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Sunday, November 8, 2020

बेसिक शिक्षा : आठ साल में भी नहीं बन सका इस जिले का बीएसए दफ्तर

बेसिक शिक्षा : आठ साल में भी नहीं बन सका इस जिले का  बीएसए दफ्तर


अमेठी। बेसिक शिक्षा विभाग के स्थाई कार्यालय का निर्माण स्वीकृति के आठ साल बाद भी पूरा नहीं हो सका है। यह स्थिति तब है जब कार्यदायी संस्था शासन से आवंटित 73.30 लाख रुपये खर्च कर चुकी है। 177.72 लाख की पुनरीक्षित लागत को स्वीकृति नहीं मिलने व धनावंटन नहीं होने से भवन निर्माण का काम सवा साल से ठप है।


एक जुलाई 2010 को जिले का पुनर्गठन होने के साथ ही शहर स्थित उच्च प्राथमिक विद्यालय कटरा लालगंज में बेसिक शिक्षा विभाग के कार्यालय का संचालन शुरू हुआ था। काम काज पटरी पर आने के बाद विभाग की ओर से की गई लिखा पढ़ी पर शासन ने वित्तीय वर्ष 2011-122 मेें सैठा रोड पर आवंटित भूमि पर बीएसए कार्यालय के लिए भवन निर्माण को स्वीकृति दी थी।
उस समय शासन ने डीपीआर के हिसाब से भवन निर्माण की लागत 73.30 लाख रुपये तय करते हुए 31 मार्च 2013 को पहली किश्त के रूप में 35 लाख रुपये आवंटित कर कार्यदायी संस्था समाज कल्याण निर्माण निगम को काम शुरू करने को कहा था। कार्यदायी संस्था ने निर्माण कार्य शुरू भी किया।


हालांकि बाद में मूल्य वृद्धि का हवाला देते हुए कार्यदायी संस्था ने लागत पुनरीक्षण का पत्र भेजकर स्वीकृति प्रदान करने की मांग की। शासन ने पुनरीक्षण को स्वीकृति देने के बजाए 31 मार्च 2017 को शुरुआती लागत की अवशेष दूसरी किश्त के रूप में 38.30 लाख रुपये आवंटित कर दिया। कार्यदायी संस्था ने इस धन को भी खर्च कर दिया। विभागीय सूत्रों की मानें तो अक्टूबर 2017 से ही भवन का निर्माण कार्य ठप पड़ा है।
भवन निर्माण को लेकर शासन की उदासीनता की वजह से कार्यदायी संस्था को तीन बार नए पुनरीक्षित आगणन को स्वीकृति प्रदान करने के लिए प्रशासन के माध्यम से पत्र भेजा गया। पहली बार स्वीकृत लागत 73.30 लाख को बढ़ाकर 130.18 लाख करने, दूसरी बार 130.18 लाख को 167 लाख करने व तीसरी बार 167 लाख को बढ़ाकर 177.42 लाख करने की मांग की गई। हालांकि शासन ने न तो पुनरीक्षित आगणन को स्वीकृति दी न ही धन आवंटित किया।


भवन निर्माण का कार्य पूरा हो सके इसके लिए विभाग की ओर से अपने विभागीय सचिव व निदेशक को भेजे गए दर्जनों पत्रों के साथ ही चार डीएम (जगतराज व चंद्रकांत पांडेय ने एक-एक तो योगेश कुमार व प्रशांत शर्मा ने दो-दो बार) ने छह-सात बार डीओ शासन को भेजा। बावजूद इसके शासन ने कोई ध्यान नहीं दिया।

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