28 हजार शिक्षामित्रों को मूल विद्यालय में वापसी का इंतजार, 2025 में शासनादेश होने के बावजूद जिलों में अब तक पालन नहीं
लखनऊ। प्रदेश में 28 हजार शिक्षामित्रों को मूल विद्यालय वापसी का इंतजार है। सिर्फ पांच जिलों में मात्र 2000 शिक्षामित्रों को ही इसका लाभ मिल सका है। आरोप है कि जनवरी 2025 में शासनादेश होने के बावजूद जिलों में अधिकारी मनमानी दिखा रहे हैं।
दरअसल, शिक्षामित्रों को शिक्षक बनाया गया था। वर्ष 2017 में इनका समायोजन रद्द कर इन्हें दोबारा शिक्षामित्र बनाया गया। जून 2018 में शिक्षामित्रों की मूल विद्यालय वापसी की गई, मगर तमाम शिक्षामित्र छूट गए। उसके बाद शिक्षामित्रों ने लगभग सात साल तक संघर्ष किया और जनवरी 2025 में शासनादेश जारी कर इन्हें अपने मूल विद्यालय भेजने के आदेश दिए गए।
यह अपने निवास स्थान की जिन ग्राम पंचायतों में शिक्षामित्र पद पर रखे गए थे वहीं इन्हें वापस भेजा जाना है। सबसे अधिक कठिनाई वह महिला शिक्षामित्र उठा रही हैं जिन्हें शादी के बाद दूसरे जिले में जाना पड़ा। अब वह अपने मायके वाले जिले में लंबी दूरी नापकर पढ़ाने आती है या उन्हें मायके में ही रहना पड़ रहा है। अब तक सिर्फ बाराबंकी, लखनऊ, अंबेडकरनगर, चित्रकूट और बरेली में ही शिक्षामित्रों को लाभ मिल सका है और वह अपने मूल विद्यालय वापस आ चुके हैं। बाकी जिलों में शिक्षामित्र परेशान हैं।
उप्र प्राथमिक शिक्षामित्र संघ के व प्रदेश महामंत्री सुशील कुमार यादव के कहते हैं कि शासन की मंशा पर प्र अधिकारी पानी फेर रहे हैं। शासनादेश जारी होने के एक साल 10 महीने बाद भी शिक्षामित्र परेशान हैं।
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