DISTRICT WISE NEWS

अंबेडकरनगर अमरोहा अमेठी अलीगढ़ आगरा आजमगढ़ इटावा इलाहाबाद उन्नाव एटा औरैया कन्नौज कानपुर कानपुर देहात कानपुर नगर कासगंज कुशीनगर कौशांबी कौशाम्बी गाजियाबाद गाजीपुर गोंडा गोण्डा गोरखपुर गौतमबुद्ध नगर गौतमबुद्धनगर चंदौली चन्दौली चित्रकूट जालौन जौनपुर ज्योतिबा फुले नगर झाँसी झांसी देवरिया पीलीभीत फतेहपुर फर्रुखाबाद फिरोजाबाद फैजाबाद बदायूं बरेली बलरामपुर बलिया बस्ती बहराइच बागपत बाँदा बांदा बाराबंकी बिजनौर बुलंदशहर बुलन्दशहर भदोही मऊ मथुरा महराजगंज महोबा मिर्जापुर मीरजापुर मुजफ्फरनगर मुरादाबाद मेरठ मैनपुरी रामपुर रायबरेली लखनऊ लख़नऊ लखीमपुर खीरी ललितपुर वाराणसी शामली शाहजहाँपुर श्रावस्ती संतकबीरनगर संभल सहारनपुर सिद्धार्थनगर सीतापुर सुलतानपुर सुल्तानपुर सोनभद्र हमीरपुर हरदोई हाथरस हापुड़

Saturday, December 5, 2020

क्या शिक्षकों के हितों की बात कर पाएंगे राजनीतिक दलों के शिक्षक एमएलसी?

यूपी : दिग्गजों के हारने से अब उच्च सदन में कुंद होगी शिक्षकों से जुड़े मुद्दों की धार, अंदरूनी गुटबाजी ले डूबी


● हार से विधान परिषद में कम हुआ अध्यापकों का प्रतिनिधित्व
● ओमप्रकाश शर्मा जैसे दिग्गज की हार से उच्च सदन ने खोया अग्रदूत

 क्या शिक्षकों के हितों की बात कर पाएंगे राजनीतिक दलों के शिक्षक एमएलसी? 


शिक्षक एमएलसी के नतीजे आ चुके हैं। 6 में से 4 सीटें भाजपा व सपा के पास हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी हैं कि क्या ये नेता दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर शिक्षक हितों की बात कर पाएंगे? वित्तविहीन महासभा के अध्यक्ष उमेश द्विवेदी इस बार सत्ताधारी दल के टिकट से जीते हैं, ऐसे में वे कैसे सरकार के खिलाफ जाते हुए शिक्षकों की मांगों को सदन में उठाएंगे, इस पर शिक्षकों की नजरें रहेंगी। 


एडेड और वित्तविहीन की लड़ाई का फायदा राजनीतिक दलों को पहुंचा है और नतीजे इसकी पुष्टि करते हैं। वित्तविहीन शिक्षक आरोप लगाते रहे हैं कि एडेड स्कूल के शिक्षक संघों ने सदन में सिर्फ अपने फायदे की बात उठाई। यही कारण था कि वित्तविहीन शिक्षकों ने लड़ाई लड़ कर अपने वोट बनवाए और पिछली बार वित्तविहीन महासभा के अध्यक्ष उमेश द्विवेदी सदन भी पहुंचे। प्रदेश में वित्तविहीन शिक्षकों की संख्या 2 लाख से भी ज्यादा है लेकिन इस बार उमेश द्विवेदी भाजपा के टिकट पर जीते हैं। भाजपा के टिकट पर सदन पहुंचे अन्य दो एमएलसी भी खांटी भाजपाई पहले हैं और शिक्षक बाद में। ऐसे में वे किस तरह शिक्षक हितों की बात करेंगे, ये देखने वाली बात होगी।  वित्तविहीन शिक्षकों को मानदेय, सेवा नियमावली, प्रबंधन का उत्पीड़न या एडेड स्कूलों में प्रबंधन के खेल आदि से निजात शिक्षकों की पुरानी मांगे हैं। 


फैजाबाद-गोरखपुर से जीते शर्मा गुट के ध्रुव कुमार त्रिपाठी वित्तविहीन महासभा के अजय सिंह के साथ कांटे की टक्कर के बाद जीते हैं। अजय सिंह हालांकि भाजपा में शामिल हुए थे लेकिन भाजपा ने उन्हें यहां से टिकट न देते हुए ध्रुव कुमार को ही समर्थन दे दिया था।  मौजूदा नतीजे के बाद अब विधान परिषद में शिक्षक एमएलसी की 8 सीटों में तीन भाजपा के पास, दो शर्मा गुट, एक सपा, एक वित्तविहीन और एक चंदेल गुट के पास है यानी अब केवल सशिक्षक दलों के चार नेता सदन में हैं और बाकी के चार दलों के प्रतिनिधि के रूप में रहेंगे। 


लखनऊ : विधान परिषद की 11 सीटों पर हुए चुनाव में शिक्षक संगठनों के पराभव से उच्च सदन में शिक्षकों से जुड़े मुद्दें की धार कुंद होगी। शिक्षकों के हितों से जुड़े विषयों को जिस शिद्दत से शिक्षक संगठन सदन में उठाते थे और उसके प्रति आग्रही होते थे, अब ऐसा शायद न हो पाए। वजह यह है कि शिक्षक कोटे की जिन छह सीटों पर चुनाव हुए, उनमें से चार सीटों पर राजनीतिक दलों के उम्मीदवार जीते हैं जो सदन में अपनी पार्टियों की लाइन के हिसाब से चलेंगे। उच्च सदन में अध्यापकों का प्रतिनिधित्व करने वाले शर्मा गुट और चंदेल गुट की ताकत कम हो गई है।


विधान परिषद चुनाव के नतीजे आने के बाद सदन में शिक्षक दल का संख्याबल पांच से घटकर दो रह गया है। वहीं उमेश द्विवेदी के भाजपा के टिकट पर निर्वाचित होने और चेत नारायण सिंह की पराजय से निर्दलीय समूह (चंदेल गुट) की ताकत भी आधी रह गई है। ओम प्रकाश शर्मा जैसे धुरंधर भी अब सदन में मौजूद नहीं रहेंगे। ऐसे में अब उच्च सदन में शिक्षकों का प्रतिनिधित्व करने वाले राज बहादुर सिंह चंदेल, सुरेश कुमार त्रिपाठी और ध्रुव कुमार त्रिपाठी जैसे वरिष्ठ सदस्यों पर शिक्षक बिरादरी से जुड़े मुद्दों को असरदार तरीके से उठाने का अधिक दारोमदार होगा।

अतीत में था दबदबा

कभी शिक्षक दल का दबदबा विधान परिषद की शिक्षक कोटे की सभी आठों सीटों पर होता था और उसका संख्या बल दहाई तक पहुंचा था। शिक्षक दल की इसी ताकत ने 1997 में उसके नेता ओम प्रकाश शर्मा को विधान परिषद में नेता विरोधी दल का रुतबा दिलाया था । ओम प्रकाश शर्मा की बढ़ती उम्र के तकाजे, अंदरूनी गुटबाजी, और वर्ष 2007 में पंचानन राय की मृत्यु के बाद से ही शिक्षक दल का प्रभाव कम होने लगा था। मतभेद के चलते शिक्षक दल से छिटककर अलग हुए नेताओं ने अलग ठीहे बनाए या तलाशे ।

No comments:
Write comments