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Wednesday, September 9, 2026

ककहरा के साथ फलदार पेड़ों की पाठशाला, स्कूलों में बनेंगे खाद्य वन, 16 हजार प्राथमिक स्कूल पहले चरण में किए गए चिह्नित

ककहरा के साथ फलदार पेड़ों की पाठशाला, स्कूलों में बनेंगे खाद्य वन, 16 हजार प्राथमिक स्कूल पहले चरण में किए गए चिह्नित

पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों को मिलेगा प्राकृतिक पोषण

लखनऊ : प्रदेश के प्राथमिक स्कूल अब सिर्फ पढ़ाई के केंद्र नहीं रहेंगे, बल्कि बच्चों के पोषण और प्रकृति से जुड़ाव के नए ठिकाने भी बनेंगे। योगी सरकार प्राथमिक विद्यालयों में खाद्य वन (फ्रूट फारेस्ट) विकसित करने की तैयारी कर रही है। इसके लिए स्कूल परिसर में उपलब्ध जमीन का उपयोग फलदार पौधे लगाने के लिए किया जाएगा। उद्देश्य बच्चों को स्कूल में ही ताजे फल और प्राकृतिक पोषण से जोड़ना है।


खाद्य वन की अवधारणा के तहत स्कूल परिसर की खाली या उपलब्ध जमीन पर ऐसे फलदार पौधे लगाए जाएंगे, जो स्थानीय जलवायु के अनुकूल हों और जिनसे बच्चों को समय-समय पर फल मिल सकें। इससे विद्यालय परिसर में हरियाली बढ़ाने के साथ बच्चों के पोषण में भी प्रत्यक्ष योगदान की उम्मीद है।

खास बात यह है कि बच्चे इन पौधों को केवल किताबों में नहीं पढ़ेंगे, बल्कि उन्हें उगते, फलते और विकसित होते हुए अपनी आंखों से देखेंगे। पहले चरण में 16 हजार विद्यालय इसके लिए चिह्नित किए गए हैं। खाद्य वन को स्कूलों में 'पोषण की जीवंत पाठशाला' के रूप में विकसित किया जाएगा। शिक्षक बच्चों को पौधों की देखभाल, फलदार वृक्षों के महत्व, पोषण और पर्यावरण संरक्षण से जोड़ेंगे।

 इससे विज्ञान और पर्यावरण जैसे विषयों की पढ़ाई को भी व्यावहारिक आधार मिलेगा। बच्चों में पौधों के प्रति जिम्मेदारी और प्रकृति के संरक्षण की आदत विकसित करने में भी यह पहल मददगार हो सकती है। स्कूल में पैदा होने वाले फल को बच्चों को खाने के लिए दिए जाएंगे। इससे स्थानीय स्तर पर पोषण का एक अतिरिक्त स्त्रोत तैयार होगा। खाद्य वन की देखभाल में बच्चों की भागीदारी भी होगी।

कक्षा और उम्र के अनुसार बच्चों को पौधों में पानी देने, उनकी वृद्धि दर्ज करने और उनके संरक्षण जैसी गतिविधियों से जोड़ने की योजना है। इससे 'एक पेड़ लगाने' के साथ ही 'एक पेड़ पालने' की संस्कृति विकसित करने का अवसर मिलेगा।

सरकार की यह पहल जमीन के बेहतर इस्तेमाल के साथ स्कूलों में हरियाली, बच्चों के पोषण और पर्यावरण शिक्षा को एक साथ जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बन सकती है। यदि इन खाद्य वनों का नियमित रखरखाव सुनिश्चित हुआ और स्थानीय फलदार प्रजातियों को प्राथमिकता दी गई तो आने वाले वर्षों में ये विद्यालय परिसर बच्चों के लिए पोषण, प्रकृति और सीखने के एकीकृत केंद्र के रूप में विकसित हो सकते हैं।

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