स्कूली शिक्षा 15 वर्ष करने की सलाह
नई दिल्ली । आर्थिक सर्वेक्षण में चेतावनी देते हुए भारत में अपेक्षित स्कूली शिक्षा अवधि को मौजूदा 13 से बढ़ाकर 15 वर्ष करने की सलाह दी गई है। 2024 में भारत की 27% आबादी स्कूल जाने की उम्र (3–18 वर्ष) में थी। 2047 तक भी यह हिस्सा 20% से ज्यादा बना रहेगा। भारत का शिक्षा सूचकांक अब भी वैश्विक स्तर पर कमजोर है। वजह है बच्चों की औसत अपेक्षित पढ़ाई के साल, जो भारत में कई विकसित व उभरती अर्थव्यवस्थाओं से कम हैं।
भारत में अभी औसत अपेक्षित पढ़ाई 13 वर्ष है। जबकि चीन में 15.5 वर्ष , ब्राजील में 15.8 वर्ष, जापान में 15.5 वर्ष , जर्मनी में 17.3 वर्ष और अमेरिका में 15.9 वर्ष है। रूस में 13.2 और इंडोनेशिया में औसत अपेक्षित स्कूलिंग 13.3 वर्ष है। यह दोनों देश भारत से थोड़ा बेहतर हैं जबकि अन्य देशों की तुलना में भारत को लंबी छलांग लगाने की जरूरत है।
सर्वे में कहा गया कि स्कूल शिक्षा विकसित भारत 2047 की ओर देश के विकास पथ को आकार देने में महत्वपूर्ण है। तेजी से बढ़ती एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के अनुभव साफ दिखाते हैं कि शिक्षा, कौशल विकास और टेक्नोलॉजी में लगातार निवेश से उत्पादकता में काफी सुधार हो सकता है और आर्थिक बदलाव में तेजी आ सकती है।
सर्वे में कहा गया है कि अगर स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता और बच्चों की पढ़ाई की निरंतरता नहीं बढ़ाई गई, तो युवा आबादी का यह लाभ भविष्य में चुनौती भी बन सकता है।
आर्थिक सर्वेक्षण ने शिक्षा को नए रास्ते पर चलने की दिखाई राह, ड्रॉप आउट खत्म करना होगी बड़ी चुनौती
आर्थिक सर्वेक्षण ने शिक्षा क्षेत्र की चुनौतियों पर प्रकाश डाला है, जिसमें उच्च ड्रॉपआउट दर और उच्च शिक्षा में कम जीईआर शामिल हैं। प्राथमिक स्तर पर 1.9% से माध्यमिक स्तर पर 14.1% तक ड्रॉपआउट चिंताजनक है, जबकि उच्च शिक्षा का जीईआर 28% है। सर्वेक्षण 2030 और 2035 के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रयासों में तेजी लाने, संस्थानों की क्षमता बढ़ाने और बहु-विषयक शिक्षा पर जोर देता है।
प्राथमिक स्तर पर 1.9% और माध्यमिक पर 14.1% ड्रॉपआउट दर।
उच्च शिक्षा का सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) अभी भी 28%।
2030-35 तक जीईआर लक्ष्य हेतु प्रयास तेज करने की जरूरत।
नई दिल्ली। सबको अच्छी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने की दिशा में भले ही केंद्र व राज्य सरकारों ने पिछले सालों में कई बड़े कदम उठाए हैं, लेकिन इसके बाद भी स्कूली शिक्षा के सामने ड्राप आउट खत्म करने और उच्च शिक्षा के सामने अपने जीईआर को बढ़ाने की बड़ी चुनौती अभी भी बरकरार है।
मौजूदा समय में प्राथमिक स्तर पर ड्रापआउट की दर 1.9 प्रतिशत, उच्च प्राथमिक स्तर पर 5.2 प्रतिशत व माध्यमिक स्तर पर 14.1 प्रतिशत है। वहीं उच्च शिक्षा का सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) अभी भी करीब 28 प्रतिशत है।
क्या चिंता जताई गई?
आर्थिक सर्वेक्षण में यह चिंता तब जताई गई है, जब 2030 तक स्कूली शिक्षा के जीईआर को सभी स्तरों तक शत -प्रतिशत करने और उच्च शिक्षा के जीईआर को 2035 तक 50 प्रतिशत करने का लक्ष्य है। ऐसे में सर्वेक्षण में इस दिशा में रफ्तार तेज करने की जरूरत जताई गई है।
सर्वेक्षण के मुताबिक अभी भी स्कूली शिक्षा में बारहवीं का जीईआर 58.4 प्रतिशत है वहीं पहली से पांचवीं कक्षा तक की जीईआर 90.9 प्रतिशत है। इससे साफ है कि बड़ी संख्या में बच्चे बारहवीं तक आते-आते पढ़ाई अभीभी छोड़ देते है। इसका कारण बोर्ड परीक्षाओं में फेल होने सहित बड़ी संख्या में बच्चों की आर्थिक स्थिति का ठीक न होना भी होता है।
ऐसे में वह मेहनत-मजदूरी जैसे कामों में लग जाते हैं। शिक्षा मंत्रालय इस समस्या से निपटने की दिशा में काम कर रहा है, लेकिन सर्वेक्षण में उनके प्रयासों को नाकाफी बताते हुए इनमें और तेजी लाने की राह दिखाई गई है।इसी तरह उच्च शिक्षा के जीईआर को भी 50 प्रतिशत करने के लिए उच्च शिक्षण संस्थानों की क्षमता बढ़ाने की पहल तेज हुई है।
IIT जैसे संस्थानों ने की पहल
2040 तक सभी उच्च शिक्षण संस्थानों को बहु विषयक संस्थान के रूप में तैयार करने पर जोर दिया गया है। इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट या सिर्फ शिक्षक शिक्षा देने वाले संस्थानों को सभी विषयों से जुड़े कोर्स शुरूकरने के लिए कहा गया है।
इस दिशा में आइआइटी जैसे संस्थानों में पहल भी की है, हालांकि इसके लिए संस्थानों को बड़ा इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करना होगा। सर्वेक्षण में इनमें भी तेजी लाने की जरूरत बताई गई है। सर्वेक्षण में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति ( एनईपी) आने के बाद शिक्षा क्षेत्र में सुधार की दिशा में उठाए गए कदमों पर संतोष जताया गया है।
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