नहीं मिल सकता है, इसलिए बच्चों को मदरसों के बजाय मुख्यधारा के स्कूलों में पढ़ा रहे हैं। अंसारी का यह भी मानना है कि पहले मदरसों में छात्रों की फर्जी संख्या दर्ज करके अनुदान हड़पा जाता था। उन्होंने 2016 की मदरसा नियमावली के बाद अनुदान और छात्रों की वास्तविक संख्या का पता लगाने के लिए सीबीआइ जांच की मांग की है। मानवाधिकार आयोग में भी शिकायत की गई है। पिछले वर्ष तक शिक्षकों की भर्ती में मनमानी का जिक्र करते हुए बताते हैं कि लखनऊ के एक मदरसे में छात्र तो 429 ही हैं लेकिन शिक्षक 611 देवरिया के मदरसे में 240 छात्र हैं लेकिन शिक्षक 14 हैं जबकि राष्ट्रीय स्तर पर 30 छात्रों पर एक शिक्षक का अनुपात है।

Wednesday, May 27, 2026

बच्चों को मोबाइल से दूर रहने, संस्कारों से जुड़ने और अपनी छुट्टियों को पूरी तरह से 'प्लास्टिक-मुक्त' बनाने का स्नेहिल संदेश, गर्मी की छुट्टियों पर 'सीएम योगी' की बच्चों को पाती

बच्चों को मोबाइल से दूर रहने, संस्कारों से जुड़ने और अपनी छुट्टियों को पूरी तरह से 'प्लास्टिक-मुक्त' बनाने का स्नेहिल संदेश, गर्मी की छुट्टियों पर 'सीएम योगी' की बच्चों को पाती


उत्तर प्रदेश में स्कूलों की गर्मी की छुट्टियां शुरू होते ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बच्चों के नाम एक बेहद भावुक खुला खत लिखा है. 'योगी अंकल' ने बच्चों से इन छुट्टियों में मोबाइल और रील्स की स्क्रीन से दूर रहने, नानी-दादी के घर जाकर संस्कार सीखने और इस वैकेशन को पूरी तरह 'प्लास्टिक-मुक्त' बनाने की बड़ी अपील की है.


लखनऊ ।  उत्तर प्रदेश में स्कूलों की गर्मी की छुट्टियां शुरू होते ही सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एक बिल्कुल अलग और संवेदनशील अंदाज में नजर आए हैं. बच्चों के 'योगी अंकल' ने आज, 25 मई 2026 को राज्य के स्कूली बच्चों और उनके अभिभावकों के नाम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक बेहद भावुक और प्रेरक खुला खत साझा किया है. इस खत को 'योगी की पाती' नाम दिया गया है, जिसमें उन्होंने बच्चों को मोबाइल स्क्रीन से दूर रहने, संस्कारों से जुड़ने और अपनी छुट्टियों को पूरी तरह से 'प्लास्टिक-मुक्त' बनाने का कड़ा और स्नेहिल संदेश दिया है. 


'मेरे प्यारे बच्चों... किताबों से दोस्ती करो, नई भाषा सीखो' मुख्यमंत्री ने बच्चों को संबोधित करते हुए लिखा कि स्कूल की व्यस्त दिनचर्या और परीक्षाओं के परिणाम के बाद मिलने वाला यह अवकाश केवल खाली बैठने के लिए नहीं, बल्कि कुछ नया तलाशने का समय है. सीएम योगी ने लिखा:

"मेरे प्यारे बच्चों, गर्मी की छुट्टियां आप सभी के लिए आनंद, उत्साह और नए शोध का समय लेकर आती हैं. व्यस्त रूटीन से मुक्ति मिलते ही मन कुछ नया सीखने के लिए उत्सुक हो जाता है. यह समय अपनी रुचियों को पहचानने, अच्छी किताबों से दोस्ती करने, फोटोग्राफी, पेंटिंग, कुकिंग, संगीत और बागवानी जैसे शौक विकसित करने का है."

उन्होंने किशोरों और युवाओं से विशेष अपील की कि वे इस खाली समय का उपयोग कोई नई भाषा सीखने या कोई नया हुनर (Skill Acquisition) हासिल करने की प्रक्रिया में करें. 


पेरेंट्स से अपील: 'बच्चों को ले जाएं नानी-दादी के घर' खत के दूसरे हिस्से में सीएम योगी ने अभिभावकों (Parents) को सीधे संबोधित करते हुए आज के डिजिटल दौर की एक बड़ी कमी पर चोट की. उन्होंने लिखा कि आज के बच्चे दादा-दादी और नाना-नानी की कहानियों से दूर होते जा रहे हैं.

संस्कारों से जुड़ाव: सीएम ने पेरेंट्स से कहा कि इन छुट्टियों में बच्चों को उनके ननिहाल और ददिहाल जरूर लेकर जाएं, ताकि वे अपने परिवार के साथ समय बिता सकें और हमारे पारिवारिक मूल्यों, संस्कृति और परंपराओं को करीब से समझ सकें.

प्रकृति से दोस्ती: उन्होंने माता-पिता से अपील की कि बच्चों को मिट्टी, पानी और वृक्षों का महत्व समझाएं. बच्चों के हाथों से पौधे लगवाएं और उन पौधों की देखभाल की जिम्मेदारी भी बच्चों को ही सौंपें.

छुट्टियों को 'प्लास्टिक-मुक्त' बनाएं पर्यावरण संरक्षण पर विशेष जोर देते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पूरे प्रदेश से एक बड़ा संकल्प लेने का आह्वान किया है. उन्होंने लिखा:

'मेरी आप सभी से अपील है कि इन छुट्टियों को पूरी तरह से 'प्लास्टिक-मुक्त' बनाने का संकल्प लें. आप कहीं भी घूमने जाएं या पिकनिक पर जाएं, हमेशा कपड़े या जूट के थैलों का ही उपयोग करें. प्लास्टिक का कचरा कहीं भी न फेंकें. आज के ये छोटे-छोटे प्रयास ही भविष्य में बड़े बदलावों का आधार बनते हैं.' 

सीएम ने बच्चों को उत्तर प्रदेश की प्राकृतिक संपदा से रूबरू कराने के लिए उन्हें दुधवा नेशनल पार्क, चूका बीच और कतर्नियाघाट वाइल्डलाइफ सेंचुरी जैसे प्राकृतिक स्थलों पर ले जाने का भी सुझाव दिया.

Monday, May 11, 2026

बच्चों को तनाव से बचने के गुर भी सिखाएंगे स्कूल, मंत्रालय जारी करेगा बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े दिशा-निर्देश, शिक्षक होंगे प्रशिक्षित

बच्चों को तनाव से बचने के गुर भी सिखाएंगे स्कूल, मंत्रालय जारी करेगा बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े दिशा-निर्देश, शिक्षक होंगे प्रशिक्षित

परीक्षा परिणाम सहित साइबर बुलिंग की बढ़ती घटनाएं बच्चों के बढ़ते तनाव की मानी जा रही हैं मुख्य वजह


नई दिल्ली: खेलने, कूदने और पढ़ने की उम्र में बच्चों में तनाव के बढ़ते मामलों को देखते हुए अब स्कूल उन्हें पढ़ाने के साथ तनाव मुक्त रहने की भी सीख देंगे। शिक्षा मंत्रालय ने मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े विशेषज्ञों की मदद से बच्चों को तनाव से बचाने के लिए एक विस्तृत गाइडलाइन पर काम शुरू किया है। इसमें स्कूलों में पढ़ने वाले प्रत्येक बच्चे पर न सिर्फ नजर रखी जाएगी, बल्कि स्कूलों में पढ़ाने वाले प्रत्येक शिक्षक को भी मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा प्रशिक्षण दिया जाएगा। इस प्रशिक्षण की मदद से शिक्षक कक्षा में पढ़ाते समय ऐसे बच्चों को पहचान सकेंगे, जिन्हें तनाव हो रहा है। इसके साथ ही काउंसलिंग और मेडिटेशन के जरिए उनके तनाव को भगाने में मदद करेंगे।


शिक्षा मंत्रालय के स्कूली शिक्षा विभाग से जुड़े अधिकारियों ने इस गाइडलाइन के जून के पहले हफ्ते तक आने की उम्मीद जताई है। सूत्रों के अनुसार, पिछले कुछ सालों में पढ़ाई और परीक्षा परिणामों से जुड़े तनावों के साथ ही साइबर बुलिंग यानी इंटरनेट गेम, मैसेजिंग एप्स और अन्य इंटरनेट माध्यमों के जरिए भी बच्चों के तनाव ग्रस्त होने के मामले बढ़े हैं। ऐसे में तैयार की जा रही नई गाइडलाइन में इन सभी पहलुओं से बच्चों को बचाने पर फोकस किया गया है। खासकर कोविड के बाद से स्कूलों में मोबाइल या अन्य डिजिटल माध्यमों से पढ़ाने को बढ़ावा दिया गया है, जिससे बच्चों के बीच इसका इस्तेमाल तो बढ़ा है, लेकिन इसके सुरक्षित प्रयोग को लेकर बच्चों को सतर्क न करने से वे गेमिंग या इंटरनेट मीडिया के अन्य एप्स में फंस गए हैं, जो उनके तनाव बढ़ने का एक प्रमुख कारण माना जा रहा है।


तनाव के बढ़ते मामलों को लेकर नीति आयोग ने भी उठाए थे सवाल

मंत्रालय ने यह पहल ऐसे समय शुरू की है, जब नीति आयोग ने भी हाल ही में बच्चों में तनाव बढ़ने के मामलों को लेकर सवाल उठाए थे। साथ ही कहा कि बच्चों को इससे बचाने के लिए काउंसलर नियुक्त करने की पहल पर भी शैक्षणिक संस्थानों ने काम नहीं किया। वहीं तनाव ग्रस्त बच्चों को पहचानने के लिए शिक्षकों को भी प्रशिक्षण नहीं दिया गया। यही वजह है कि तैयार की जा रही नई गाइडलाइन में शिक्षकों के प्रशिक्षण पर जोर दिया गया है। इसके साथ ही डिजिटल माध्यमों के सुरक्षित इस्तेमाल पर भी ध्यान दिया गया है। इस पहल में स्कूलों में बच्चों के माता-पिता और संरक्षकों के साथ लगातार बैठकों को शामिल किया जा रहा है ताकि बच्चों में देखे जाने वाले बदलावों पर चर्चा की जा सके।

Friday, April 3, 2026

प्रदेश के राजकीय, अशासकीय सहायता प्राप्त और स्ववित्त पोषित माध्यमिक विद्यालयों में ऑनलाइन आर्टीफिशियल इन्टेलीजेंस अवेयरनेस प्रोग्राम में कक्षा 11 और 12 के अधिक से अधिक छात्र-छात्राओं का पंजीकरण कराने के सम्बन्ध में।

प्रदेश के राजकीय, अशासकीय सहायता प्राप्त और स्ववित्त पोषित माध्यमिक विद्यालयों में ऑनलाइन आर्टीफिशियल इन्टेलीजेंस अवेयरनेस प्रोग्राम में कक्षा 11 और 12 के अधिक से अधिक छात्र-छात्राओं का पंजीकरण कराने के सम्बन्ध में।


Wednesday, April 1, 2026

भारत में भी बच्चों की सोशल मीडिया पहुंच पर सख्ती की तैयारी, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की उम्र आधारित नियमों की सिफारिश

भारत में भी बच्चों की सोशल मीडिया पहुंच पर सख्ती की तैयारी,  राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की उम्र आधारित नियमों की सिफारिश


नई दिल्ली। बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग को लेकर सख्त नियम बनाने की दिशा में कदम तेज हो गए हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने सुझाव दिया है कि बच्चों को उनकी उम्र के अनुसार ही सोशल मीडिया तक पहुंच दी जाए और इसके लिए एक स्पष्ट नियामक ढांचा तैयार किया जाए।


आयोग के अनुसार, 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया के स्वतंत्र उपयोग की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। वहीं, 13 से 15 वर्ष के बच्चों के लिए माता-पिता की सहमति अनिवार्य हो और 15 से 18 वर्ष के किशोरों को सीमित और निगरानी के साथ उपयोग की छूट दी जाए। आयोग का मानना है कि इससे बच्चों की सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य की बेहतर रक्षा की जा सकेगी।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के बजाय अधिक जोखिम वाले फीचर्स पर नियंत्रण किया जाना चाहिए। साथ ही, बच्चों की गोपनीयता और डेटा सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए ताकि उनके अधिकार सुरक्षित रह सकें।

आयोग ने उम्र सत्यापन प्रणाली को अनिवार्य बनाने की भी सिफारिश की है, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि बच्चे तय नियमों के अनुसार ही सोशल मीडिया का उपयोग कर रहे हैं। इसके अलावा, एक केंद्रीय नियामक संस्था के गठन का सुझाव दिया गया है, जो इन नियमों के पालन की निगरानी करेगी।

रिपोर्ट में ऑस्ट्रेलिया का उदाहरण देते हुए बताया गया है कि वहां बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग को लेकर सख्त प्रावधान लागू किए गए हैं, जहां नियमों का उल्लंघन करने पर कंपनियों पर भारी जुर्माना लगाया जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों के बढ़ते डिजिटल एक्सपोजर को देखते हुए इस तरह के नियम समय की मांग हैं। यदि इन सिफारिशों को लागू किया जाता है, तो यह बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकता है।

Tuesday, March 31, 2026

सीएम "योगी की पाती" से छात्रों को संदेश – नए सत्र में शिक्षा, संस्कार और खेल पर जोर

सीएम "योगी की पाती" से छात्रों को संदेश – नए सत्र में शिक्षा, संस्कार और खेल पर जोर

Monday, October 27, 2025

शिक्षा मंत्रालय ने स्कूली शिक्षा को लेकर पेश की विरोधाभासी तस्वीर

8,000 स्कूलों में एक छात्र नहीं, पर तैनात हैं 20,000 शिक्षक

दूसरी तरफ, देश में एक लाख से अधिक ऐसे स्कूल हैं जो सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे चल रहे एवं उनमें पढ़ते हैं 33 लाख से अधिक छात्र

शिक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, शून्य नामांकन वाले सबसे अधिक 3,812 स्कूल पश्चिम बंगाल में हैं जहां 17,965 शिक्षकों की तैनाती


नई दिल्लीः स्कूलों में शिक्षकों की कमी पर उठते सवाल के बीच शिक्षा मंत्रालय ने राज्यों में शिक्षकों की असमान तैनाती को लेकर गंभीर सवाल उठाए है। साथ ही, राज्यों को आईना दिखाने के लिए दो तस्वीर भी पेश की है। मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, देशभर में करीब 8,000 स्कूल ऐसे हैं जहां एक भी बच्चे का नामांकन नहीं है, लेकिन फिर भी उन स्कूलों में 20 हजार से अधिक शिक्षकों की तैनाती है। यानी, ऐसे स्कूलों में औसतन ढाई शिक्षक हैं जो बैठे-बैठे ही वेतन पा रहे हैं। दूसरी ओर, देश में एक लाख से अधिक ऐसे स्कूल हैं जो एक शिक्षक के भरोसे चल रहे है और जिसमें पढ़ने वाले बच्चों की संख्या 33 लाख से अधिक है।


शिक्षा मंत्रालय ने स्कूली शिक्षा को लेकर यह विरोधाभासी तस्वीर तब पेश की है, जब वह सभी राज्यों में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) के अमल में तेजी से जुटी है। शिक्षा और स्कूलों में शिक्षकों की तैनाती पूरी तरह से राज्य का विषय है। बावजूद इसके, केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय का लगातार इस बात पर जोर रहता है कि स्कूलों में छात्रों को अच्छी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देते हुए छात्र-शिक्षक अनुपात को बेहतर रखा जाए। इसमें प्रत्येक 30 छात्र पर कम से कम एक शिक्षक होना जरूरी है। आर्थिक-सामाजिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों के स्कूलों में प्रत्येक 25 बच्चों पर कम से कम एक शिक्षक की तैनाती देने की सिफारिश है।

शिक्षा मंत्रालय की ओर से राज्यों के स्कूलों की स्थिति पर तैयार की गई 2024-25 की रिपोर्ट में शून्य नामांकन वाले स्कूलों की संख्या में पिछले साल के मुकाबले काफी सुधार हुआ है। इससे पहले ऐसे स्कूलों की संख्या करीब 13 हजार थी, जो अब 7,993 रह गई है। इनमें शून्य नामांकन वाले सबसे अधिक 3,812 स्कूल अकेले पश्चिम बंगाल के हैं जिनमें 17,965 शिक्षकों की तैनाती है। गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में शिक्षकों की भर्ती हमेशा से विवादों में रही है। यह इस ओर भी संकेत करता है कि वहां राजनीति साधने के लिए बड़ी संख्या में शिक्षकों की भर्ती हो रही है। इसके साथ ही तेलंगाना में 2,245, मध्य प्रदेश में 463, कर्नाटक में 270, तमिलनाडु में 311, झारखंड में 107, जम्मू-कश्मीर में 146, उत्तर प्रदेश में 81 और उत्तराखंड में 39 स्कूल शून्य नामांकन वाले हैं। इन स्कूलों में एक भी छात्र का नामांकन नहीं है, फिर भी इनमें 20,817 शिक्षकों की तैनाती दी गई है।

वहीं, देश में एकल शिक्षक वाले स्कूलों की सर्वाधिक संख्या (12,912) आंध्र प्रदेश में है, जबकि 9,508 स्कूलों के साथ उत्तर प्रदेश दूसरे स्थान पर है। उल्लेखनीय है कि शिक्षा मंत्रालय हर साल सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के स्कूलों की स्थिति को लेकर एक रिपोर्ट तैयार करता है जिसका ब्यौरा राज्य खुद देते हैं। जरूरत पड़ने पर शिक्षा मंत्रालय की ओर से थर्ड पार्टी सर्वेक्षण भी कराया जाता है।

Friday, October 24, 2025

ड्रापबाक्स में अटका 5.74 लाख बच्चों का डाटा, 31 अक्टूबर तक यूडायस पोर्टल पर ड्रापबाक्स खाली करने का परिषदीय स्कूलों पर पड़ रहा दबाव

ड्रापबाक्स में अटका 5.74 लाख बच्चों का डाटा, 31 अक्टूबर तक यूडायस पोर्टल पर ड्रापबाक्स खाली करने का परिषदीय स्कूलों पर पड़ रहा दबाव

बोर्ड परीक्षा के रजिस्ट्रेशन के समय परमानेंट एजुकेशन नंबर नहीं होने से हो सकती परेशानी

लखनऊसरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले कक्षा एक से सातवीं तक के 5,74,132  बच्चों का डाटा यू-डायस पोर्टल के ड्रापबाक्स में फंसा हुआ है। पोर्टल पर छात्रों का पूरा रिकार्ड नाम, जन्मतिथि, आधार नंबर और कक्षा की जानकारी दर्ज की जाती है। किसी बच्चे का रिकार्ड तब तक ड्रापबाक्स में रहता है, जब तक उसका डाटा अगले स्कूल में इंपोर्ट (स्थानांतरण) नहीं हो जाता। ऐसे बच्चे जब नौवीं कक्षा में जाएंगे तो बोर्ड परीक्षा के रजिस्ट्रेशन के समय परमानेंट एजुकेशन नंबर नहीं होने से परेशानी हो सकती है।

फिलहाल बड़ी संख्या में बच्चों का डाटा इंपोर्ट नहीं हो पाया है। कई बच्चे पांचवीं या आठवीं पास करने के बाद अपने परिवार के साथ राज्य से बाहर चले गए हैं, जिससे उनसे संपर्क नहीं हो पा रहा। कुछ बच्चों ने गैर-मान्यता प्राप्त स्कूलों में दाखिला ले लिया है, जिनका डाटा सिस्टम में ट्रांसफर नहीं हो सकता।

परिषदीय स्कूल के प्रधानाध्यापकों - का कहना है कि ड्रापबाक्स खाली कराने का दबाव बेसिक शिक्षा अधिकारियों की ओर से डाला जा रहा है, जबकि कई मामलों में छात्रों की जन्मतिथि, आधार कार्ड और ट्रांसफर सर्टिफिकेट (टीसी) में अंतर है। कुछ के नाम आधार और यू-डायस पोर्टल पर अलग अलग दर्ज हैं, जिससे सिस्टम डाटा स्वीकार नहीं कर रहा। जिन बच्चों का जन्म प्रमाणपत्र या आधार कार्ड नहीं है, उन्हें कुछ स्कूलों ने अस्थायी रूप से '9999' डालकर पंजीकृत किया है।

ग्रामीण इलाकों में स्थिति और गंभीर है। कुछ स्कूल आरटीई (शिक्षा के अधिकार) 2009 के नियमों का उल्लंघन करते हुए कक्षा पांच या आठ पास बच्चों को फिर से निचली कक्षा में दाखिला दे रहे हैं, जिससे भी डाटा ट्रांसफर नहीं हो पा रहा। 

बेसिक शिक्षा विभाग के अधिकारियों का कहना है कि ड्रापबाक्स में डाटा फंसे होने का मतलब यह नहीं है कि बच्चे स्कूल नहीं जा रहे हैं, बल्कि सिर्फ उनका परमानेंट एजुकेशन नंबर (पेन) नए स्कूल में ट्रांसफर नहीं हो पाया है। एक स्कूल से दूसरे स्कूल में जाने वाले बच्चों का डाटा स्थानांतरित करने की जिम्मेदारी प्रधानाध्यापक की है। अगर किसी बच्चे ने पांचवीं पास करने के बाद निचली कक्षा में प्रवेश ले लिया है, तो संबंधित स्कूल के प्रधानाध्यापक फार्म भरकर इसे ठीक कर सकते हैं। सभी जिलों के बेसिक शिक्षा अधिकारियों को 31 अक्टूबर तक समीक्षा कर गलत प्रविष्टियों को सुधारने के निर्देश दिए गए हैं





जानिए! ड्रॉप बॉक्स में बच्चों की संख्या में वृद्धि के कारण, यू-डायस पर प्रदर्शित ड्राप आउट वाले बच्चों की संख्या से जिम्मेदारों की चिंता बढ़ी


लखनऊ। उत्तर प्रदेश में तमाम प्रयासों के बावजूद अभी भी 5,74,132 लाख बच्चे स्कूलों से दूर हैं। यू-डायस पर प्रदर्शित ड्राप आउट वाले इन बच्चों की संख्या जिम्मेदारों के लिए परेशानी का कारण बना हुआ है। ड्राप बॉक्स में बच्चों की संख्या में इजाफा का सबसे बड़ा कारण जटिल नियम मने जा रहे हैं। कहीं आधार व यू डायस पर बच्चों के नाम मैच नहीं हैं, तो कहीं जन्मतिथि समेत अन्य गड़बड़ियों से मामला फंसा हुआ है। हजारों ऐसे बच्चें हैं जिन्होंने

कक्षा पांच पास करने के बाद गैर मान्यता प्राप्त स्कूलों या मदरसों में अपना नाम लिखा लिया, यह भी एक कारण बताया जा रहा है। यह भी बताया जा रहा है कि हजारों बच्चे कक्षा 5 या 8 पास करने के बाद स्कूलों से टीसी लेकर राज्य से बाहर चले गए और उनसे कोई संपर्क नहीं हो पा रहा है। ऐसे में इन बच्चों को इम्पोर्ट करवाया जाना संभव नहीं है और इनके नाम भी ड्रॉप बॉक्स में पड़े हैं। इसी प्रकार ड्रॉप बॉक्स में कुछ ऐसे भी बच्चे हैं, जिनके यू-डायस पोर्टल पर जन्म तिथि आधार के अनुसार है और टीसी में अलग है।


ड्रॉप बॉक्स में बच्चों की संख्या में वृद्धि के कारण

बेसिक स्कूलों अभी भी लाखों बच्चों के पास आधार न होना

विद्यालय व विभाग के पास आधार बनाने का विशेष अधिकार न होना

माध्यमिक स्कूलों द्वारा अपने यहां नामांकित बच्चों का इंपोर्ट न करना

गैर मान्यता प्राप्त विद्यालयों पर शिकंजा न कसा जाना

गैर मान्यता प्राप्त स्कूलों में अपना नामांकन कराना



परिषदीय विद्यालयों के 'लापता' बच्चे ड्रॉपबॉक्स में, बच्चों की तलाश में गुरु जी हलाकान, ड्राप बाक्स में सब से अधिक आठ पास विद्यार्थी


परिषदीय विद्यालयों में बच्चों की उपस्थिति को लेकर बड़ी समस्या सामने आई है। विभागीय जांच में पाया गया कि विभिन्न स्कूलों के ड्राप बाक्स में लाखों बच्चे हैं। ड्राप बाक्स का अर्थ है कि आनलाइन सिस्टम के जरिए छात्र रिकार्ड प्रबंधन। विशेष रूप से विद्यालय छोड़ने वाले बच्चों को ट्रैक करने के लिए यू डावस प्लस पोर्टल जैसे सिस्टम में इसका उपयोग होता है। लापता  बच्चों का कोई विवरण यू डायस पोर्टल पर अभी तक नहीं है। बेसिक शिक्षकों पर इन बच्चों की तलाश का दबाव है और इस दबाव के चक्कर में स्कूलों की पढ़ाई चौपट है।


विभागीय रिपोर्ट के अनुसार, लापता बच्चों की संख्या बढ़ने के कई कारण हैं, पहला पारिवारिक स्थिति ठीक न होने की वजह से बहुत से बच्चों ने पढ़ाई छोड़ दी है। दूसरा कुछ बच्चे दूसरे स्कूलों में चले गए लेकिन उनके दूसरे विद्यालय में जाने संबंधी विवरण नहीं दर्ज किया गया। तीसरी वजह निजी स्कूलों में प्रवेश के बाद भी बच्चों का नाम सरकारी अभिलेखों से नहीं हटाया गया। इसके अतिरिक्त निर्देशों के बावजूद स्कूलों द्वारा बच्चों के नाम अपडेट या हटाने का कार्य समय से नहीं किया गया। 


ड्राप बाक्स में कक्षावार बच्चों की संख्या देखें तो सबसे अधिक आठवीं कक्षा में विद्यार्थी है। खास यह कि काफी विद्यार्थी अब भी पुरानी कक्षा में है। उनको यू डायस पर कक्षोन्नति नहीं किया गया है।


Monday, October 20, 2025

यूपी के राजकीय और एडेड माध्यमिक विद्यालयों में पुरातन छात्र सम्मेलन अगले माह से, हर विद्यालय में बनेगी पुरातन छात्र परिषद साल में दो बार होगी बैठक

यूपी के राजकीय और एडेड माध्यमिक विद्यालयों में पुरातन छात्र सम्मेलन अगले माह से, हर विद्यालय में बनेगी पुरातन छात्र परिषद साल में दो बार होगी बैठक

पूर्व छात्रों का अनुभव बनेगा विद्यालय विकास की नई ताकत


लखनऊ। अब माध्यमिक विद्यालयों में पुराने छात्रों -से फिर जुड़ने का मौका मिलने वाला है। प्रदेशभर के राजकीय व एडेड माध्यमिक विद्यालयों में अगले माह ई से पुरातन छात्र सम्मेलन शुरू किए जाएंगे। इसके लिए हर विद्यालय में पुरातन छात्र परिषद गठित करने पं के निर्देश जारी किए गए हैं।


जेडी (माध्यमिक) और जिला विद्यालय निरीक्षक की ओर से प्रधानाचार्यों को कहा गया है कि परिषद का गठन जल्द पूरा करें और सम्मेलन की तैयारियां शुरू करें। इसका उद्देश्य पूर्व और वर्तमान छात्रों के में बीच सेतु बनाना है, ताकि विद्यालय के विकास जैसे । नए कक्ष, पुस्तकालय या संसाधन निर्माण में पुरातन छात्रों का योगदान लिया जा सके।  शासन की गाइडलाइन के अनुसार नवंबर से सम्मेलन होंगे। राजधानी सहित मंडल के सभी राजकीय व एडेड कॉलेजों में तैयारियां जोरों पर हैं।



जानिये कौन होंगे परिषद के सदस्य
विद्यालय से पास होकर निकले ऐसे विद्यार्थी, जिन्होंने कला, संस्कृति, व्यवसाय, सरकारी सेवा, खेलकूद या समाजसेवा में विशेष योगदान दिया हो, परिषद् के सदस्य बनेंगे। प्रारंभ में कम से कम तीन ऐसे छात्रों को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाएगा।

दो बार होगी बैठक
हर वर्ष दो बार पुरातन छात्र परिषद की बैठक होगी, जिसमें पूर्व छात्र अपने अनुभव साझा करेंगे और विद्यालय विकास के लिए सुझाव देंगे

Wednesday, August 13, 2025

बेसिक स्कूलों में 50 छात्रों पर दो शिक्षक व एक शिक्षामित्र होंगे तैनात

बेसिक स्कूलों में 50 छात्रों पर दो शिक्षक व एक शिक्षामित्र होंगे तैनात

विधान सभा प्रश्नकाल में बेसिक शिक्षा मंत्री संदीप सिंह बोले, छात्र-शिक्षक अनुपात और बेहतर बनाया जाएगा

कहा- विपक्ष ने विलय व्यवस्था का राजनीतिकरण कर आमजन को किया है गुमराह


लखनऊ । बेसिक शिक्षा मंत्री संदीप सिंह ने मंगलवार को विधान सभा में एक प्रश्न के जवाब में बताया कि विलय के बाद विद्यालयों में 50 छात्रों पर दो शिक्षक और एक शिक्षामित्र की तैनाती की जाएगी। छात्र-शिक्षक अनुपात को सुधारने और शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए ऐसा किया जाएगा। स्कूलों में बच्चों के प्रवेश की आयु चार वर्ष करना संभव नहीं, शिक्षा के अधिकार अधिनियम के प्रविधान इसकी अनुमति नहीं देते हैं। तीन से छह वर्ष के बच्चों के लिए आंगनबाड़ी में पढ़ाई व पोषण की व्यवस्था पहले से है। वर्तमान में प्राथमिक विद्यालयों में 1.05 करोड़ बच्चे नामांकित हैं। इनमें 3,38,590 शिक्षक और 1,43,450 शिक्षामित्र तैनात हैं।


सपा के पंकज पटेल, अनिल प्रधान व प्रभु नारायण सिंह के प्रश्न पर संदीप ने कहा कि विपक्ष ने स्कूलों की विलय व्यवस्था का पूरी तरह राजनीतिकरण कर आमजन को गुमराह किया है। सच्चाई यह है कि सरकार ने शिक्षा के स्तर को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने के लिए ऐतिहासिक कार्य किए हैं। वर्तमान में परिषदीय विद्यालयों में कुल नामांकित छात्रों की संख्या लगभग 1.48 करोड़ से अधिक है। परिषदीय विद्यालयों में शिक्षकों, शिक्षामित्रों और अनुदेशकों की कुल संख्या 6.28 लाख से अधिक है। उच्च प्राथमिक विद्यालयों में 43,01,483 बच्चों को पढ़ाने के लिए 1,20,860 शिक्षक और 25,223 अनुदेशक हैं।

प्राथमिक शिक्षा में छात्र-शिक्षक अनुपात 30:1 और उच्च प्राथमिक शिक्षा में 35:1 का अनुपात है। यह पूरी तरह संतुलित है और इसे बनाए रखने की कार्रवाई जारी रहेगी। स्कूल बंद करने के आरोपों को खारिज करते हुए मंत्री ने कहा कि सरकार ने एक भी विद्यालय बंद करने का निर्णय नहीं किया है।

सभी परिषदीय विद्यालय बेसिक शिक्षा विभाग के अंतर्गत संचालित हो रहे हैं। स्कूलों के विलय पर मंत्री ने बताया कि एक किलोमीटर के दायरे और 50 से कम छात्र संख्या वाले विद्यालयों की ही पेयरिंग की गई है। इन स्कूलों को संसाधनयुक्त विद्यालयों में समाहित किया गया है, ताकि बच्चों को बेहतर सुविधा और निकटतम स्कूल की पहुंच मिले। 

Saturday, July 26, 2025

यूपी में उमस-गर्मी से 40 स्कूली बच्चे बेहोश, एक की मौत

यूपी में उमस-गर्मी से 40 स्कूली बच्चे बेहोश, एक की मौत
 
हरदोई में 13, बाराबंकी में 16 और सीतापुर में सात बच्चे स्कूल में में बेहोश,  बाराबंकी में एक छात्र ने दम तोड़ा, अलीगढ़ में कीटनाशक से सात बेसुध

बाराबंकी/सीतापुर/हरदोई । उमस भरी गर्मी बच्चों पर भारी पड़ रही है। हरदोई, बाराबंकी, सीतापुर, सुलतानपुर में शुक्रवार को 40 बच्चे बेहोश गए, इनमें से बाराबंकी के हैदरगढ़ में एक बच्चे की तबीयत बिगड़ने से मौत हो गई।


बाराबंकी में शुक्रवार को विभिन्न स्कूलों में पढ़ने वाले 16 छात्र-छात्राएं गर्मी के कारण चक्कर खाकर गिर पड़े, कई को बेहोशी की हालत में अस्पताल ले जाना पड़ा। हैदरगढ़ में एक हाईस्कूल छात्र की अचानक तबीयत बिगड़ने से मौत हो गई। 

सीतापुर में उमस भरी गर्मी से शुक्रवार को छह विद्यालयों के सात बच्चे बेहोश हो गए। नजदीकी स्वास्थ केंद्र में इलाज के बादघर भेजा गया। 

सुलतानपुर के पारसपट्टी विद्यालय के चार बच्चे एक-एक कर बेहोश हो गए। शिक्षकों के प्रयास से सामान्य होने के बाद अभिभावकों के साथ घर भेजा गया

हरदोई में 13 छात्राएं बीमारः नवोदय विद्यालय में बिजली कटौती, उमसभरी गर्मी से 13 छात्राओं की हालत बिगड़ गई। सात की हालत नाजुक होने पर जिला अस्पताल भेजा गया, छह प्राथमिक इलाज के बाद घर चले गए। रायबरेली में भी कक्षा 8 की एक छात्रा गर्मी से बेहोश हुई। शिक्षक संगठनों ने समय परिवर्तन की मांग की है।



विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए काउंसलिंग अनिवार्य, सुप्रीम कोर्ट ने शैक्षणिक संस्थानों में आत्महत्याएं रोकने के लिए जारी किए दिशा-निर्देश, कोचिंग संस्थानों के लिए 60 दिनों में नियम बनाएं राज्य

विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए काउंसलिंग अनिवार्य, सुप्रीम कोर्ट ने शैक्षणिक संस्थानों में आत्महत्याएं रोकने के लिए जारी किए दिशा-निर्देश, कोचिंग संस्थानों के लिए 60 दिनों में नियम बनाएं राज्य


नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा है कि देशभर में सभी कोचिंग संस्थानों को अनिवार्य रूप से पंजीकरण करना होगा। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को 60 दिन के भीतर सभी निजी कोचिंग सेंटरों के लिए छात्र सुरक्षा मानदंड और शिकायत निवारण तंत्र बनाने वाले नियम-कानून अधिसूचित करने का आदेश दिया है।


जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने स्कूलों, कॉलेजों और कोचिंग संस्थानों में पढ़ने वाले छात्रों में तेजी से बढ़ते आत्महत्या की प्रवृति और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के समाधान के लिए विस्तृत 15 दिशा-निर्देश जारी करते हुए यह फैसला दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के एक आदेश के खिलाफ दाखिल अपील पर आया। उच्च न्यायालय ने विशाखापत्तनम में मेडिकल पाठ्यक्रम में दाखिले के लिए राष्ट्रीय पात्रता-सह-प्रवेश परीक्षा (नीट) की तैयारी कर रही छात्रा की मौत की जांच सीबीआई को सौंपने की मांग को खारिज कर दिया था।


छात्रों के स्वास्थ्य पर भी रखनी होगी नजर
सभी शैक्षणिक संस्थान नियमित रूप से छात्र मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करेंगे। शैक्षणिक संस्थान गुमनाम रिकॉर्ड रखेंगे और एक वार्षिक रिपोर्ट तैयार करेंगे परीक्षा के अंकों और रैंक से परे पहचान की व्यापक भावना विकसित करने को पाठ्यक्रमों की समीक्षा करनी होगी। सभी शैक्षणिक संस्थान, जिनमें कोचिंग केंद्र और प्रशिक्षण संस्थान शामिल हैं, छात्रों और उनके माता-पिता या अभिभावकों के लिए नियमित, करियर परामर्श सेवाए प्रदान करेंगे।


पंखे या उपकरण इस तरह से लगाएं जिससे न की जा सके छेड़छाड़

पीठ ने कहा कि सभी आवासीय सुविधा वाले संस्थान छत वाले ऐसे पंखे या उपकरण इस तरह से लगाएं, जिससे छेड़छाड़ न की जा सके। छतों, बालकनियों और अन्य खतरे वाले क्षेत्रों तक पहुंच को प्रतिबंधित करेंगे। सभी शैक्षणिक संस्थान, विशेषकर कोचिंग संस्थान या केंद्र शैक्षणिक प्रदर्शन, सार्वजनिक रूप से बदनामी, या उनकी क्षमता से अधिक शैक्षणिक लक्ष्य सौंपने के आधार पर विद्यार्थियों के बैचों को अलग-अलग नहीं करेंगे।


आत्महत्या रोकथाम के लिए हेल्पलाइन जरूरी

सभी शैक्षणिक संस्थान मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं, स्थानीय अस्पतालों और आत्महत्या रोकथाम हेल्पलाइन और तत्काल रेफरल के लिए लिखित प्रोटोकॉल स्थापित करेंगे। टेली-मानस और अन्य राष्ट्रीय सेवाओं सहित आत्मघाती हेल्पलाइन नंबरों को छात्रावासों, कक्षाओं, साझा क्षेत्रों और बड़े और सुपाठ्य प्रिंट में वेबसाइटों पर प्रमुखता से प्रदर्शित किया जाएगा।


सभी कर्मचारियों का साल में दो बार प्रशिक्षण

संस्थान के सभी कर्मचारियों को वर्ष में दो बार अनिवार्य प्रशिक्षण देना होगा। प्रशिक्षण प्रमाणित मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर देंगे। इसमें मनोवैज्ञानिक प्राथमिक चिकित्सा, चेतावनी संकेतों की पहचान, आत्म-नुकसान की प्रतिक्रिया जैसे विषय शामिल रहेंगे।


100 या उससे अधिक विद्यार्थी होने पर परामर्शदाता जरूरी

दिशा-निर्देशों के अनुसार, 100 या उससे अधिक नामांकित विद्यार्थियों वाले संस्थानों को कम से कम एक परामर्शदाता, मनोविज्ञानी या सामाजिक कार्यकर्ता नियुक्त करना होगा। ये अधिकारी बच्चे और किशोर मानसिक स्वास्थ्य में प्रशिक्षित होने चाहिए। कम छात्रों वाले संस्थान बाहरी मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों के साथ औपचारिक रेफरल संबंध स्थापित करेंगे।

Sunday, May 25, 2025

CBSE Sugar Boards Diabetes : बच्चों में बढ़ रहे मधुमेह के मामलों को देखते हुए सीबीएसई ने दिया स्कूलों को आदेश – लगाएं शुगर बोर्ड

CBSE स्कूल छात्रों को देंगे चीनी से होने वाले नुकसान की जानकारी

लखनऊ। देश-प्रदेश के बच्चों में जंक फूड, शुगर स्नैक्स आदि के बढ़ते प्रयोग से उनमें मोटापा, डायबिटीज जैसी बीमारियां बढ़ रही हैं। इसे देखते हुए सीबीएसई के स्कूलों में छात्रों को चीनी के प्रयोग से होने वाले नुकसान और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक किया जाएगा। इसके लिए हर विद्यालय में शुगर बोर्ड लगाकर जानकारी दी जाएगी। सीबीएसई के इस निर्देश को प्रदेश में सख्ती से लागू करने की कवायद तेज कर दी गई है।

सीबीएसई ने सभी स्कूलों को निर्देश दिया है कि वे नए सत्र 2025-26 में 15 जुलाई तक अनिवार्य रूप से अपने यहां शुगर बोर्ड लगाएं। साथ ही इसकी फोटो भी सीबीएसई मुख्यालय को भेजें। इसके माध्यम से छात्रों को जागरूक किया जाएगा कि टाइप-टू-डायबिटीज के बढ़ने के क्या कारण हैं। 

सीबीएसई की निदेशक एकेडमिक डॉ. प्रज्ञा एम सिंह की ओर से जारी आदेश में इसके लिए कार्यशाला, सेमिनार आदि आयोजित करने के लिए कहा गया है। इसके साथ ही बच्चों को स्वास्थ्यवर्धक खाद्य पदार्थों जैसे ताजे फल, हरी सब्जी, श्रीअन्न, दूध आदि के सेवन के फायदे भी बताए जाएंगे।



CBSE Sugar Boards Diabetes : बच्चों में बढ़ रहे मधुमेह के मामलों को देखते हुए सीबीएसई ने दिया स्कूलों को आदेश – लगाएं शुगर बोर्ड

चीनी से होने वाली हानि, कितनी मात्रा में खाएं चीनी आदि की जानकारी मिलेगी शुगर बोर्ड से 


नई दिल्ली। प्रमुख संवाददाता देश में टाइप 2 मधुमेह के बच्चों में बढ़ते प्रभाव को देखते हुए केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने अपने से संबद्ध विद्यालयों को बच्चों के चीनी सेवन पर नजर रखने और उसे कम करने के लिए 'शुगर बोर्ड' लगाने का निर्देश दिया है। सीबीएसई ने इस बाबत एक सर्कुलर भी जारी किया है। जिसमें उल्लेख किया है कि पिछले दशक में बच्चों में टाइप 2 मधुमेह के मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो पहले मुख्य रूप से वयस्कों में देखा जाता था। बोर्ड ने स्कूल प्रधानाचार्यों को लिखे पत्र में कहा है कि यह खतरनाक प्रवृत्ति मुख्य रूप से चीनी के अधिक सेवन के कारण है, जो अकसर स्कूल के वातावरण में मीठे स्नैक्स, पेय पदार्थ और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की आसानी से उपलब्धता के कारण होता है।


चीनी के अत्यधिक सेवन से न केवल मधुमेह का खतरा बढ़ता है, बल्कि मोटापा, दांत की समस्याएं और अन्य चयापचय संबंधी विकार भी होते हैं, जो अंततः बच्चों के दीर्घकालिक स्वास्थ्य और शैक्षणिक प्रदर्शन को प्रभावित करते हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि 4 से 10 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए दैनिक कैलोरी सेवन में चीनी का हिस्सा 13 प्रतिशत है, तथा 11 से 18 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए यह 15 प्रतिशत है, जो अनुशंसित 5 प्रतिशत की सीमा से काफी अधिक है। 


रिपोर्ट में कहा गया है कि इस अत्यधिक सेवन के लिए स्कूल में आसानी से उपलब्ध होने वाले मीठे स्नैक्स, पेय पदार्थ और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का अत्यधिक उपयोग जिम्मेदार है। सीबीएसई की निदेशक (शैक्षणिक) डॉ. प्रज्ञा एम. सिंह द्वारा हस्ताक्षरित इस सर्कुलर में यह भी कहा गया है कि स्कूल इन गतिविधियों से संबंधित रिपोर्ट व फोटो https://shorturl.at/e33kc लिंक पर 15 जुलाई 2025 तक अपलोड करें। यह निर्देश राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) के कहने पर जारी किया गया। 


ज्ञात हो कि एनसीपीसीआर एक वैधानिक निकाय है, जिसका गठन बच्चों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करने लिए किया गया था, खासकर उन बच्चों के जो सबसे कमजोर और हाशिए पर हैं। विद्यालयों को 'शुगर बोर्ड' लगाने के लिए कहा गया है, जिस पर छात्रों को चीनी के अत्यधिक सेवन के जोखिमों के बारे में शिक्षित करने के लिए जानकारी प्रदर्शित की जाए। 


स्कूल आयोजित करेंगे जागरूकता सेमिनार 
सीबीएसई द्वारा विद्यालयों को इस संबंध में जागरूकता सेमिनार और कार्यशालाएं आयोजित करने के लिए भी कहा गया है। इसमें कहा गया है कि इस पट्टिका पर आवश्यक जानकारी प्रदान की जानी चाहिए, जिसमें अनुशंसित दैनिक चीनी का सेवन, आम तौर पर खाए जाने वाले खाद्य पदार्थ (जंक फूड, कोल्ड ड्रिंक्स आदि जैसे अस्वास्थ्यकर भोजन) में चीनी की मात्रा, उच्च चीनी के सेवन से जुड़े स्वास्थ्य जोखिम और स्वस्थ आहार विकल्प शामिल हैं। यह छात्रों को सूचित भोजन विकल्पों के बारे में शिक्षित करेगा और छात्रों के बीच दीर्घकालिक स्वास्थ्य लाभों को बढ़ावा देगा।


Monday, April 7, 2025

Say No! – 'न' कहने की कला भी बच्चों को सिखाएंगे शिक्षक, विद्यार्थियों में संचार कौशल संवर्द्धन के लिए बनाई गई गाइड, मनोविज्ञानशाला ने माध्यमिक शिक्षकों को दिया प्रशिक्षण

Say No! – 'न' कहने की कला भी बच्चों को सिखाएंगे शिक्षक, विद्यार्थियों में संचार कौशल संवर्द्धन के लिए बनाई गई गाइड, मनोविज्ञानशाला ने माध्यमिक शिक्षकों को दिया प्रशिक्षण


प्रयागराज । प्रदेश के 4512 सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों और 2460 राजकीय विद्यालयों में पढ़ने वाले कक्षा नौ से 12 तक के विद्यार्थियों को अब शिक्षक न कहने की कला भी सिखाएंगे। मनोविज्ञानशाला एवं निर्देशन विभाग के विशेषज्ञों ने ‘विद्यार्थियों में संचार कौशल संवर्द्धन’ के लिए शिक्षक गाइड तैयार की है और चरणबद्ध तरीके से शिक्षकों का प्रशिक्षण पूरा भी हो चुका है। अब नए सत्र में ये शिक्षक बच्चों को संचार कौशल की बारीकियां सिखाने के साथ ही बच्चों को कब और कहां न कहना है, इसकी जानकारी भी देंगे।

मनोविज्ञानशाला की निदेशक ऊषा चन्द्रा ने बताया कि बच्चों में संचार कौशल संवर्द्धन के लिए शिक्षकों को प्रशिक्षण दिया गया है। स्पष्टता की कमी, खराब श्रवण कौशल, सांस्कृतिक एवं भाषाई अवरोध, सूचना अवरोध, प्रतिपुष्टि की कमी आदि के कारण विद्यार्थी अपनी बातों, विचारों को सभी के समक्ष प्रभावी रूप से व्यक्त करने में सक्षम नहीं होते हैं जिसके लिए आवश्यक है कि उन्हें संचार में कौशलयुक्त बनाया जाए।



 ● नए सत्र में शिक्षक बच्चों को सिखाएंगे कब न कहना जरूरी

● कैसे करें अभिवादन, स्वयं और दूसरों का कैसे दें परिचय

🔴 कब नहीं कहना जरूरी 

● यदि आप असहज महसूस करते हैं।
● आप दोषी या बाध्य महसूस करते हैं।
● जब आप पर अधिक बोझ हो।
● यदि अनुरोध आपकी व्यक्तिगत सीमाओं को पार करता है।
● यदि आप किसी और को खुश करने के लिए ही हां कह रहे हैं।



🔴 नहीं कहना कैसे सीखें

● न कहने के लिए तार्किक कारण बताएं।
● स्पष्ट रहें।
● संक्षेप में कारण बताएं।
● आभार व्यक्त करें।
● कोई विकल्प दीजिए।
● अपने उत्तर पर अड़े रहें।
● अपने अनुरोध के नकारात्मक प्रभाव की व्याख्या करें।


नहीं कहना महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे विद्यार्थियों के सर्वोत्तम हितों की रक्षा होती है। मानसिक स्पष्टता बनाए रखने के लिए विद्यार्थियों को उन कार्यों को करने से मना करना चाहिए जिन्हें वह नहीं कर सकते। - ऊषा चन्द्रा, निदेशक मनोविज्ञानशाला

Tuesday, March 25, 2025

शिक्षण संस्थानों में आत्महत्याएं रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बनाई राष्ट्रीय टास्क फोर्स

शिक्षण संस्थानों में आत्महत्याएं रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बनाई राष्ट्रीय टास्क फोर्स

कहा-प्रदर्शन का दबाव, अत्यधिक प्रतिस्पर्धा छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर डाल रही बोझ


नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने उच्च शिक्षण संस्थानों में बढ़ती आत्महत्याओं को रोकने के लिए राष्ट्रीय टास्क फोर्स का गठन किया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि स्कोर आधारित शिक्षा प्रणाली और सीमित सीटों के लिए अत्यधिक मानसिक स्वास्थ्य पर भयानक बोझ डालते हैं। आत्महत्याएं बढ़ना परिसरों में ऐसे मुद्दों को संबोधित करने में कानूनी और संस्थागत ढांचे की अपर्याप्तता और अप्रभाविता की ओर इशारा करती हैं।


जस्टिस जेबी पारदीवाला व जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने छात्रों की मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को दूर करने और ऐसे संस्थानों में आत्महत्याओं को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस एस रवींद्र भट्ट की अध्यक्षता में राष्ट्रीय टास्क फोर्स का गठन किया। पीठ ने कहा, अब समय आ गया है कि हम इस गंभीर मुद्दे का संज्ञान लें और छात्रों के बीच इस तरह के संकट में योगदान देने वाले अंतर्निहित कारणों को दूर करने और कम करने के लिए व्यापक और प्रभावी दिशा-निर्देश तैयार करें।


टास्क फोर्स में मनोचिकित्सक डॉ. आलोक सरीन, प्रोफेसर मैरी ई जॉन, अरमान अली, प्रोफेसर राजेंद्र काचरू, डॉ. अक्सा शेख, डॉ. सीमा मेहरोत्रा, प्रोफेसर वर्जिनियस जाक्सा, डॉ. निधि एस सभरवाल और वरिष्ठ अधिवक्ता अपर्णा भट्ट भी शामिल होंगे। उच्च शिक्षा विभाग, सामाजिक न्याय और अधिकारिता विभाग, महिला और बाल विकास मंत्रालय और कानूनी मामलों के विभाग के सचिवों को टास्क फोर्स का पदेन सदस्य बनाया गया है।


एफआईआर दर्ज करने का आदेश

पीठ ने दिल्ली पुलिस को आयुष आशना और अनिल कुमार की मौत के मामले में एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया, जिन्होंने क्रमशः 8 जुलाई, 2023 और 1 सितंबर, 2023 को आत्महत्या की थी। उनके माता-पिता ने आईआईटी, दिल्ली में जाति-आधारित भेदभाव का आरोप लगाया था। दिल्ली हाईकोर्ट के याचिका पर विचार करने से इन्कार के खिलाफ याचिका को स्वीकार करते हुए पीठ ने कहा, भले ही पुलिस का मानना था कि जो आरोप लगाया गया था, उसमें सच्चाई का कोई तत्व नहीं था लेकिन वह एफआईआर दर्ज करने और जांच करने के बाद ही ऐसा कह सकती थी। यही कानून है।


यह अभिभावकों के लिए भी आंखें खोलने वाला

पीठ ने कहा, यह मुकदमा न सिर्फ पुलिस के लिए, बल्कि अभिभावकों के लिए भी आंखें खोलने वाला है। ये त्रासदियां विभिन्न कारकों को संबोधित करने के लिए एक अधिक मजबूत, व्यापक और उत्तरदायी तंत्र की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती हैं, जो कुछ छात्रों को अपनी जान लेने के लिए मजबूर करती हैं। हालांकि, इस संकट को मिटाना मुश्किल है, फिर भी इसे लचीले पाठ्यक्रम, निरंतर मूल्यांकन विधियों, बैकलॉग के प्रबंधन के लिए संरचित समर्थन और छात्रों की ओर से सामना किए जाने वाले मनोवैज्ञानिक मुद्दों के लिए परिसर में समर्थन शुरू करके प्रबंधित किया जा सकता है।


संस्थानों में आत्महत्या महामारी के लिए कई कारक जिम्मेदार

पीठ ने कहा कि शैक्षणिक संस्थानों में आत्महत्या महामारी के लिए कई कारक जिम्मेदार हैं, जिनमें शैक्षणिक दबाव, जाति आधारित भेदभाव, वित्तीय तनाव और यौन उत्पीड़न शामिल हैं, लेकिन यह इन्हीं तक सीमित नहीं है। आईआईटी व एनआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में परीक्षा में असफलता से जुड़ी उच्च दर रिपोर्ट की गई है।


रैगिंग के रूप में क्रूरता भी है अहम वजह

पीठ ने कहा, छात्रों की आत्महत्या का एक अन्य कारण रैगिंग के रूप में क्रूरता है। इसे अक्सर कॉलेज और विश्वविद्यालय अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए छिपाते हैं, जो छात्रों के सम्मान और शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन है।


Sunday, January 5, 2025

नौ साल में 12 लाख महिला शिक्षकों की हुई नियुक्ति, भारत में छात्रों का स्कूलिंग में समय बिताने का औसत बढ़ रहा

नौ साल में 12 लाख महिला शिक्षकों की हुई नियुक्ति, भारत में छात्रों का स्कूलिंग में समय बिताने का औसत बढ़ रहा

■ भारत में छात्रों की स्कूलिंग अवधि बढ़ी
■ दस सालों में प्रति छात्र खर्च 130 फीसदी बढ़ा


नई दिल्ली । देश में पिछले नौ साल में करीब 12 लाख अतिरिक्त महिला शिक्षक स्कूलों में नियुक्त हुई हैं। इसके अलावा स्कूलों की गुणवत्ता को लेकर कई मानकों में सुधार हुआ है। इसकी वजह से भारत में छात्रों का स्कूलिंग में समय बिताने का औसत बढ़ रहा है।


यह वर्ष 2013 में 11.81 वर्ष का था। अब यह बढ़कर 13.28 वर्ष तक पहुंच गया है। यानी अब छात्र ज्यादा समय तक स्कूलों में टिक रहे हैं और स्कूल से उच्च शिक्षा की ओर कदम बढ़ाने का रुझान सकारात्मक है। 


अधिकारियों का कहना है कि हम यूनीक आईडी से छात्रों के मूवमेंट को ट्रैक करके एक वास्तविक डेटा बैंक तैयार करने का प्रयास रहे हैं जिससे यह पता चल सके कि छात्र कब और कहां पढ़ाई कर रहे हैं। इससे यह भी पता चलेगा कि छात्रों ने किस स्तर पर स्कूलिंग छोड़ी। 


करीब 18 करोड़ छात्रों का डेटा एकत्र किया गया था। इनमें से 11 करोड़ का सत्यापन किया गया। शिक्षा मंत्रालय द्वारा एकत्र डेटा यह भी बताता है कि पिछले दस सालों में प्रति छात्र खर्च 130 फीसदी बढ़ा है। इससे स्कूलों में नामांकन से लेकर अधारभूत ढांचे में बढ़ोतरी हुई है।

Thursday, January 2, 2025

छात्रों को मोबाइल, लैपटॉप से दूर रखने का तरीका सीखेंगे शिक्षक, मनोविज्ञानशाला प्रदेश के शिक्षकों के लिए तैयार कर रही है एकाग्रता बढ़ाने वाली गाइड

छात्रों को मोबाइल, लैपटॉप से दूर रखने का तरीका सीखेंगे शिक्षक, मनोविज्ञानशाला प्रदेश के शिक्षकों के लिए तैयार कर रही है एकाग्रता बढ़ाने वाली गाइड


प्रयागराज । छात्र- छात्राओं को स्मार्टफोन, कंप्यूटर, टैबलेट, टीवी और सोशल मीडिया से दूर रखने के लिए शिक्षकों को प्रशिक्षण दिया जाएगा। माध्यमिक कक्षाओं में पढ़ने वाले 14 से 18 वर्ष के छात्र-छात्राओं को डिजिटल डिटॉक्स (एक तय समय के लिए मोबाइल, लैपटॉप आदि से दूर रखने के लिए) शिक्षकों की गाइड तैयार कर रहे हैं। मनोविज्ञानशाला की निदेशक उषा चंद्रा ने बताया कि गाइड बनने के बाद शिक्षकों को प्रशिक्षण दिया जाएगा और उसके बाद ये शिक्षक कक्षाओं में विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से बच्चों को रचनात्मकता की ओर प्रेरित करेंगे।


गतिविधि एकः पर्यावरण (40 मिनट)

शिक्षक विद्यार्थियों को स्कूल मैदान का भ्रमण कराएंगे ताकि वह प्रकृति से निकटता महसूस कर सकें। उनसे गमलों में पौधे लगवाएंगे और कुछ दल बनाकर पूरे साल निश्चित संख्या में पौधों की देखरेख का प्रोजेक्ट देंगे। अच्छे तरीके से देखभाल करने वाले बच्चों को प्रोत्साहन के रूप में प्रमाणपत्र वगैरह भी दे सकते हैं।


गतिविधि दोः एकाग्रता (40 मिनट)

सबसे पहले शिक्षक ब्लैकबोर्ड पर कैंची, गोंद, कागज, सुतली, दफ्ती और रंग के नाम लिखेंगे। उसके बाद विद्यार्थियों से पूछेंगे कि आंख बंद करके मन को एकाग्र करते हुए चिंतन करें कि इन चीजों का उपयोग करके वह क्राफ्ट से जुड़ी कौन कौन सी ची बना सकते हैं। उसके बाद उन्हें सामग्री देकर वस्तुएं बनवाएंगे और अपनी बनाई चीजों का प्रदर्शन करेंगे। इस गतिविधि में दूसरों और स्वयं की बनाई चीजों की सराहना करना सीखेंगे।


गतिविधि तीनः आओ किताब पढ़ें (40-45 मिनट)

शिक्षक छात्र-छात्राओं को लाइब्रेरी में ले जाएंगे और उन्हें अपनी रुचि के अनुसार पुस्तक, पत्रिका या अखबार चुनने को कहें। प्रत्येक विद्यार्थी को प्रेरित करें कि कम से कम एक कहानी या लेख ध्यानपूर्वक पढ़ें। अगले दिन विद्यार्थी से पढ़े हुए लेख या कहानी को सुनाने को कहें। शिक्षक विद्यार्थियों को प्रतिदिन अखबार पढ़ने के लिए प्रेरित करेंगे।


गतिविधि चारः समय का सदुपयोग (30-35 मिनट)

इसमें शिक्षक विद्यार्थियों को कुछ समय आंख बंद करके शांति की मुद्रा में बैठने के लिए कहेंगे। उसके बाद सादा कागज वितरित कर लिखने को कहेंगे कि प्रतिदिन कितना समय स्क्रीन अर्थात सोशल मीडिया पर व्यतीत करते हैं। थोड़ा समय देकर उनके नॉन डिजिटल शौक या रुचि का कक्षा में प्रदर्शन भी कराएंगे। उनसे पूछेंगे कि मनपसंद काम करके कैसा लगा और स्क्रीन से दूर रहने के लिए प्रेरित करेंगे।