DISTRICT WISE NEWS

अंबेडकरनगर अमरोहा अमेठी अलीगढ़ आगरा इटावा इलाहाबाद उन्नाव एटा औरैया कन्नौज कानपुर कानपुर देहात कानपुर नगर कासगंज कुशीनगर कौशांबी कौशाम्बी गाजियाबाद गाजीपुर गोंडा गोण्डा गोरखपुर गौतमबुद्ध नगर गौतमबुद्धनगर चंदौली चन्दौली चित्रकूट जालौन जौनपुर ज्योतिबा फुले नगर झाँसी झांसी देवरिया पीलीभीत फतेहपुर फर्रुखाबाद फिरोजाबाद फैजाबाद बदायूं बरेली बलरामपुर बलिया बस्ती बहराइच बाँदा बांदा बागपत बाराबंकी बिजनौर बुलंदशहर बुलन्दशहर भदोही मऊ मथुरा महराजगंज महोबा मिर्जापुर मीरजापुर मुजफ्फरनगर मुरादाबाद मेरठ मैनपुरी रामपुर रायबरेली लखनऊ लखीमपुर खीरी ललितपुर लख़नऊ वाराणसी शामली शाहजहाँपुर श्रावस्ती संतकबीरनगर संभल सहारनपुर सिद्धार्थनगर सीतापुर सुलतानपुर सुल्तानपुर सोनभद्र हमीरपुर हरदोई हाथरस हापुड़
Showing posts with label शिक्षा. Show all posts
Showing posts with label शिक्षा. Show all posts

Tuesday, October 13, 2026

पढ़ाई छोड़ चुके बच्चों को स्कूल से जोड़ेंगे 'NIOS मित्र'योजना में सौ से अधिक बच्चों को प्रवेश दिलाने पर प्रति प्रवेश मिलेगा 120 रुपए मानदेय

पढ़ाई छोड़ चुके बच्चों को स्कूल से जोड़ेंगे 'NIOS मित्र'
योजना में सौ से अधिक बच्चों को प्रवेश दिलाने पर प्रति प्रवेश मिलेगा 120 रुपए मानदेय

10वीं और 12वीं कक्षा के साथ स्कूली शिक्षा की आयु वर्ग के सभी बच्चों की होगी मैपिंग


नई दिल्ली: 10वीं और 12वीं कक्षाओं में फेल हो चुके छात्रों के साथ ही अब स्कूली शिक्षा से दूर या फिर वंचित प्रत्येक आयु वर्ग के बच्चों की तलाश के लिए देश भर में अभियान चलेगा। शिक्षा मंत्रालय की पहल पर राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (एनआइओएस) राज्यों के साथ मिलकर इसकी तैयारी में जुटा है। इसके तहत जल्द ही देश के सभी ब्लाकों में 'एनआइओएस मित्र' की तैनाती की जाएगी, जो अपने ब्लाक में स्कूली शिक्षा की उम्र में स्कूलों से दूर सभी बच्चों की पहचान करेगा। इनमें से जो बच्चे शिक्षा के अधिकार कानून के तहत राज्यों के स्कूलों में पढ़ने के लिए पात्र होंगे, उन्हें राज्य पढ़ाएंगे, बाकी बच्चों को, जिनमें दसवीं और बारहवीं के फेल छात्र भी होंगे, उन्हें एनआइओएस के जरिए पढ़ाया जाएगा।


एनआइओएस ने इस मुहिम को प्रोत्साहित करने के लिए एक इंसेंटिव प्लान भी तैयार किया है। इसमें ऐसे प्रत्येक बच्चे को प्रवेश दिलाने पर उन्हें प्रोत्साहन राशि भी दी जाएगी। फिलहाल इसे लेकर जो प्लान बनाया गया है, उनमें 49 प्रवेश दिलाने वाले एनआइओएस मित्र को प्रत्येक प्रवेश पर 80 रुपए दिए जाएंगे। वहीं 50 से 99 प्रवेश दिलाने पर प्रति प्रवेश सौ रुपए और सौ से डेढ़ सौ प्रवेश दिलाने पर उन्हें प्रति प्रवेश 120 रुपए की प्रोत्साहन राशि देने की योजना है। यह खर्च केंद्र और राज्य सरकार मिलकर उठाएंगी। इस स्कीम में जो छात्र आर्थिक रूप से कमजोर हैं उनकी फीस व पढ़ाई का खर्च भी केंद्र व राज्य मिलकर उठाएंगें। मंत्रालय से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक एनआइओएस मित्र की पहल अगले महीने से शुरू हो जाएगी।


यूपी सहित पांच राज्यों में होगा ट्रायल: इससे पहले उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा, कर्नाटक और गुजरात के पांच ब्लाकों में एनआइओएस की ओर से एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने की तैयारी है। इसे लेकर एक एप तैयार कराया गया है। इसके जरिये एनआइओएस मित्र अपने काम को अंजाम देंगे। इनमें फिलहाल उत्तर प्रदेश के अयोध्या व श्रावस्ती जिले को शामिल किया गया है। बाकी राज्यों में जिलों के चयन की प्रक्रिया चल रही है। इस अभियान के तहत 10वीं और 12वीं फेल हो चुके दो करोड़ बच्चों को स्कूलों से फिर से जोड़ने के साथ 2030 तक स्कूली शिक्षा के सकल नामांकन अनुपात को शत-प्रतिशत तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। मौजूदा समय में 10वीं कक्षा तक आते-आते करीब 20 प्रतिशत बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं।

Saturday, September 26, 2026

पॉक्सो पर विद्यार्थियों को जागरूक करने के लिए प्रदेशव्यापी अभियान शुरू, राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की पहल, स्कूलों में विस्तार से दी जाएगी अधिनियम की जानकारी

पॉक्सो पर विद्यार्थियों को जागरूक करने के लिए प्रदेशव्यापी अभियान शुरू,  राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की पहल, स्कूलों में विस्तार से दी जाएगी अधिनियम की जानकारी


लखनऊ। उप्र राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण ने शुक्रवार से लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (पॉक्सो) के प्रति विद्यार्थियों को जागरूक करने के लिए प्रदेशव्यापी विशेष अभियान शुरू किया है। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों को पॉक्सो के विधिक प्रावधानों, अधिकारों, दायित्वों और उल्लंघन के कानूनी परिणामों की जानकारी देना है। 


अभियान सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश व राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण के कार्यपालक अध्यक्ष न्यायमूर्ति विक्रम नाथ के नेतृत्व और इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश व उप्र राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के मुख्य संरक्षक न्यायमूर्ति अरुण भंसाली एवं वरिष्ठ न्यायाधीश व कार्यपालक अध्यक्ष न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा के मार्गदर्शन में संचालित किया जा रहा है। 


अभियान के तहत विद्यार्थियों, विशेषकर किशोरों व युवाओं को बताया जा रहा है कि कानून में 18 वर्ष से कम आयु के प्रत्येक व्यक्ति को बच्चा माना गया है और उसकी सहमति को कानूनी मान्यता नहीं है। 

Sunday, August 23, 2026

देशभर के सभी स्कूलों में बनेंगे चुनावी साक्षरता क्लब, चुनावी प्रक्रिया को लेकर फैलाए जाने वाले दुष्प्रचार से निपटने के लिए चुनाव आयोग की मुहिम

देशभर के सभी स्कूलों में बनेंगे चुनावी साक्षरता क्लब, चुनावी प्रक्रिया को लेकर फैलाए जाने वाले दुष्प्रचार से निपटने के लिए चुनाव आयोग की मुहिम

दिसंबर तक हर विधानसभा क्षेत्र में कम से कम 10 ऐसे क्लबों को सक्रिय करने का लक्ष्य


नई दिल्ली ।  इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) सहित देश की चुनावी प्रक्रिया को लेकर फैलाए जाने वाले दुष्प्रचार से निपटने के लिए चुनाव आयोग ने अब नई पीढ़ी को इन चुनावी प्रक्रियाओं से जोड़ने और समझाने की एक मुहिम शुरू की है। इसके तहत देशभर के प्रत्येक स्कूल, कालेज व विश्वविद्यालय में अब एक चुनावी साक्षरता क्लब (ईएलसी) स्थापित होगा। जहां छात्रों को ईवीएम के कामकाज सहित मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया, मतगणना की प्रक्रिया आदि के बारे में जानकारी दी जाएगी। जल्द ही आयोग इसके लिए एक पाठ्यक्रम भी जारी करेगा। इसकी तैयारी जोरों पर है।


इस मुहिम के तहत  देश के 14.71 लाख स्कूलों, करीब 70 हजार उच्च शिक्षण संस्थानों और 1420 निजी व सरकारी विश्वविद्यालयों तक चुनावी साक्षरता क्लब खोलने की योजना बनाई है। इस साल के अंत यानी दिसंबर तक देश के प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में कम से कम 10 सक्रिय क्लब शुरू करने की योजना है। देश में मौजूदा समय में 4,123 विधानसभा क्षेत्र हैं। ऐसे में 41 हजार से अधिक क्लब इस साल के अंत तक सक्रिय हो जाएंगे। प्रत्येक क्लब में सदस्यों की संख्या करीब 25 होगी। ऐसे में इस मुहिम के जरिए इस साल 10 लाख से अधिक छात्रों को जोड़ने की योजना है। आयोग इस मुहिम को राज्यों के साथ मिलकर तेजी से आगे बढ़ाने में जुटा है।

इस पूरी मुहिम की कमान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने खुद ही संभाली है। उन्होंने इसे लेकर राज्यों का दौरा भी शुरू कर दिया है। दिसंबर तक उनकी सभी 36 राज्यों तक पहुंचने की तैयारी है। इस कड़ी में सोमवार को वह उत्तर प्रदेश के दौरे पर रहेंगे। उसके बाद वह तमिलनाडु, गोवा व गुजरात जाएंगे। इन दौरों के दौरान वह राज्य के सभी विश्वविद्यालयों के कुलपतियों, कालेजों व स्कूलों के प्राचार्यों के साथ करीब छह-सात सौ छात्रों की एक कांफ्रेंस में हिस्सा लेते हैं।

स्कूल के क्लब में नौवीं से 12वीं कक्षा तक के बच्चे शामिल होंगे। प्रत्येक कक्षा के प्रत्येक सेक्शन से दो-दो बच्चे (एक छात्र व एक छात्रा) चयनित होंगे। इसका चयन क्लास टीचर करेंगे। क्लब के अध्यक्ष व उपाध्यक्ष का चयन चयनित छात्रों के बीच चुनाव के जरिए होगा। कालेज व विश्वविद्यालय स्तर पर क्लब में भी प्रत्येक स्ट्रीम में एक सेक्शन से दो-दो छात्र चयनित होंगे। इन सभी का चयन एक शैक्षणिक सत्र के लिए होगा। यह क्लब चुनावी साक्षरता के अपने तय पाठ्यक्रम के मुताबिक हफ्ते में एक दिन करीब एक घंटे के लिए एक्टिविटी आयोजित करेगा।


Saturday, August 15, 2026

हर साल शिक्षा बजट 10% अनिवार्य बढ़ोतरी की सिफारिश, प्राकलन समिति ने अपनी रिपोर्ट लोकसभा को सौंपी

हर साल शिक्षा बजट 10% अनिवार्य बढ़ोतरी की सिफारिश,  प्राकलन समिति ने अपनी रिपोर्ट लोकसभा को सौंपी


नई दिल्लीः केंद्र सरकार के बजट आवंटन पर पैनी नजर रखने वाली प्राक्कलन समिति ने शिक्षा के बजट में कमी पर सवाल उठाए हैं और इसे नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) की सिफारिशों के अनुरूप जीडीपी के छह प्रतिशत तक पहुंचाने के लिए सालाना दस प्रतिशत तक की अनिवार्य बढ़ोतरी की सिफारिश की है।


समिति का मानना है कि मौजूदा समय में देश में शिक्षा पर कुल जीडीपी का संयुक्त व्यय (केंद्र व राज्य दोनों का) अभी 4.1 प्रतिशत ही है, जो लक्ष्य से दूर है। यह स्थिति तब है, जब नीति का अमल अंतिम चरण में पहुंच चुका है।

लोकसभा सदस्य डा. संजय जायसवाल की अगुवाई में गठित इस 30 सदस्यीय प्राक्कलन समिति ने बुधवार को इसे लेकर अपनी रिपोर्ट लोकसभा को सौंप दी है। इसमें समिति ने कहा कि 2020 में आई नई शिक्षा नीति के प्राथमिक और बड़े उद्देश्यों में एक शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय को जीडीपी के छह प्रतिशत तक बढ़ाना था। लेकिन इसके बाद भी यह लक्ष्य से लगातार कम बना हुआ है। 

2026-27 में शिक्षा मंत्रालय को 1.39 लाख करोड़ रुपये का आवंटन दिया गया था, जो पिछले वर्ष की तुलना में 8.27 प्रतिशत वृद्धि को दर्शाता है, लेकिन यह वृद्धि लक्ष्य तक पहुंचने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके लिए समयबद्ध रूपरेखा तैयार की जाए। इसमें केंद्र व राज्य दोनों अपने शिक्षा खर्च में और बढ़ोतरी करें।

 शिक्षा बजट में औसत की जगह हर साल दस प्रतिशत तक अनिवार्य बढ़ोतरी सुनिश्चित करनी चाहिए। प्राक्कलन समिति हर साल बजट के आवंटन को जांचती है और देखती है कि नीति के अनुरूप आवंटन हो रहा है या नहीं।

Sunday, July 26, 2026

प्रह्लाद जोशी बने नए शिक्षा मंत्री, धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद हुआ ऐलान

प्रह्लाद जोशी बने नए शिक्षा मंत्री, धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद हुआ ऐलान

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा सीजेपी ने खत्म किया आंदोलन

आंदोलन खत्म करने के एलान के बाद सीजेपी ने प्रदर्शनकारियों से घर लौटने की अपील की

जनभावनाओं को देखते हुए और ग्राउंड रिपोर्ट मिलने के बाद त्यागपत्र का फैसला


नई दिल्ली । धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी अब प्रह्लाद जोशी को सौंप दी गई है. राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री की सलाह पर उन्हें शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार देने की मंजूरी दी है। हालांकि, उनके पास पहले से मौजूद मंत्रालयों की जिम्मेदारी भी बनी रहेगी. यानी फिलहाल वह अपने मौजूदा कामकाज के साथ शिक्षा मंत्रालय का काम भी संभालेंगे। 

राष्ट्रपति भवन की ओर से जारी अधिसूचना के मुताबिक, धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा तत्काल प्रभाव से स्वीकार कर लिया गया है. इसके बाद प्रह्लाद जोशी को शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई है। यह फैसला ऐसे समय में हुआ है, जब NEET-UG परीक्षा में गड़बड़ियों को लेकर शुरू हुआ छात्र आंदोलन लगातार चर्चा में था 


नई दिल्लीः नीट पेपर लीक से उठे विवाद में आखिरकार शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया। सरकार ने इस्तीफे के साथ साथ आंदोलनकारियों पर हुए सभी केस वापस करने और नीट के कारण आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को मुआवजा देने की मांग भी मान ली। इसके साथ ही जंतर मंतर पर काकरोच जनता पार्टी (रॉजेपी) का छात्र आंदोलन भी खत्म हो गया। केंद्रीय स्वास्म्म मंत्री जेपी नड्‌डा और प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह के साथ प्रर्ता व सरकार की ओर से सभी मांगें माने जाने के बाद सीजेपी के प्रतिनिधि आशुतोष कर संका में जंतर-मंतर पर 35 दिन से चल रहा आंदोलन तत्काल खत्म करने का एलान किया और सभी प्रदर्शनकारियों से अपस अपने घर लौटने की अपील की। इस बीच, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्भु ने प्रधान क इस्तीफा स्वीकार कर लिया है। उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक शिशारण मंत्री प्रल्हाद जोरी को शिक्षा मंत्री का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है।

जनभावनाओं को देखते हुए और सुरक्षा को लेकर ग्राउंड रिपोर्ट मिलने के बाद प्रधान का इस्तीपय लेने का फैसला लिया गया। इस्तीफा देते हुए प्रधान ने भारत की दुवा शक्ति' को देश की असली ताकत बताते हुए कहा कि वह वह मेरे लिए व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का विषय नहीं है और पहले ही दिन से इस पर मैंने अपनी जिम्मेदारी ली है। उन्होंने कहा कि जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्तियों द्वारा छात्रों को गुमराह करने की कोशिशों लेकर भी का व्यथित हैं। सूत्रों के अनुसार, शनिवार की सुबह उन्हें बताया गया कि आज की स्थिति में त्यागपत्र जरूरी है। प्रधान ने रॉजेपी के साथ सरकार की वार्ता से पहले दोपहर ढाई बजे पोस्ट के जरिये अपने इस्तीफे की घोषणा कर दी। बताते चलें, आंदोलन खत्म करने के लिए सीजेपी की सत्तों में धर्मेंद्र प्रबयान का इस्तीफा, केस वापस लेने और आत्महत्या करने वाले नोट छात्रओं के परिवार को एक-एक करोड़ रुपये मुआवजा देने की मांग शामिल थी। सोमवार को प्रदर्शनकारियों के सांसद मार्च के पैरान हुई हिंसक झड़पों के बाद से ही सरकार ने इस आंदोलन को खत्म करने को लेकर गंभीरता से सोचना शुरू किया था।


Saturday, July 11, 2026

प्रशिक्षण व प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार, फिर भी ग्रेडिंग काफी नीचे, उत्तर प्रदेश के पीजीआईडी रैंकिंग में गर्वनेंस व प्रशिक्षण में बढ़े नंबर

प्रशिक्षण व प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार, फिर भी ग्रेडिंग काफी नीचे, उत्तर प्रदेश के पीजीआईडी रैंकिंग में गर्वनेंस व प्रशिक्षण में बढ़े नंबर

आधार सीडिंग, आरटीई, प्रबंध पोर्टल व खर्च में स्थिति बेहतर

लखनऊ। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की ओर से जारी परफार्मेंस ग्रेडिंग इंडेक्स (पीजीआई डी) में प्रदेश की शैक्षिक व्यवस्था में अपेक्षाकृत हर क्षेत्र में सुधार हुआ है। प्रदेश में शिक्षण-प्रशिक्षण की व्यवस्था बेहतर हुई है तो विद्यालयों की प्रशासनिक व्यवस्था भी बेहतर हुई है।

किंतु ओवरऑल यूपी की ग्रेडिंग काफी नीचे है। यूपी का लर्निंग आउटकम एंड क्वालिटी में सत्र 2024-25 में 81 नंबर था जो पिछले सत्र में भी 81 रहा है। वहीं एक्सेस में 2024-25 में 53 नंबर था जो अब 54 हो गया। इंफ्रास्ट्रक्चर एंड फैसिलिटी में 73 से बढ़कर 77, इक्विटी में 231 की जगह 231, गर्वनेंस प्रोसेस में 69 की जगह 71 नंबर मिले हैं। इसी तरह शिक्षण-प्रशिक्षण में 62 से बढ़कर 66 नंबर मिले हैं। ओवरआल 1000 में से यूपी को 580 नंबर मिले हैं। प्रदेश में हाल में शिक्षण-प्रशिक्षण व्यवस्था काफी बेहतर हुई है। 




40 हजार विद्यालयों में अभी भी बिजली का कनेक्शन नहीं,  101407 स्कूलों में कंप्यूटर की सुविधा की जरूरत, शिक्षा मंत्रालय की पीजीआईडी रिपोर्ट में किया गया उल्लेख

स्कूलों में बच्चों के रुकने के समय में हुआ सुधार

एक से दूसरे क्लास में जाने की स्थिति भी हुई है बेहतर

लखनऊ। शिक्षा मंत्रालय की ओर से स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता, छात्रों के सीखने के स्तर व आधारभूत सुविधाओं का आकलन करते हुए परफार्मेंस ग्रेडिंग इंडेक्स फॉर डिस्ट्रिक्ट (पीजीआई डी) 2025-26 जारी की गई है। इसमें जहां प्रदेश की स्कूली शिक्षा में कुछ स्तर पर सुधार देखने को मिला है तो कुछ जगह पर अभी भी हम राष्ट्रीय स्तर से पीछे हैं, इनमें सुधार की जरूरत है।


रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में स्कूलों में बच्चों के रुकने का समय राष्ट्रीय स्तर के आंकड़ों से तो कम है। लेकिन प्रदेश के ही पिछले साल के आंकड़ों में सुधार हुआ है। प्राइमरी में जहां ठहराव दर 86.9 फीसदी थी, वह 2025-26 में 86 हो गई है। वहीं उच्च प्राथमिक में गत वर्ष ठहराव दर 70.4 फीसदी था, वह बढ़कर 72 फीसदी हो गई है। 9वीं-10वीं में 49.6 फीसदी से बढ़कर 55 व 11वीं-12वीं में 42.8 से बढ़कर 45 फीसदी हो गई है। हालांकि राष्ट्रीय स्तर के आंकड़ों से यह अभी पीछे है। इसमें सुधार के लिए अभी और काम करना पड़ेगा।

एक से दूसरे क्लास में बच्चों के जाने की दर में भी पिछले साल की अपेक्षा स्थिति बेहतर हुई है। प्राइमरी से अपर प्राइमरी में बच्चों के जाने की दर पिछले सत्र में 91 फीसदी थी जो 2025-26 में 92.2 फीसदी हुई है। अपर प्राइमरी से सेकेंडरी में छात्रों के जाने की दर 78.1 से बढ़कर 78.7 फीसदी हुई है। सेकेंडरी से उच्च स्तर पर जाने की दर 76.6 फीसदी से बढ़कर 79.2 फीसदी हुई है। 


स्कूलों में कंप्यूटर व बिजली कनेक्शन की जरूरत : बेसिक से माध्यमिक तक के सरकारी व निजी स्कूलों में पिछले साल की तुलना में सुविधाएं बढ़ी है। वहीं 40 हजार विद्यालयों में अभी भी बिजली का कनेक्शन नहीं है। वहीं 101407 स्कूलों में कंप्यूटर की सुविधा की जरूरत है। शिक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट में पिछले साल की तुलना में प्री-प्राइमरी से कक्षा 12 तक के स्कूलों में पिछले साल की तुलना में सुविधाएं बढ़ी हैं। पिछले सत्र में 262358 स्कूल थे और इनकी संख्या बढ़कर 265278 हो गई है।

निजी स्कूलों की संख्या बढ़ी
प्रदेश में निजी स्कूलों की संख्या में पिछले साल की तुलना में 3397 स्कूल बढ़े हैं। एक साल में स्कूलों की संख्या 2913 बढ़ी है। जबकि सरकारी स्कूलों की संख्या में कमी आई है। प्री-प्राइमरी से कक्षा 12 तक के 69 स्कूल कम हुए हैं।

Monday, June 8, 2026

पीएम मोदी की अध्यक्षता में शिक्षा क्षेत्र से जुड़े सुधारों पर होगा मंथन, 11 जून को होगी नीति आयोग की गवर्निंग काउंसिल की बैठक

पीएम मोदी की अध्यक्षता में शिक्षा क्षेत्र से जुड़े सुधारों पर होगा मंथन, 11 जून को होगी नीति आयोग की गवर्निंग काउंसिल की बैठक

राज्यों की आर्थिक प्रगति की रफ्तार कैसे बढ़े, इस पर भी विमर्श

नई दिल्ली: देश में पेपर लीक की घटनाओं के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में एक महत्वपूर्ण बैठक होने जा रही है। यह बैठक 11 जून को नीति आयोग की गवर्निंग काउंसिल की होगी और इसमें शिक्षा क्षेत्र से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की जाएगी। इस बैठक में वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लिए आवश्यक मानव संसाधन विकास, बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा, सेकेंडरी स्तर की शिक्षा व्यवस्था, और बच्चों की एक्स्ट्रा कैरीकुलर गतिविधियों यानी खेल, सांस्कृतिक गतिविधियों और लीडरशिप कार्यक्रम आदि को लेकर किस तरह की नीति बनाई जाए, इस पर चर्चा होगी। साथ ही इस पर भी विमर्श होगा कि किस तरह से राज्यों में नियमों व व्यवस्थाओं को ज्यादा से ज्यादा उदारवादी बनाकर आर्थिक प्रगति की रफ्तार तेज की जाए।


बैठक में सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों और केंद्र शासित प्रदेशों के उपराज्यपालों के भाग लेने की संभावना है। सूत्रों के अनुसार, इस बैठक में पेपर लीक से संबंधित मुद्दे सीधे तौर पर शामिल नहीं होंगे, लेकिन कुछ मुख्यमंत्रियों द्वारा इस विषय को उठाए जाने की संभावना है। 

सभी राज्यों को पहले ही यह संदेश दिया गया है कि शिक्षा क्षेत्र से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा होगी, ताकि मुख्यमंत्री अपने सुझाव प्रस्तुत कर सकें। मुख्य रूप से, विकसित भारत के लक्ष्यों के अनुसार मौजूदा शिक्षा व्यवस्था में बदलाव और केंद्र तथा राज्यों के बीच सामंजस्य पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। 

कांग्रेस शासित राज्यों के नए मुख्यमंत्रियों जैसे कि केरल और कर्नाटक द्वारा पेपर लीक के मुद्दे को लेकर सरकार को असहज करने का प्रयास किया जा सकता है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के बाद हो रही इस बैठक में बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी, केरल के मुख्यमंत्री वीडी सतीशन और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री जोसेफ विजय पहली बार भाग ले सकते हैं।

सूत्रों का कहना है कि इस बैठक को मई, 2026 में पीएम मोदी की उनके मंत्रिमंडल के सभी सदस्यों और सभी राज्यों के मुख्य सचिवों के साथ हुई अलग-अलग बैठकों के संदर्भ में भी देखना चाहिए। उक्त बैठकों में मोदी ने पश्चिम एशिया संकट से उत्पन्न चुनौतियों को दूर करने के लिए रिफार्म एक्सप्रेस व विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए राज्यों के स्तर पर कारोबार करने की राह की अड़चनों को दूर करने को प्राथमिकता के तौर पर लेने की बात कही थी।

 मुख्य सचिवों की बैठक में कई ऐसे फैसले किए गए थे जिनको लेकर अब मुख्यमंत्रियों के साथ विमर्श किया जाएगा। इसमें वामपंथी हिंसा से मुक्त कराये गए जिलों व क्षेत्रों के लिए विशेष कार्यक्रम व योजनाओं को लागू करना भी शामिल है।

Tuesday, May 26, 2026

जानिए! क्या है श्रमिक विद्या योजना? जिसका 75 जिलों में किया जायेगा विस्तार

जानिए! क्या है श्रमिक विद्या योजना? जिसका 75 जिलों में किया जायेगा विस्तार 

लखनऊ । बाल श्रमिक विद्या योजना उत्तर प्रदेश सरकार की एक प्रमुख बाल कल्याण और शिक्षा प्रोत्साहन योजना है, जिसे राज्य में बाल श्रम को खत्म करने और गरीब कामकाजी बच्चों को शिक्षित करने के लिए शुरू किया गया था। अब इसका विस्तार उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों में कर दिया गया है।

इस योजना के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

उद्देश्य: आर्थिक तंगी के कारण बाल मजदूरी करने वाले 8 से 18 वर्ष के बच्चों को चिन्हित कर उन्हें शिक्षा से जोड़ना और मुख्यधारा में वापस लाना।

वित्तीय सहायता: बच्चों को पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित करने हेतु सरकार मासिक आर्थिक सहायता प्रदान करती है:

बालकों (लड़कों) को: ₹1,000 प्रति माह
बालिकाओं (लड़कियों) को: ₹1,200 प्रति माह

अतिरिक्त प्रोत्साहन: यदि ये बच्चे कक्षा 8, 9 और 10 पास करते हैं, तो उन्हें शिक्षा पूरी करने के लिए ₹6,000 की विशेष प्रोत्साहन राशि अलग से दी जाती है।कौशल विकास: निजी क्षेत्रों के सहयोग से इन बच्चों के लिए कौशल विकास प्रशिक्षण का भी प्रावधान किया गया है ताकि भविष्य में उन्हें बेहतर रोजगार मिल सके।



अब प्रदेश के सभी 75 जिलों में लागू होगी श्रमिक विद्या योजना, सीएम योगी ने दिए निर्देश, अब तक 20 जिलों में लागू थी

योजना के तहत 8 से 18 साल आयु वर्ग के कामकाजी बच्चों को भेजा जाएगा विद्यालय


24 मई 2026
लखनऊ। प्रदेश में श्रमिक परिवार के बच्चों को शिक्षा से जोड़ने के लिए सरकार ने बड़ा फैसला लेते हुए श्रम विभाग संचालित बाल श्रमिक विद्या योजना को अब प्रदेश के सभी 75 जिलों में लागू करने का फैसला किया है। योजना के तहत 8 से 18 वर्ष की आयु तक के कामकाजी बच्चों को विद्यालय से जोड़ा जाएगा। वहीं, सेवा मित्र योजना को और प्रभावी बनाते हुए बड़े और औद्योगिक शहरों में श्रमिक सुविधा केंद्रों का विकसित करने के निर्देश दिए गए हैं।


यह निर्देश मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शनिवार को श्रम एवं सेवायोजन विभाग की योजनाओं की समीक्षा के दौरान दिए। उन्होंने रोजगार मिशन को वैश्विक अवसरों से जोड़ने पर जोर देते हुए कहा कि कोई भी श्रमिक परिवार का बच्चा आर्थिक मजबूरी के कारण शिक्षा से वंचित न रहे। उन्होंने निर्देश दिए कि बाल श्रम प्रभावित क्षेत्रों में विशेष अभियान चलाकर बच्चों को विद्यालयों से जोड़ा जाए। उन्होंने कहा कि निजी क्षेत्र के सहयोग से इन बच्चों के कौशल विकास की कार्ययोजना तैयार करें।

वर्ष 2020 में शुरु बाल श्रमिक विद्या योजना के तहत 8 से 18 वर्ष के कामकाजी बच्चों को विद्यालयों में प्रवेश के साथ आर्थिक सहायता दी जा रही है। वर्तमान में योजना 20 जिलों में संचालित है। मुख्यमंत्री ने इसे नए प्रावधानों के साथ प्रदेश के सभी 75 जिलों में लागू करने के निर्देश दिए।

मुख्यमंत्री ने 'सेवामित्र व्यवस्था' को रोजगार और जनसुविधा का अभिनव मॉडल बताते हुए कहा कि तकनीक आधारित ऐसी व्यवस्थाएं युवाओं और कुशल कामगारों के लिए नए अवसर तैयार करती हैं।

बैठक में बताया गया कि वर्ष 2021 से संचालित इस व्यवस्था के तहत नागरिक मोबाइल ऐप, वेब पोर्टल अथवा कॉल सेंटर के माध्यम से घरेलू सेवाएं प्राप्त कर सकते हैं। वर्तमान में पोर्टल पर 1097 सेवा प्रदाता, 5049 सेवामित्र और 54,747 कुशल कामगार पंजीकृत हैं। 

मुख्यमंत्री ने कहा कि उद्योगों के अनुकूल वातावरण और श्रमिक हितों के बीच संतुलन बनाना सरकार की नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

Wednesday, April 1, 2026

भारत में भी बच्चों की सोशल मीडिया पहुंच पर सख्ती की तैयारी, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की उम्र आधारित नियमों की सिफारिश

भारत में भी बच्चों की सोशल मीडिया पहुंच पर सख्ती की तैयारी,  राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की उम्र आधारित नियमों की सिफारिश


नई दिल्ली। बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग को लेकर सख्त नियम बनाने की दिशा में कदम तेज हो गए हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने सुझाव दिया है कि बच्चों को उनकी उम्र के अनुसार ही सोशल मीडिया तक पहुंच दी जाए और इसके लिए एक स्पष्ट नियामक ढांचा तैयार किया जाए।


आयोग के अनुसार, 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया के स्वतंत्र उपयोग की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। वहीं, 13 से 15 वर्ष के बच्चों के लिए माता-पिता की सहमति अनिवार्य हो और 15 से 18 वर्ष के किशोरों को सीमित और निगरानी के साथ उपयोग की छूट दी जाए। आयोग का मानना है कि इससे बच्चों की सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य की बेहतर रक्षा की जा सकेगी।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के बजाय अधिक जोखिम वाले फीचर्स पर नियंत्रण किया जाना चाहिए। साथ ही, बच्चों की गोपनीयता और डेटा सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए ताकि उनके अधिकार सुरक्षित रह सकें।

आयोग ने उम्र सत्यापन प्रणाली को अनिवार्य बनाने की भी सिफारिश की है, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि बच्चे तय नियमों के अनुसार ही सोशल मीडिया का उपयोग कर रहे हैं। इसके अलावा, एक केंद्रीय नियामक संस्था के गठन का सुझाव दिया गया है, जो इन नियमों के पालन की निगरानी करेगी।

रिपोर्ट में ऑस्ट्रेलिया का उदाहरण देते हुए बताया गया है कि वहां बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग को लेकर सख्त प्रावधान लागू किए गए हैं, जहां नियमों का उल्लंघन करने पर कंपनियों पर भारी जुर्माना लगाया जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों के बढ़ते डिजिटल एक्सपोजर को देखते हुए इस तरह के नियम समय की मांग हैं। यदि इन सिफारिशों को लागू किया जाता है, तो यह बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकता है।

Saturday, March 28, 2026

दिल्ली शिक्षा निदेशालय ने कक्षा में रील्स और शॉर्ट वीडियो बनाने पर लगाई रोक, शिक्षकों पर भी नियम लागू

दिल्ली शिक्षा निदेशालय ने कक्षा में रील्स और शॉर्ट वीडियो बनाने पर लगाई रोक, शिक्षकों पर भी नियम लागू

🔴 कक्षा के दौरान रील्स, शॉर्ट वीडियो बनाने पर रोक।

🔴 पढ़ाई का माहौल बनाए रखने के लिए सख्त निर्देश।

🔴 शैक्षणिक सामग्री अनुमति से, आपत्तिजनक सामग्री प्रतिबंधित।

दिल्ली  शिक्षा निदेशालय ने दिल्ली के स्कूलों में पढ़ाई के दौरान रील्स और शॉर्ट वीडियो बनाने पर सख्त रोक लगा दी है। यह कदम पढ़ाई के माहौल को प्रभावित करने वाली शिकायतों के बाद उठाया गया है। निर्देश में छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों को कक्षा के घंटों में ऐसे वीडियो बनाने से मना किया गया है।


नई दिल्ली। स्कूलों में पढ़ाई के दौरान रील्स और शार्ट वीडियो बनाने के बढ़ते चलन पर अब सख्ती शुरू हो गई है। शिक्षा निदेशालय ने सभी स्कूलों को निर्देश दिया है कि कक्षा के घंटों में विद्यार्थी, शिक्षक या कर्मचारी किसी भी तरह के रील्स या शार्ट वीडियो न बनाएं।


निदेशालय ने कहा कि स्कूल परिसर में मनोरंजन के लिए वीडियो बनाए जाने की शिकायतें सामने आई हैं, जिससे पढ़ाई का माहौल प्रभावित हो रहा है। ऐसे में सभी स्कूल प्रधानाचार्यों को निर्देश दिया गया है कि वे इस तरह की गतिविधियों पर सख्ती से रोक लगाएं।

केवल शिक्षा पर फोकस दिलाना उद्देश्य
निदेशालय ने स्पष्ट किया है कि कोई भी गतिविधि जो पढ़ाई-लिखाई में बाधा डाले या विद्यार्थियों का ध्यान भटकाए, उसे पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाए। साथ ही स्कूलों की गरिमा और अनुशासन बनाए रखना जरूरी है और फोकस केवल शिक्षा पर होना चाहिए।

हालांकि, विभाग ने यह भी कहा है कि शैक्षणिक, सांस्कृतिक या जागरूकता से जुड़े कंटेंट को अनुमति दी जा सकती है, लेकिन इसके लिए पहले संबंधित प्राधिकरण की मंजूरी लेनी होगी और शिक्षक की निगरानी में ही ऐसी गतिविधि होनी चाहिए।

नियम उल्लंघन पर कार्रवाई की चेतावनी
साथ ही यह भी साफ किया गया है कि स्कूल परिसर में किसी भी तरह का आपत्तिजनक, गैर-शैक्षणिक या प्रमोशनल कंटेंट रिकार्ड नहीं किया जाएगा। सभी स्कूलों को यह निर्देश तुरंत लागू करने और विद्यार्थियों व कर्मचारियों तक जानकारी पहुंचाने को कहा गया है। विभाग ने चेतावनी दी है कि निर्देशों का उल्लंघन गंभीरता से लिया जाएगा।

Monday, March 23, 2026

दुनिया के आधे से अधिक देशों के स्कूलों में मोबाइल फोन पर प्रतिबंध यूनेस्को की वैश्विक शिक्षा निगरानी टीम की रिपोर्ट

दुनिया के आधे से अधिक देशों के स्कूलों में मोबाइल फोन पर प्रतिबंध यूनेस्को की वैश्विक शिक्षा निगरानी टीम की रिपोर्ट


नई दिल्ली। दुनियाभर में स्कूलों में मोबाइल फोन के इस्तेमाल को लेकर चिंता बढ़ रही है। यूनेस्को की वैश्विक शिक्षा निगरानी (जेम) टीम की रिपोर्ट के अनुसार, अब तक 58 प्रतिशत देशों ने स्कूलों में मोबाइल पर प्रतिबंध लगा दिया है। रिपोर्ट में कहा गया कि क्लास में ध्यान कम होना, ऑनलाइन उत्पीड़न और डिजिटल माध्यमों का बच्चों पर बढ़ता असर इसके मुख्य कारण हैं।


जून 2023 में केवल 24% देशों में ही यह प्रतिबंध था, जो 2025 की शुरुआत में बढ़कर 40 प्रतिशत और मार्च 2026 तक 58 प्रतिशत हो गया। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि सामाजिक माध्यमों का बच्चों, खासकर लड़कियों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। 


लड़कियां लड़कों की तुलना में दोगुना ज्यादा खानपान से जुड़ी बीमारियों का शिकार हो रही हैं। 32 प्रतिशत किशोरियों को तस्वीरें देखने के बाद अपने शरीर को लेकर असहज महसूस होता है। कुछ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बच्चों को बार-बार शरीर से जुड़ी सामग्री दिखाते हैं, जिससे मानसिक असर बढ़ता है। हाल ही में कई देशों ने भी स्कूलों में मोबाइल पर पाबंदी लगाई है। 

Friday, February 13, 2026

शिक्षा पर उत्तर प्रदेश का बड़ा दांव: बजट में बेसिक से प्राविधिक तक हजारों करोड़ की सौगात, देखें शिक्षा के हर स्तर पर कितना हुआ बजट आवंटन

राजकीय माध्यमिक स्कूलों में 'ड्रीम लैब' से बदलेगी तस्वीर, बजट में 150 करोड़ का प्रावधान

लखनऊ: राजकीय माध्यमिक विद्यालयों में डिजिटल लर्निंग पर विशेष जोर दिया जा रहा है। अब बजट में इन विद्यालयों में 'ड्रीम स्किल लैब क्लस्टर' स्थापित करने के लिए 150 करोड़ रुपये का प्रविधान किया गया है। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों को स्कूल स्तर पर ही आधुनिक तकनीक और कौशल से जोड़ना है। योजना के अनुसार पहले चरण में प्रत्येक मंडल से दो विद्यालय एक बालक और एक बालिका को हब स्कूल बनाया जाएगा। 

एक हब से तीन अन्य विद्यालय स्पोक स्कूल के रूप में जुड़े रहेंगे। प्रत्येक हब की अनुमानित लागत 13.34 करोड़ रुपये होगी। खर्च उद्योग समूहों और माध्यमिक शिक्षा विभाग के बीच 68:32 के अनुपात में साझा किया जाएगा। टाटा टेक्नोलाजीज, टाटा क्लासेस और जापान की यास्कावा जैसी कंपनियां तकनीकी सहयोग देंगी। पांच वर्षों तक उपकरणों के रखरखाव और प्रशिक्षण की जिम्मेदारी उद्योग समूहों की होगी। ड्रीम लैब में एआइ, इंडस्ट्रियल रोबोटिक्स, एआर-वीआर, ड्रोन तकनीक, कंप्यूटर एडेड मशीनिंग, ईवी और बैटरी तकनीक, प्लंबिंग और ओडीओपी आधारित ट्रेड कोर्स सिखाए जाएंगे।



शिक्षा पर उत्तर प्रदेश का बड़ा दांव:  बजट में बेसिक से प्राविधिक तक हजारों करोड़ की सौगात, देखें शिक्षा के हर स्तर पर कितना हुआ बजट आवंटन

लखनऊ। उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 2026–27 के बजट में शिक्षा क्षेत्र को प्राथमिकता देते हुए बेसिक, माध्यमिक, उच्च और प्राविधिक शिक्षा के लिए व्यापक वित्तीय प्रावधान किए हैं। बजट में स्कूल शिक्षा से लेकर विश्वविद्यालयों और तकनीकी संस्थानों के विकास तक कई महत्वपूर्ण घोषणाएं की गई हैं, जिससे प्रदेश में शिक्षा व्यवस्था को नई गति मिलने की उम्मीद है।



बेसिक शिक्षा के लिए 77,622 करोड़ रुपये
बेसिक शिक्षा के लिए 77,622 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित की गई है। परिषदीय विद्यालयों में कक्षा 1 से 8 तक के विद्यार्थियों को निःशुल्क यूनिफॉर्म, स्कूल बैग, जूता-मोजा और स्टेशनरी उपलब्ध कराने हेतु 650 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।

प्रदेश के सभी 75 जनपदों में दो-दो मुख्यमंत्री मॉडल कंपोजिट विद्यालय स्थापित किए जाएंगे। साथ ही प्रत्येक जनपद में एक विद्यालय को ‘मुख्यमंत्री उत्कृष्ट विद्यालय’ के रूप में विकसित किया जा रहा है।

जहां कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय नहीं हैं, वहां आवासीय बालिका विद्यालयों की स्थापना के लिए 580 करोड़ रुपये प्रस्तावित हैं। शिक्षकों एवं कर्मचारियों के लिए कैशलेस चिकित्सा सुविधा योजना हेतु 358 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई है।

सभी प्राथमिक विद्यालयों को स्मार्ट स्कूल के रूप में विकसित करने के लिए 300 करोड़ रुपये तथा सहायता प्राप्त अशासकीय विद्यालयों के सुरक्षा ऑडिट में कमियां पाए जाने पर अनुरक्षण के लिए 300 करोड़ रुपये का प्रावधान भी किया गया है।


माध्यमिक शिक्षा के लिए 22,167 करोड़ रुपये
माध्यमिक शिक्षा के लिए 22,167 करोड़ रुपये का बजट प्रस्तावित है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 15 प्रतिशत अधिक है। राजकीय माध्यमिक विद्यालयों में मूलभूत सुविधाओं के सुदृढ़ीकरण हेतु 520 करोड़ रुपये तथा सहायता प्राप्त विद्यालयों के लिए 10 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई है।
राजकीय संस्कृत पाठशालाओं के छात्रों की छात्रवृत्ति हेतु 20 करोड़ रुपये, ड्रिम स्कूल क्लस्टर की स्थापना के लिए 150 करोड़ रुपये और अशासकीय माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षकों के लिए कैशलेस चिकित्सा योजना हेतु 89 करोड़ रुपये प्रस्तावित हैं। गोरखपुर में पूर्वांचल के पहले एवं प्रदेश के दूसरे सैनिक स्कूल की स्थापना और संचालन भी आरंभ किया गया है।


उच्च शिक्षा को 6,591 करोड़ रुपये
उच्च शिक्षा के लिए 6,591 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जो वर्ष 2025–26 की तुलना में 7 प्रतिशत अधिक है। मेधावी छात्राओं के लिए रानी लक्ष्मीबाई स्कूटी योजना हेतु 400 करोड़ रुपये तथा मुख्यमंत्री शिक्षुता प्रोत्साहन योजना के लिए 40 करोड़ रुपये प्रस्तावित हैं।

मिर्जापुर, मुरादाबाद और बलरामपुर में नए विश्वविद्यालयों की स्थापना के लिए 50-50 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई है। शाहजहांपुर और भदोही में नए विश्वविद्यालयों की स्थापना हेतु 21-21 करोड़ रुपये प्रस्तावित हैं।

उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्र मानसिक स्वास्थ्य एवं कल्याण नीति के लिए 14 करोड़ 50 लाख रुपये का प्रावधान भी किया गया है।


प्राविधिक शिक्षा में 72 प्रतिशत वृद्धि
प्राविधिक शिक्षा के क्षेत्र में 72 प्रतिशत की वृद्धि के साथ लगभग 2,365 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। प्रदेश के 195 डिप्लोमा स्तरीय संस्थानों में प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जबकि 23 नए राजकीय पॉलिटेक्निक निर्माणाधीन या प्रक्रियाधीन हैं।

राजकीय पॉलिटेक्निक संस्थानों में नवीन तकनीक से सुसज्जित उत्कृष्टता केंद्रों की स्थापना के लिए 714 करोड़ रुपये तथा उन्नयन और अवस्थापना विकास हेतु 254 करोड़ रुपये प्रस्तावित हैं। 251 स्मार्ट क्लासरूम स्थापित किए जा चुके हैं और 143 नए स्मार्ट क्लासरूम की स्थापना प्रक्रिया में है।


राज्य सरकार ने इस बजट के माध्यम से प्राथमिक से लेकर तकनीकी और उच्च शिक्षा तक एक समग्र शैक्षिक ढांचा विकसित करने की दिशा में ठोस कदम उठाने का संकेत दिया है। बुनियादी सुविधाओं के सुदृढ़ीकरण, डिजिटल संसाधनों के विस्तार, छात्र कल्याण योजनाओं और संस्थागत विकास पर विशेष जोर इस बजट की प्रमुख विशेषता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन घोषणाओं का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया गया, तो उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सकारात्मक परिवर्तन संभव है।

Tuesday, February 3, 2026

हर जिले में छात्राओं के लिए एक-एक हॉस्टल बनाने की घोषणा से शिक्षा में बराबरी का सपना होगा साकार

हर जिले में छात्राओं के लिए एक-एक हॉस्टल बनाने की घोषणा से शिक्षा में बराबरी का सपना होगा साकार


केंद्रीय बजट 2026-27 में हर जिले में छात्राओं के लिए हॉस्टल बनाने की घोषणा की गई है। यह योजना विशेष रूप से ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों की छात्राओं के लिए महत्वपूर्ण है, जो सुरक्षित आवास की कमी के कारण पढ़ाई छोड़ देती थीं। हॉस्टल से छात्राओं को आत्मविश्वास, शिक्षा की निरंतरता और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में मदद मिलेगी।


लखनऊ । केंद्रीय बजट 2026-27 में हर जिले में छात्राओं के लिए एक-एक हॉस्टल बनाने की घोषणा को शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा और दूरगामी कदम माना जा रहा है। खासकर ग्रामीण और पिछड़े इलाकों की छात्राओं के लिए यह योजना वरदान साबित होगी। आज भी बड़ी संख्या में बेटियां सिर्फ इस वजह से आगे की पढ़ाई छोड़ देती हैं क्योंकि उनके जिले या आसपास सुरक्षित आवास की व्यवस्था नहीं होती। ग्रामीण छात्राओं को उच्च शिक्षा तक सीधी पहुंच ग्रामीण क्षेत्रों में इंटर, स्नातक या तकनीकी शिक्षा के संस्थान अक्सर जिला मुख्यालय या शहरी क्षेत्रों में होते हैं। आवास की सुविधा नहीं होने के कारण छात्राओं को रोज लंबी दूरी तय करनी पड़ती है या वे पढ़ाई बीच में ही छोड़ देती हैं।


हॉस्टल बनने से उन्हें सुरक्षित और सुलभ आवास मिलेगा, जिससे वे बिना किसी बाधा के कॉलेज और विश्वविद्यालयों में पढ़ाई कर सकेंगी। बालिका शिक्षा में गिरावट पर लगेगा अंकुश आर्थिक कमजोरी और सुरक्षा की चिंता के कारण कई परिवार बेटियों को दूर पढ़ने नहीं भेजते। जिले में ही छात्रा हॉस्टल होने से अभिभावकों का भरोसा बढ़ेगा और ड्रॉपआउट दर में कमी आएगी। इससे बालिकाओं की शिक्षा निरंतरता बनी रहेगी। सुरक्षित वातावरण से आत्मविश्वास में वृद्धि छात्राओं के लिए विशेष रूप से बनाए गए हॉस्टल में सुरक्षा, वार्डन, सीसीटीवी और अन्य मूलभूत सुविधाएं होंगी। सुरक्षित माहौल मिलने से छात्राओं का आत्मविश्वास बढ़ेगा और वे पढ़ाई के साथ-साथ प्रतियोगी परीक्षाओं और कौशल विकास पर भी ध्यान दे सकेंगी। 

आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को राहत किराए के मकान या निजी हॉस्टल का खर्च गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए भारी होता है। सरकारी हॉस्टल कम शुल्क पर उपलब्ध होने से परिवारों पर आर्थिक बोझ कम होगा और बेटियों की शिक्षा पर खर्च करना आसान होगा। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में सुविधा जिला मुख्यालयों में स्थित लाइब्रेरी, कोचिंग संस्थान और डिजिटल संसाधनों तक छात्राओं की पहुंच बढ़ेगी। इससे ग्रामीण छात्राएं भी इंजीनियरिंग, मेडिकल, प्रशासनिक और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी बेहतर ढंग से कर सकेंगी। सामाजिक सोच में सकारात्मक बदलाव जब बेटियां पढ़-लिखकर आगे बढ़ेंगी, तो समाज में शिक्षा के प्रति सोच बदलेगी। यह योजना महिला सशक्तिकरण को मजबूती देगी और “बेटी पढ़ाओ, बेटी बढ़ाओ” के संकल्प को जमीन पर उतारेगी। कुल मिलाकर, हर जिले में छात्राओं के लिए हॉस्टल की व्यवस्था न केवल शिक्षा तक पहुंच आसान बनाएगी, बल्कि ग्रामीण भारत की बेटियों को आत्मनिर्भर और सशक्त भविष्य की ओर ले जाने में मील का पत्थर साबित होगी।

Monday, February 2, 2026

बजट 2026 15,000 स्कूलों और 500 कॉलेजों में कंटेंट क्रिएटर लैब बनेंगीं, शिक्षा बजट में इस बार 8.27 प्रतिशत वृद्धि

बजट 2026 15,000 स्कूलों और 500 कॉलेजों में कंटेंट क्रिएटर लैब बनेंगीं, शिक्षा बजट में इस बार 8.27 प्रतिशत वृद्धि

03 नए नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मास्युटिकल एजुकेशन एंड रिसर्च खुलेंगे

05 विश्वविद्यालय खोलने में मदद देगी केंद्र सरकार


नई दिल्ली। केंद्रीय बजट 2026-27 में शिक्षा क्षेत्र को लेकर अहम घोषणाएं की गई हैं। स्कूल-कॉलेजों में कंटेंट क्रिएटर लैब बनेंगी। वहीं, देश के अलग-अलग हिस्सों में पांच यूनिवर्सिटी टाउनशिप बनाई जाएंगी। खास बात यह है कि ये सभी यूनिवर्सिटी टाउनशिप प्रमुख औद्योगिक और लॉजिस्टिक कॉरिडोर के आसपास विकसित की जाएंगी। ऐसे में इसका सीधा लाभ यहां पढ़ने वाले छात्रों को मिलेगा। यह पहल इसलिए की जा रही है ताकि इंडस्ट्री और रोजगार सीधे उच्च शिक्षा के साथ जुड़ सकें।


इसके साथ ही सेवा क्षेत्र के विकास पर ध्यान केंद्रित करने वाले उपायों की सिफारिश करने के लिए एक उच्च-स्तरीय 'शिक्षा से रोजगार और उद्यम' स्थायी समिति गठित करने की घोषणा से शिक्षा को कौशल से जोड़ने और उद्योगों की जरूरतों के मुताबिक शैक्षिक ढांचे पर फोकस बढ़ेगा। हर जिले में गर्ल्स हास्टल बनाने का ऐलान लड़कियों की इनरोलमेंट दर बढ़ाने के मकसद से किया गया है। बजट में हुए ऐलान के मुताबिक, देशभर के 15,000 स्कूलों और 500 कॉलेजों में कंटेंट क्रिएटर लैब्स तैयार की जाएंगी।


इडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिएटिव टेक्नोलॉजीज बनेगा:

इसके साथ ही सरकार कंटेंट क्रिएटर्स के लिए नए सेट अप भी लगाएगी। बजट में अनुमान लगाया गया है कि 2030 तक देश में एवीजीसी सेक्टर के लिए 20 लाख से अधिक प्रोफेशनल्स की जरूरत होगी। सरकार मुंबई में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिएटिव टेक्नोलॉजीज की स्थापना भी करेगी। कंटेंट के उभरते बाजार को देखते हुए सरकार का यह घोषणा काफी महत्वपूर्ण है।


शिक्षा बजट में इस बार 8.27 प्रतिशत वृद्धि : शिक्षा के कुल बजट में इस बार 8.27 फीसदी बढ़ोतरी की गई है। वर्ष 2026-27 में 139289 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है। पिछले वर्ष यह आवंटन 128650 करोड़ रुपये का था। अटल टिंकरिंग लैब के लिए आवंटन बढ़ाकर 3200 करोड़ रुपये कर दिया गया है। इसके अलावा आईआईटी, आईआईएम जैसे संस्थानों को दी जाने वाली मदद में भी बढ़ोतरी की गई है।

सेवा क्षेत्र पर स्थायी समिति की घोषणा की गई : एक उच्च-स्तरीय स्थायी समिति सेवा क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित करेगी, रोजगार सृजन, प्रौद्योगिकी निर्यात और एआई एकीकरण को बढ़ावा देगी ताकि कौशल को भविष्य की कार्यबल आवश्यकताओं के अनुरूप बनाया जा सके।


राज्यों के साथ मिलकर टाउनशिप बनेंगी

केंद्र सरकार ने साफ किया है कि 'यूनिवर्सिटी टाउनशिप' बनाने में केंद्र सरकार विभिन्न राज्य सरकारों के साथ मिलकर काम करेगी। यानी यूनिवर्सिटी बनाने, ढांचा खड़ा करने और सुविधाएं विकसित करने में राज्यों को केंद्र की मदद मिलेगी। इस पूरी योजना का मकसद यह है कि हर क्षेत्र की जरूरत के हिसाब से आधुनिक और मजबूत शिक्षा संस्थान तैयार किए जाएं।


यह होगा खास

इन विश्वविद्यालयों में स्किल सेंटर बनाए जाएंगे, जहां पढ़ाई के साथ-साथ व्यावहारिक प्रशिक्षण होगा

यूनिवर्सिटी में हाईटेक लेबोरेटरी, आधुनिक कॉलेज, रिसर्च सेंटर और इनोवेशन हब भी होंगे

छात्रों को अत्याधुनिक तकनीक और सुविधाएं मिलेंगी, शोध को बढ़ावा



पूर्वी भारत में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन खोला जाएगा

केंद्र सरकार ने बजट में पूर्वी भारत में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन खोलने का भी एलान किया गया है। इसका सीधा मकसद है कि इस क्षेत्र में डिजाइन की पढ़ाई, क्रिएटिव सोच और इनोवेशन को मजबूती मिले। वहीं, आईआईटी मुंबई व्यावहारिक नवाचार और उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए क्रिएटर लैब्स की स्थापना करेगा, जिससे छात्रों को बड़ा लाभ मिलेगा।

Friday, January 30, 2026

आर्थिक सर्वेक्षण ने शिक्षा को नए रास्ते पर चलने की दिखाई राह, ड्रॉप आउट खत्म करना होगी बड़ी चुनौती, स्कूली शिक्षा 15 वर्ष करने की सलाह

स्कूली शिक्षा 15 वर्ष करने की सलाह

नई दिल्ली । आर्थिक सर्वेक्षण में चेतावनी देते हुए भारत में अपेक्षित स्कूली शिक्षा अवधि को मौजूदा 13 से बढ़ाकर 15 वर्ष करने की सलाह दी गई है। 2024 में भारत की 27% आबादी स्कूल जाने की उम्र (3–18 वर्ष) में थी। 2047 तक भी यह हिस्सा 20% से ज्यादा बना रहेगा। भारत का शिक्षा सूचकांक अब भी वैश्विक स्तर पर कमजोर है। वजह है बच्चों की औसत अपेक्षित पढ़ाई के साल, जो भारत में कई विकसित व उभरती अर्थव्यवस्थाओं से कम हैं।

भारत में अभी औसत अपेक्षित पढ़ाई 13 वर्ष है। जबकि चीन में 15.5 वर्ष , ब्राजील में 15.8 वर्ष, जापान में 15.5 वर्ष , जर्मनी में 17.3 वर्ष और अमेरिका में 15.9 वर्ष है। रूस में 13.2 और इंडोनेशिया में औसत अपेक्षित स्कूलिंग 13.3 वर्ष है। यह दोनों देश भारत से थोड़ा बेहतर हैं जबकि अन्य देशों की तुलना में भारत को लंबी छलांग लगाने की जरूरत है।

सर्वे में कहा गया कि स्कूल शिक्षा विकसित भारत 2047 की ओर देश के विकास पथ को आकार देने में महत्वपूर्ण है। तेजी से बढ़ती एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के अनुभव साफ दिखाते हैं कि शिक्षा, कौशल विकास और टेक्नोलॉजी में लगातार निवेश से उत्पादकता में काफी सुधार हो सकता है और आर्थिक बदलाव में तेजी आ सकती है।

सर्वे में कहा गया है कि अगर स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता और बच्चों की पढ़ाई की निरंतरता नहीं बढ़ाई गई, तो युवा आबादी का यह लाभ भविष्य में चुनौती भी बन सकता है।


आर्थिक सर्वेक्षण ने शिक्षा को नए रास्ते पर चलने की दिखाई राह, ड्रॉप आउट खत्म करना होगी बड़ी चुनौती

आर्थिक सर्वेक्षण ने शिक्षा क्षेत्र की चुनौतियों पर प्रकाश डाला है, जिसमें उच्च ड्रॉपआउट दर और उच्च शिक्षा में कम जीईआर शामिल हैं। प्राथमिक स्तर पर 1.9% से माध्यमिक स्तर पर 14.1% तक ड्रॉपआउट चिंताजनक है, जबकि उच्च शिक्षा का जीईआर 28% है। सर्वेक्षण 2030 और 2035 के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रयासों में तेजी लाने, संस्थानों की क्षमता बढ़ाने और बहु-विषयक शिक्षा पर जोर देता है।

प्राथमिक स्तर पर 1.9% और माध्यमिक पर 14.1% ड्रॉपआउट दर।

उच्च शिक्षा का सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) अभी भी 28%।

2030-35 तक जीईआर लक्ष्य हेतु प्रयास तेज करने की जरूरत।


नई दिल्ली। सबको अच्छी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने की दिशा में भले ही केंद्र व राज्य सरकारों ने पिछले सालों में कई बड़े कदम उठाए हैं, लेकिन इसके बाद भी स्कूली शिक्षा के सामने ड्राप आउट खत्म करने और उच्च शिक्षा के सामने अपने जीईआर को बढ़ाने की बड़ी चुनौती अभी भी बरकरार है।

मौजूदा समय में प्राथमिक स्तर पर ड्रापआउट की दर 1.9 प्रतिशत, उच्च प्राथमिक स्तर पर 5.2 प्रतिशत व माध्यमिक स्तर पर 14.1 प्रतिशत है। वहीं उच्च शिक्षा का सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) अभी भी करीब 28 प्रतिशत है।

क्या चिंता जताई गई?
आर्थिक सर्वेक्षण में यह चिंता तब जताई गई है, जब 2030 तक स्कूली शिक्षा के जीईआर को सभी स्तरों तक शत -प्रतिशत करने और उच्च शिक्षा के जीईआर को 2035 तक 50 प्रतिशत करने का लक्ष्य है। ऐसे में सर्वेक्षण में इस दिशा में रफ्तार तेज करने की जरूरत जताई गई है।

सर्वेक्षण के मुताबिक अभी भी स्कूली शिक्षा में बारहवीं का जीईआर 58.4 प्रतिशत है वहीं पहली से पांचवीं कक्षा तक की जीईआर 90.9 प्रतिशत है। इससे साफ है कि बड़ी संख्या में बच्चे बारहवीं तक आते-आते पढ़ाई अभीभी छोड़ देते है। इसका कारण बोर्ड परीक्षाओं में फेल होने सहित बड़ी संख्या में बच्चों की आर्थिक स्थिति का ठीक न होना भी होता है।

ऐसे में वह मेहनत-मजदूरी जैसे कामों में लग जाते हैं। शिक्षा मंत्रालय इस समस्या से निपटने की दिशा में काम कर रहा है, लेकिन सर्वेक्षण में उनके प्रयासों को नाकाफी बताते हुए इनमें और तेजी लाने की राह दिखाई गई है।इसी तरह उच्च शिक्षा के जीईआर को भी 50 प्रतिशत करने के लिए उच्च शिक्षण संस्थानों की क्षमता बढ़ाने की पहल तेज हुई है।


IIT जैसे संस्थानों ने की पहल
2040 तक सभी उच्च शिक्षण संस्थानों को बहु विषयक संस्थान के रूप में तैयार करने पर जोर दिया गया है। इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट या सिर्फ शिक्षक शिक्षा देने वाले संस्थानों को सभी विषयों से जुड़े कोर्स शुरूकरने के लिए कहा गया है।

इस दिशा में आइआइटी जैसे संस्थानों में पहल भी की है, हालांकि इसके लिए संस्थानों को बड़ा इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करना होगा। सर्वेक्षण में इनमें भी तेजी लाने की जरूरत बताई गई है। सर्वेक्षण में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति ( एनईपी) आने के बाद शिक्षा क्षेत्र में सुधार की दिशा में उठाए गए कदमों पर संतोष जताया गया है।

Saturday, January 10, 2026

स्कूलों के संचालन का पूरा जिम्मा समाज को सौंपेगी भारत सरकार, सरकार सिर्फ वेतन और व्यवस्था देगी, बड़े बदलाव की तैयारी के संकेत

स्कूलों के संचालन का पूरा जिम्मा समाज को सौंपेगी भारत सरकार, सरकार सिर्फ वेतन और व्यवस्था देगी, बड़े बदलाव की तैयारी के संकेत 

सम्मग्र शिक्षा अभियान के एक नए चरण की होगी शुरुआत

नई दिल्ली: स्कूली शिक्षा को सशक्त बनाने के लिए शुरू किए गए समग्र शिक्षा अभियान के जल्द ही एक नए चरण की शुरुआत होगी। इसमें 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्यों को पूरा करने सहित स्कूलों के संचालन की व्यवस्था को लेकर भी बड़े बदलाव की तैयारी है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने शुक्रवार को इसे लेकर एक खाका पेश किया और राज्यों से सुझाव भी मांगे। नई व्यवस्था के तहत स्कूलों के संचालन का पूरा जिम्मा समाज के पास होगा, जबकि सरकार सिर्फ वेतन और व्यवस्था देगी।


केंद्र ने यह पहल तब की है, जब नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अमल को पांच साल पूरा हो गया है। समग्र शिक्षा अभियान का मौजूदा चरण भी 31 मार्च 2026 को समाप्त हो रहा है। इस अभियान के चलते पिछले कुछ वर्षों में स्कूली शिक्षा में इंफ्रास्ट्रक्चर और गुणवत्ता दोनों स्तर पर काफी सुधार हुआ है। बावजूद इसके लर्निंग आउटकम बढ़ाने, परीक्षा के बोझ को कम करने, बारहवीं तक शत-प्रतिशत सकल नामांकन अनुपात करने जैसे ऐसे कदम हैं, जिसे सामाजिक जुड़ाव को बढ़ाए बगैर हासिल नहीं किया जा सकता। 


मंत्रालय ने इसी सोच के साथ अब स्कूलों के संचालन की पूरी व्यवस्था में बदलाव का फैसला लिया है। इसे लेकर एक मसौदा तैयार किया गया है, जिसमें स्कूलों के संचालन के लिए समाज के प्रबुद्ध वर्गों की समिति गठित की जा सकती है। 

Wednesday, December 24, 2025

आने वाले बजट में सभी जिलों में बालिका छात्रावास बनाने का हो सकता है एलान, उच्च शिक्षा के GER को बढ़ाने में जुटे शिक्षा मंत्रालय ने वित्त मंत्रालय को दिया प्रस्ताव

आने वाले बजट में सभी जिलों में बालिका छात्रावास बनाने का हो सकता है एलान, उच्च शिक्षा के GER को बढ़ाने में जुटे शिक्षा मंत्रालय ने वित्त मंत्रालय को दिया प्रस्ताव


नई दिल्लीः आने वाले बजट में केंद्र सरकार बालिकाओं को उच्च शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करने के लिए कुछ बड़ा एलान कर सकती है। जो संकेत मिले है, उसमें देश के सभी जिलों में बालिकाओं के लिए एक-एक छात्रावास बनाए जा सकते है। जहां वह सुरक्षित तरीके से रह कर उच्च शिक्षा की अपनी पढ़ाई पूरी कर सकती है। 


अभी ग्रामीण और दूर-दराज क्षेत्रों में रहने वाली बालिकाएं सिर्फ इसलिए उच्च शिक्षा से वंचित रह जाती है, क्योंकि उच्च शिक्षण संस्थान उनके घरों से दूर है। साथ ही जहां संस्थान है, वहां उनके पास रहकर पढ़ाई करने की कोई व्यवस्था नहीं है। ऐसे में शिक्षा मंत्रालय इस दिशा में आगे बढ़ा है। 


शिक्षा मंत्रालय से जुड़े उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार, मंत्रालय की ओर से वित्त मंत्रालय को इसे लेकर प्रस्ताव दिया गया है। जिस पर वित्त मंत्रालय के साथ ही कई दौर की चर्चा भी चुकी है। ऐसे में माना जा रहा है कि बजट में इसे लेकर घोषणा हो सकती है। मंत्रालय वैसे भी उच्च शिक्षा के जीईआर को 2035 तक 50 प्रतिशत पहुंचाने के लक्ष्य को लेकर तेजी से बढ़ा है। ऐसे में बगैर बालिकाओं को जोड़े यह लक्ष्य हासिल भी नहीं होने वाला है। मौजूदा समय में देश में उच्च शिक्षा का जीइआर करीब 29 प्रतिशत है।

उच्च शिक्षा के जीइआर को बढ़ाने की इस मुहिम में केंद्र ने सभी राज्यों को भी जोड़ने की योजना बनाई है। जिसके तहत 26, 27 और 28 दिसंबर को सभी राज्यों के मुख्य सचिवों के साथ एक बैठक रखी गई है। जिसमें उच्च शिक्षा के जीइआर को बढ़ाने के मुद्दे पर प्रमुखता से चर्चा होगी। इसके लिए सभी राज्यों को जरूरी संसाधन जुटाने जैसी पहलों के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।

Tuesday, November 11, 2025

यूपी के शिक्षा संस्थानों में अनिवार्य होगा वंदे मातरम् का गायन, बोले सीएम योगी

यूपी के शिक्षा संस्थानों में अनिवार्य होगा वंदे मातरम् का गायन, बोले सीएम योगी


गोरखपुर । मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश के सभी शैक्षणिक संस्थानों में वंदे मातरम् का गायन अनिवार्य करने की बात कही है। सोमवार को उन्होंने कहा कि राष्ट्र गीत के प्रति सबके मन में सम्मान का भाव होना ही चाहिए। इसके लिए वह प्रदेश के सभी शैक्षणिक संस्थानों में बंदे मातरम् का गायन अनिवार्य कराएंगे। हर नागरिक के मन में भारत माता के प्रति श्रद्धा और सम्मान का भाव जगाएंगे। 

मुख्यमंत्री, सरदार वल्लभ भाई पटेल की 150वीं जन्मतिथि और बंदे मातरम् का 150वां वर्ष शुरू होने के उपलक्ष्य में प्रदेश के सभी 403 विधानसभा क्षेत्रों के लिए आयोजित 'एकता यात्रा' का शुभारंभ कर रहे थे। इस अवसर पर उन्होंने देश निर्माण में सरदार पटेल के अवदान को याद किया।


निगम परिसर के रानी लक्ष्मीबाई पार्क में सोमवार को आयोजित 'एकता यात्रा' में मुख्यमंत्री ने भी इसे लेकर कांग्रेस पर तीखा प्रहार किया। कहा कि जिस राष्ट्र गीत ने आजादी के आंदोलन में भारत की सोई हुई चेतना को जागृत किया, तुष्टीकरण की नीति के चलते कांग्रेस ने सांप्रदायिक बताकर उसमें संशोधन का प्रयास किया। जिस वंदे मातरम् को कांग्रेस के 1896-97 के अधिवेशन में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने अपने स्वर में गाया था, उसका 1923 के अधिवेशन में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष मोहम्मद अली जौहर ने विरोध किया। उन्होंने राष्ट्र गीत गाने से इन्कार कर दिया था। वंदे मातरम् का इस प्रकार का विरोध भारत के विभाजन का दुर्भाग्यपूर्ण कारण बना था। मुख्यमंत्री ने कहा कि कांग्रेस ने अगर उस समय मौहम्मद अली जौहर को अध्यक्ष पद से बेदखल कर वंदे मातरम् के माध्यम से भारत की राष्ट्रीयता का सम्मान किया होता तो देश का विभाजन नहीं हुआ होता।

मुख्यमंत्री ने संबोधन में सपा को भी निशाने पर रखा। कहा कि कोई भी व्यक्ति, मत या मजहब राष्ट्र से बड़ा नहीं हो सकता। व्यक्तिगत आस्था यदि राष्ट्र के आड़े आए तो उसे किनारे कर देना चाहिए। कुछ लोगों के लिए आज भी उनका व्यक्तिगत मत और मजहब बड़ा है। इस क्रम में उन्होंने सपा के एक सांसद द्वारा राष्ट्र गीत गाने से इन्कार करने का उल्लेख भी किया।

यौगी ने कहा कि हमारा दायित्व है कि हम उन कारणों को ढूंढे, जो समाज को बांटने वाले हैं। जाति, क्षेत्र, भाषा के नाम पर विभाजन नए जिन्ना को पैदा करने की साजिश का हिस्सा है। हमें ध्यान रखना होगा कि भारत के अंदर फिर से कोई जिन्ना न पैदा होने पाए। कोई जिन्ना बनने का साहस करता है तो उसे चुनौती बनने से पहले ही दफन कर देना होगा। समाज को बांटने वाले वही लोग हैं, जो पटेल की जयंती में शामिल नहीं होते, लेकिन जिन्ना के सम्मान के लिए शर्मनाक तरीके से आगे आ जाते हैं।


निर्णय पर अखिलेश ने उठाए सवाल
लखनऊः सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने स्कूल-कालेजों में वंदे मातरम अनिवार्य किए जाने पर सवाल उठाए हैं।? उन्होंने लखनऊ में पार्टी मुख्यालय में वार्ता में कहा कि, 'ये बहस जो आज हम कर रहे है, क्या उस समय जो संविधान के निर्माता थे, उन्होंने नहीं की? इसलिए राष्ट्र गान और राष्ट्र गीत दिया। अगर यही होता कि इसे गाना जरूरी है तो तब इसे अनिवार्य क्यों नहीं किया गया? उन्होंने विकल्प छोड़ दिया था।


'वंदे मातरम्' न गाएं मुस्लिम बच्चे, स्कूल से निकल जाएं: कासमी
मुंबई  उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा सोमवार को राज्य के सभी शैक्षणिक संस्थानों में 'वंदे मातरम्' गाना अनिवार्य करने की घोषणा पर मुस्लिम समुदाय ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। जमीयत उलमा-ए-महाराष्ट्र के अध्यक्ष मौलाना हलीम उल्लाह कासमी ने कहा कि मुसलमानों को अपने बच्चों को स्कूलों से निकाल लेना चाहिए, बजाय इसके कि उन्हें राष्ट्रगीत गाने के लिए मजबूर किया जाए।

कासमी ने कहा, हम मुसलमान हैं। इस देश का संविधान हमें अपने धर्म का पालन करने की आजादी देता है। अगर हमारी आस्था के खिलाफ कुछ भी थोपा जाता है, तो हमारा संविधान उसे स्वीकार नहीं करेगा। इसलिए हम किसी भी हालत में ऐसी चीज को स्वीकार नहीं करेंगे जो हमारे धर्म के खिलाफ हो। हमारा धर्म हमें सिखाता है कि अल्लाह एक है और हम सिर्फ उसी की इबादत करेंगे। किसी और की नहीं। अगर हम इसके अतिरिक्त कुछ करेंगे, तो मुसलमान नहीं रहेंगे। जहां तक देश का सवाल है, मुसलमान राष्ट्र के प्रति सम्मान दिखाने में कभी पीछे नहीं रहे।

Monday, October 27, 2025

शिक्षा मंत्रालय ने स्कूली शिक्षा को लेकर पेश की विरोधाभासी तस्वीर

8,000 स्कूलों में एक छात्र नहीं, पर तैनात हैं 20,000 शिक्षक

दूसरी तरफ, देश में एक लाख से अधिक ऐसे स्कूल हैं जो सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे चल रहे एवं उनमें पढ़ते हैं 33 लाख से अधिक छात्र

शिक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, शून्य नामांकन वाले सबसे अधिक 3,812 स्कूल पश्चिम बंगाल में हैं जहां 17,965 शिक्षकों की तैनाती


नई दिल्लीः स्कूलों में शिक्षकों की कमी पर उठते सवाल के बीच शिक्षा मंत्रालय ने राज्यों में शिक्षकों की असमान तैनाती को लेकर गंभीर सवाल उठाए है। साथ ही, राज्यों को आईना दिखाने के लिए दो तस्वीर भी पेश की है। मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, देशभर में करीब 8,000 स्कूल ऐसे हैं जहां एक भी बच्चे का नामांकन नहीं है, लेकिन फिर भी उन स्कूलों में 20 हजार से अधिक शिक्षकों की तैनाती है। यानी, ऐसे स्कूलों में औसतन ढाई शिक्षक हैं जो बैठे-बैठे ही वेतन पा रहे हैं। दूसरी ओर, देश में एक लाख से अधिक ऐसे स्कूल हैं जो एक शिक्षक के भरोसे चल रहे है और जिसमें पढ़ने वाले बच्चों की संख्या 33 लाख से अधिक है।


शिक्षा मंत्रालय ने स्कूली शिक्षा को लेकर यह विरोधाभासी तस्वीर तब पेश की है, जब वह सभी राज्यों में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) के अमल में तेजी से जुटी है। शिक्षा और स्कूलों में शिक्षकों की तैनाती पूरी तरह से राज्य का विषय है। बावजूद इसके, केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय का लगातार इस बात पर जोर रहता है कि स्कूलों में छात्रों को अच्छी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देते हुए छात्र-शिक्षक अनुपात को बेहतर रखा जाए। इसमें प्रत्येक 30 छात्र पर कम से कम एक शिक्षक होना जरूरी है। आर्थिक-सामाजिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों के स्कूलों में प्रत्येक 25 बच्चों पर कम से कम एक शिक्षक की तैनाती देने की सिफारिश है।

शिक्षा मंत्रालय की ओर से राज्यों के स्कूलों की स्थिति पर तैयार की गई 2024-25 की रिपोर्ट में शून्य नामांकन वाले स्कूलों की संख्या में पिछले साल के मुकाबले काफी सुधार हुआ है। इससे पहले ऐसे स्कूलों की संख्या करीब 13 हजार थी, जो अब 7,993 रह गई है। इनमें शून्य नामांकन वाले सबसे अधिक 3,812 स्कूल अकेले पश्चिम बंगाल के हैं जिनमें 17,965 शिक्षकों की तैनाती है। गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में शिक्षकों की भर्ती हमेशा से विवादों में रही है। यह इस ओर भी संकेत करता है कि वहां राजनीति साधने के लिए बड़ी संख्या में शिक्षकों की भर्ती हो रही है। इसके साथ ही तेलंगाना में 2,245, मध्य प्रदेश में 463, कर्नाटक में 270, तमिलनाडु में 311, झारखंड में 107, जम्मू-कश्मीर में 146, उत्तर प्रदेश में 81 और उत्तराखंड में 39 स्कूल शून्य नामांकन वाले हैं। इन स्कूलों में एक भी छात्र का नामांकन नहीं है, फिर भी इनमें 20,817 शिक्षकों की तैनाती दी गई है।

वहीं, देश में एकल शिक्षक वाले स्कूलों की सर्वाधिक संख्या (12,912) आंध्र प्रदेश में है, जबकि 9,508 स्कूलों के साथ उत्तर प्रदेश दूसरे स्थान पर है। उल्लेखनीय है कि शिक्षा मंत्रालय हर साल सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के स्कूलों की स्थिति को लेकर एक रिपोर्ट तैयार करता है जिसका ब्यौरा राज्य खुद देते हैं। जरूरत पड़ने पर शिक्षा मंत्रालय की ओर से थर्ड पार्टी सर्वेक्षण भी कराया जाता है।

Sunday, October 12, 2025

स्कूलों में फीस के लिए UPI अपनाने पर शिक्षा मंत्रालय का जोर

स्कूलों में फीस के लिए UPI अपनाने पर शिक्षा मंत्रालय का जोर

राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों को पत्र लिखा, डिजिटल लेनदेन से छात्रों को सुविधा होगी


नई दिल्ली । केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के स्कूलों से प्रवेश और परीक्षा शुल्क वसूलने के लिए एकीकृत भुगतान इंटरफेस (यूपीआई) अपनाने को कहा है। इस पहल का उद्देश्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं का आधुनिकीकरण और लेन-देन प्रक्रिया को सरल बनाना है। इससे छात्रों और अभिभावकों को भी सुविधा होगी।


राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और एनसीईआरटी, सीबीएसई, केवीएस और एनवीएस जैसी स्वायत्त संस्थाओं को लिखे एक पत्र में स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग ने यूपीआई, मोबाइल वॉलेट और नेट बैंकिंग जैसे डिजिटल भुगतान प्लेटफार्मों का लाभ उठाने पर जोर दिया। 

शिक्षा मंत्रालय का कहना है कि यह कदम विधायी, नीतिगत और संस्थागत सुधारों के माध्यम से 'जीवन और स्कूली शिक्षा में आसानी' को बढ़ावा देने के व्यापक प्रयासों का हिस्सा है। डिजिटल भुगतान प्रणालियों को अपनाने से कई लाभ होंगे, जिनमें अधिक सुविधा, पारदर्शिता और अभिभावकों के लिए स्कूल जाए बिना ही दूर से भुगतान करने की क्षमता शामिल है। इसका उद्देश्य हितधारकों को डिजिटल लेनदेन से परिचित कराकर उनके बीच वित्तीय साक्षरता को बढ़ावा देना भी है, जो एक डिजिटल रूप से सशक्त और समावेशी शिक्षा प्रणाली के दृष्टिकोण के अनुरूप है।

मंत्रालय ने इस बात पर जोर दिया कि नकद भुगतान से डिजिटल भुगतान में बदलाव से स्कूल प्रशासन का आधुनिकीकरण होगा और 2047 तक 'विकसित भारत' एक नागरिक-केंद्रित, डिजिटल रूप से उन्नत राष्ट्र के सरकार के लक्ष्य को बल मिलेगा।