उच्च शिक्षा के क्षेत्रीय अधिकारियों की तैनाती को लेकर चर्चा तेज, शिक्षा निदेशालय में कार्यवाहक व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल
प्रयागराज। प्रदेश का उच्च शिक्षा निदेशालय प्रयागराज इन दिनों कार्यवाहक व्यवस्था के सहारे संचालित हो रहा है। उच्च शिक्षा निदेशक स्वयं कार्यवाहक के रूप में कार्यरत हैं। हाल ही में प्रदेश के विभिन्न मंडलों में 11 से अधिक क्षेत्रीय उच्च शिक्षा अधिकारियों की तैनाती भी अस्थायी एवं कार्यवाहक आधार पर किए जाने से विभागीय हलकों में चर्चा तेज हो गई है। कारण प्रोफेसर पदनाम वाले को स्थायी प्राचार्य के पद पर नियुक्ति दिया जाना शासनादेश का उल्लंघन है।
सूत्रों के अनुसार, शासन ने अगस्त 2025 में प्रदेश के मंडलों में क्षेत्रीय उच्च शिक्षा अधिकारी के पद सृजित करने का निर्णय लिया था। प्रमुख सचिव उच्च शिक्षा की ओर से जारी पत्र में स्पष्ट किया गया था कि इन पदों को उत्तर प्रदेश उच्चतर शिक्षा सेवा नियमावली-1985 के प्रावधानों के अनुरूप राजकीय महाविद्यालयों के प्राचार्यों के स्थानांतरण के माध्यम से भरा जाएगा।
हालांकि हाल में जारी तैनाती आदेशों में कई शिक्षकों को पदोन्नति की प्रतीक्षा के बीच अस्थायी रूप से क्षेत्रीय उच्च शिक्षा अधिकारी का दायित्व सौंपा गया है। आदेश में यह भी उल्लेख है कि प्राचार्य पद पर पदोन्नति बाधित होने के कारण यह व्यवस्था की गई है।
विभागीय सूत्रों का कहना है कि उच्चतर शिक्षा सेवा नियमावली-1985 के तहत प्रशासनिक संरचना में निदेशक, स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राचार्य, स्नातक महाविद्यालय के प्राचार्य और शिक्षक शामिल हैं। नियमों के अनुसार पदोन्नति की क्रमिक व्यवस्था निर्धारित है। ऐसे में कार्यवाहक तैनाती को लेकर सवाल उठ रहे हैं। विवाद की एक वजह वर्ष 2016 का शासनादेश भी बताया जा रहा है।
उस समय शासन ने निर्णय लिया था कि राजकीय एवं सहायता प्राप्त महाविद्यालयों के प्राचार्यों को प्राचार्य के साथ प्रोफेसर का पदनाम भी दिया जाएगा। शासन का तर्क था कि प्राचार्य और प्रोफेसर दोनों का वेतनमान एवं ग्रेड पे समान है।
प्राचार्य पद के लिए अपेक्षित अनुभव प्रोफेसर की तुलना में अधिक है। दरअसल पदनाम इसलिए समकक्ष मानने कि अनुमति प्रदान की गई, जिससे कि प्रोफेसर पदनाम न होने के कारण महाविद्यालयों के स्थायी प्राचार्य विभिन्न समितियों में सदस्य बनने से वंचित न रह जाएं। उधर, विभाग में लंबे समय से नियमित पदोन्नति न होने की भी चर्चा है। करीब आठ वर्षों से विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) की बैठक नहीं हो सकी है, जिससे नियुक्तियां लंबित हैं।
मार्च 2016 के शासनादेश के अनुसार प्राचार्य एवं प्रोफेसर का वेतनमान समान है। जो अधिकारी प्राचार्य के वेतनमान में कार्य कर रहे हैं, उन्हें ही क्षेत्रीय उच्च शिक्षा अधिकारी बनाया गया है। इसमें किसी नियम की अनदेखी नहीं की गई है। लंबे समय से पदोन्नति नहीं होने के कारण व्यावहारिक कठिनाइयां हैं। – डा. बीएल शर्मा, निदेशक उच्च शिक्षा
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