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Wednesday, April 29, 2026

RTE में स्कूल बिना किसी देरी के प्रवेश देने के लिए बाध्य– सुप्रीम कोर्ट, जारी सरकारी सूची पर सवाल नहीं उठा सकते स्कूल

RTE में स्कूल बिना किसी देरी के प्रवेश देने के लिए बाध्य– सुप्रीम कोर्ट, जारी सरकारी सूची पर सवाल नहीं उठा सकते स्कूल

सुप्रीम कोर्ट सख्त : कमजोर वर्ग के बच्चों का दाखिला राष्ट्रीय मिशन, निजी स्कूल की दलीलें खारिज


नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शिक्षा के अधिकार (आरटीई) अधिनियम के तहत कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों को दाखिला देना राष्ट्रीय मिशन है। निजी स्कूलों को सख्त निर्देश देते हुए शीर्ष कोर्ट ने कहा, सांविधानिक एवं वैधानिक रूप से राज्य सरकार की ओर से आवंटित छात्रों को पड़ोस के स्कूल बिना किसी देरी के प्रवेश देने के लिए बाध्य हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया, किसी विद्यार्थी की पात्रता पर संदेह या विवाद लंबित होने का आधार बनाकर प्रवेश से इन्कार नहीं किया जा सकता।



जस्टिस पीएस नरसिम्हा एवं जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने फैसले में कहा, आरटीई अधिनियम, 2009 की धारा 12 के तहत निजी, गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों को अपनी कक्षा की 25 फीसदी सीटें कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित करनी होती हैं। यह प्रावधान न केवल शिक्षा के प्रसार के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि समाज में समानता स्थापित करने की दिशा में भी बड़ा कदम है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया, संविधान के अनुच्छेद 21ए के तहत शिक्षा का मौलिक अधिकार तभी प्रभावी होगा जब आरटीई कानून का पूरी निष्ठा से पालन किया जाए। कोर्ट ने कहा, इन बच्चों का दाखिला सरकार, स्थानीय निकायों एवं अदालतों की साझा जिम्मेदारी है। पीठ ने कहा, यदि किसी स्कूल को चयन प्रक्रिया या छात्र की पात्रता पर आपत्ति है, तो वह संबंधित सरकारी प्राधिकरण के समक्ष आपत्ति दर्ज करा सकता है। इस प्रक्रिया के चलते दाखिले को रोका नहीं जा सकता।


लखनऊ के स्कूल ने किया था इन्कारयह मामला लखनऊ पब्लिक स्कूल, एल्डिको से जुड़ा था, जिसने राज्य सरकार की ओर से चयनित एक छात्रा को प्रवेश देने से इन्कार कर दिया था। स्कूल ने उसकी पात्रता पर संदेह जताया, जबकि उसका नाम सरकारी सूची में शामिल था। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्कूल को छात्रा को दाखिला देने का निर्देश दिया था। इसके बाद, स्कूल ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने स्कूल की अपील को खारिज करते हुए हाईकोर्ट के आदेश को सही ठहराया है।


सरकारी सूची पर सवाल नहीं उठा सकते : शीर्ष अदालत ने कहा, स्कूलों को सरकारी सूची पर सवाल उठाने का अधिकार नहीं है। एक बार सूची जारी हो जाने के बाद उन्हें प्रवेश देना ही होगा। कोर्ट ने चेतावनी दी, यदि इस प्रक्रिया में बाधा डाली गई तो शिक्षा का अधिकार केवल कागजी बनकर रह जाएगा।


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