बच्चे पढ़ेंगे सुशासन के राजदंड सेंगोल के बारे में, नौवीं की नई किताब में नया भारत, संसद से लेकर चोल राजवंश तक... लिज्जत पापड़ की कहानी भी
नई दिल्ली। जिस सेंगोल को लेकर नए संसद भवन के उद्घाटन के वक्त सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने आ गए थे, वही सेंगोल अब नौवीं कक्षा के बच्चों को सुशासन का पाठ पढ़ाएगा। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने सामाजिक विज्ञान की नई किताब ‘अंडरस्टैंडिंग सोसायटी : इंडिया एंड बियॉन्ड’ में सेंगोल को शासन और सुशासन के सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में जगह दी है। यह किताब मंगलवार से बाजार में उपलब्ध हो गई है।
किताब में लिखा गया है कि 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सेंगोल को नए संसद भवन में स्थापित किया। इसे धर्मसम्मत शासन चिह्न के रूप में इस्तेमाल करने की परंपरा चोल राजवंश के दौर में शुरू हुई थी। किताब में बताया गया है कि 15 अगस्त 1947 की आधी रात को आजादी के मौके पर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने शैव परंपरा के संतों से सेंगोल ग्रहण किया था। छात्रों से कहा गया है कि वे ऐतिहासिक तस्वीरों के जरिये सेंगोल की यात्रा के बारे में और जानकारी जुटाएं।
किताब में शासन और लोकनीति वाले अध्याय में भारत के शासकीय प्रतीकों की जड़ों को समझाया गया है। इसी हिस्से में राष्ट्रीय आदर्श वाक्य ‘सत्यमेव जयते’ को मुंडक उपनिषद से और सर्वोच्च न्यायालय के ध्येय वाक्य ‘यतो धर्मस्ततो जयः’ को महाभारत से जोड़ा गया है। किताब का तर्क है कि ये प्रतीक केवल सजावटी नहीं हैं, बल्कि उन मूल्यों और आदर्शों के वाहक हैं जो संस्थाओं को सुशासन की जिम्मेदारी के साथ सौंपे गए हैं।
सुशासन की सात शाखाएं
अध्याय में सुशासन को एक पेड़ के रूप में दिखाया गया है, जिसकी सात शाखाएं भागीदारी, कानून का राज, जवाबदेही, पारदर्शिता, प्रभावशीलता, संवेदनशीलता और समावेशिता हैं। पेड़ के नीचे खड़े नागरिकों के साथ संदेश दिया गया है कि सुशासन सरकार और नागरिकों की साझेदारी है।
प्रस्तावना में ही दिशा साफ
किताब की दिशा उसकी प्रस्तावना से ही स्पष्ट है। एनसीईआरटी निदेशक दिनेश प्रसाद सकलानी के हस्ताक्षर से सितंबर 2026 में लिखी प्रस्तावना में कहा गया है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ऐसी शिक्षा व्यवस्था की कल्पना करती है जो भारत की सभ्यतागत बुद्धिमत्ता, मूल्यों और नैतिक परंपराओं में गहराई से रची-बसी हो। किताब में भारतीय ज्ञान, परंपरा और साझा विरासत के तत्वों को समकालीन सरोकारों से जोड़ा गया है।
सत्ता की जगह शासन
भूमिका में एनसीईआरटी ने खुद माना है कि पहले इसमें सत्ता विषय पर अध्याय प्रस्तावित था, जिसकी जगह अब ‘शासन और लोकनीति’ अध्याय रखा गया है। ‘भारत और विश्व : भाग एक’ वाला अध्याय अब दसवीं कक्षा में खिसका दिया गया है। इसके पीछे पढ़ाई को अधिक सुसंगत रखने और बच्चों पर कठिन विचारों का बोझ न डालने को कारण बताया गया है।
आयकर की दरें भी पढ़ेंगे बच्चे
निजी वित्त प्रबंधन वाले अध्याय में बच्चे अब आयकर की दरें भी पढ़ेंगे। इसमें नई कर व्यवस्था की पूरी तालिका दी गई है।
लिज्जत पापड़ की कथा से स्टार्टअप तक
उद्यमिता के अध्याय में दो देसी कहानियां दी गई हैं। इनमें लिज्जत पापड़ की कहानी 1959 से शुरू होती है, जब मुंबई की एक चॉल की सात गृहिणियों ने 80 रुपये और उधार के सामान से काम शुरू किया। किताब के अनुसार इस सहकारी संस्था में 2023 तक 45,000 से ज्यादा महिला सदस्य, 83 शाखाएं और 1,600 करोड़ रुपये का सालाना कारोबार था।
नई दिल्ली। जिस अध्याय को सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका पर विवादित टिप्पणी के चलते देशभर से वापस मंगवा लिया था, वह अब बदले हुए रूप में स्कूलों तक पहुंच चुका है। नई किताब में अदालतों की कमजोरियों और चुनौतियों के बजाय न्यायपालिका के ढांचे, अधिकार क्षेत्र और डिजिटल पहलों को प्रमुखता दी गई है।
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की नौवीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान की किताब ‘एक्सप्लोरिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड’ के संशोधित संस्करण में ‘द ज्यूडिशियरी इन अवर सोसाइटी’ अध्याय को पूरी तरह बदल दिया गया है। पिछले संस्करण में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार, लंबित मुकदमों के भारी बोझ, पहाड़ और जजों की कमी जैसे मुद्दों को शामिल किया गया था, लेकिन नए पाठ से ये विवादित हिस्से पूरी तरह हटा दिए गए हैं।
26 फरवरी को किताब देशभर से वापस मंगाई गई थी। फरवरी 2026 में आठवीं कक्षा की इसी किताब के न्यायपालिका वाले अध्याय में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ शीर्षक से एक हिस्सा सामने आया था। इसमें अदालतों के सामने मौजूद चुनौतियों में विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार और लंबित मामलों के भारी बोझ का उल्लेख किया गया था। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने इसका स्वतः संज्ञान लिया था। 26 फरवरी को अदालत ने किताब को तत्काल देशभर से वापस लेने का आदेश दिया। इसके बाद एनसीईआरटी को बिना शर्त माफी मांगनी पड़ी और पूरी किताब वापस लेनी पड़ी। केंद्र ने समीक्षा के लिए विशेषज्ञ समिति गठित की, जिसके बाद अध्याय को बदल दिया गया।
सिर्फ ढांचे, अधिकार क्षेत्र और डिजिटल पहलों पर जोर
नए अध्याय में न्यायपालिका के ढांचे, अधिकार क्षेत्र और डिजिटल पहलों को बताया गया है। वहीं भ्रष्टाचार, मुकदमों का बोझ, पहाड़ और जजों की कमी जैसे मुद्दे, जिन पर पिछला विवाद खड़ा हुआ था, नए पाठ से पूरी तरह बाहर हैं।
नए पाठ में क्या है
नया अध्याय मार्टिन लूथर किंग जूनियर के इस कथन से शुरू होता है कि कहीं भी अन्याय हर जगह के न्याय के लिए खतरा है। इसके बाद संविधान की प्रस्तावना में न्याय के वादे, अदालतों के पिरामिड, सर्वोच्च न्यायालय की 33 जमा एक की संख्या, जजों की योग्यता और सेवानिवृत्ति की उम्र को समझाया गया है। अनुच्छेद 142 की पूर्ण न्याय वाली शक्ति का भी ब्योरा दिया गया है। अध्याय में बार-बार यह बताया गया है कि न्यायपालिका विधायिका और कार्यपालिका से स्वतंत्र है।
सरकार का श्रेय, इतिहास की चूक
किताब में आजादी के बाद औपनिवेशिक दौर के सैकड़ों कानूनों को भेदभावपूर्ण बताया गया है और कहा गया है कि सरकार ने ऐसे 500 से ज्यादा कानून रद्द किए। उदाहरण के रूप में 1871 का आपराधिक जनजाति कानून दिया गया है।
मुकदमों का बोझ, पर बिना आंकड़े
देश की अदालतों में करोड़ों मुकदमे लंबित हैं, लेकिन नए अध्याय में इसका कोई आंकड़ा नहीं दिया गया है। समस्या केवल संकेत के रूप में सामने आती है। डिजिटल पहलों वाले हिस्से में ई-फाइलिंग, हाइब्रिड सुनवाई, सीधा प्रसारण और राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड का उल्लेख किया गया है। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य द्वार पर लगी वर्चुअल जस्टिस क्लॉक को पारदर्शिता और जवाबदेही की मिसाल बताया गया है।
अभ्यास प्रश्नों में बच्चों से कहा गया है कि वे स्वयं को विधायिका या कार्यपालिका का हिस्सा मानकर मुकदमों की बड़ी संख्या से निपटने के नए उपाय सुझाएं।
नियुक्ति में कॉलेजियम का जिक्र नहीं
जजों की नियुक्ति वाले हिस्से में किताब केवल संविधान के प्रावधानों को दोहराती है। उसके मुताबिक सर्वोच्च न्यायालय के जज राष्ट्रपति नियुक्त करते हैं। उच्च न्यायालय के जज राष्ट्रपति द्वारा मुख्य न्यायाधीश, राज्यपाल और संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श के बाद नियुक्त किए जाते हैं। इस हिस्से में कॉलेजियम प्रणाली का कोई जिक्र नहीं किया गया है।
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