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Wednesday, February 11, 2026

नाबालिग की आयु निर्धारण में शैक्षणिक दस्तावेज ही प्राथमिक –हाईकोर्ट

नाबालिग की आयु निर्धारण में शैक्षणिक दस्तावेज ही प्राथमिक –हाईकोर्ट

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि नाबालिग की आयु निर्धारण में शैक्षणिक दस्तावेज़ सबसे अहम हैं। यदि दस्तावेजों संदिग्धता है या स्पष्टता का अभाव है तब अस्थि परीक्षण के द्वारा आयु निर्धारण किया जा सकता है। मगर इस प्रकार किए गए निर्धारण में दो वर्ष ऊपर और नीचे की आयु गणना की संभावना होती है जिसका लाभ नाबालिग के पक्ष में जाएगा। कोर्ट ने नाबालिगता से जुड़े मामले में जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड, प्रयागराज द्वारा पारित आदेश को रद्द करते हुए मामले पर कानून के अनुसार पुनः विचार करने के निर्देश दिए हैं। यह आदेश न्यायमूर्ति जय प्रकाश तिवारी ने नाबालिग की पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।


मामला एक नाबालिग बनाम राज्य सरकार एवं अन्य से संबंधित है, जिसमें याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता नाज़िया नफीस ने पैरवी की, जबकि राज्य की ओर से अपर सरकारी अधिवक्ता राजीव कुमार एवं विपक्षी पक्ष की ओर से कृष्ण कुमार मिश्रा उपस्थित रहे।

मामला प्रयागराज के फाफामऊ थाने का है। प्राथमिकी 16 फरवरी 2023 को दर्ज की गई थी, जिसमें दो नामजद और एक अज्ञात आरोपी था। याचिकाकर्ता कानामएफआईआर में नहीं था, बल्कि जांच के दौरान सह-आरोपी के कथन के आधार पर उसका नाम सामने आया। इसके बाद याचिकाकर्ता की ओर से स्वयं को नाबालिग घोषित किए जानेके लिए आवेदन प्रस्तुत किया गया, जिसमें स्कूल प्रमाणपत्र के आधार पर जन्मतिथि एक जनवरी 2006 बताई गई। 

हालांकि, जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने स्कूल प्रमाणपत्र को संदेहास्पद मानते हुए अस्थि-परीक्षण कराने का आदेश दिया। चिकित्सा परीक्षण में याचिकाकर्ता की आयु 18 से 20 वर्ष के बीच बताई गई और मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने उसकी आयु 19 वर्ष आंकी। इसके आधार पर जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने 28 जून 2023 को याचिकाकर्ता को घटना की तिथि पर बालिग मानते हुए नाबालिग घोषित करने का आवेदन खारिज कर दिया। इस आदेश को सत्र न्यायालय ने भी बरकरार रखा।

हाईकोर्ट ने कहा कि जुवेनाइल जस्टिस अधिनियम, 2015 की धारा 94(2) के अनुसार आयु निर्धारण में सर्वप्रथम स्कूल प्रमाणपत्र या मैट्रिकुलेशन प्रमाणपत्र को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। केवल इन दस्तावेजों के अभाव में ही चिकित्सा परीक्षण कराया जा सकता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अस्थि-परीक्षण आयु निर्धारण का सटीक माध्यम नहीं है, बल्कि इसमें दो वर्ष तक की त्रुटि संभव है। सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया कि सीमा रेखा मामलों में संदेह का लाभ अभियुक्त को दिया जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड का आदेश करते हुए पुनःबोर्ड को भेज दिया है।

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