RTE के तहत प्रवेश के लिए मैनुअल आवेदन भी स्वीकार किए जाएं : हाईकोर्ट
प्रयागराज । इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 (आरटीई एक्ट) का उद्देश्य सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देना है, खासकर कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों को। केवल आनलाइन आवेदन की बाध्यता से इस उद्देश्य पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। सरकार के आदेश में स्पष्ट है कि अभिभावक आनलाइन आवेदन नहीं कर पाते तो बीएसए को मैनुअल आवेदन स्वीकार कर उसे आगे बढ़ाना होगा। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन ने ख्वाजा शमशाद अहमद की याचिका स्वीकार करते हुए की है। कोर्ट ने बीएसए प्रयागराज को आदेश दिया है कि याची के आवेदन को एक सप्ताह के भीतर क्रियान्वित करें। साथ ही राज्य सरकार को निर्देश दिया कि इस व्यवस्था को सुधारने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) अपनाए और सभी जिलों के बीएसए को यह आदेश लागू करने के लिए निर्देशित किया जाए।
याची ख्वाजा शमशाद अहमद ने बेटे ख्वाजा अशर के नर्सरी में प्रवेश के लिए आवेदन किया था, लेकिन तकनीकी कारणों से आनलाइन आवेदन नहीं कर पाए। इसके बाद उन्होंने बीएसए प्रयागराज के कार्यालय में मैनुअल आवेदन किया, जिसे स्वीकार नहीं किया गया। इस पर यह याचिका दाखिल की गई। कोर्ट ने कहा, आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों को शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 की धारा 12 (1) (सी) के तहत प्रवेश दिलाने के लिए केवल आनलाइन आवेदन अनिवार्य नहीं किया जा सकता।
अभिभावक किसी कारणवश आनलाइन आवेदन नहीं कर पाते तो उनका आफलाइन आवेदन भी स्वीकार किया जाना चाहिए और संबंधित अधिकारी का दायित्व है कि वह उसे प्रक्रिया में शामिल करे। राज्य सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि अब पूरी प्रक्रिया आनलाइन है, लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया।
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) के तहत निजी स्कूलों में प्रवेश के लिए केवल ऑनलाइन आवेदन की अनिवार्यता नहीं हो सकती। कोर्ट ने कहा कि यदि वंचित वर्ग के अभिभावक तकनीक के अभाव में ऑनलाइन फॉर्म भरने में असमर्थ हैं तो उनका मैन्युअल (ऑफलाइन) आवेदन स्वीकार करना बेसिक शिक्षा अधिकारी का कर्तव्य है।
यह आदेश न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की पीठ ने प्रयागराज के बालक ख्वाजा अशर की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है। याचिकाकर्ता के पिता ने ऑनलाइन फॉर्म भरने में असमर्थता जताते हुए मैन्युअल आवेदन दिया था, जिसे अधिकारियों ने यह कहते हुए स्वीकार करने से इन्कार कर दिया कि अब केवल ऑनलाइन प्रक्रिया ही मान्य है। इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
कोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद कहा कि केवल ऑनलाइन पोर्टल का सहारा लेना संविधान के अनुच्छेद 21-ए और शिक्षा के अधिकार कानून की मूल भावना के विपरीत है। यह गरीब और कम पढ़े-लिखे परिवारों को उनके अधिकारों से वंचित कर सकता है। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि सत्र 2024-25 और 2025-26 के दौरान हजारों बच्चों ने स्कूल आवंटित होने के बावजूद प्रवेश नहीं लिया।
साथ ही कई स्कूलों में 25 प्रतिशत कोटे के मुकाबले केवल एक या दो बच्चों को ही प्रवेश दिया गया, जो नियमों का खुला उल्लंघन है। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह उन अभिभावकों के लिए एक एसओपी तैयार करे जो ऑनलाइन आवेदन नहीं कर सकते, ताकि उन्हें बेसिक शिक्षा अधिकारी के कार्यालय के माध्यम से सुविधा मिल सके। अदालत ने प्रयागराज के बेसिक शिक्षा अधिकारी को एक सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता के आवेदन पर कार्रवाई करने का आदेश देते हुए याचिका को स्वीकार कर लिया है।
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