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Friday, October 24, 2025

बोर्ड परीक्षा फॉर्म में अब 27 अक्टूबर तक सुधारें गलतियां, CBSE की ओर से गलतियों में सुधार के लिए खोला गया पोर्टल

सीबीएसई : 10वीं और 12वीं के छात्रों के एलओसी डेटा में सुधार का अवसर, 27 अक्तूबर संशोधन फार्म भरने की अवधि, सतर्कता नहीं बरती तो नहीं मिलेगा मौका

वाराणसी। सीबीएसई ने 10वीं और 12वीं के छात्रों के एलओसी डेटा में सुधार का अवसर दिया है। इस समय सीमा को समाप्त होने में अब सिर्फ 4 दिन शेष हैं। सुधार विंडो 27 अक्तूबर तक खुली रहेगी। इसके बाद बोर्ड कोई अन्य मौका नहीं मिलेगा। सीबीएसई बोर्ड ने कक्षा 10 और 12 के विद्यार्थियों के लिए लिस्ट ऑफ कैंडिडेट्स (एलओसी) भरने को लेकर इस बार सख्त निर्देश दिए हैं। इसमें वही डेटा भरना होता है जिसके आधार पर बच्चे बोर्ड एग्जाम में बैठ पाते हैं।

इस बार सीबीएसई ने साफ कह दिया है कि बोर्ड परीक्षा के लिए भरे जाने वाले फार्म में नाम, जन्म तिथि और विषयों में गलती के लिए अब कोई अन्य मौका नहीं मिलेगा। इसलिए विद्यालय और छात्रों को शुरू से ही सतर्कता बरतना होगी। एलओसी में सभी बच्चों का नाम, पिता या माता का नाम, जन्म तिथि और चुने गए विषय दर्ज करने होते हैं। यही जानकारी एडमिट कार्ड और बोर्ड की मार्कशीट में छपती है। इसलिए अगर इसमें छोटी-सी भी गलती हो जाए तो भविष्य में बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

सीबीएसई ने स्कूलों को विकल्प दिया है कि अगर एलओसी में कोई गलती हो तो उसे अंतिम प्रस्तावित तिथि तक संशोधित करें। एक बार एलओसी जमा होने पर विद्यार्थी को एक डाटा वेरिफिकेशन स्लिप मिलेगी। इसमें नाम, जन्म तिथि और विषय चेक करना होगा। अगर कोई गलती मिलती है तो उसे 13 से 27 अक्तूबर 2025 तक सुधारा जा सकेगा। इसके बाद कोई मौका नहीं दिया जाएगा।

जिला समन्वयक गुरमीत कौर ने बताया कि बोर्ड में पंजीकरण के बाद उसमें संशोधन के लिए सिर्फ 4 दिन हैं। ऐसे में छात्र और विद्यालय दोनों सतर्कता बरतें। अक्सर विद्यार्थी फॉर्म भरते समय या स्कूल डाटा अपलोड करते समय गलती करते हैं। ऐसे में सतर्कता बरतते हुए यदि आवेदन ठीक से अपलोड किए गए तो गलतियों की संभावना ना के बराबर होगी।




बोर्ड परीक्षा फॉर्म में अब 27 अक्टूबर तक सुधारें गलतियां, CBSE की ओर से गलतियों में सुधार के लिए खोला गया पोर्टल

आगरा। सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (सीबीएसई) ने दसवीं और बारहवीं के छात्रों को राहत दी है। बोर्ड परीक्षा से पहले छात्रों के डाटा में सुधार का मौका दिया गया है। स्कूल 27 अक्तूबर तक लिस्ट ऑफ कैंडिडेट्स (एलओसी) में आवश्यक संशोधन कर सकेंगे। इसके बाद सुधार का कोई अवसर नहीं मिलेगा।


बोर्ड ने कहा है कि परीक्षा से जुड़े डाटा में गलतियों को लेकर वह पूरी तरह संवेदनशील है। इसलिए 2025-26 सत्र के लिए एलओसी में दर्ज विवरणों में सुधार की सुविधा दी गई है। करेक्शन विंडो 27 अक्तूबर तक खुली रहेगी। 

बोर्ड ने स्पष्ट किया है कि इसके बाद कोई बदलाव स्वीकार नहीं होगा। जारी नोटिफिकेशन के अनुसार अभिभावक और स्कूल छात्र का नाम, माता-पिता के नाम, जन्मतिथि और विषयों की जानकारी को ध्यान से जांचें। डाटा वेरिफिकेशन स्लिप के माध्यम से विवरण दोबारा जांचने के निर्देश दिए हैं। बोर्ड ने कहा है कि स्कूल अभिभावकों को समय सीमा की जानकारी दें ताकि सुधार तय समय में पूरे हो सकें।



विदेश में पढ़ाई करनी है तो लगाएं सरनेम

सीबीएसई ने कहा है कि जो छात्र विदेश में पढ़ाई की योजना बना रहे हैं, वे अपने नाम में सरनेम अवश्य जोड़ें। इससे भविष्य में किसी प्रकार की परेशानी नहीं होगी। यदि पासपोर्ट बन चुका है तो उसी के अनुसार बोर्ड के डाटा में विवरण दर्ज करें। बोर्ड ने विषय चयन को भी एक बार फिर से जांचने की सलाह दी है, क्योंकि विषयों में कोई संशोधन स्वीकार नहीं किया जाएगा।

ड्रापबाक्स में अटका 5.74 लाख बच्चों का डाटा, 31 अक्टूबर तक यूडायस पोर्टल पर ड्रापबाक्स खाली करने का परिषदीय स्कूलों पर पड़ रहा दबाव

ड्रापबाक्स में अटका 5.74 लाख बच्चों का डाटा, 31 अक्टूबर तक यूडायस पोर्टल पर ड्रापबाक्स खाली करने का परिषदीय स्कूलों पर पड़ रहा दबाव

बोर्ड परीक्षा के रजिस्ट्रेशन के समय परमानेंट एजुकेशन नंबर नहीं होने से हो सकती परेशानी

लखनऊसरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले कक्षा एक से सातवीं तक के 5,74,132  बच्चों का डाटा यू-डायस पोर्टल के ड्रापबाक्स में फंसा हुआ है। पोर्टल पर छात्रों का पूरा रिकार्ड नाम, जन्मतिथि, आधार नंबर और कक्षा की जानकारी दर्ज की जाती है। किसी बच्चे का रिकार्ड तब तक ड्रापबाक्स में रहता है, जब तक उसका डाटा अगले स्कूल में इंपोर्ट (स्थानांतरण) नहीं हो जाता। ऐसे बच्चे जब नौवीं कक्षा में जाएंगे तो बोर्ड परीक्षा के रजिस्ट्रेशन के समय परमानेंट एजुकेशन नंबर नहीं होने से परेशानी हो सकती है।

फिलहाल बड़ी संख्या में बच्चों का डाटा इंपोर्ट नहीं हो पाया है। कई बच्चे पांचवीं या आठवीं पास करने के बाद अपने परिवार के साथ राज्य से बाहर चले गए हैं, जिससे उनसे संपर्क नहीं हो पा रहा। कुछ बच्चों ने गैर-मान्यता प्राप्त स्कूलों में दाखिला ले लिया है, जिनका डाटा सिस्टम में ट्रांसफर नहीं हो सकता।

परिषदीय स्कूल के प्रधानाध्यापकों - का कहना है कि ड्रापबाक्स खाली कराने का दबाव बेसिक शिक्षा अधिकारियों की ओर से डाला जा रहा है, जबकि कई मामलों में छात्रों की जन्मतिथि, आधार कार्ड और ट्रांसफर सर्टिफिकेट (टीसी) में अंतर है। कुछ के नाम आधार और यू-डायस पोर्टल पर अलग अलग दर्ज हैं, जिससे सिस्टम डाटा स्वीकार नहीं कर रहा। जिन बच्चों का जन्म प्रमाणपत्र या आधार कार्ड नहीं है, उन्हें कुछ स्कूलों ने अस्थायी रूप से '9999' डालकर पंजीकृत किया है।

ग्रामीण इलाकों में स्थिति और गंभीर है। कुछ स्कूल आरटीई (शिक्षा के अधिकार) 2009 के नियमों का उल्लंघन करते हुए कक्षा पांच या आठ पास बच्चों को फिर से निचली कक्षा में दाखिला दे रहे हैं, जिससे भी डाटा ट्रांसफर नहीं हो पा रहा। 

बेसिक शिक्षा विभाग के अधिकारियों का कहना है कि ड्रापबाक्स में डाटा फंसे होने का मतलब यह नहीं है कि बच्चे स्कूल नहीं जा रहे हैं, बल्कि सिर्फ उनका परमानेंट एजुकेशन नंबर (पेन) नए स्कूल में ट्रांसफर नहीं हो पाया है। एक स्कूल से दूसरे स्कूल में जाने वाले बच्चों का डाटा स्थानांतरित करने की जिम्मेदारी प्रधानाध्यापक की है। अगर किसी बच्चे ने पांचवीं पास करने के बाद निचली कक्षा में प्रवेश ले लिया है, तो संबंधित स्कूल के प्रधानाध्यापक फार्म भरकर इसे ठीक कर सकते हैं। सभी जिलों के बेसिक शिक्षा अधिकारियों को 31 अक्टूबर तक समीक्षा कर गलत प्रविष्टियों को सुधारने के निर्देश दिए गए हैं





जानिए! ड्रॉप बॉक्स में बच्चों की संख्या में वृद्धि के कारण, यू-डायस पर प्रदर्शित ड्राप आउट वाले बच्चों की संख्या से जिम्मेदारों की चिंता बढ़ी


लखनऊ। उत्तर प्रदेश में तमाम प्रयासों के बावजूद अभी भी 5,74,132 लाख बच्चे स्कूलों से दूर हैं। यू-डायस पर प्रदर्शित ड्राप आउट वाले इन बच्चों की संख्या जिम्मेदारों के लिए परेशानी का कारण बना हुआ है। ड्राप बॉक्स में बच्चों की संख्या में इजाफा का सबसे बड़ा कारण जटिल नियम मने जा रहे हैं। कहीं आधार व यू डायस पर बच्चों के नाम मैच नहीं हैं, तो कहीं जन्मतिथि समेत अन्य गड़बड़ियों से मामला फंसा हुआ है। हजारों ऐसे बच्चें हैं जिन्होंने

कक्षा पांच पास करने के बाद गैर मान्यता प्राप्त स्कूलों या मदरसों में अपना नाम लिखा लिया, यह भी एक कारण बताया जा रहा है। यह भी बताया जा रहा है कि हजारों बच्चे कक्षा 5 या 8 पास करने के बाद स्कूलों से टीसी लेकर राज्य से बाहर चले गए और उनसे कोई संपर्क नहीं हो पा रहा है। ऐसे में इन बच्चों को इम्पोर्ट करवाया जाना संभव नहीं है और इनके नाम भी ड्रॉप बॉक्स में पड़े हैं। इसी प्रकार ड्रॉप बॉक्स में कुछ ऐसे भी बच्चे हैं, जिनके यू-डायस पोर्टल पर जन्म तिथि आधार के अनुसार है और टीसी में अलग है।


ड्रॉप बॉक्स में बच्चों की संख्या में वृद्धि के कारण

बेसिक स्कूलों अभी भी लाखों बच्चों के पास आधार न होना

विद्यालय व विभाग के पास आधार बनाने का विशेष अधिकार न होना

माध्यमिक स्कूलों द्वारा अपने यहां नामांकित बच्चों का इंपोर्ट न करना

गैर मान्यता प्राप्त विद्यालयों पर शिकंजा न कसा जाना

गैर मान्यता प्राप्त स्कूलों में अपना नामांकन कराना



परिषदीय विद्यालयों के 'लापता' बच्चे ड्रॉपबॉक्स में, बच्चों की तलाश में गुरु जी हलाकान, ड्राप बाक्स में सब से अधिक आठ पास विद्यार्थी


परिषदीय विद्यालयों में बच्चों की उपस्थिति को लेकर बड़ी समस्या सामने आई है। विभागीय जांच में पाया गया कि विभिन्न स्कूलों के ड्राप बाक्स में लाखों बच्चे हैं। ड्राप बाक्स का अर्थ है कि आनलाइन सिस्टम के जरिए छात्र रिकार्ड प्रबंधन। विशेष रूप से विद्यालय छोड़ने वाले बच्चों को ट्रैक करने के लिए यू डावस प्लस पोर्टल जैसे सिस्टम में इसका उपयोग होता है। लापता  बच्चों का कोई विवरण यू डायस पोर्टल पर अभी तक नहीं है। बेसिक शिक्षकों पर इन बच्चों की तलाश का दबाव है और इस दबाव के चक्कर में स्कूलों की पढ़ाई चौपट है।


विभागीय रिपोर्ट के अनुसार, लापता बच्चों की संख्या बढ़ने के कई कारण हैं, पहला पारिवारिक स्थिति ठीक न होने की वजह से बहुत से बच्चों ने पढ़ाई छोड़ दी है। दूसरा कुछ बच्चे दूसरे स्कूलों में चले गए लेकिन उनके दूसरे विद्यालय में जाने संबंधी विवरण नहीं दर्ज किया गया। तीसरी वजह निजी स्कूलों में प्रवेश के बाद भी बच्चों का नाम सरकारी अभिलेखों से नहीं हटाया गया। इसके अतिरिक्त निर्देशों के बावजूद स्कूलों द्वारा बच्चों के नाम अपडेट या हटाने का कार्य समय से नहीं किया गया। 


ड्राप बाक्स में कक्षावार बच्चों की संख्या देखें तो सबसे अधिक आठवीं कक्षा में विद्यार्थी है। खास यह कि काफी विद्यार्थी अब भी पुरानी कक्षा में है। उनको यू डायस पर कक्षोन्नति नहीं किया गया है।


Thursday, October 23, 2025

यूपी के स्कूलों और कॉलेजों में गूंजेगा 'सरदार @ 150' का संदेश, एक से सात नवंबर के बीच संस्थानों में होंगी निबंध, भाषण व रंगोली प्रतियोगिताएं

यूपी के स्कूलों और कॉलेजों में गूंजेगा 'सरदार @ 150' का संदेश, एक से सात नवंबर के बीच संस्थानों में होंगी निबंध, भाषण व रंगोली प्रतियोगिताएं

प्रतियोगिताओं के जरिये नई पीढ़ी को सरदार पटेल के विचारों से जोड़ने की तैयारी


लखनऊ :  सरदार वल्लभभाई पटेल की 150वीं जयंती 31 अक्टूबर से 25 नवंबर तक मनाई जाएगी। 31 अक्टूबर को प्रदेश भर में युनिटी मार्च निकाला जाएगा। इसके साथ ही स्कूल-कालेजों में 'सरदार@150' का संदेश गूंजेगा। एक से सात नवंबर के बीच शैक्षणिक संस्थानों में निबंध, भाषण व रंगोली प्रतियोगिताएं आयोजित की जाएंगी। नई पीढ़ी को इनके माध्यम से सरदार पटेल के विचारों से जोड़ा जाएगा। इन प्रतियोगिताओं का उद्देश्य नई पीढ़ी को 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' के विचार से जोड़ना और राष्ट्रनिर्माण में लौहपुरुष पटेल के योगदान को रचनात्मक तरीके से समझाना है।


यह पहल सरकार के उस प्रयास का हिस्सा है जिसमें वह युवाओं और विद्यार्थियों के बीच राष्ट्रभक्ति, एकता और जिम्मेदारी का भाव जाग्रत करने की कोशिश कर रही है। एक नवंबर से सात नवंबर तक प्रदेश भर के स्कूल, कालेजों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों, आइटीआइ, पालीटेक्निक, मेडिकल कालेजों, प्रबंधन कालेजों व विधि इत्यादि प्रोफेशनल कालेजों में प्रतियोगिताएं कराई जाएंगी।

निबंध प्रतियोगिता कक्षा नौ व उसके ऊपर के सभी विद्यार्थियों के बीच कराई जाएगी। यह प्रतियोगिता इंटर कालेज, महाविद्यालय, इंजीनियरिंग सहित प्रोफेशनल कालेजों में आयोजित की जाएगी। भाषण प्रतियोगिता में कक्षा 11 व उसके ऊपर के सभी विद्यार्थी भाग लेंगे। यह प्रतियोगिता सभी इंटर कालेजों, महाविद्यालयों, इंजीनियरिंग सहित प्रोफेशनल कालेजों में आयोजित की जाएंगी। 

रंगोली प्रतियोगिता में कक्षा छह और इससे ऊपर की सभी छात्राएं भाग लेंगी। यह प्रतियोगिता सभी इंटर कालेजों व महाविद्यालयों में आयोजित की जाएगी। चित्रकला प्रतियोगिता में कक्षा एक से आठ तक के विद्यार्थी भाग लेंगे। यह प्रतियोगिता सभी प्राथमिक और जूनियर हाईस्कूल में आयोजित होगी।


Wednesday, October 22, 2025

नौ महीने पहले शासनादेश हुआ, नहीं शुरू हुए शिक्षामित्रों के तबादले, पूरा नहीं हो रहा घर के नजदीकी स्कूल में आने का इंतज़ार

शादीशुदा महिला शिक्षामित्रों के तबादले पर फैंस रहा पेंच

नौ महीने पहले शासनादेश हुआ, नहीं शुरू हुए शिक्षामित्रों के तबादले, पूरा नहीं हो रहा घर के नजदीकी स्कूल में आने का इंतज़ार

20 अक्टूबर 2025
लखनऊ : अपने घर के नजदीकी स्कूल में पहुंचने के लिए शिक्षा मित्रों ने पहले आठ साल इंतजार किया। काफी प्रयास के बाद इस साल जनवरी में यह यह शासनादेश भी हो गया कि उनको नजदीकी स्कूलों पहुंचने का एक मौका दिया जाएगा। इसके लिए उनके ट्रांसफर किए जाएंगे। तब से फिर वे इंतजार कर रहे हैं। बेसिक शिक्षा विभाग ने अब तक तबादला प्रक्रिया शुरू नहीं की है और न इस बाबत कोई नया आदेश जारी किया है।

शिक्षक बने, फिर बन गए शिक्षामित्र
सपा सरकार में प्रदेश के करीब 1.37 लाख शिक्षा मित्रों को शिक्षक बनाया गया था। शिक्षक बनने पर उनको दूसरे ब्लॉक में पोस्टिंग दी गई थी। शिक्षक बनने की खुशी में उन्होंने दूर-दराज के स्कूलों में जाना स्वीकार कर लिया। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर उनका बतौर शिक्षक किया गया समायोजन रद कर दिया गया। वे फिर से शिक्षा मित्र बन गए। ऐसे में उनका मानदेय फिर से 10 हजार ही रह गया लेकिन उनकी तैनाती वहीं रह गई जहां वे शिक्षक बन कर गए थे और वे अपने घर से दूर हो गए। बेसिक शिक्षा निदेशक प्रताप सिंह बघेल का कहना है कि कुछ तकनीकी दिक्कतें दूर करके जल्द ही तबादला प्रक्रिया शुरू की जाएगी।

उम्मीद लगाए हैं 35 हजार शिक्षामित्र
सरकार ने 2018 में शिक्षा मित्रों को अपने मूल विद्यालय में आने का मौका दिया था। ऐसे में करीब एक लाख शिक्षा मित्र तो उस समय वापस आ गए। बाकी करीब 35 हजार शिक्षा मित्र शिक्षक बनने उम्मीद में अपने मूल विद्यालय में नहीं आए। उन्हे उम्मीद थी कि कोर्ट से लेकर सड़क तक लड़ाई लड़ी जा रही है। ऐसे में वे शिक्षक बन सकते है। नए शासनादेश ने उनको मौका दिया है कि वे अपने घर के नजदीकी स्कूल में आ सकते है लेकिन अब तक प्रक्रिया शुरू न होने से निराश है।

कहां आ रही दिक्कत ?
दरअसल, कुछ ऐसी महिला शिक्षा मित्र भी है, जिनकी शादी हो गई है। कुछ की शादी दूसरे जिले में और कुछ की जिले में ही काफी दूर हो गई है। शासनादेश के अनुसार उनको अपनी ससुराल के नजदीकी स्कूल में जाने का मौका भी मिलेगा। सूत्रों के अनुसार इसी को लेकर कुछ पेंच फंस गया है। 

अधिकारी यह तर्क भी दे रहे है कि शिक्षा मित्र संविदा महिला शिक्षको को तो तबादलो में ससुराल का विकल्प चुनने का मौका दिया जा सकता है, संविदा कर्मी को नहीं। दूसरी बात यह कि शिक्षा मित्र जब शिक्षक बने थे तो उसी जिले में दूसरे स्कूल में तैनाती दी गई थी। अब अगर शादी दूसरे जिले में हो गई है तो वहां कैसे भेजा जा सकता है? इसे ध्यान में रखते हुए शासनादेश में संशोधन को लेकर भी अधिकारियों में मंथन चल रहा है। इसी वजह से तबादलो में देरी हो रही है। 



मांग : शिक्षामित्रों के तबादले की भी जल्द शुरू हो प्रक्रिया, निर्देश के बाद अभी तक तबादले की प्रक्रिया शुरू नहीं होने से शिक्षामित्र ऊहापोह में

13 अप्रैल 2025
लखनऊ। प्रदेश के परिषदीय विद्यालयों में नियमित शिक्षकों की तबादला प्रक्रिया तो शुरू हो गई है लेकिन विद्यालयों में कार्यरत शिक्षामित्रों का मूल विद्यालय में वापसी व महिला शिक्षामित्रों को उनके ससुराल के पास तबादले की प्रक्रिया अब तक नहीं शुरू हुई है।

उत्तर प्रदेश प्राथमिक शिक्षामित्र संघ के प्रदेश मंत्री कौशल कुमार सिंह ने कहा कि पूर्व में जारी निर्देश के बाद अभी तक तबादले की विभागीय प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है। एक अप्रैल से स्कूलों में बच्चों का नया सत्र शुरू हो चुका है।

ऐसे में महिला शिक्षामित्र जो ससुराल के पास वापस जाना चाहती हैं। वह असमंजस में हैं कि वह अपने बच्चों का नामांकन वर्तमान स्थान पर कराएं या नहीं। संघ ने अपर मुख्य सचिव बेसिक शिक्षा को पत्र भेजकर मांग की है कि समस्या का जल्द समाधान किया जाए।




लंबा होता जा रहा आठ साल बाद घर वापसी का इंतज़ार,  जानिए! शासनादेश जारी होने के बाद अब कहां फंस रहा शिक्षामित्रों की घरवापसी में पेच?
 

17 मार्च 2025
आठ साल के इंतजार के बाद आदेश हुआ था कि शिक्षा मित्र अपने घर के नजदीकी स्कूलों में आ सकेंगे। यह शासनादेश तीन जनवरी को हुआ था। उसके बाद से शिक्षामित्र फिर इंतजार कर रहे हैं। बेसिक शिक्षा विभाग ने अब तक तबादला प्रक्रिया शुरू नहीं की है और न इस बाबत कोई नया आदेश आया है।


ऐसे दूर हुए थे शिक्षामित्र
सपा सरकार में प्रदेश के करीब 1.37 लाख शिक्षा मित्रों को शिक्षक बनाया गया था। शिक्षक बनने पर उनको दूर-दराज के ब्लॉक में पोस्टिंग दी गई थी। शिक्षक बनने पर उन्होंने खुशी-खुशी दूर-दराज के स्कूलों में जाना स्वीकार कर लिया। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर उनका बतौर शिक्षक किया गया समायोजन रद्द कर दिया गया। वे फिर से शिक्षा मित्र बन गए। ऐसे में उनका मानदेय फिर से 10 हजार ही रह गया लेकिन उनकी तैनाती वहीं रह गई जहां वे शिक्षक बन कर गए थे और वे अपने घर से दूर हो गए।


सरकार ने 2018 में शिक्षा मित्रों को अपने मूल विद्यालय में आने का मौका दिया था। ऐसे में करीब एक लाख शिक्षा मित्र तो उस समय वापस आ गए। बाकी करीब 35 हजार शिक्षा मित्र शिक्षक बनने उम्मीद में अपने मूल विद्यालय में नहीं आए। उन्हें उम्मीद थी कि कोर्ट से लेकर सड़क तक लड़ाई लड़ी जा रही है। ऐसे में वे शिक्षक बन सकते हैं। नए शासनादेश ने उनको मौका दिया है कि वे अपने घर के नजदीकी स्कूल में आ सकते है लेकिन अब तक प्रक्रिया शुरू न होने से निराश है।


दरअसल, कुछ ऐसी महिला शिक्षा मित्र भी है, जिनकी शादी हो गई है। कुछ की शादी दूसरे जिले में और कुछ की जिले में ही काफी दूर हो गई है। शासनादेश के अनुसार, उनको अपनी ससुराल के नजदीकी स्कूल में जाने का मौका भी मिलेगा। 


सूत्रों के अनुसार, शासन स्तर पर इसी को लेकर फिर नया पेंच फंस गया है। अधिकारी यह तर्क भी दे रहे हैं कि शिक्षामित्र संविदा पर हैं। नियमित महिला शिक्षकों को तो तबादलों में ससुराल का विकल्प चुनने का मौका दिया जा सकता है, संविदा कर्मी को नहीं। इसे ध्यान में रखते हुए शासनादेश में संशोधन को लेकर भी अधिकारियों में मंथन चल रहा है। इसी वजह से तबादला प्रक्रिया शुरू नहीं हो सकी है।

Tuesday, October 21, 2025

MDM में तिथि भोजन योजना का यूपी में नहीं हो पा रहा सफल क्रियान्वयन, प्रयागराज की रिपोर्ट ने खोला सच

MDM में तिथि भोजन योजना का यूपी में नहीं हो पा रहा सफल क्रियान्वयन, प्रयागराज की रिपोर्ट ने खोला सच


उत्तर प्रदेश के विद्यालयों में तिथि भोजन योजना को लेकर फिर से सवाल उठने लगे हैं। सरकार और विभागीय अधिकारी इस योजना को सामुदायिक सहभागिता और बच्चों में पोषण के प्रति जागरूकता का माध्यम मानते हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत अभी भी उम्मीदों से बहुत दूर है। प्रयागराज से आई रिपोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि योजना के दिशा-निर्देशों और वास्तविक क्रियान्वयन के बीच गहरी खाई मौजूद है।


 प्रयागराज से प्रकाशित अखबारी खबरों के अनुसार, परिषदीय स्कूलों में तिथि भोजन के लिए विशेष निर्देश जारी किए गए हैं कि विद्यालय परिसर के भीतर केवल पका हुआ भोजन ही बच्चों को दिया जाए और फास्ट फूड या तले हुए पदार्थों को पूरी तरह प्रतिबंधित रखा जाए। विद्यालय प्रबंधन समिति (एसएमसी) के सदस्यों की जिम्मेदारी तय की गई है कि वे भोजन की गुणवत्ता और वितरण प्रक्रिया की निगरानी करें। यहां तक कि भोजन कराने वाला व्यक्ति भी बच्चों के साथ बैठकर भोजन करेगा, ताकि बच्चों में समानता और सहभागिता की भावना विकसित हो।

लेकिन, योजना की भावनात्मक और प्रशासनिक गंभीरता के बावजूद, राज्य के अधिकांश जिलों में यह पहल अपेक्षित रूप से सफल नहीं हो पाई है। प्रयागराज की न्यूज रिपोर्ट में साफ उल्लेख किया गया है कि बीएसए देवेंद्र सिंह के निर्देशों के बावजूद, तिथि भोजन कराने के इच्छुक लोगों की संख्या बहुत कम है। कई विद्यालयों में महीनों से कोई तिथि भोजन कार्यक्रम आयोजित नहीं हुआ है।

सूत्र बताते हैं कि ग्रामीण इलाकों में आर्थिक सीमाएँ, समय की कमी और अभिभावकों की अनिच्छा इसके प्रमुख कारण हैं। कई स्थानों पर एसएमसी सदस्य और ग्राम पंचायतें भी सक्रिय भूमिका नहीं निभा पा रही हैं। जिन विद्यालयों में तिथि भोजन होता भी है, वहाँ अक्सर मात्रा और गुणवत्ता दोनों पर सवाल उठते हैं।

विभागीय अधिकारी मानते हैं कि तिथि भोजन की भावना अत्यंत नेक है, लेकिन बिना सामुदायिक भागीदारी के यह योजना केवल कागज़ों पर ही सजीव रह जाएगी। प्रयागराज की तरह कई जिलों में जब तक स्थानीय समाज और अभिभावक सक्रिय भागीदारी नहीं निभाते, तब तक यह योजना अपने वास्तविक उद्देश्य — सामाजिक एकता, स्वच्छता और पोषण सुधार — को हासिल नहीं कर सकेगी।


इस पूरे परिदृश्य में सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि योजनाओं का मसौदा और क्रियान्वयन प्रक्रिया प्रायः ज़मीनी सच्चाइयों को जाने बिना तैयार की जाती है। विद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों से न तो व्यावहारिक सुझाव लिए जाते हैं, न ही स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर योजना बनाई जाती है। नतीजतन, ऐसी योजनाएँ जमीनी हकीकत से कटकर केवल “अच्छे इरादों के दस्तावेज़” बनकर रह जाती हैं। तिथि भोजन जैसी सामाजिक रूप से सार्थक पहल को सफल बनाने के लिए आवश्यक है कि शिक्षक, अभिभावक, ग्राम प्रतिनिधि और प्रशासन — सभी एक साथ मिलकर व्यवहारिक ढंग से आगे बढ़ें, वरना यह योजना भी अन्य अनेक योजनाओं की तरह केवल आदेशों और फाइलों में सिमट कर रह जाएगी।


Monday, October 20, 2025

यूपी के राजकीय और एडेड माध्यमिक विद्यालयों में पुरातन छात्र सम्मेलन अगले माह से, हर विद्यालय में बनेगी पुरातन छात्र परिषद साल में दो बार होगी बैठक

यूपी के राजकीय और एडेड माध्यमिक विद्यालयों में पुरातन छात्र सम्मेलन अगले माह से, हर विद्यालय में बनेगी पुरातन छात्र परिषद साल में दो बार होगी बैठक

पूर्व छात्रों का अनुभव बनेगा विद्यालय विकास की नई ताकत


लखनऊ। अब माध्यमिक विद्यालयों में पुराने छात्रों -से फिर जुड़ने का मौका मिलने वाला है। प्रदेशभर के राजकीय व एडेड माध्यमिक विद्यालयों में अगले माह ई से पुरातन छात्र सम्मेलन शुरू किए जाएंगे। इसके लिए हर विद्यालय में पुरातन छात्र परिषद गठित करने पं के निर्देश जारी किए गए हैं।


जेडी (माध्यमिक) और जिला विद्यालय निरीक्षक की ओर से प्रधानाचार्यों को कहा गया है कि परिषद का गठन जल्द पूरा करें और सम्मेलन की तैयारियां शुरू करें। इसका उद्देश्य पूर्व और वर्तमान छात्रों के में बीच सेतु बनाना है, ताकि विद्यालय के विकास जैसे । नए कक्ष, पुस्तकालय या संसाधन निर्माण में पुरातन छात्रों का योगदान लिया जा सके।  शासन की गाइडलाइन के अनुसार नवंबर से सम्मेलन होंगे। राजधानी सहित मंडल के सभी राजकीय व एडेड कॉलेजों में तैयारियां जोरों पर हैं।



जानिये कौन होंगे परिषद के सदस्य
विद्यालय से पास होकर निकले ऐसे विद्यार्थी, जिन्होंने कला, संस्कृति, व्यवसाय, सरकारी सेवा, खेलकूद या समाजसेवा में विशेष योगदान दिया हो, परिषद् के सदस्य बनेंगे। प्रारंभ में कम से कम तीन ऐसे छात्रों को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाएगा।

दो बार होगी बैठक
हर वर्ष दो बार पुरातन छात्र परिषद की बैठक होगी, जिसमें पूर्व छात्र अपने अनुभव साझा करेंगे और विद्यालय विकास के लिए सुझाव देंगे

Sunday, October 19, 2025

सीएम डैशबोर्ड में बेसिक शिक्षकों की हाजिरी शामिल होने की सूचना वॉयरल

सीएम डैशबोर्ड में बेसिक शिक्षकों की हाजिरी शामिल होने की सूचना वॉयरल


लखनऊ । मुख्यमंत्री डैशबोर्ड ‘दर्पण’ में अब एक बड़ा बदलाव किया जा रहा है। अब तक इस डैशबोर्ड पर मध्यान्ह भोजन योजना (MDM) के तहत छात्रों की संख्या और विद्यालयों में छात्रों की उपस्थिति जैसी जानकारियाँ प्रदर्शित करने की योजनाओं को रद्द करने के बाद अब बेसिक शिक्षकों की उपस्थिति को शामिल करने की तैयारी की जा रही है।




इस बदलाव को लेकर शिक्षा विभाग और शिक्षकों के बीच चर्चा तेज हो गई है। सोशल मीडिया पर यह सूचना तेजी से वायरल हो रही है कि अब विभाग डिजिटल उपस्थिति की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ाने वाला है। इस बदलाव के बाद प्रत्येक शिक्षक की हाजिरी सीधे सीएम डैशबोर्ड ‘दर्पण’ पोर्टल पर  प्रदर्शित हो सकती है।

जानकारों का कहना है कि यह कदम पारदर्शिता बढ़ाने और उत्तरदायित्व तय करने के उद्देश्य से उठाया जा रहा है। हालांकि शिक्षक समुदाय में इसको लेकर आशंकाएँ भी व्यक्त की जा रही हैं। कई शिक्षकों का कहना है कि पहले से ही शिक्षकों पर डेटा अपलोड, रिपोर्टिंग और विभिन्न ऐप्स के माध्यम से उपस्थिति देने का बोझ है। अब यदि डिजिटल उपस्थिति भी अनिवार्य की गई, तो यह शिक्षण कार्य को और प्रभावित कर सकता है।

विभागीय सूत्रों का कहना है कि ‘दर्पण’ डैशबोर्ड का उद्देश्य स्कूलों के वास्तविक संचालन की निगरानी करना है। अब शिक्षकों की नियमित उपस्थिति को आधार बनाकर शिक्षण गुणवत्ता का मूल्यांकन करने की योजना है।

हालाँकि इस निर्णय पर अभी आधिकारिक आदेश जारी नहीं हुआ है, लेकिन वायरल सूचनाओं से स्पष्ट है कि विभाग डिजिटल उपस्थिति प्रणाली की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रहा है।

CBSE का बड़ा फैसला, अब सिर्फ Digilocker में मिलेगा Migration Certificate

CBSE का बड़ा फैसला, अब सिर्फ Digilocker में मिलेगा Migration Certificate 


अगर आप सीबीएसई बोर्ड से पढ़ाई कर रहे हैं तो आपके लिए काम की खबर है. केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने कहा है कि अब से यानी कि 2025 के बाद से 10वीं-12वीं कक्षा के स्टूडेंट्स को हार्डकॉपी के रूप में माइग्रेशन सर्टिफिकेट (CBSE Migration Certificate) जारी नहीं किया जाएगा. CBSE ने कहा कि डिजिटल डॉक्यूमेंट्स को बढ़ावा देने के उद्देश्य से यह कदम उठाया गया है. साथ ही छात्रों को अब माइग्रेशन सर्टिफिकेट जुटाने के लिए ज्यादा भागदौड़ नहीं करनी होगी. 


CBSE Big Update: सीबीएसई का बड़ा फैसला 
यह फैसला विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के उस निर्देश के बाद लिया गया है, जिसमें कहा गया है कि CBSE जैसे बोर्ड्स द्वारा जारी डिजिटल डॉक्यूमेंट्स उच्च शिक्षण संस्थान जैसे कि कॉलेज और यूनिवर्सिटी में एक्सेप्ट किए जाएंगे. वहीं अब CBSE माइग्रेशन सर्टिफिकेट के लिए कोई शुल्क नहीं लेगा. 


पहले क्या होता था? 
इससे पहले तक CBSE बोर्ड की ओर से 10वीं-12वीं कक्षा के छात्रों के लिए ऑनलाइन रिजल्ट के बाद मार्कशीट जारी किया जाता था. साथ ही माइग्रेशन सर्टिफिकेट भी जारी किया जाता है. साथ ही डिजिटल तरीके से भी ये सारे डॉक्यूमेंट्स जारी किए जाएंगे. लेकिन अब CBSE ने डिजिटल डॉक्यूमेंट्स को लागू करने के लिए बड़ा फैसला लेते हुए माइग्रेशन सर्टिफिकेट की हार्डकॉपी नहीं जारी करने का फैसला लिया है. 

इस बदलाव को CBSE परीक्षा समिति ने मंजूरी दे दी है. ऐसे में 2025 के बाद से 10वीं-12वीं के बोर्ड स्टूडेंट्स पर ये नियम लागू होगा. ऐसा भी नहीं कि ये डिजिटल कॉपी मान्य नहीं होगी. आप इसे हर जगह शेयर कर सकते हैं. 


क्या है DigiLocker? 
DigiLocker एक सरकारी प्लेटफॉर्म हैं, जहां सारे डॉक्यूमेंट्स को स्टोर किया जाता है. इस प्लेटफॉर्म के जरिए आप कभी भी लॉगिन करके अपना सारा डॉक्यूमेंट्स और सर्टिफिकेट पा सकत हैं. यह एक भरोसेमंद प्लेटफॉर्म है. 



CBSE Migration Certificate Steps To Check: कैसे चेक करें माइग्रेशन सर्टिफिकेट? 

सबसे पहले Digilocker प्लेटफॉर्म पर जाएं (आप इसे प्लेस्टोर से डाउनलोड कर सकते हैं). 
इसमें मोबाइल नंबर की मदद से लॉगिन करें. 
अब ‘Issued Documents’ के ऑप्शन पर क्लिक करें. 
यहां Issuers की लिस्ट से बोर्ड या समिति (यहां CBSE) को चुनें. 
अब अपना सर्टिफिकेट खोजें और इसे डाउनलोड कर लें. 
आप चाहें तो इसे प्रिंट कराकर कहीं शेयर कर सकते हैं. 

आदेश के बाद भी तदर्थ शिक्षकों को नहीं मिला नौ महीने का वेतन

आदेश के बाद भी तदर्थ शिक्षकों को नहीं मिला नौ महीने का वेतन

माध्यमिक विद्यालयों से हटाए गए तदर्थ शिक्षकों की खराब हुई दिवाली

माध्यमिक शिक्षक संघ ने अधिकारियों के खिलाफ दर्ज कराई नाराजगी


लखनऊ। प्रदेश के माध्यमिक विद्यालयों में 20 साल से अधिक काम करने वाले लगभग 2300 तदर्थ शिक्षकों को उच्च अधिकारियों के आदेश के बाद भी नौ महीने का वेतन नहीं दिया गया। उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षक संघ (पांडेय गुट) ने इस पर नाराजगी व्यक्त करते हुए इन शिक्षकों व परिजनों की दिवाली खराब करने का भी आरोप लगाया है।


संघ के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. जितेंद्र सिंह पटेल व संगठन प्रवक्ता ओम प्रकाश त्रिपाठी ने कहा कि ये वे शिक्षक हैं जिन्हें 2000 के पूर्व में तय व्यवस्था के तहत नियुक्त किया गया था। वे लगातार सेवा में रहकर देश की भावी पीढ़ी के निर्माण में गत 20 साल से ज्यादा से अपना योगदान दे रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट से उन्हें नियमित करने और नियमित वेतन भुगतान के स्पष्ट आदेशों के बाद भी अधिकारी मनमानी कर रहे हैं।

डॉ. पटेल ने इस संवेदनशील मामले में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का व्यक्तिगत ध्यान आकृष्ट करते हुए उनसे तत्काल हस्तक्षेप करने की मांग की है। उन्होंने आरोप लगाया कि अधिकारियों ने अपनी स्वेच्छाचारिता से शिक्षकों का वेतन रोककर उनका आर्थिक व मानसिक उत्पीड़न कर रहे हैं।

उन्होंने विभाग के अपर मुख्य सचिव पार्थ सारथी सेन शर्मा से भी इस मामले में व्यक्तिगत रुचि लेते हुए शिक्षकों का वेतन जल्द जारी कराने की मांग की।

Saturday, October 18, 2025

माध्यमिक में हेड मास्टरों की पदोन्नति अगले महीने, 30 नवंबर तक उनकी प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश

माध्यमिक में हेड मास्टरों की पदोन्नति अगले महीने, 30 नवंबर तक उनकी प्रक्रिया पूरी करने का nirdesh

लखनऊ। राजकीय माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षकों व हेड मास्टरों की भर्ती, पदोन्नति की प्रक्रिया को शासन ने समयबद्ध तरीके से पूरा करने का निर्देश दिया है। माध्यमिक शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव पार्थ सारथी सेन शर्मा ने इसकी टाइमलाइन तय कर दी है। 

उन्होंने बताया कि शिक्षकों के खाली पदों को भरने के लिए अधियाचन लोक सेवा आयोग को भेजा जा चुका है। इसके साथ ही उन्होंने निर्देश दिया है कि शिक्षकों की ग्रेडेशन लिस्ट 16 नवंबर तक फाइनल कर ली जाए। साथ ही नवंबर अंत तक लोक सेवा आयोग को इसके लिए अधियाचन भेज दिया जाए। हेड मास्टरों के शत प्रतिशत पद पदोन्नति के हैं। 30 नवंबर तक उनकी प्रक्रिया पूरी की जाए। 




राजकीय और एडेड माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षकों की कमी जल्द होगी दूर

लखनऊः प्रदेश सरकार ने राजकीय और अनुदानित (एडेड) माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षकों की कमी को दूर करने और पदोन्नति की प्रक्रिया पूरी करने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाया है। विभाग में सभी लंबित भर्तियों और पदोन्नतियों को तय समय सीमा के भीतर पूरा करने के लिए निर्देश जारी किए है। इसमें राजकीय कालेजों में 31 अक्टूबर तक और एडेड कालेजों में 31 दिसंबर तक पदोन्नति की प्रक्रिया पूरी करने तैयारी है।

अपर मुख्य सचिव (बेसिक एवं माध्यमिक शिक्षा) पार्थ सारथी सेन शर्मा ने गुरुवार को आदेश जारी किया है। राजकीय विद्यालयों में सहायक अध्यापक और प्रवक्ताओं के पदों पर भर्ती प्रक्रिया जारी है। सहायक अध्यापक के पदों का अधियाचन उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग को भेजा जा चुका है, जिसे आयोग ने स्वीकार कर लिया है और उसकी विज्ञप्ति भी जारी हो चुकी है। इसी तरह प्रवक्ता के सीधी भर्ती वाले पदों का अधियाचन भी आयोग को भेजकर विज्ञप्ति जारी की जा चुकी है। 


राजकीय इंटर कालेजों में प्रवक्ताओं के 50 प्रतिशत पद पदोन्नति से भरे जाते हैं, जिनमें महिला प्रवक्ता के पदों का अधियाचन 18 सितंबर को आयोग को भेजा गया था। पुरुष प्रवक्ताओं की ग्रेडेशन सूची को 16 नवंबर तक अंतिम रूप देकर जारी करने और उसके 10 दिन बाद पदोन्नति के लिए अधियाचन लोक सेवा आयोग को भेजने के निर्देश दिए गए हैं। हेडमास्टर के सभी पद पदोन्नति के माध्यम से भरे जाते हैं। पुरुष और महिला शाखा दोनों में वर्ष 2025 की पदोन्नति प्रक्रिया अभी तक पूरी नहीं हो पाई है। इसलिए इसे 30 नवंबर तक हर हाल में पूरा करने के निर्देश दिए गए हैं। 

प्रिंसिपल के पदों पर भी तेजी से कार्यवाही करने के निर्देश दिए गए हैं। प्रिंसिपल की सीधी भर्ती का अधियाचन पहले ही आयोग को भेजा जा चुका है। पुरुष और महिला प्रिंसिपलों की ब्राडशीट शासन को प्राप्त हो चुकी है और इन्हें 31 अक्टूबर तक पदोन्नति देने के निर्देश दिए गए हैं।


एडेड कालेजों में डीआइओएस को जिम्मेदारी 

एडेड विद्यालयों में सीधी भर्ती की जिम्मेदारी माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन आयोग द्वारा की जाएगी। माध्यमिक शिक्षा निदेशक द्वारा निर्देश दिए गए हैं कि वे विद्यालयवार अधियाचन तैयार करें और हाल ही में हुए स्थानांतरण और शिक्षकों के कार्यभार ग्रहण को ध्यान में रखते हुए अधियाचन आयोग को भेजें। 

एडेड विद्यालयों में पदोन्नति की जिम्मेदारी जिला विद्यालय निरीक्षकों (डीआइओएस) को दी गई है। निदेशक माध्यमिक और अपर निदेशक माध्यमिक से कहा गया है कि सभी जिलों में वर्ष 2025-26 की पदोन्नति समय से पूरी हो जाए। इसके बाद पदोन्नति की संकलित रिपोर्ट 31 दिसंबर तक शासन को भेजी जानी है।

प्रदेश के अशासकीय सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षक एवं शिक्षणेत्तर कर्मचारियों के अवशेष देयकों का निस्तारण ऑनलाइन माध्यम से किए जाने के सम्बन्ध में।

मानव संपदा पोर्टल से होगा अवशेष वेतन का भुगतान, अशासकीय सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षकों व शिक्षणेत्तर कर्मचारियों के लिए निर्देश

माध्यमिक शिक्षा निदेशालय ने अधिकारियों को दिया एक सप्ताह का अल्टीमेटम

प्रयागराज। राज्य के अशासकीय सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों और शिक्षणेत्तर कर्मचारियों के अवशेष वेतन व अन्य भुगतानों का निस्तारण मानव संपदा पोर्टल के एरियर मॉड्यूल के माध्यम से होगा।

इस संबंध में माध्यमिक शिक्षा निदेशालय के अर्थ-1 अनुभाग की ओर से सभी संबंधित अधिकारियों को सख्त निर्देश जारी किए गए हैं। निदेशालय की ओर से बताया कि इस संबंध में एक अगस्त, 20 अगस्त और 17 सितंबर को भी निर्देश जारी किए जा चुके हैं। इसके बावजूद अब तक केवल 32 जिला विद्यालय निरीक्षक और सात मंडलीय संयुक्त शिक्षा निदेशक ही एल-1 व एल-2 स्तर पर पोर्टल पर पंजीकरण की प्रक्रिया पूरी कर पाए हैं।

इस स्थिति को माध्यमिक शिक्षा निदेशक डॉ. महेंद्र देव ने खेदजनक करार देते हुए निर्देश दिया है कि शेष सभी अधिकारी एक सप्ताह के भीतर पंजीकरण की प्रक्रिया पूर्ण कर लें। उन्होंने कहा कि इसके साथ ही इसकी सूचना ईमेल के माध्यम से निदेशालय को अनिवार्य रूप से भेजी जाए। 

शिक्षा निदेशक ने यह भी स्पष्ट किया कि मानव संपदा पोर्टल पर पंजीकरण के बाद फ्लो चार्ट में दर्शित प्रक्रिया के अनुसार प्रकरणों का त्वरित निस्तारण भी सुनिश्चित किया जाए। निदेशालय ने संकेत दिए हैं कि निर्धारित समय सीमा में प्रक्रिया पूरी नहीं हुई तो संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध प्रशासनिक कार्रवाई की संस्तुति भी की जा सकती है।



एडेड शिक्षकों के अवशेष भुगतान की आनलाइन व्यवस्था करने में 43 जिले फिसड्डी

प्रयागराज : एडेड माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षक एवं शिक्षणेतर कर्मचारियों के अवशेष देयकों का निस्तारण आनलाइन माध्यम से किए जाने की व्यवस्था बनाई गई है, लेकिन 43 जिलों एवं 11 मंडलों ने इस दिशा में अब तक कार्य नहीं किया। इस स्थिति को खेदजनक बताते हुए माध्यमिक शिक्षा निदेशक डा. महेन्द्र देव ने संबंधित जिला विद्यालय निरीक्षकों एवं मंडलीय संयुक्त शिक्षा निदेशकों को पोर्टल के एरियर माड्यूल पर पंजीकरण की कार्यवाही एक सप्ताह में पूर्ण करने के निर्देश दिए हैं।

एडेड विद्यालयों के शिक्षकों एवं कर्मचारियों के अवशेष देयकों के भुगतान को लेकर लगने वाले आरोपों-प्रत्यारोपों पर विराम लगाने के लिए व्यवस्था आनलाइन की जा रही है। इसके लिए 17 सितंबर को निर्देश दिए गए थे कि शिक्षक व शिक्षणेतर कर्मचारियों के अवशेष भुगतान मानव संपदा पोर्टल के एरियर माड्यूल माध्यम से निस्तारण कराए जाने के लिए जनपद एवं मंडल स्तर अलग-अलग पंजीकरण किया जाना है।

इस क्रम में केवल 32 जिला विद्यालय निरीक्षकों एवं सात मंडलीय संयुक्त शिक्षा निदेशकों ने अब तक पंजीकरण की कार्यवाही पूर्ण की है, जबकि इसके लिए एक अगस्त, 20 अगस्त और 17 सितंबर को निर्देश जारी किए गए थे। इस स्थिति पर नाराजगी जताते हुए शिक्षा निदेशक ने शेष जनपदों एवं मंडलों में पंजीकरण पूर्ण कर उसकी सूचना ई-मेल के माध्यम से एक सप्ताह में हर हाल में शिक्षा निदेशालय को उपलब्ध कराने को कहा है। इसके साथ ही प्रकरणों का निस्तारण किस तरह किया जाना है, इसे समझाने के लिए फ्लो चार्ट भी जारी किया गया है।




प्रदेश के अशासकीय सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षक एवं शिक्षणेत्तर कर्मचारियों के अवशेष देयकों का निस्तारण ऑनलाइन माध्यम से किए जाने के सम्बन्ध में।


प्रदेश के सभी शैक्षणिक संस्थानों के खेल मैदान और अचल संपत्तियों के व्यावसायिक उपयोग पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लगाई रोक

प्रदेश के सभी शैक्षणिक संस्थानों के खेल मैदान और अचल संपत्तियों के व्यावसायिक उपयोग पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लगाई रोक

हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार को दिया निर्देश, कहा-डीएम और पुलिस प्रशासन को जारी करें परिपत्र

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रदेश के सभी शैक्षणिक संस्थानों के खेल मैदान और अचल संपत्तियों के व्यावसायिक उपयोग पर रोक लगा दी है। ऐसे में वहां प्रदर्शनी, व्यापार मेले का आयोजन नहीं किया जा सकेगा। कोर्ट ने सरकार को इस संबंध में जिला प्रशासन, पुलिस प्रशासन और सभी शैक्षणिक संस्थानों को एक माह के अंदर परिपत्र जारी करने का निर्देश दिया है।


यह आदेश मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने गिरजा शंकर की ओर से दाखिल जनहित याचिका पर दिया है। हमीरपुर निवासी गिरजा शंकर ने राठ स्थित ब्रह्मानंद डिग्री कॉलेज परिसर में आयोजित किए जा रहे एक व्यावसायिक मेले को रोकने की मांग कर जनहित याचिका दाखिल की थी।

उनका कहना था कि शैक्षणिक संस्थान शिक्षा प्रदान करने के लिए है। यहां पर व्यावसायिक गतिविधियां नहीं की जानी चाहिए। हाईकोर्ट के 2020 में पारित एक फैसले का भी हवाला दिया गया जिसमें न्यायालय ने राज्य सरकार को सभी डीएम को शैक्षणिक संस्थानों की संपत्तियों का व्यावसायिक उपयोग पर रोक लगाने का निर्देश दिया था। प्रतिवादियों ने कहा कि मेला समाप्त हो गया है। इसलिए अब यह याचिका अर्थहीन हो चुकी है।

कोर्ट ने याचिका को अर्थहीन नहीं माना। क्योंकि, इसमें शामिल मुख्य मुद्दा महत्वपूर्ण सार्वजनिक महत्व का है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शैक्षणिक संस्थान केवल शिक्षा प्रदान करने के लिए हैं। वहां शैक्षणिक, खेल और सांस्कृतिक प्रतियोगिताएं आयोजित की जानी चाहिए। कोर्ट ने उप-जिला मजिस्ट्रेट (एसडीएम), राठ, हमीरपुर की ओर से दिए गए स्पष्टीकरण को पूरी तरह से बेबुनियाद बताते हुए खारिज कर दिया। 


आदेश की कॉपी मुख्य सचिव को भेजें

हाईकोर्ट ने रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि वे आदेश की एक प्रति एक सप्ताह के भीतर प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव को भेजें। साथ ही न्यायालय ने निर्देश दिया कि ब्रह्मानंद डिग्री कॉलेज के खेल के मैदान को अब किसी भी व्यावसायिक गतिविधि के लिए उपयोग करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

शिक्षक ने ले ली थी दवा की ओवरडोज, बच्चों का आधार न बनने से शिक्षक का बीईओ ने रोका था वेतन


शिक्षक ने ले ली थी दवा की ओवरडोज, बच्चों का आधार न बनने से शिक्षक का बीईओ ने रोका था वेतन

बीईओ कार्यालय की ओर से बच्चों का आधार कार्ड न बनने के चलते छह शिक्षकों का वेतन रोका गया था। बाद में अन्य शिक्षकों का वेतन बहाल हो गया, परंतु शौकिंद्र का वेतन दो माह से रुका रहा।

शौकिंद्र ने इस संबंध में बीएसए को पत्र भेजकर अपनी स्थिति बताई थी, जिस पर बीएसए ने वेतन भुगतान का निर्देश भी दिया, मगर इसके बाद बीईओ ने रोक जारी रखी कि जब तक सभी रजिस्टर आनलाइन नहीं होंगे, आख्या नहीं लगाई जाएगी। शिक्षक व बीईओ के बीच व्हाट्सएप चैटिंग भी हुई, बाद में इंटरनेट मीडिया पर प्रसारित हो गई। 

शिक्षक ने दीपावली के पहले घर जाने की इच्छा जताई और कहा कि सभी का वेतन जारी कर दिया गया है, केवल उनका रोका गया है। यह भी लिखा कि वे मानसिक रूप से परेशान हैं, और यदि वेतन नहीं मिला तो उनके पास आत्महत्या के सिवाय कोई विकल्प नहीं बचेगा। बुधवार की रात करीब आठ बजे शौकिंद्र ने कमरे में रखी दवाओं की ओवरडोज ले ली। 

लोगों ने उन्हें चिकित्सक के पास उपचार के बाद घर भेज दिया गया। गुरुवार की सुबह फिर स्थिति गंभीर देख उन्हें सीएचसी इटवा और मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया। बड़ी संख्या में शिक्षक अस्पताल पहुंचे। 

प्राथमिक शिक्षक संघ के जिलाध्यक्ष राधेरमण ने कहा कि यह अत्यंत गंभीर मामला है। शिक्षक दो माह से वेतन के लिए दर-दर भटक रहा है। इससे वह मानसिक रूप से टूट गया। इस पर बीईओ पर मुकदमा दर्ज कर निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। वहीं राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के जिला महामंत्री पंकज त्रिपाठी व ब्लाक अध्यक्ष मो. इमरान ने कहा कि यह प्रशासनिक असंवेदनशीलता का उदाहरण है। डीएम ने तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की है। इसमें एडीएम, मेडिकल कॉलेज के मुख्य चिकित्साधीक्षक व बीएसए को शामिल किया गया है। 



बीईओ पर उत्पीड़न का आरोप लगाकर शिक्षक ने खाया जहर, बाधित वेतन बहाल करने की लगाई थी गुहार, सोशल मीडिया पर दी थी खुदकुशी की चेतावनी

सिद्धार्थनगर के खुनियांव ब्लॉक में तैनात हैं शोकेंद्र यादव


सिद्धार्थनगर। इटवा थाना क्षेत्र के प्राथमिक विद्यालय भदोखर भदोखरी में तैनात शिक्षक शोकेंद्र यादव ने बुधवार की देर शाम जहर खा लिया। मूलतः बागपत जिले के थाना सराय रसूलपुर संकुल पुठी पोआमी नगर, थाना सराय निवासी शोकेंद्र का आरोप है कि बीईओ इटवा के उत्पीड़न और बदसलूकी से तंग आकर उन्होंने यह आत्मघाती कदम उठाया।


उन्हें मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया है। बीईओ ने आरोपों को गलत बताया है। वहीं, डीएम ने मामले की जांच के लिए एडीएम की अगुवाई में तीन सदस्यीय टीम गठित कर दी है। इटवा ब्लॉक क्षेत्र के प्राथमिक विद्यालय भदोखर भदोखरी में तैनात शोकेंद्र महादेव घूरहू निवासी जमील के मकान में किराये पर रह रहे हैं। शोकेंद्र का आरोप है कि बीईओ इटवा राजेश कुमार ने उनका वेतन बाधित कर दिया था। आरोप है कि कई बार अनुरोध के बाद भी बीईओ वेतन बहाल नहीं कर रहे थे। 

दीपावली नजदीक आने पर भी वेतन न मिल पाने से वह बहुत परेशान थे। उन्होंने बीईओ को व्हाट्सएप पर मैसेज भेजकर दीपावली से पहले वेतन बहाल करने की सिफारिश की थी। बीईओ से कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिलने पर वह निराश हो गए थे।

बुधवार को बीईओ को व्हॉट्सएप पर भेजे मैसेज में उन्होंने वेतन न मिलने पर खुदकुशी की बात भी लिखी थी। इसके बाद आत्मघाती कदम उठा लिया। जानकारी होने पर लोग एक प्राइवेट अस्पताल में ले गए जहां रात में इलाज चला। बृहस्पतिवार की सुबह साथी शिक्षक सीएचसी इटवा ले आए। 




Friday, October 17, 2025

अटल आवासीय विद्यालय के छात्रों को मिली नई पहचान, निराश्रित/अनाथ के बजाय अब कहलाएंगे राज्याश्रित

अटल आवासीय विद्यालय के छात्रों को मिली नई पहचान, निराश्रित/अनाथ के बजाय अब कहलाएंगे राज्याश्रित


लखनऊ। उत्तर प्रदेश सरकार ने संवेदनशील निर्णय लेते हुए समाज के वंचित वर्गों के बच्चों को सम्मानजनक पहचान देने की पहल की है। उत्तर प्रदेश भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण बोर्ड (बीओसीडब्ल्यू) कार्यालय में बृहस्पतिवार को आयोजित अटल आवासीय विद्यालय समिति की बैठक में निर्णय लिया गया कि अब तक निराश्रित/अनाथ कहे जाने वाले विद्यार्थी अब राज्याश्रित कहलाएंगे।


अटल आवासीय विद्यालय समिति की बैठक में लिया निर्णय

बैठक की अध्यक्षता प्रमुख सचिव श्रम एवं सेवायोजन विभाग डॉ. एमके शन्मुगा सुंदरम ने की। डॉ. सुंदरम ने बताया कि यह निर्णय विद्यार्थियों को आत्मगौरव और सम्मानजनक सामाजिक पहचान दिलाने की दिशा में बड़ा कदम है। एक अन्य निर्णय में अगले शैक्षणिक सत्र 2026-27 से प्रवेश परीक्षा सेंट्रलाइज एंट्रेंस टेस्ट (सीबीएसई) के माध्यम से आयोजित की जाएगी ताकि सभी विद्यालयों में चयन प्रक्रिया में एकरूपता बनी रहे। प्रत्येक विद्यालय में इनोवेशन लैब भी बनाई जाएगी।

समिति ने सभी छात्र-छात्राओं को हेल्थ इंश्योरेंस के दायरे में लाने का भी निर्णय लिया है। बैठक में हॉस्टल व्यवस्था, पोषण, खेलकूद और सह-पाठयक्रम गतिविधियों से संबंधित सुधारों पर भी विस्तार से चर्चा की गई। प्रमुख सचिव ने निर्देश दिए कि सभी विभाग मिलकर अटल आवासीय विद्यालयों को देश के मॉडल रेजिडेंशियल स्कूल के रूप में विकसित करें। श्रमायुक्त मार्कण्डेय शाही, महानिदेशक अटल आवासीय विद्यालय पूजा यादव, नवोदय विद्यालय समिति के बीके सिन्हा सहित वित्त, कार्मिक एवं शिक्षा विभागों के वरिष्ठ अधिकारी और शिक्षाविद मौजूद थे। 

Wednesday, October 15, 2025

यूपीटीईटी आयोजन को लेकर चिंता में 1.86 लाख बेसिक शिक्षक, बिना टीईटी के नियुक्त शिक्षकों को सुप्रीम कोर्ट ने दो वर्ष में टीईटी उत्तीर्ण करने का दिया है समय


यूपीटीईटी आयोजन को लेकर चिंता में 1.86 लाख बेसिक शिक्षक, बिना टीईटी के नियुक्त शिक्षकों को सुप्रीम कोर्ट ने दो वर्ष में टीईटी उत्तीर्ण करने का दिया है समय

शिक्षा सेवा चयन आयोग में पूर्णकालिक अध्यक्ष के आने पर होगा परीक्षा के आयोजन पर निर्णय


प्रयागराजः एक तरफ सुप्रीम कोर्ट ने बिना शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) उत्तीर्ण बेसिक शिक्षा परिषद के विद्यालयों में नियुक्त शिक्षकों को सेवा में बने रहने के लिए दो वर्ष में टीईटी उत्तीर्ण होने का समय दिया है तो दूसरी तरफ जिस शिक्षा सेवा चयन आयोग को यह परीक्षा करानी है, उसमें पूर्णकालिक अध्यक्ष नहीं हैं। 

टीईटी का आयोजन 29 व 30 जनवरी 2026 को कराए जाने का निर्णय एक अगस्त को जिस अध्यक्ष ने लिया था, वह 26 सितंबर को पद से त्यागपत्र दे चुकी हैं। ऐसे में अब इस परीक्षा के आयोजन पर निर्णय आयोग में आने वाले पूर्णकालिक अध्यक्ष को लेना है कि निर्धारित तिथि पर परीक्षा कराई जाएगी या नहीं। इस स्थिति में विशेष रूप से बेसिक शिक्षा परिषद के 1.86 लाख वह शिक्षक चिंतित हैं, जो बिना टीईटी किए विद्यालयों में कार्यरत हैं।

उत्तर प्रदेश शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) का आयोजन पहली बार उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग को कराना है। इसके पूर्व यह परीक्षा उत्तर प्रदेश परीक्षा नियामक प्राधिकारी (पीएनपी) कराता था। सुप्रीम कोर्ट ने एक सितंबर को महत्वपूर्ण निर्णय दिया है कि बेसिक शिक्षा परिषद के विद्यालयों में बिना टीईटी के चयनित शिक्षकों को सेवा में बने रहने के लिए दो वर्ष के भीतर टीईटी उत्तीर्ण होना आवश्यक है। 

इस निर्णय का बिना टीईटी वाले कार्यरत शिक्षक विरोध कर रहे हैं। प्रदेश सरकार भी उनके साथ है और शिक्षकों के हित में सरकार पुनर्विचार की मांग के साथ सुप्रीम कोर्ट गई है। मामले में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आना बाकी है, लेकिन शिक्षक टीईटी की तैयारी में जुट गए हैं, ताकि उनके विरोध में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आने पर वह टीईटी उत्तीर्ण कर सेवा में बने रह सकें। 

उत्तर प्रदेश बीटीसी शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष अनिल यादव ने कहा है कि जब तक सुप्रीम कोर्ट का निर्णय नहीं आता, तब तक शिक्षक टीईटी की तैयारी कर रहे हैं। उनकी चिंता को ध्यान में रखकर टीईटी आयोजन को लेकर स्थिति स्पष्ट कर जल्द परीक्षा कराई जाए, ताकि दो वर्ष के समय में दो बार परीक्षा कराए जाने पर शिक्षकों को टीईटी उत्तीर्ण होने के लिए दो अवसर मिल सकें।




प्रदेश में 1.86 लाख शिक्षक टीईटी उत्तीर्ण नहीं, टीईटी की अनिवार्यता से शिक्षकों के पदोन्नति की प्रक्रिया भी रुकी

परिषदीय विद्यालयों में वर्तमान में 4,59,490 शिक्षक कार्यरत

 लखनऊः प्रदेश के परिषदीय विद्यालयों में करीब 1.86 लाख शिक्षक ऐसे हैं जिन्होंने शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) उत्तीर्ण नहीं की है। कक्षा एक से आठवीं तक पढ़ाने वाले इन शिक्षकों के लिए सुप्रीम कोर्ट के एक सितंबर के आदेश के बाद चुनौती खड़ी हो गई है। आदेश के चलते शिक्षकों की पदोन्नति की प्रक्रिया भी रुक गई है। हालांकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर बेसिक शिक्षा विभाग ने 16 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल की है। अब सभी की निगाहें कोर्ट और केंद्र सरकार के रुख पर टिकी हैं।

परिषदीय विद्यालयों में वर्तमान में 4,59,490 शिक्षक कार्यरत हैं। इनमें से 1.86 लाख शिक्षक 2010 से पहले नियुक्त हुए थे और उन्होंने टीईटी उत्तीर्ण नहीं किया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार पांच साल से अधिक सेवा वाले शिक्षकों को दो वर्ष के भीतर टीईटी उत्तीर्ण करना अनिवार्य है। पदोन्नति में भी यह शर्त लागू रहेगी। 

हालांकि प्रदेश सरकार चाहती है कि 2010 में शिक्षा का अधिकार (आरटीई) कानून लागू होने से पहले नियुक्त शिक्षकों की सेवाएं सुरक्षित रहें, भले ही उन्होंने टीईटी उत्तीर्ण न किया हो। इसी कारण विभाग के अधिकारी कानूनी विशेषज्ञों से लगातार सलाह ले रहे हैं। वहीं, टीईटी की अनिवार्यता को लेकर शिक्षकों में बेचैनी है। कई शिक्षक विरोध स्वरूप कालीपट्टी बांधकर पढ़ा रहे हैं। विशिष्ट बीटीसी शिक्षक वेलफेयर एसोसिएशन ने केंद्र सरकार की चुप्पी पर नाराजगी जताई है।

एसोसिएशन की वरिष्ठ उपाध्यक्ष शालिनी मिश्रा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने आरटीई एक्ट और 23 अगस्त 2010 की अधिसूचना से पहले नियुक्त शिक्षकों पर भी टीईटी की शर्त लागू कर दी है। केंद्र सरकार ने अब तक इस पर कोई कदम नहीं उठाया, जो गंभीर चिंता का विषय है। वहीं, विधि सलाहकार आमोद श्रीवास्तव का कहना है कि प्रदेश सरकार ने इस मामले को गंभीरता से उठाया है, लेकिन जब तक केंद्र सरकार हस्तक्षेप नहीं करेगी, तब तक शिक्षकों को पूरी राहत मिलना मुश्किल है।



टीईटी की अनिवार्यता पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी एनसीटीई और केंद्र और राज्य सरकारों की चुप्पी, शिक्षकों में बढ़ रही बेचैनी और तनाव


लखनऊ: सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद कक्षा एक से आठ तक के शिक्षकों के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) उत्तीर्ण करना अनिवार्य हो गया है। आदेश को आए कई दिन हो चुके हैं, लेकिन अब तक न तो एनसीटीई और न ही केंद्र या राज्य सरकारों की ओर से कोई स्पष्ट बयान जारी किया गया है। इस चुप्पी ने प्रभावित शिक्षकों की बेचैनी और तनाव को और गहरा कर दिया है।

शिक्षकों का कहना है कि फैसले में किन श्रेणियों पर टीईटी की बाध्यता लागू होगी, इस पर अब तक स्थिति साफ नहीं है। 23 अगस्त 2010 से पहले नियुक्त शिक्षकों को लेकर विरोधाभासी बातें सामने आ रही हैं। ऐसे में हजारों शिक्षक असमंजस में हैं कि क्या उन्हें भी परीक्षा देनी होगी या नहीं। स्पष्टता के अभाव में एक ओर शिक्षक विरोध की राह पकड़ रहे हैं, तो दूसरी ओर कई शिक्षक तैयारी शुरू कर चुके हैं।

इस ऊहापोह के बीच शिक्षकों के व्हाट्सएप समूहों पर टीईटी पाठ्यक्रम की सामग्रियां, सामान्य ज्ञान और विषयवार नोट्स खूब साझा किए जा रहे हैं। कुछ शिक्षक पूरी तरह पढ़ाई में जुट गए हैं, लेकिन अधिकतर शिक्षक तनाव और चिंता में हैं। उनका कहना है कि “सिर्फ विरोध से कुछ हासिल नहीं होगा, और तैयारी शुरू करने पर भी यह स्पष्ट नहीं कि वास्तव में किसे परीक्षा देनी है।”

पांच साल से अधिक सेवा अवधि वाले शिक्षकों में सबसे ज्यादा असुरक्षा है। वे मान रहे हैं कि यदि स्थिति समय रहते स्पष्ट नहीं हुई तो उनकी नौकरी संकट में पड़ सकती है। वहीं, शिक्षामित्रों का उदाहरण भी उन्हें डरा रहा है, जिन्हें पहले सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सहायक अध्यापक से फिर शिक्षामित्र बना दिया गया था।

शासन ने 29 और 30 जनवरी को टीईटी परीक्षा की तिथियां प्रस्तावित की हैं और आवेदन प्रक्रिया जल्द शुरू होने वाली है। परंतु जब तक एनसीटीई और सरकारें साफ-साफ नहीं बतातीं कि किन शिक्षकों पर यह अनिवार्यता लागू होगी, तब तक असमंजस और तनाव दूर होना मुश्किल है।

शिक्षक संगठनों ने सरकार से मांग की है कि तत्काल स्पष्ट बयान जारी किया जाए, ताकि अफवाहों और आशंकाओं पर विराम लगे और शिक्षक तैयारी व सेवा को लेकर निश्चिंत हो सकें।




टीईटी की अनिवार्यता : विरोध और तैयारी के बीच ऊहापोह में आम शिक्षक

 लखनऊसुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद कक्षा एक से आठ तक के शिक्षकों के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) उत्तीर्ण करना अब अनिवार्य हो गया है। आदेश ने हजारों शिक्षकों को गहरी दुविधा में डाल दिया है। एक ओर, बड़ी संख्या में शिक्षक प्रधानमंत्री कार्यालय तक पत्र लिखकर इस निर्णय से राहत की मांग कर रहे हैं, तो दूसरी ओर, वे यह भी समझ रहे हैं कि केवल विरोध से बात नहीं बनेगी। इसी ऊहापोह में कई शिक्षक अब तैयारी की ओर भी मुड़ गए हैं।


वर्तमान समय में शिक्षकों के व्हाट्सएप समूह टीईटी पाठ्यक्रम की सामग्री, सामान्य ज्ञान के प्रश्नों और विषयवार नोट्स से भरे पड़े हैं। कई शिक्षक दिन-रात पढ़ाई में जुट गए हैं, तो कई अब भी इस अनिवार्यता को लेकर तनावग्रस्त हैं। जिन शिक्षकों की सेवा अवधि पांच साल से अधिक  है, उन्हें हर हाल में परीक्षा देनी होगी, अन्यथा नौकरी संकट में पड़ सकती है। यही डर शिक्षकों के बीच तनाव और असमंजस को और बढ़ा रहा है।

टीईटी को लेकर विरोध और तैयारी की इस दोहरी स्थिति में शिक्षक खुद को मानसिक दबाव में महसूस कर रहे हैं। एक वर्ग मानता है कि इतने वर्षों तक पढ़ाने के बाद भी पात्रता पर सवाल खड़ा होना अपमानजनक है, जबकि दूसरा वर्ग यह मान रहा है कि परिस्थिति को स्वीकार कर तैयारी ही एकमात्र रास्ता है। कई शिक्षक कहते हैं कि “न तो विरोध से राहत मिलती दिख रही है और न ही तैयारी से तनाव कम हो रहा है।”

शासन ने 29 और 30 जनवरी को शिक्षक पात्रता परीक्षा आयोजित करने का प्रस्ताव दिया है और आवेदन प्रक्रिया जल्द शुरू होने वाली है। ऐसे में शिक्षकों के पास ज्यादा समय भी नहीं है। वहीं कुछ शिक्षक संगठन के जरिए विरोध की रणनीति के साथ भी खड़े हैं। 

गौरतलब है कि इससे पहले शिक्षामित्रों के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश से सहायक अध्यापक बने शिक्षामित्रों को फिर से शिक्षामित्र बनना पड़ा था। इस पुराने अनुभव की याद भी शिक्षकों की चिंता को और गहरा रही है।

शिक्षामित्रों को जल्द मिलेगा यूपी सरकार का उपहार, बोले योगी सरकार के मंत्री अनिल राजभर

शिक्षामित्रों को जल्द मिलेगा यूपी सरकार का उपहार, बोले योगी सरकार के मंत्री अनिल राजभर 


लखनऊः शिक्षक दिवस पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आश्वासन के बाद अब डेढ़ लाख शिक्षामित्रों को सरकार की ओर से जल्द खुशखबरी मिलने की उम्मीद है। श्रम एवं सेवायोजन मंत्री अनिल राजभर ने मंगलवार को कहा कि सरकार शिक्षामित्रों के हित में सकारात्मक फैसला लेने जा रही है। वे विधानभवन के तिलक हाल में आदर्श शिक्षामित्र वेलफेयर एसोसिएशन उत्तर प्रदेश की ओर से आयोजित शिक्षामित्र के भविष्य निर्धारण विषयक कार्यशाला को संबोधित कर रहे थे।


कार्यक्रम में मंत्री ने कहा कि सरकार शिक्षामित्रों के संघर्ष और समर्पण को भली-भांति समझती है। बहुत जल्द उनकी मेहनत का परिणाम सामने आएगा। उन्होंने शिक्षामित्रों से अपील की कि वे पूरी निष्ठा और लगन से विद्यालयों में शिक्षण कार्य करते रहें। 

एसोसिएशन के कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष अमरेंद्र दुबे ने कहा कि मुख्यमंत्री ने पांच सितंबर को शिक्षामित्रों के मानदेय वृद्धि और अन्य सुविधाएं बढ़ाने का संकेत दिया था। अब पूरा प्रदेश इंतजार कर रहा है कि यह घोषणा कब अमल में आएगी। कार्यक्रम की अध्यक्षता राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद के अध्यक्ष हरीकिशोर तिवारी ने की। कार्यशाला में प्रदेशभर से शिक्षामित्र पदाधिकारी, जिलाध्यक्ष और महिला प्रतिनिधि मौजूद थे।

Tuesday, October 14, 2025

Basic Shiksha Parishad Tollfree Number: चहारदीवारी पर अंकित होगा बेसिक शिक्षा विभाग का टोल फ्री नंबर 18008893277

चहारदीवारी पर अंकित होगा बेसिक शिक्षा विभाग का टोल फ्री नंबर 18008893277

शैक्षिक गुणवत्ता में सुधार के लिए नई पहल, स्कूलों की समस्या की कर सकेंगे शिकायत


लखनऊ । सूबे के परिषदीय विद्यालयों की चहारदीवारी पर अब टोल फ्री नंबर लिखवाया जाएगा। महानिदेशक के निर्देश पर बेसिक शिक्षा विभाग इसको अमली जामा पहनाने में जुट गया है। 15 अक्तूबर तक सभी विद्यालयों में यह नंबर अंकित कराने का समय प्रधानाध्यापकों को दिया गया है। 

कई स्कूलों में शिक्षकों की अनुपस्थिति, देर से पहुंचने, स्वच्छता व्यवस्था में लापरवाही और रखरखाव संबंधी शिकायतें आए दिन विभाग को मिलती हैं। अब पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावकों को समस्याओं के समाधान के लिए अधिकारियों के कार्यालय का चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। 


शासन की तरफ से परिषदीय विद्यालयों की गुणवत्ता सुधारने के लिए पहल की गई है। इन शिकायतों संज्ञान लेते हुए विभाग ने टोल फ्री नंबर 18008893277 जारी किया है। यह टोल फ्री नंबर सभी परिषदीय विद्यालयों की चहारदीवारी पर अंकित कराए जाएंगे। इस टोल फ्री नंबर पर छात्र-छात्राएं, अभिभावक और आमजन विद्यालय से संबंधित शिकायतें दर्ज करा सकेंगे।

इसके अलावा विद्यालयों की दीवारों पर यातायात के सामान्य नियम भी लिखवाने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि बच्चों में यातायात के प्रति जागरूकता बढ़ाई जा सके।

अब इस टोल फ्री नंबर के माध्यम से शिकायतें सीधे उच्च स्तर तक पहुंचेंगी, जिससे विद्यालयों की शिक्षा व्यवस्था में सुधार होगा। इसके साथ ही, विद्यालयों की दीवारों पर यातायात के सामान्य नियम भी लिखवाने के निर्देश जारी किए गए हैं। इससे छात्रों में जागरूकता बढ़ेगी और शिक्षकों की कार्यशैली की निगरानी भी संभव हो सकेगी।

ब्रिज कोर्स में अतिरिक्त मौके से शीर्ष अदालत का इनकार

ब्रिज कोर्स में अतिरिक्त मौके से शीर्ष अदालत का इनकार, बीएड शिक्षकों के लिए छह माह का ब्रिज कोर्स जरूरी 

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर एनआईओएस को जिम्मा


प्रयागराज । बीएड के आधार पर 69000 भर्ती में चयनित शिक्षकों की ब्रिज कोर्स के लिए अतिरिक्त अवसर की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इनकार कर दिया है। शीर्ष अदालत ने आठ अक्तूबर के आदेश में प्रयागराज के कुछ शिक्षकों की ओर से दाखिल याचिका पर विचार से ही मना कर दिया है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 11 अगस्त 2023 से पहले नियुक्त बीएड अर्हताधारी शिक्षकों को अनिवार्य रूप से ब्रिज कोर्स के आदेश दिए थे।


शिक्षकों को ब्रिज कोर्स शुरू होने की तिथि से एक वर्ष में पूरा करना है। कि शिक्षकों को एक बार में ही कोर्स पूरा करना है। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि कोर्स पूरा न करने पर शिक्षक की नियुक्ति अमान्य हो जाएगी। शिक्षकों ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिकाएं लगाकर अतिरिक्त अवसर मांगा था। 


राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थ की ओर से जारी प्राथमिक शिक्षा में छह माह के प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम को राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद ने दो जुलाई 2025 को मान्यता दी है। इस बीच यूपी सरकार ने भी प्रशिक्षण के आदेश जारी कर दिए हैं। ऐसे शिक्षकों से एक से 15 नवंबर तक ऑनलाइन आवेदन लिए जाएंगे और एक दिसंबर से 30 मई तक प्रशिक्षण दिया जाएगा

Monday, October 13, 2025

परीक्षा ही नहीं हो रही तो टीईटी कैसे दें? 8वीं तक शिक्षक बनने के लिए TET अनिवार्य लेकिन यूपी में तीन साल से परीक्षा ही नहीं हुई

परीक्षा ही नहीं हो रही तो टीईटी कैसे दें? 8वीं तक शिक्षक बनने के लिए TET अनिवार्य लेकिन यूपी में तीन साल से परीक्षा ही नहीं हुई

शिक्षा सेवा चयन आयोग को करवानी है परीक्षा , अभी तक तारीख तय नहीं


लखनऊ: सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि कक्षा आठ तक पढ़ाने वाले सभी शिक्षकों को TET पास होना अनिवार्य है। अब शिक्षक परेशान है। वे नौकरी कर रहे है लेकिन TET नहीं किया। सबसे बड़ी समस्या यह है कि दो साल के अंदर उनको TET करना जरूरी है। प्रदेश का हाल ये है कि यहां पर तीन साल से TET की परीक्षा ही नहीं हुई। फिलहाल, जल्दी परीक्षा होने की कोई उम्मीद भी नहीं है? लाखों शिक्षकों को नौकरी जाने का डर सता रहा है।


ऐसे अनिवार्य हुआ TET
कक्षा एक से आठ तक पढ़ाने के लिए हर शिक्षक को बीएड/बीटीसी के साथ ही TET करना अनिवार्य है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत TET को अनिवार्य किया गया था यह अधिनियम 2011 में लागू किया गया था। उससे पहले जो शिक्षक पढ़ा रहे है, उनके लिए उस समय TET अनिवार्य नहीं थी। उनमें से कुछ का प्रमोशन भी हो गया और वे जूनियर हाईस्कूलों में कक्षा छह से आठ तक के छात्रों को पढ़ा रहे है। उनके लिए भी जूनियर TET से करना होता है।


 अभी जो राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) की गाइडलाइन के अनुसार सभी शिक्षकों को TET करना जरूरी है। इस मामले को लेकर शिक्षक कोर्ट गए। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। शिक्षकों का तर्क था कि जब उनकी नौकरी लगी थी, उस समय TET की अनिवार्यता नहीं थी। उसे बाद में उन पर कैसे थोपा जा सकता है? 

सुप्रीम कोर्ट ने एक सितंबर को आदेश दिया कि NCTE की गाइडलाइन का पालन करना जरूरी है। सभी को TET करनी होगी। सुप्रीम कोर्ट ने इसमें से सिर्फ उन शिक्षकों को छूट दी है, जिनको रिटायर होने में पांच साल से कम वक्त बचा है। वाकी सभी शिक्षकों को दो साल के भीतर TET करना जरूरी होगा।


'आदेश ही अव्यावहारिक'
शिक्षकों का कहना है कि पहली बात तो TET का आदेश ही अव्यावहारिक है। दूसरी बात यह कि जो शिक्षक या शिक्षक बनने के इच्छुक अन्य बेरोजगार युवा TET करना चाहते हैं तो उसके लिए तो सरकार को व्यवस्था करनी होगी। प्राथमिक शिक्षक प्रशिक्षित स्नातक असोसिएशन के अध्यक्ष विनय कुमार सिंह कहते हैं कि सरकार को TET परीक्षा करवाकर उन्हें मौका देना चाहिए। नियमानुसार साल में दो बार TET परीक्षा होनी चाहिए।

प्रदेश का हाल ये है कि यहां आखिरी बार 2021 में TET के लिए आवेदन मांगे गए थे। उसमें भी पेपर लीक हो गया था। वह परीक्षा आखिरी बार 2022 में हुई थी। तब से अब तक TET नहीं हुई। ऐसे में टीचरों की उम्मीद TET' पर टिकी है।


आयोग नहीं करवा सका परीक्षा
पहले TET करवाने का जिम्मा परीक्षा नियामक प्राधिकारी का होता था। अब सरकार ने शिक्षा सेवा चयन आयोग गठित कर दिया है। अब इस आयोग को ही परीक्षा करवानी है। यह आयोग 2023 में गठित भी हो गया लेकिन तब से अभी तक एक भी परीक्षा नहीं कर पाया है। प्रफेसर कीर्ति पांडेय एक सितंबर 2024 को आयोग की अध्यक्ष बनाई गई थी। वह भी 26 सितंबर को हट गई। अब आयोग कार्यवाहक अध्यक्ष के सहारे चल रहा है और अभी तक कोई परीक्षा नहीं करा सका है।


कैसे आया नौकरी पर संकट ?
 बेसिक शिक्षा परिषद में ही ऐसे करीब डेढ़ लाख शिक्षक  है, जिन्होंने अभी तक TET नहीं किया है। वे ज्यादातर 2011 के पहली के भर्ती है। कई तो ऐसे है जब शैक्षिक अर्हता इंटर और BTC होती थी। वे TET कैसे करे? वही कई मृतक आश्रित है, जिन्होंने TET नहीं किया है। अब जो करना भी चाहते हैं, वे कहां से TET करें? तीन साल से यूपी में कोई TET परीक्षा नहीं हुई। जल्दी परीक्षा नहीं करवाई जाती तो उनके हाथ से मौके निकलते जाएंगे और नौकरी संकट ने आ जाएगी। बेसिक शिक्षा परिषद के अलावा अन्य एडेड और प्राइवेट स्कूलों में भी इन कक्षाओं को पढ़ाने के लिए TET अनिवार्य है। वे भी इंतजार कर रहे है। लाखों की संख्या में युवा TET के इंतजार में है।


शिक्षा सेवा चयन आयोग एक स्वायत्त संस्था है। उसको ही परीक्षा करवानी है। फिर भी हम बात करेंगे कि जल्द से जल्द TET का आयोजन किया जाए, ताकि युवाओं को अधिक से अधिक अवसर मिल सकें। - योगेद्र उपाध्याय, उच्च शिक्षा मंत्री

दर्जन भर से ज्यादा नियामकों में बिखरी देश की उच्च शिक्षा को एक नियामक के दायरे में लाने के लिए उच्च शिक्षा आयोग बनाने के लिए प्रयास तेज

दर्जन भर से ज्यादा नियामकों में बिखरी देश की उच्च शिक्षा को एक नियामक के दायरे में लाने के लिए उच्च शिक्षा आयोग बनाने के लिए प्रयास तेज


नई दिल्ली: दर्जन भर से ज्यादा नियामकों में बिखरी देश की उच्च शिक्षा को एक नियामक के दायरे में लाने की सिफारिश हुए पांच साल से ज्यादा वक्त हो गया है। लेकिन सक्रियता अब बढ़ी है। शिक्षा मंत्रालय ने इसे लेकर प्रस्तावित भारतीय उच्च शिक्षा आयोग (हेकी) के गठन की तैयारी फिर से शुरू कर दी है। इससे संबंधित विधेयक के मसौदे को अंतिम रूप दिया जा रहा है। साथ ही जो संकेत मिले, उसमें नवंबर से शुरू होने वाले संसद के शीतकालीन सत्र में इसे पेश किया जा सकता है।


शिक्षा मंत्रालय ने यह तेजी तब दिखाई है, जब एनईपी की सिफारिश के तहत उच्च शिक्षा में कई बड़े बदलावों को लागू कर दिया गया है। इसमें सभी उच्च शिक्षा संस्थानों को बहुविषयक संस्थानों में तब्दील करने, क्रेडिट फार्मूले को अपनाना व पढ़ाई के दौरान कभी भी एक्जिट और एंट्री जैसे विकल्पों को मुहैया कराना है। आइआइटी सहित देश के शीर्ष उच्च संस्थानों ने इस पर अमल भी शुरू कर दिया है। इसमें आइआइटी ने बीएसएसी-बीएड व बीए-बीएड जैसे शिक्षक प्रशिक्षण कोसौँ को शुरू कर दिया है। वैसे तो आइआइटी एक स्वायत्त और तकनीकी संस्थान है लेकिन इन कोर्सों के नियामक का जिम्मा राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) के पास है। इस तरह गैर तकनीकी कोर्सों यानी बीएससी जैसे कोर्सों के नियामक यूजीसी निर्धारित करता है। 


मंत्रालय से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक उच्च शिक्षा में तेजी से अपनाए जा रहे इन बदलावों को देखते हुए प्रस्तावित उच्च शिक्षा आयोग का गठन दर्शाती है।  जरूरी हो गया है। जहां बहुविषयक संस्थानों को अलग-अलग नियामकों के चक्कर नहीं लगाने पड़े। जो उच्च शिक्षा को विश्वस्तरीय बनाने व सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) को बढ़ाने के लिए भी आवश्यक है। देश की उच्च शिक्षा अभी यूजीसी, एआइसीटीई, एनसीटीई, एनसीवीईटी व वास्तुकला परिषद जैसे करीब 14 नियामकों में बिखरी हुई है।

टीईटी अनिवार्यता पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पुनर्विचार याचिका दायर करेगी बंगाल सरकार

टीईटी अनिवार्यता पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पुनर्विचार याचिका दायर करेगी बंगाल सरकार


बंगाल की ममता सरकार सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश पर पुनर्विचार याचिका दायर करेगी, जिसमें जिन कार्यरत प्राथमिक व उच्च प्राथमिक शिक्षक-शिक्षिकाओं ने शिक्षक पात्रता परीक्षा (टेट) उत्तीर्ण नहीं की है, उन्हें इसकी परीक्षा देने को कहा गया है। नौकरी कायम रखने के लिए उन्हें परीक्षा में उत्तीर्ण होना पड़ेगा। सूत्रों ने बताया कि पुनर्विचार याचिका के लिए राज्य के स्कूल शिक्षा विभाग की ओर से राज्य सचिवालय से अनुरोध किया गया है। वहां से हरी झंडी मिलते ही याचिका दायर कर दी जाएगी।

स्कूल शिक्षा विभाग का कहना है कि शिक्षक-शिक्षिकाओं के परीक्षा देने की तैयारी करने से स्कूलों में पठन-पाठन में व्यापक रूप से प्रभाव पड़ सकता है। आंकड़ों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के फलस्वरूप बंगाल में करीब एक लाख शिक्षक-शिक्षिकाओं को परीक्षा देनी पड़ सकती है। बहुत से शिक्षकों को नौकरी खोने का भय सता रहा है। ऐसे बहुत से शिक्षक हैं, जो पिछले 15-20 वर्षों से अध्यापन कर रहे हैं। उन्हें भी परीक्षा से गुजरना पड़ेगा। मालूम हो कि उत्तर प्रदेश समेत कई राज्य इस बाबत पुनर्विचार याचिका दायर कर चुके हैं।




TET अनिवार्यता के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ तामिलनाडु की रिव्यू याचिका, आदेश से पूरे मैकेनिज्म के कोलैप्स होने का जताया खतरा

नई दिल्लीः तमिलनाडु सरकार ने हाल ही में आए सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर की है, जिसमें टीचरों के लिए पात्रता परीक्षा (टीईटी) की योग्यता अनिवार्य की गई थी। 

राज्य सरकार ने पिटिशन में कहा है कि यह अनिवार्यता उन पर लागू होती है जिन्हें ऐक्ट के 1 अप्रैल 2010 से प्रभावी होने के बाद अधिसूचित मानकों के तहत नियुक्त किया गया था। 

याचिका में कहा गया है कि अगर आदेश को लागू हुआ तो पूरे मैकेनिज्म के कोलैप्स करने का खतरा है, जिसमें शिक्षकों का सामूहिक अयोग्य ठहरना और लाखों बच्चों को कक्षा शिक्षा से वंचित करना शामिल है।




टीईटी की अनिवार्यता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, टीईटी की अनिवार्यता पूर्व नियुक्त शिक्षकों पर लागू नहीं हो सकती

याचिका में कहा, आरटीई के संशोधन अधिनियम की धारा-2 को लागू करने से हजारों शिक्षकों की आजीविका पर संकट


नई दिल्ली। टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट (टीईटी) पास करने की अनिवार्यता से आहत उत्तर प्रदेश के शिक्षकों के संगठन यूनाइटेड टीचर्स एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (आरटीई) और इसके 2017 के संशोधन अधिनियम की वैधानिकता को चुनौती दी है। संगठन का कहना है कि अधिनियम की धारा 23 (2) और संशोधन अधिनियम की धारा-2 को लागू करने से राज्य के हजारों शिक्षकों की आजीविका पर संकट आ गया है।

याचिका में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश में वर्षों से अलग-अलग नीतियों के तहत शिक्षक भर्ती होती रही है। वर्ष 1999, 2004 और 2007 में विशेष बीटीसी योजनाओं के तहत बीएड या बीपीएड धारक शिक्षकों की नियुक्ति हुई। इसके अलावा मृतक आश्रित कोटे से भी हजारों लोगों को शिक्षक पद पर लिया गया।

इन सभी नियुक्तियों को राज्य सरकार ने वैध माना और शिक्षक लंबे समय से सेवा में कार्यरत हैं। लेकिन एनसीटीई (राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद) ने 2010 से लेकर 2021 तक कई अधिसूचनाएं जारी कर न्यूनतम योग्यता को बार-बार संशोधित किया।

अब शिक्षकों के लिए अनिवार्य कर दिया गया है कि वे टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट (टीईटी) पास करें और स्नातक के साथ बीएड या यहां तक कि स्नातकोत्तर के साथ एकीकृत बीएड-एमएड होना चाहिए। संगठन ने तर्क दिया है कि कानून का पूर्व प्रभाव से प्रयोग असांविधानिक है। इससे वे शिक्षक भी अयोग्य घोषित कर दिए गए हैं, जिन्हें उनके समय की वैध नीतियों और आदेशों के तहत नियुक्त किया गया था। 

शिक्षकों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार
याचिका में कहा गया है कि यह प्रावधान अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है क्योंकि समान परिस्थितियों वाले शिक्षकों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार हो रहा है। साथ ही यह यह अनुच्छेद 21 का भी उल्लंघन भी है, क्योंकि लंबे समय से सेवा दे रहे शिक्षक-शिक्षिकाओं को अचानक नौकरी और आजीविका से वंचित किया जा रहा है।

संगठन का कहना है कि टीईटी की अनिवार्यता पूर्व नियुक्त शिक्षकों पर लागू नहीं हो सकती क्योंकि उनमें से कई बीएड धारक हैं और नियमों के अनुसार वे टीईटी में बैठ ही नहीं सकते। याचिका में यह भी कहा गया है कि केंद्र सरकार की ओर से लाए गए संशोधन राज्य सरकारों की भर्ती नीतियों को पीछे से बदल रहे हैं। यह संघीय ढांचे और राज्यों की शक्ति में दखल है। याचिका में आरटीई अधिनियम की धारा 23 (2) और 2017 संशोधन अधिनियम की धारा 2 को असांविधानिक घोषित करने की मांग की गई है। साथ ही मांग की गई है कि इन प्रावधानों के तहत शिक्षकों की सेवा समाप्त करने की कार्रवाई पर रोक लगाई जाए।

'मौलिक अधिकारों के विरुद्ध'
यूटा के प्रदेश अध्यक्ष राजेंद्र सिंह राठौर ने इस अधिनियम संशोधन को मौलिक अधिकारों के विरुद्ध तथा असंवैधानिक बताया। उनका का कहना है कि प्रदेश के काफी शिक्षक ऐसे हैं जो अब टीईटी के लिए आवेदन ही नहीं कर सकते। 2001 से पहले इंटर, बीटीसी के आधार पर नियुक्त काफी शिक्षक जिनकी सेवा अभी पांच वर्ष से अधिक है। मृतक आश्रित कोटे में अनुकंपा के तहत इंटर शैक्षिक योग्यता के आधार पर नौकरी पाने वाले अध्यापक टीईटी के लिए आवेदन नहीं कर सकते हैं। ऐसे में पहले नियुक्त शिक्षकों इससे राहत दी जानी चाहिए।



अध्यापकों के लिए टीईटी की अनिवार्यता पर सुप्रीम कोर्ट से पुनर्विचार का अनुरोध, सरकारों पर राहत का दबाव बनाने के साथ ही आदेश पर पुनर्विचार करने की रणनीति 


अखिल भारतीय प्राथमिक शिक्षक संघ ने दाखिल की पुनर्विचार याचिका, उम्र और तमिलनाडु की भी दस्तक

नई दिल्ली: टीईटी की अनिवार्यता के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ शिक्षकों ने कानूनी लड़ाई का मन बनाया है। सरकार के छोर पर राहत का दबाव बनाने के साथ ही शिक्षकों ने आदेश पर पुनर्विचार करने की गुहार लगाई है। शिक्षक संघ के अलावा उत्तर प्रदेश सरकार और तमिलनाडु सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट में फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की हैं। तमिलनाडु सरकार का कहना है कि टीईटी की अनिवार्यता उन्हीं शिक्षकों पर लागू होती है जिनकी नियुक्ति आरटीई कानून लागू होने के बाद हुई। यह अनिवार्यता उन शिक्षकों पर लागू नहीं होती जिनकी नियुक्ति इस कानून के लागू होने के पहले के नियम कानूनों के तहत हुई।

सुप्रीम कोर्ट ने गत एक सितंबर को दिए आदेश में कक्षा एक से आठ को पढ़ाने वाले सभी शिक्षकों (जिनकी नौकरी पांच वर्ष से ज्यादा बची है) के लिए दो वर्ष के भीतर टीईटी पास करना अनिवार्य किया है। पांच वर्ष से कम बची नौकरी वालों को अगर प्रोन्नति पानी है तो उनके लिए टीईटी अनिवार्य है। इस आदेश का सबसे ज्यादा असर आरटीई कानून लागू होने से पहले हुई नियुक्तियों पर है। 


अखिल भारतीय प्राथमिक शिक्षक संघ ने सुप्रीम कोर्ट से टीईटी की अनिवार्यता के आदेश पर पुनर्विचार का अनुरोध करते हुए कहा कि इस फैसले का देश भर में करीब 10 लाख उन शिक्षकों पर प्रभाव पड़ रहा है। इन शिक्षकों की नियुक्ति शिक्षा का अधिकार (आरटीई) कानून लागू होने से पहले लागू नियम कानूनों के मुताबिक हुई है। उन शिक्षकों के लिए नियुक्ति के समय टीईटी (शिक्षक पात्रता परीक्षा) की अनिवार्यता नहीं थी और अब उनमें से ज्यादातर 50 वर्ष से ज्यादा आयु के हैं। संघ का कहना है कि टीईटी की अनिवार्यता को पूर्व प्रभाव से लागू करने से बड़ी संख्या में शिक्षक बर्खास्त होंगे, उन्हें प्रोन्नति नहीं मिलेगी उनका जीवनयापन का अधिकार प्रभावित होगा।

शिक्षक संघ ने वकील आरके सिंह के जरिये दाखिल पुनर्विचार याचिका में कहा कि एनसीटीई ने 23 अगस्त, 2010 को अधिसूचना जारी कर न्यूनतम योग्यता में टीईटी को जोड़ दिया। लेकिन अधिसूचना का पैरा चार नई तय न्यूनतम योग्यता से उन शिक्षको को छूट देता है जो अधिसूचना जारी होने की तारीख से पहले नियुक्त हो चुके हैं। इसलिए जो शिक्षक 23 अगस्त, 2010 से पहले नियुक्त हुए, उन्हें टीईटी से छूट है। 

कोर्ट ने अधिसूचना को ऐसे पढ़ा है जैसे कि कोई छूट थी ही नहीं, ऐसे में फैसले में स्पष्ट रूप से खामी है जिस पर पुनर्विचार की जरूरत है। यह भी कहा कि बाद में आए विधायी व कार्यकारी आदेशों में भी एनसीटीई की दी छूट जारी रहेगी। एनसीटीई ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में स्पष्ट किया कि जिन शिक्षकों की नियुक्ति 23 अगस्त, 2010 के पहले हुई है उन्हें नौकरी में बने रहने या प्रोन्नति के लिए टीईटी करने की जरूरत नहीं। ये भी कहा गया कि उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में शिक्षकों की भर्तियां प्रतियोगी परीक्षा से होती है।




टीईटी प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट पहुंचे शिक्षक संगठन, टीईटी की अनिवार्यता के खिलाफ की गई याचिकाएं 

एआईपीटीएफ शिक्षकों के हित में मैदान में उतरा

सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षकों के लिए टीईटी अनिवार्य किए जाने के बाद देश और प्रदेश से एक के बाद एक पुनर्विचार याचिका दाखिल की जा रही हैं


लखनऊ । शिक्षकों के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) की अनिवार्यता व दो वर्षों में इसे पास किए जाने के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल कर दी गई है। भारतीय प्राथमिक शिक्षक संघ (एआईपीटीएफ) के राष्ट्रीय अध्यक्ष व उप्र प्राथमिक शिक्षक संघ (यूपीपीएसएस) के प्रदेश अध्यक्ष सुनील कुमार पांडेय ने बताया कि पुनर्विचार याचिका दाखिल कर दी गई है और कोर्ट से शिक्षकों के लिए राहत की मांग की गई है।

पूरे देश में ऐसे 20 लाख शिक्षक हैं, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद टीईटी पास करना होगा। वहीं उत्तर प्रदेश में ऐसे 1.86 लाख शिक्षक हैं, जिन्हें टीईटी पास करना होगा। एआईटीपीएफ के नेशनल काउंसलर नरेश कौशिक का कहना है कि शिक्षकों के हितों को बचाने के लिए मजबूती के साथ कोर्ट में पक्ष प्रस्तुत किया जाएगा। हमें उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलेगी। राज्य सरकार इस मामले में पहले ही याचिका दायर कर चुकी है।




टीईटी अनिवार्यता के विरोध में अखिल भारतीय प्राथमिक शिक्षक संघ दाखिल करेगा पुनर्विचार याचिका 

 अखिल भारतीय प्राथमिक शिक्षक संघ की सोमवार को हुई ऑनलाइन बैठक में टीईटी अनिवार्यता के विरोध में सर्वोच्च न्यायालय में पुनर्विचार याचिका दाखिल किए जाने का निर्णय लिया गया। 


राष्ट्रीय अध्यक्ष सुशील कुमार पांडेय ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में मजबूत तथ्यों के साथ लड़ाई लड़ेंगे। साथ ही सड़क से लेकर संसद तक शिक्षकों की सेवा को सुरक्षित करने के लिए संघर्ष करेंगे। वहीं 15 अक्तूबर तक काली पट्टी बांधकर शिक्षण कार्य करने व हस्ताक्षर अभियान पूर्व की भांति चलता रहेगा। 




टेट की अनिवार्यता के विरोध में आज से काली पट्टी बांधकर काम करेंगे शिक्षक

लखनऊ। टीईटी अनिवार्य किए जाने के बाद शिक्षकों ने एनसीटीई नियमावली में संशोधन की मांग की है। इसके लिए शिक्षकों ने दूसरे चरण के आंदोलन की घोषणा की है। अखिल भारतीय प्राथमिक शिक्षक संघ की ओर से इसकी शुरुआत नवरात्र के पहले दिन सोमवार से की जा रही है।

संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुशील कुमार पांडेय ने बताया कि 22 सितंबर से 15 अक्तूबर तक शिक्षक काली पट्टी बांधकर शिक्षण कार्य करेंगे। साथ ही इस दौरान सभी जिलों में हस्ताक्षर अभियान चलाएंगे। हस्ताक्षर अभियान की कॉपी सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केंद्रीय शिक्षा मंत्री को ईमेल से भेजा जाएगा।

उन्होंने कहा कि देश भर के शिक्षकों को टीईटी की बाध्यता से मुक्त करने व केंद्र सरकार के 2017 एनसीटीई की नियमावली में संशोधन किए जाने की मांग करेंगे। इसके बाद भी शिक्षकों को राहत नहीं मिली तो आगे के आंदोलन की घोषणा की जाएगी। 



टीईटी मामले में शिक्षकों का पक्ष सही से रखने की मांग

 लखनऊः कक्षा एक से आठवीं तक शिक्षक बने रहने के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) की अनिवार्यता को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ प्रदेश सरकार ने पुनर्विचार याचिका दाखिल कर दी है। अब शिक्षक संगठनों की ओर से शिक्षा विभाग को लिखे पत्र में यह मांग की गई है कि सरकार इस मुद्दे पर सही से पक्ष रखे, क्योंकि आदेश के बाद से कई तरह की भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गई है।

विशिष्ट बीटीसी शिक्षक वेलफेयर एसोसिएशन उत्तर प्रदेश के पदाधिकारियों का कहना है कि इस फैसले से प्रदेश के करीब 1.5 लाख और देशभर के लगभग 10 लाख शिक्षक प्रभावित हो रहे हैं। ये वे शिक्षक हैं जिन्हें शिक्षा अधिकार कानून (आरटीई एक्ट) के तहत 23 अगस्त 2010 को राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीईटी) की अधिसूचना के आधार पर नियुक्त किया गया था। उस अधिसूचना में स्पष्ट किया गया था कि पहले से नियुक्त शिक्षकों को टीईटी करने की आवश्यकता नहीं है। 

संगठन के प्रदेश अध्यक्ष संतोष तिवारी ने कहा कि इंटरनेट मीडिया में यह गलत प्रचारित किया जा रहा है कि केंद्र सरकार ने 2017 में धारा 23(2) में संशोधन कर सभी शिक्षकों के लिए टीईटी अनिवार्य कर दिया है। दरअसल, यह संशोधन केवल अप्रशिक्षित शिक्षकों को प्रशिक्षण पूरा करने के लिए समय-सीमा बढ़ाने के लिए किया गया था, न कि पहले से नियुक्त शिक्षकों पर लागू करने के लिए।

 संयुक्त मोर्चा महासचिव दिलीप चौहान ने बताया कि कोर्ट का आदेश खेल के बीच में नियम बदलने जैसा है। वरिष्ठ उपाध्यक्ष शालिनी मिश्रा ने भी इसे त्रुटिपूर्ण करार दिया। संगठन के विधि विशेषज्ञ अरुण कुमार और विधि सलाहकार आमोद श्रीवास्तव ने कहा कि इस फैसले का पूर्वव्यापी प्रभाव नहीं होना चाहिए। उन्होंने सरकार से मांग की है कि वह सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए स्थिति स्पष्ट करे।





अनिवार्य टीईटी को लेकर सीएम योगी से मिले एमएलसी,  सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल करने की मांग की 

लखनऊ। सुप्रीम कोर्ट द्वारा शिक्षकों के लिए टीईटी अनिवार्य किए जाने के बाद से प्रदेश भर के शिक्षकों की धड़कनें बढ़ी हुई हैं। इसी क्रम में भाजपा एमएलसी देवेंद्र प्रताप सिंह ने शनिवार को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की।


 उन्होंने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल करने की मांग की। एमएलसी ने बताया कि शिक्षकों के चयन के लिए अलग-अलग समय में अलग-अलग योग्यता निर्धारित थी। ऐसे में इंटर, बीपीएड-सीपीएड, बीएड प्राथमिक स्तर पर अब टीईटी के लिए अर्ह नहीं हैं।

न्यायालय के फैसले से प्रदेश के काफी शिक्षकों और उनके परिवारों का भविष्य अंधकारमय होने का खतरा है। शिक्षकों में काफी निराशा है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल करने के साथ ही सरकार अपनी विधायी शक्तियों का प्रयोग करते हुए नया कानून बनाने व संशोधित करने पर भी चर्चा की गई। एमएलसी ने बताया कि सीएम ने इस मामले में सकारात्मक कार्यवाही का आश्वासन दिया है। 




टीईटी से राहत के लिए प्रधानमंत्री और शिक्षामंत्री को भेजा जा रहा ज्ञापन, शिक्षक संगठनों की ओर से राहत देने की मांग हुई तेज

लखनऊ। सुप्रीम कोर्ट द्वारा सभी शिक्षकों के लिए टीईटी अनिवार्य किए जाने के बाद शिक्षक संगठनों ने इससे राहत देने की मांग तेज कर दी है। अलग-अलग संगठनों ने बृहस्पतिवार को भी इसके लिए प्रधानमंत्री, शिक्षा मंत्री व स्थानीय जनप्रतिनिधियों के माध्यम से ज्ञापन भेजा।

विशिष्ट बीटीसी शिक्षक वेलफेयर एसोसिएशन की ओर से प्रधानमंत्री, शिक्षा मंत्री व प्रमुख सचिव स्कूल शिक्षा को इसके लिए पत्र भेजा गया। प्रदेश अध्यक्ष संतोष तिवारी ने पत्र लिखकर अभियान की शुरुआत की।

प्रदेश महासचिव दिलीप चौहान ने बताया कि राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद की अधिसूचना 23 अगस्त 2009 में कहा गया है कि शिक्षक को शिक्षण कार्य करने के लिए न्यूनतम योग्यता डिप्लोमा (बीटीसी या समकक्ष) या बीएड के साथ ही छह माह का विशिष्ट बीटीसी प्रशिक्षण होना अनिवार्य है।

वरिष्ठ उपाध्यक्ष शालिनी मिश्रा, विधि सलाहकार आमोद श्रीवास्तव ने कहा कि प्रदेश भर से शिक्षक पत्र लिखकर प्रधानमंत्री, शिक्षा मंत्री व सचिव को इससे अवगत कराएंगे। साथ ही यह मांग करेंगे कि केंद्र सरकार इससे उच्चतम न्यायालय को अवगत कराए ताकि 23 अगस्त 2010 के पूर्व नियुक्त शिक्षकों में जो भ्रम की स्थिति पैदा हुई है, उससे राहत मिल सके।

दूसरी तरफ एक अन्य शिक्षक संगठन की ओर से बृहस्पतिवार से अपने जिले के जनप्रतिनिधियों के माध्यम से पीएम व शिक्षा मंत्री को ज्ञापन भेजने की शुरुआत की गई है। शिक्षक नेता सुशील कुमार पांडेय ने बताया कि 20 सितंबर तक यह अभियान चलेगा। गलत तथ्यों को सर्वोच्च न्यायालय में रखने से शिक्षकों के सामने यह समस्या पैदा हुई है। केंद्र सरकार शिक्षा के अधिकार अधिनियम में संशोधन कर शिक्षकों की सेवा को सुरक्षित करने का काम करे।



टीईटी की अनिवार्यता को लेकर केंद्र सरकार पर दबाव बनाने के लिए उत्तर प्रदेश में शिक्षकों का विरोध शुरू, अक्तूबर में दिल्ली कूच की तैयारी 

सुप्रीम कोर्ट द्वारा सभी शिक्षकों के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) अनिवार्य किए जाने के आदेश के बाद प्रदेश भर के शिक्षक चिंतित और डरे हुए हैं। अगर केंद्र सरकार और शिक्षा मंत्रालय इस मामले में हस्तछेप नहीं करते हैं तो उनके सामने बडी विकट स्थिति उत्पन्न हो जाएगी।

इसी क्रम में उत्तर प्रदेश बीटीसी शिक्षक संघ के आह्वान पर बुधवार को प्रदेश भर से शिक्षकों द्वार पहले दिन ही 97890 पत्र प्रधानमंत्री के नाम भेजा गया। यह कार्यक्रम 20 सितंबर तक चलेगा। इस दौरान प्रदेश भर के शिक्षक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से 25 अगस्त 2010 से पहले नियुक्त शिक्षकों को टीईटी से छूट देने की मांग करेंगे।

संघ के प्रदेश अध्यक्ष अनिल यादव ने कहा की 55 साल का शिक्षक कैसे परीक्षा पास कर पायेगा। अब शिक्षक बच्चों को पढ़ाए या अब खुद पढ़े। उन्होंने कहा की केंद्र सरकार के कानून और सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश से प्रदेश के काफी शिक्षकों की नौकरी पर संकट गहराया है। केंद्र सरकार व एनसीटीई चाहे तो शिक्षकों को राहत मिल सकती है। अगर इस समस्या का समाधान नहीं निकलता है तो अक्तूबर में देश भर के शिक्षक दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना देंगे।दू

सरी ओर एक शिक्षक संगठन की ओर से प्रदेश भर में जिला मुख्यालयों पर बुधवार को प्रदर्शन कर डीएम के माध्यम से पीएम को ज्ञापन दिया गया। संगठन के सुशील कुमार पांडेय ने मांग की कि आरटीई लागू होने से पहले के शिक्षकों को इससे मुक्त रखा जाए। आरटी ई एक्ट में संशोधन किया जाए। 

वहीं विशिष्ट बीटीसी शिक्षक वेलफेयर एसोशिएशन 11 से 25 सितम्बर के बीच पीएम और शिक्षा मंत्री को पत्र भेजकर इस मामले में हस्तक्षेप की अपील करेंगे। प्रदेश अध्यक्ष संतोष तिवारी ने हम पत्र लिखकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले को चुनौती देने के लिए अभियान चलाएंगे। प्रदेश महासचिव दिलीप चौहान ने कहा कि संगठन शिक्षकों के लिए हर स्तर पर लड़ाई लड़ेगा।



टीईटी अनिवार्यता के विरुद्ध आंदोलन करेंगे यूपी के शिक्षक

प्रभावित शिक्षक बुधवार से पीएम को भेजेंगे पांच लाख पत्र

बीटीसी शिक्षक संघ 10 से 20 सितंबर तक चलाएगा अभियान

 लखनऊ : सुप्रीम कोर्ट द्वारा सभी शिक्षकों के लिए टीईटी (शिक्षक पात्रता परीक्षा) अनिवार्य किए जाने के आदेश के बाद देशभर के प्राथमिक और जूनियर हाई स्कूलों में कार्यरत लगभग एक करोड़ शिक्षक आंदोलन की तैयारी में जुट गए हैं। 

उत्तर प्रदेश बीटीसी शिक्षक संघ के अनुसार 10 से 20 सितंबर तक प्रदेश के शिक्षक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को करीब पांच लाख पत्र भेजेंगे। इन पत्रों में 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों को टीईटी से छूट देने की मांग की जाएगी। 

शिक्षक संगठनों का कहना है कि केंद्र सरकार के कानून और सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश से देश के करीब 30 लाख शिक्षकों की नौकरी पर संकट गहराया है। केंद्र सरकार चाहे तो शिक्षकों को राहत मिल सकती है। इसी उद्देश्य से संघ ने 10 से 20 सितंबर तक पत्र भेजने का अभियान चलाने का निर्णय लिया है। शिक्षक नेताओं ने चेतावनी दी कि यदि केंद्र सरकार इस मुद्दे पर सकारात्मक पहल नहीं करती है तो अक्टूबर में देशभर के शिक्षक दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना देंगे। जरूरत पड़ने पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ पुनर्विचार याचिका भी दाखिल की जाएगी। इसके लिए वरिष्ठ अधिवक्ताओं का एक पैनल निर्णय का अध्ययन कर रहा है।

आंदोलन को नैतिक समर्थन देंगे शिक्षामित्र : शिक्षक अपने आंदोलन को व्यापक बनाने के लिए शिक्षामित्रों को साथ जोड़ना चाहते हैं, लेकिन शिक्षामित्रों ने साफ किया है कि वे सीधे आंदोलन में हिस्सा नहीं लेंगे बल्कि नैतिक समर्थन देंगे। पहले जब शिक्षामित्र आंदोलनरत थे, तब सहायक अध्यापकों ने उन्हें नैतिक सहयोग दिया था।




टीईटी के खिलाफ शिक्षक संगठन हो रहे लामबंद,  सुप्रीम कोर्ट के फैसले से चिंतित प्रदेश भर के शिक्षक धीरे-धीरे आंदोलन की राह पर चल निकले 

उत्तर प्रदेशीय शिक्षक संघ ने 16 को प्रदेशव्यापी आंदोलन का किया एलान

लखनऊ। सभी शिक्षकों के लिए टीईटी अनिवार्य किए जाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से चिंतित प्रदेश भर के शिक्षक धीरे-धीरे आंदोलन की राह पर चल निकले हैं। शिक्षक संगठन इस मुद्दे को लेकर लामबंद होने लगे हैं। उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक संघ की रविवार को लखनऊ स्थित शिक्षक भवन में हुई बैठक में 16 सितंबर को प्रदेशव्यापी प्रदर्शन की घोषणा की गई है।

प्रदेश अध्यक्ष डॉ. दिनेश चंद्र शर्मा ने कहा कि टीईटी को लेकर केंद्र सरकार की ओर से बनाए गए कानून के क्रम में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से देश भर के 20 लाख शिक्षकों के सामने संकट खड़ा हुआ है। प्रदेश में भी इससे प्रभावित होने वालों की बड़ी संख्या है। संघ इसके लिए हर स्तर पर संघर्ष करेगा। बैठक में निर्णय लिया गया कि केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए कानून में संशोधन के लिए 16 सितंबर को सभी बीएसए कार्यालयों पर प्रदर्शन किया जाएगा। साथ ही डीएम के माध्यम से पीएम को संबोधित ज्ञापन भेजा जाएगा। उन्होंने आंदोलन में सभी शिक्षकों से शामिल होने का आह्वान किया।

संघ के महामंत्री संजय सिंह ने बताया कि जल्द एक प्रतिनिधिमंडल इस मामले में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से मिलेगा। जरूरत पड़ी तो इसके लिए कानूनी लड़ाई लड़ी जाएगी। बैठक में कोषाध्यक्ष शिव शंकर पांडेय, वरिष्ठ उपाध्यक्ष राधे रमण त्रिपाठी, प्रांतीय पदाधिकारी, जिला पदाधिकारी शामिल हुए। 


10 सितंबर को जिलों में होगा प्रदर्शन

लखनऊ। शिक्षकों के एक अन्य गुट ने टीईटी की अनिवार्यता को समाप्त करने के लिए प्रदेश के सभी जिला मुख्यालयों पर 10 सितंबर को प्रदर्शन की घोषणा की है। शिक्षक नेता सुशील कुमार पांडेय ने बताया कि सभी जिलों में डीएम के माध्यम से प्रधानमंत्री, केंद्रीय शिक्षा मंत्री व सीएम को संबोधित ज्ञापन दिया जाएगा।



टीईटी की अनिवार्यता के मुद्दे पर लंबी लड़ाई लड़ेगा AIPTF 

नई दिल्लीः नौकरी में बने रहने के लिए टीईटी की अनिवार्यता के मामले में शिक्षक संघ ने लंबी लड़ाई के लिए कमर कस ली है। शिक्षकों को राहत दिलाने के लिए अखिल भारतीय प्राथमिक शिक्षक संघ सरकार पर नियम-कानून में संशोधन करने का दबाव बनाएगा। शिक्षक संघ मांग करेगा कि जिन शर्तों पर नियुक्ति हुई थी, उन्हीं पर शिक्षकों की नौकरी जारी रहनी चाहिए और उन्हें प्रोन्नति मिलनी चाहिए। अगर नियुक्ति के समय टीईटी (शिक्षक पात्रता परीक्षा) जरूरी नहीं थी, तो अब इसे अनिवार्य नहीं किया जा सकता। हालांकि, सरकार पर राहत देने का दबाव बनाने के साथ-साथ शिक्षक संघ ने कानूनी विकल्प भी तलाशने शुरू कर दिए हैं और वकीलों से विचार-विमर्श चल रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने गत एक सितंबर को दिए फैसले में कहा है कि कक्षा एक से आठ तक के छात्रों को पढ़ाने वाले सभी शिक्षकों को दो वर्ष के भीतर टीईटी पास करनी होगी। इसमें नाकाम रहने वालों को अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी जाएगी। प्रोन्नति के लिए भी टीईटी पास करना अनिवार्य है। सिर्फ जिनकी नौकरी पांच वर्ष से कम बची है, उन्हें टीईटी से छूट है। लेकिन, प्रोन्नति पाने के लिए उन्हें भी टीईटी पास करनी होगी। कोर्ट का आदेश पूरे देश के लिए है। इससे शिक्षकों में हड़कंप मचा हुआ है, क्योंकि देशभर में लाखों शिक्षक हैं, जिन्होंने टीईटी नहीं किया है। 2011 से पहले नियुक्त हुए शिक्षकों की नौकरी पर तलवार लटक गई है। 

शिक्षकों की नौकरी पर संकट को देखते हुए अखिल भारतीय प्राथमिक शिक्षक संघ सक्रिय हो गया है। संकट का हल ढूंढने और वकीलों से विचार-विमर्श के लिए संघ के अध्यक्ष सुशील पांडेय, सचिव मनोज कुमार सहित विभिन्न राज्यों से कई शिक्षक नेता दिल्ली आए हुए हैं। सुशील कहते हैं कि शिक्षक संघ टीईटी अनिवार्य करने के कोर्ट के फैसले से राहत के लिए सरकार से बात करेगा और दबाव बनाएगा। जो शिक्षक पहले भर्ती हुए थे, वे उस समय के नियमों के साथ नियुक्त हुए थे। उनका अधिकार है कि उनकी नौकरी उन्हीं सेवा शर्तों के मुताबिक जारी रहे और उन्हीं पर प्रोन्नति दी जाए।




टीईटी बना शिक्षकों की टेंशन, सुप्रीम फैसले से बढ़ी बेचैनी, NCTE की संशोधित गाइडलाइन वापस लेने की बढ़ रही मांग

लखनऊ। सुप्रीम कोर्ट द्वारा शिक्षकों के लिए टीईटी अनिवार्य किए जाने के बाद से प्रदेश के 4.50 लाख से अधिक शिक्षकों की धड़कनें बढ़ी हुई हैं। शिक्षक खुद को दोराहे पर खड़ा पा रहा है। अब यह तय किया जा रहा है कि वह इस निर्णय पर पुर्नविचार के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील करें या फिर आंदोलन का रास्ता अपनाएं।


उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक संघ की ओर से सात सितंबर को इस मुद्दे पर महत्वपूर्ण बैठक बुलाई गई है। बैठक में केंद्र सरकार पर इस मामले में हस्तक्षेप करने की रणनीति बनाई जाएगी। साथ ही इस मामले में आगे और क्या किया जाए इस पर भी निर्णय लिया जाएगा।

संघ के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. दिनेश चंद्र शर्मा ने बताया कि सभी जिलों के जिलाध्यक्ष व प्रदेश के पदाधिकारी इस बैठक में शामिल होंगे। उनसे वार्ता कर आगे का निर्णय लिया जाएगा। उन्होंने बताया कि हम प्रदेश व केंद्र सरकार से मिलकर अपना पक्ष रखेंगे और शिक्षक विरोधी एक्ट वापस लेने की मांग करेंगे। यदि सरकार मांग नहीं मानती है तो देशव्यापी आंदोलन का निर्णय लिया जा सकता है।

डॉ. शर्मा ने कहा कि किसी भर्ती के पूर्व सरकार द्वारा संबंधित पद के लिए जो भी योग्यता निर्धारित की जाती है उसको पूरा करने वाले अभ्यर्थी ही भर्ती किये जाते हैं। प्रदेश सरकार द्वारा समय समय पर शिक्षकों की भर्ती के लिए जो भी योग्यता निर्धारित की गई, उसको पूरा करने पर ही शिक्षक भर्ती हुए हैं।

ऐसे में 25-30 साल पहले निर्धारित योग्यता पर नियुक्त शिक्षकों पर वर्तमान भर्ती के लिए निर्धारित योग्यता थोपने को बनाया गया कोई भी कानून केवल काला कानून ही कहा जाएगा। 23 अगस्त 2010 की एनसीटीई की गाइडलाइन में संशोधन देश भर के शिक्षकों के साथ धोखा है। इसी संशोधन के तहत सुप्रीम कोर्ट ने देश भर के बेसिक शिक्षकों को दो साल में टेट करना अनिवार्य कर दिया है। अन्यथा सेवा से अनिवार्य सेवानिवृत्ति देने का आदेश जारी किया है।

आरटीई एक्ट का उल्लंघन
विशिष्ट बीटीसी शिक्षक वेलफेयर एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष संतोष तिवारी ने कहा है कि आरटीई एक्ट में साफ कहा गया है कि 2010 के पूर्व नियुक्त शिक्षकों के लिए टीईटी की अनिवार्यता नही है। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश ने शिक्षकों को अंदर से हिला दिया है। संगठन इसके लिए हर सम्भव लड़ाई लड़ेगा। प्रांतीय महासचिव दिलीप चौहान ने कहा 20 से 25 साल नौकरी करने के बाद अचानक से यह कह देना कि बिना टीईटी सेवा से बाहर होना पड़ेगा। यह शिक्षकों और उनके परिवार के साथ बहुत बड़ा अन्याय है।



सुप्रीम कोर्ट के फैसले से आहत शिक्षक नहीं मनाएंगे शिक्षक दिवस, टीईटी मामले में केंद्र सरकार से हस्तक्षेप की अपील

लखनऊ। सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक सितंबर को दिए आदेश में शिक्षण सेवा में बने रहने या पदोन्नति पाने के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) को अनिवार्य करने से शिक्षक आहत हैं। अदालती फैसले से निराश शिक्षकों ने पांच सितंबर को शिक्षक दिवस नहीं मनाने का फैसला किया है। शिक्षक संगठनों ने कहा कि इस निर्णय से देश भर में 10 लाख से अधिक शिक्षकों की नौकरी पर संकट मंडरा रहा है। संगठनों ने इस मामले में केंद्र सरकार से हस्तक्षेप की अपील की है।


उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. दिनेश चंद्र शर्मा ने कहा है कि नौकरी पर मंडराते खतरे के बीच शिक्षक दिवस नहीं मनाने का फैसला किया गया है। संगठन की ओर से पांच सितंबर को किए जाने वाले सम्मान के कार्यक्रम भी स्थगित कर दिए गए हैं। कहा, सरकार शिक्षक दिवस पर जिन शिक्षकों को सम्मानित करेगी उन्हें दो साल का सेवा विस्तार मिलेगा। अगर उनकी नौकरी ही नहीं बचेगी तो इस सेवा विस्तार व सम्मान का वो क्या करेंगे? उन्होंने पीएम व केंद्रीय शिक्षा मंत्री से मामले में हस्तक्षेप कर शिक्षकों के साथ न्याय करने की अपील कही। कहा, देश भर के किसी शिक्षक की नौकरी प्रभावित नहीं होगी, यही घोषणा शिक्षकों के लिए वास्तविक सम्मान होगा।

प्राथमिक शिक्षक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष बासवराज गुरिकर, राष्ट्रीय महासचिव कमलाकांत त्रिपाठी, महामंत्री उमाशंकर सिंह व विनय तिवारी ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री को पत्र भेजकर फैसले पर पुनर्विचार करने और जरूरत पर संसद से कानून पास कराने की मांग की। 

उप्र. बीटीसी शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष अनिल यादव ने शिक्षा मंत्रालय पर टीईटी को लेकर किए गए संशोधन को छिपाने का आरोप लगाया। विशिष्ट बीटीसी शिक्षक वेलफेयर एसोसिएशन के प्रांतीय महासचिव ने भी संगठन शिक्षक दिवस न मनाने की घोषणा की है। शिक्षक नेता सुशील पांडेय ने पीएम को पत्र लिखकर सहानुभूति पूर्वक फैसला लेने का आग्रह किया है।