DISTRICT WISE NEWS

अंबेडकरनगर अमरोहा अमेठी अलीगढ़ आगरा इटावा इलाहाबाद उन्नाव एटा औरैया कन्नौज कानपुर कानपुर देहात कानपुर नगर कासगंज कुशीनगर कौशांबी कौशाम्बी गाजियाबाद गाजीपुर गोंडा गोण्डा गोरखपुर गौतमबुद्ध नगर गौतमबुद्धनगर चंदौली चन्दौली चित्रकूट जालौन जौनपुर ज्योतिबा फुले नगर झाँसी झांसी देवरिया पीलीभीत फतेहपुर फर्रुखाबाद फिरोजाबाद फैजाबाद बदायूं बरेली बलरामपुर बलिया बस्ती बहराइच बाँदा बांदा बागपत बाराबंकी बिजनौर बुलंदशहर बुलन्दशहर भदोही मऊ मथुरा महराजगंज महोबा मिर्जापुर मीरजापुर मुजफ्फरनगर मुरादाबाद मेरठ मैनपुरी रामपुर रायबरेली लखनऊ लखीमपुर खीरी ललितपुर लख़नऊ वाराणसी शामली शाहजहाँपुर श्रावस्ती संतकबीरनगर संभल सहारनपुर सिद्धार्थनगर सीतापुर सुलतानपुर सुल्तानपुर सोनभद्र हमीरपुर हरदोई हाथरस हापुड़

Saturday, January 31, 2026

यूपी कैबिनेट का बड़ा फैसला : 15 लाख शिक्षकों व कर्मियों को पांच लाख तक कैशलेस इलाज की सुविधा, सरकारी के साथ निजी अस्पतालों में भी करा सकेंगे इलाज

उत्तर प्रदेश : बड़ा शिक्षक वर्ग कैशलेस इलाज के निर्णय से छूटा

लखनऊ। कैशलेस इलाज की सुविधा से जुड़ा शिक्षा क्षेत्र का एक बड़ा वर्ग कैबिनेट निर्णय की परिधि से अछूता रह गया। महत्वपूर्ण बात यह है कि बीते पांच सितंबर को मुख्यमंत्री द्वारा की गई घोषणा में इस वर्ग को भी प्रमुखता से शामिल किया गया था।

गुरुवार को हुई कैबिनेट की बैठक में हुए निर्णय में इस वर्ग का कहीं भी कोई जिक्र नहीं होने से भारी नाराज़गी है। इसमें उच्च शिक्षा से जुड़े अशासकीय एडेड डिग्री कालेजों के शिक्षक एवं शिक्षणेत्तर कर्मियों के साथ-साथ स्ववित्त पोषित डिग्री कालेजों के शिक्षक के अलावा अल्प मानदेय वाले कस्तूरबा के चपरासी, चौकीदार एवं रसोइये शामिल हैं।

कैबिनेट ने बेसिक से लेकर माध्यमिक तक के शिक्षकों व शिक्षणेत्तर कर्मियों को यह सुविधा प्रदान करने के प्रस्ताव को स्वीकृति तो दी लेकिन उच्च शिक्षा के अनुदानित और स्ववित्तपोषित विद्यालयों के शिक्षक व शिक्षणेत्तर कर्मियों को शामिल नहीं किया गया।

स्ववित्तपोषित एवं एडेड डिग्री कालेजों के शिक्षकों का कहना है कि सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों में नियमित शिक्षकों की कमी के चलते निजी स्त्रोतों से रखे गए शिक्षक और शिक्षिकाएं लंबे समय से शिक्षण कार्य कर रहे हैं। उन्हें भी इस योजना में सम्मिलित करनाजरूरी है।

रिटायर शिक्षकों को भी कैशलेस सुविधा देने की मांगः उत्तर प्रदेश अवकाश प्राप्त माध्यमिक शिक्षक कल्याण एसोसिएशन ने सेवानिवृत शिक्षकों की वेदना का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री से रिटायर्ड शिक्षकों के लिए भी कैशलेस चिकित्सा की सुविधा दिलाए जाने का अनुरोध किया है।

इन संगठनों ने शासन को भेजा पत्र
उत्तर प्रदेश विश्वविद्यालय महाविद्यालय शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष प्रो. वीरेंद्र सिंह चौहान तथा लुआक्टा के अध्यक्ष डॉ मनोज पांडेय के अलावा उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षक संघ (ठकुराई गुट) के महामंत्री लालमणि द्विवेदी के साथ-साथ कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय शिक्षक-शिक्षणेत्तर यूनियन आल इन्डिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष अतुल कुमार बंसल ने शासन को पत्र भेजकर छूटे कर्मियों को भी इस योजना से जोड़ने की अपील की है।




यूपी कैबिनेट का बड़ा फैसला
15 लाख शिक्षकों व कर्मियों को पांच लाख तक कैशलेस इलाज की सुविधा,  सरकारी के साथ निजी अस्पतालों में भी करा सकेंगे इलाज

लखनऊ। प्रदेश में बेसिक व माध्यमिक शिक्षा विभाग के शिक्षकों को बड़ा तोहफा मिला है। 15 लाख से अधिक शिक्षकों, शिक्षणेतर कर्मचारियों व उनके आश्रितों को पांच लाख रुपये तक कैशलेस इलाज की सुविधा मिलेगी। लाभसरकारी और निजी अस्पताल दोनों में मिलेगा। बृहस्पतिवार को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक में इससे संबंधित प्रस्ताव को मंजूरी दी गई।

योजना के तहत कैशलेस इलाज की सुविधा सरकारी अस्पतालों के साथ-साथ साचीज से जुड़े निजी अस्पतालों में भी मिलेगी। इलाज की दरें प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत जन आरोग्य योजना और राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण द्वारा तय मानकों के अनुसार होंगी। इस फैसले के तहत लगभग 448 करोड़ रुपये का व्यय होगा।

बेसिक शिक्षा राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) संदीप सिंह ने बताया कि बेसिक शिक्षा परिषद के विद्यालयों व परिषद द्वारा मान्यता प्राप्त विद्यालयों (अनुदानित एवं स्ववित्त पोषित) में कार्यरत शिक्षकों, शिक्षामित्रों, विशेष शिक्षकों, अनुदेशकों, कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय में कार्यरत वार्डेन, पूर्ण कालिक, अंशकालिक शिक्षकों व पीएम पोषण योजना के तहत रसोइयों और उनके आश्रितों को भी इसका लाभ मिलेगा।

शिक्षक दिवस पर सीएम ने की थी घोषणा
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पांच सितंबर 2025 को शिक्षक दिवस पर शिक्षकों, शिक्षामित्रों, अनुदेशकों व रसोइयों को कैशलेस चिकित्सा सुविधा देने की घोषणा की थी। इस पर आवश्यक प्रक्रिया पूरी कर अब कैबिनेट ने मुहर लगा दी है। इसके बाद जल्द ही इसका शासनादेश जारी होगा और योजना को प्रभावी बनाया जाएगा।

बेसिक शिक्षा राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) संदीप सिंह ने बताया कि इस योजना से बेसिक शिक्षा परिषद के 11.95 लाख से अधिक शिक्षकों और कर्मचारियों को लाभमिलेगा। सरकार की इस विशेष पहल से प्रति कर्मचारी करीब 3000 रुपये सालाना प्रीमियम के हिसाब से कुल 358.61 करोड़ रुपये का वार्षिक खर्च अनुमानित है।

माध्यमिक शिक्षा राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) गुलाब देवी ने बताया कि विभाग के अनुदानित विद्यालयों के शिक्षकों (व्यावसायिक शिक्षा के विषय विशेषज्ञों व मानदेय शिक्षकों सहित),संस्कृत शिक्षा परिषद द्वारा मान्यता प्राप्त अनुदानित विद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों (मानदेय शिक्षकों सहित), माध्यमिक शिक्षा परिषद व संस्कृत शिक्षा परिषद के मान्यता प्राप्त स्ववित्तपोषित विद्यालयों के शिक्षकों और माध्यमिक शिक्षा विभाग के राजकीय व सहायता प्राप्त विद्यालयों में मानदेय पर कार्यरत व्यावसायिक शिक्षा के विषय विशेषज्ञों व उनके आश्रितों को यह सुविधा मिलेगी। सरकार की इस पहल का लाभ 2.97 लाख से अधिक लोगों को मिलेगा। इस पर 89.25 करोड़ का व्यय अनुमानित है।


स्ववित्तपोषित मान्यता प्राप्त विद्यालयों के शिक्षकों का होगा सत्यापन: बेसिक के स्ववित्तपोषित मान्यता प्राप्त विद्यालयों के शिक्षकों को सत्यापन के बाद योजना का लाभ मिलेगा। इसके लिए जिलों में जिला विद्यालय निरीक्षक और बेसिक शिक्षा अधिकारी की अध्यक्षता में कमेटी का गठन किया जाएगा। उनकी रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्यवाही की जाएगी।


बेसिक शिक्षा विभाग के अन्तर्गत कार्यरत उपर्युक्त शिक्षकों/कार्मिकों एवं उनके आश्रित परिवार के सदस्यों को कैशलेस चिकित्सा सुविधा अनुमन्य कराये जाने में प्रति कार्मिक अनुमानित रू0 3000/- वार्षिक प्रीमियम की दर से व्यय भार अनुमानित है। इससे लाभांवित होने वाले कुल कार्मिकों की संख्या- 11,95,391 के सापेक्ष धनराशि रू० 358.61 करोड़ का वार्षिक वित्तीय व्यय भार अनुमानित है। 

उक्त कैशलेस उपचार सुविधा योजना का क्रियान्वयन State Agency for Comprehensive health and integrated services (साचीज) के माध्यम से कराया जाना प्रस्तावित है। उक्त सुविधा राजकीय चिकित्सालयों तथा साचीज के साथ सम्बद्ध निजी चिकित्सालयों में अनुमन्य होगी, जिसकी दरें वही होगी जो प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत जन आरोग्य योजना तथा राष्ट्रीय स्वास्थ्य अभिकरण (NHA) द्वारा समय-समय पर संसूचित की जायेगी।



यूपी के शिक्षकों को योगी सरकार की सौगात, कैशलेस मेडिकल सुविधा का तोहफा किया कैबिनेट ने पास 

UP Teachers Cashless Medical: उत्तर प्रदेश में टीचर्स को योगी सरकार ने बड़ा तोहफा दिया है। संसदीय कार्यमंत्री सुरेश खन्ना ने बताया कि कैबिनेट बैठक के बाद 30 प्रस्ताव पर निर्णय हुआ। बेसिक शिक्षा विद्यालयों के टीचर्स को कैशलेस चिकित्सा सुविधा दी जाएगी। 11 लाख 95 हजार 391 टीचर्स को कैशलेस चिकित्सा सुविधा मिलेगी। इसमें 358.61 करोड़ रुपये की लागत आएगी। माध्यमिक शिक्षा विभाग के टीचर्स को भी कैशलेस चिकित्सा सुविधा मिलेगी। लगभग 3 लाख टीचर्स को ये सुविधा मिलेगी।






आज की कैबिनेट बैठक में मिल सकती शिक्षक-कर्मियों को कैशलेस इलाज के प्रस्ताव को मंजूरी 

लखनऊ। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में प्रदेश कैबिनेट की बैठक गुरुवार को होगी। इसमें 29 से अधिक प्रस्तावों को मंजूरी के लिए कैबिनेट के समक्ष रखा जाएगा। योगी सरकार माध्यमिक और बेसिक शिक्षकों, शिक्षामित्रों को बड़ा तोहफा देने जा रही है। इन्हें पांच लाख रुपये तक कैशलेस इलाज की सुविधा संबंधी प्रस्ताव को मंजूरी मिल सकती है।


प्रदेश के माध्यमिक शिक्षा विभाग के अधीन अशासकीय सहायता प्राप्त विद्यालयों के शिक्षकों तथा स्ववित्त पोषित माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षकों के साथ ही बेसिक शिक्षा विभाग के शिक्षकों, शिक्षामित्रों, अनुदेशकों, वार्डन, रसोइया व उनके आश्रित परिवार के सदस्यों को कैशलेस इलाज की सुविधा देने का प्रस्ताव है। इससे पांच लाख से अधिक शिक्षक व अन्य लाभान्वित होंगे। 

यूजीसी के नए कानूनों में समरसता की तैयारी, सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ध्यान में रखकर शिक्षा मंत्रालय व यूजीसी में नियम के नए स्वरूप को लेकर दिनभर चलीं बैठकें

यूजीसी के नए कानूनों में समरसता की तैयारी, सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ध्यान में रखकर शिक्षा मंत्रालय व यूजीसी में नियम के नए स्वरूप को लेकर दिनभर चलीं बैठकें

नई दिल्लीः विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के विवादित समता नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक और इसकी खामियों को दूर करने के स्पष्ट निर्देश के बाद शिक्षा मंत्रालय और यूजीसी में शुक्रवार को दिनभर बैठकों का दौर चला। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट के फैसले और उसकी टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए नियमों से जुड़ी खामियों को दूर करने पर विस्तार से मंथन हुआ। जो संकेत मिले हैं, उनसे साफ है कि नए समता नियमों में उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव को बढ़ावा देने वाले बिंदुओं से परहेज करते हुए एकता और समरसता बढ़ाने वाले बिंदुओं को प्रमुखता से शामिल किया जा सकता है।

अभी हालांकि यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि इसका स्वरूप क्या होगा। लेकिन माना जा रहा है कि मूल प्रारूप के अनुसार एससी-एसटी के साथ-साथ अब सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से पिछड़े छात्रों के प्रति भेदभाव की भी बात होगी। साथ ही गलत शिकायत पर कार्रवाई का प्रविधान भी वापस लाया जा सकता है। अब यह तय है कि नए नियमों में ऐसी कोई चीज नहीं रखी जाएगी, जिससे एक ही संस्थान में पढ़ने वाले बच्चों के बीच भेदभाव दिखे। साथ ही यदि भेदभाव का कोई भी मामला आता है तो उससे सख्ती से निपटा जाएगा।

इसके लिए एक मजबूत तंत्र बनाने पर भी विचार किया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट में मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च को निश्चित की गई है। सूत्रों के मुताबिक, शिक्षा मंत्रालय और यूजीसी में शीर्ष स्तर पर हुई बैठकों में समता नियमों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले और टिप्पणियों को सूचीबद्ध किया गया। साथ ही अब इन सभी बिंदुओं पर विशेषज्ञों और कानूनविदों के साथ चर्चा की जाएगी। जानकारों की मानें तो यदि इसे लेकर समाज के अलग-अलग वर्गों की ओर से किया जा रहा आंदोलन नहीं थमा तो इसे लेकर एक कमेटी गठित करके कुछ समय के लिए टाला भी जा सकता है। गौरतलब है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव मिटाने के लिए यूजीसी ने यह विधेयक 13 जनवरी, 2026 को अधिसूचित किया था।



यूजीसी के नए नियम विभाजनकारी, अस्पष्ट, दुरुपयोग की भी आशंका, सुप्रीम कोर्ट की रोक, सुनवाई पूरी होने तक 2012 की पुरानी नियमावली ही रहेगी प्रभावी

यह बेहद गंभीर मामला है। अगर हम दखल नहीं देंगे, तो समाज के लिए विभाजनकारी हो सकता है और इसके खतरनाक परिणाम हो सकते हैं। क्या हम जातिविहीन समाज की ओर बढ़ने के बजाय पीछे जा रहे हैं?... नियमों की भाषा प्रथमदृष्ट्या अस्पष्ट है। इसे स्पष्ट और संतुलित बनाने के लिए विशेषज्ञों को विचार करना चाहिए, ताकि इनका दुरुपयोग न हो सके। - सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए समता विनियम-2026 को लेकर चल रहे विवाद के बीच इन नियमों को समाज के लिए विभाजनकारी करार देते हुए क्रियान्वयन पर बृहस्पतिवार को रोक लगा दी। शीर्ष अदालत ने कहा, पहली नजर में इन नियमों की भाषा अस्पष्ट है और इनके दुरुपयोग की पूरी आशंका है। यदि इस मामले में हस्तक्षेप नहीं किया गया, तो इसके खतरनाक परिणाम होंगे। समाज बंट जाएगा और इसके गंभीर नतीजे होंगे।

मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा, 75 वर्षों के बाद, जातिविहीन समाज की दिशा में हमने जो कुछ भी हासिल किया है, क्या हम प्रतिगामी दिशा में जा रहे हैं? पीठ ने भारतीय शिक्षण संस्थानों में समावेशिता और एकता की रक्षा करने की जरूरत पर जोर दिया। पीठ ने केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी कर 19 मार्च तक जवाब तलब किया है। उन्होंने विनियम की जांच विशेषज्ञ समिति से कराने की भी जरूरत बताई। साथ ही, स्पष्ट किया कि अगले आदेश तक समता विनियम-2026 स्थगित रहेंगे और शैक्षणिक संस्थानों में 2012 की पुरानी नियमावली ही लागू रहेगी।

पुनर्समीक्षा जरूरी, केंद्र विधि विशेषज्ञों की समिति बनाए
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, इन नियमों की पुनर्समीक्षा बहुत जरूरी है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को पीठ ने सुझाव दिया कि नियमों की पुनर्समीक्षा के लिए प्रख्यात विधिवेत्ताओं की एक उच्चस्तरीय समिति बनानी चाहिए। समिति समाज की वास्तविकताओं और सामाजिक मूल्यों को ध्यान में रखते हुए नियमों पर पुनर्विचार करे। पीठ ने कहा, हमें यह भी देखना होगा कि कैंपस के भीतर लिए गए फैसलों का कैंपस के बाहर समाज पर क्या असर पड़ेगा। समाज का समग्र विकास तभी होगा, जब नियम समावेशी होंगे।

क्या भेदभाव के विशिष्ट रूप में रैगिंग शब्द को छोड़ देना, नए विनियम में प्रतिगामी व बहिष्कृत विधायी चूक है? यदि हां, तो क्या ऐसी चूक इन्साफ तक पहुंच में विषमता पैदा करके भेदभाव पीड़ितों के साथ असमान व्यवहार करती है? यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन नहीं है?

पीठ ने पूछा, सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों को रैगिंग से बचाने के लिए कोई प्रभावी तंत्र क्यों नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि यदि सामान्य वर्ग के किसी विद्यार्थी के साथ रैगिंग होती है या क्षेत्रीयता के आधार पर अपमानजनक व्यवहार होता है, तो नए नियमों में उसके संरक्षण के लिए कोई प्रभावी तंत्र क्यों नहीं है?

समानता के अधिकार का उल्लंघन: याचिकाकर्ताओं के वकील विष्णुशंकर जैन और अन्य ने दलील दी कि नई नियमावली का नियम 3(1) (सी) भेदभाव की सुरक्षा को केवल एससी/एसटी व ओबीसी वर्ग तक सीमित करता है। इसमें सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों से भेदभाव को पूरी तरह अनदेखा किया है। यह संविधान प्रदत्त समानता के अधिकार का सीधा उल्लंघन है।

हम अमेरिका जैसी व्यवस्था अपने यहां नहीं अपना सकते
सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, हम अमेरिका जैसी व्यवस्था यहां नहीं अपना सकते, जहां श्वेत और अश्वेत बच्चों के लिए अलग-अलग स्कूल हुआ करते थे। जस्टिस बागची ने भी सहमति जताते हुए कहा कि भारत की एकता का प्रतिबिंब हमारे शैक्षणिक संस्थानों में दिखना चाहिए, न कि वहां अलगाववाद को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।


शीर्ष कोर्ट ने विचार के लिए तय किए महत्वपूर्ण सवाल

क्या जाति-आधारित भेदभाव परिभाषित करने वाले उपनियम 3(सी) को शामिल करने का कोई उचित व तर्कसंगत संबंध है। खासकर इस तथ्य को देखते हुए कि जाति-आधारित भेदभाव से निपटने के लिए कोई अलग या विशेष प्रक्रियात्मक तंत्र तय नहीं किया है, जैसा कि उपनियम 3 (ई) के तहत दी भेदभाव की विस्तृत व समावेशी परिभाषा के विपरीत है?

क्या जाति-आधारित भेदभाव की शुरुआत और प्रक्रिया का अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्ग में सबसे पिछड़े वर्गों के मौजूदा सांविधानिक और वैधानिक उप-वर्गीकरण पर कोई असर पड़ेगा? क्या यह विनियम ऐसे अत्यंत पिछड़े वर्गों को भेदभाव और संरचनात्मक नुकसान के खिलाफ पर्याप्त और प्रभावी सुरक्षा उपाय है?

छात्रावास के नाम पर बंटवारे को लेकर नाराजगी, कहा-भगवान के लिए ऐसा न करें: पीठ ने नए नियमों के उन प्रावधानों पर कड़ी आपत्ति जताई, जो कैंपस के भीतर जातिगत आधार पर विभाजन का संकेत देते हैं। अलग-अलग जातियों के लिए अलग हॉस्टल के विचार पर सीजेआई सूर्यकांत ने सख्त लहजे में कहा, भगवान के लिए ऐसा मत कीजिए। हम सब सदियों से साथ रहते आए हैं, हमारे समाज में अंतरजातीय विवाह तक होते हैं। क्या हम एक जातिविहीन समाज की ओर बढ़ने के बजाय पीछे जा रहे हैं?

क्या उपनियम 7 (डी) में अलगाव शब्द को शामिल करना, छात्रावास, कक्षा, मेंटरशिप ग्रुप या ऐसी ही शैक्षणिक वा आवासीय व्यवस्था के आवंटन के संदर्भ में, भले ही पारदर्शी और गैर-भेदभावपूर्ण मानदंडों पर हो, अलग पर समान वर्गीकरण के बराबर होगा? इससे अनुच्छेद 14, 15 और संविधान की प्रस्तावना के तहत समानता और भाईचारे की सांविधानिक गारंटी का उल्लंघन होगा?



यूजीसी नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की पीठ करेगी सुनवाई, तीन याचिकाएं हुई हैं दाखिल

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के समानता विनियमन-2026 के प्रावधान को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर बृहस्पतिवार को सुनवाई करेगा। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत एवं जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ यह सुनवाई करेगी। यूजीसी नियमों के विरोध में तीन याचिकाएं शीर्ष कोर्ट आई हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि नियमों में जाति आधारित भेदभाव की गैर समावेशी परिभाषा दी गई है, जिसमें कुछ वर्गों को संस्थागत संरक्षण से बाहर रखा गया है।

सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत और जॉयमाल्या बागची की पीठ ने बुधवार को याचिकाकर्ता वकील विनीत जिंदल की तत्काल सुनवाई की मांग वाली दलीलों पर गौर किया। याचिकाकर्ता ने कहा, तत्काल सुनवाई की जरूरत इसलिए है, क्योंकि इन नियमों में कुछ प्रावधान ऐसे हैं जिनसे सामान्य वर्ग के साथ भेदभाव किया जा सकता है। इस पर सीजेआई ने कहा, हमें पता है कि क्या हो है। आप अपना केस नंबर दीजिए और यह सुनिश्चित करें कि याचिका में कमियां दूर कर दी गई हैं। हम इसे सूचीबद्ध करेंगे। 

याचिका में नियम 3 (सी) को असांविधानिक करार देने की मांग की गई है। नियम 3 (सी) के अनुसार, जाति आधारित भेदभाव का अर्थ सिर्फ अनुसूचित जाति-जनजाति व ओबीसी के सदस्यों के खिलाफ जाति या जनजाति के आधार पर किया गया भेदभाव है। यह परिभाषा गैर एससी, एसटी व ओबीसी के लोगों को संस्थागत संरक्षण व शिकायत निवारण के अधिकार से वंचित करती है।


भेदभाव की परिभाषा समावेशी हो

याचिका में तर्क है कि मौजूदा प्रावधान जाति-निरपेक्ष नहीं है। याचिकाकर्ता की मांग है कि जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा को संविधान के अनुरूप व समावेशी बनाया जाए, ताकि किसी व्यक्ति को जाति के आधार पर भेदभाव का सामना करने पर समान संरक्षण मिल सके। उसने आग्रह किया, जब तक नियम 3 (सी) पर पुनर्विचार नहीं हो जाता, तब तक क्रियान्वयन से रोका जाए। जाति के आधार पर शिकायत निवारण से वंचित करना अस्वीकार्य भेदभाव घोषित किया जाए।

यूजीसी ने 13 जनवरी को अधिसूचित किए नियमों के तहत उच्च शिक्षा संस्थानों को परिसर में भेदभाव संबंधी शिकायतों की जांच करने और समानता को बढ़ावा देने के लिए समानता समितियां गठित करनी होंगी। इन समितियों में अन्य ओबीसी, एससी, एसटी, दिव्यांगजन और महिलाओं के प्रतिनिधित्व को अनिवार्य बनाया गया है। ये नियम 2019 में दायर जनहित याचिका के बाद बनाए गए थे। याचिका रोहित वेमुला और पायल तड़वी की मांओं ने दी थी। दोनों ने कथित तौर पर विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव के कारण आत्महत्या कर ली थी।



विश्वविद्यालयों में नहीं होगा किसी तरह का भेदभाव, यूजीसी के निर्देश पर होगी समान अवसर केंद्र की स्थापना

लखनऊ। देश के सरकारी, निजी और डीम्ड विश्वविद्यालयों में अब जाति, धर्म, लिंग, जन्म स्थान या दिव्यांगता के आधार पर किसी भी तरह का भेदभाव नहीं किया जाएगा। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के निर्देशों के तहत सभी उच्च शिक्षा संस्थानों में समान अवसर केंद्र और समता समिति की स्थापना अनिवार्य की जा रही है। इसके लिए प्रदेशों के विश्वविद्यालयों में भी तैयारियां शुरू कर दी गई हैं।

यूजीसी ने हाल ही में समता के लिए संवर्धन विनियम-2026 जारी किए हैं। इनके तहत अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर और दिव्यांग छात्रों व कर्मचारियों के अधिकारों और सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। हर विवि और कॉलेज में समान अवसर केंद्र वंचित वर्ग के छात्रों और कर्मचारियों को आवश्यक सहयोग उपलब्ध कराएगा। इसके साथ ही समता समिति का गठन किया जाएगा, जिसमें शिक्षक, कर्मचारी और छात्र प्रतिनिधि शामिल होंगे। यह समिति भेदभाव से जुड़ी शिकायतों की जांच कर कार्रवाई सुनिश्चित करेगी। यूजीसी ने शिकायत निवारण के लिए हेल्पलाइन और ऑनलाइन व्यवस्था शुरू करना भी अनिवार्य किया है। 









प्रदेश के कौशल विकास केंद्रों में अखबार से अपडेट होंगे युवा, समाचार पत्र पठन-पाठन हुआ अनिवार्य

प्रदेश के कौशल विकास केंद्रों में अखबार से अपडेट होंगे युवा, समाचार पत्र पठन-पाठन हुआ अनिवार्य 

रोजाना कम से कम एक हिंदी व एक अंग्रेजी अखबार कराना होगा उपलब्ध

लखनऊ। प्रदेश के बेसिक, माध्यमिक व अटल आवासीय विद्यालयों के साथ ही अब कौशल विकास मिशन के प्रशिक्षण केंद्रों के युवा भी अखबारों से खुद को अपडेट कर सकेंगे। सभी 75 जिलों में संचालित 800 से अधिक कौशल प्रशिक्षण केंद्रों पर अखबार का पठन-पाठन अनिवार्य किया गया है। इससे युवा कौशल विकास के साथ देश-दुनिया की घटनाओं, समसामयिक विषयों और सामान्य ज्ञान से भी नियमित रूप से जुड़ेंगे। वर्तमान में यहां पर एक लाख से अधिक युवा विभिन्न ट्रेड में प्रशिक्षण ले रहे हैं।


व्यावसायिक शिक्षा, कौशल विकास और उद्यमशीलता राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) कपिल देव अग्रवाल ने बताया कि इस निर्णय का उद्देश्य प्रशिक्षणार्थियों की रोजगार क्षमता बढ़ाने के साथ उनमें आत्मविश्वास, संवाद कौशल और विश्लेषणात्मक सोच का विकास करना है। इसके अंतर्गत कौशल विकास केंद्रों, दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना और प्रोजेक्ट प्रवीण सहित सभी योजनाओं के तहत संचालित बैचों में कक्षा की शुरुआत समाचार पत्र पठन से होगी।

इसके लिए प्रशिक्षण प्रदाताओं (टीपी) और प्रोजेक्ट इम्प्लीमेंटेशन एजेंसियों (पीआईए) को अपने-अपने केंद्रों पर रोजाना कम से कम एक हिंदी और एक अंग्रेजी अखबार अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराना होगा।


सामान्य ज्ञान बढ़ेगा, भाषा शैली सुधरेगी

कौशल विकास मिशन निदेशक पुलकित खरे ने कहा कि अखबार पढ़ने से प्रशिक्षार्थियों के सामान्य ज्ञान व करंट अफेयर्स की जानकारी में बढ़ेगी। यह सरकारी व निजी क्षेत्र की नौकरियों में चयन के लिए जरूरी है। समाचारों के विश्लेषण से युवाओं में समालोचनात्मक चिंतन विकसित होगा, इससे वे निर्णय लेने में अधिक सक्षम बनेंगे। वहीं, पहेलियों, सांस्कृतिक लेखों व प्रेरक कथाओं से एकाग्रता, धैर्य व संवेदनशीलता जैसे गुण भी विकसित होंगे।

निरीक्षण : खरे ने बताया कि यह आदेश तत्काल प्रभाव से जिला समन्वयक व अन्य अधिकारी करेंगे नियमित लागू कर दिया गया है। इसकी निगरानी के लिए जिला समन्वयक, एमआईएस मैनेजर व अन्य अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे हर महीने के निरीक्षण में विशेष समीक्षा कर रिपोर्ट में इसका उल्लेख करें। इसे प्रशिक्षण प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा माना जाएगा।

डीएलएड अभ्यर्थियों को परीक्षा का अतिरिक्त अवसर न देने पर निदेशक तलब, हाईकोर्ट ने कहा- किसी आदेश के खिलाफ अपील लंबित होना उसके अनुपालन में छूट का आधार नहीं

डीएलएड अभ्यर्थियों को परीक्षा का अतिरिक्त अवसर न देने पर निदेशक तलब, हाईकोर्ट ने कहा- किसी आदेश के खिलाफ अपील लंबित होना उसके अनुपालन में छूट का आधार नहीं

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आदेश के बावजूद डीएलएड अभ्यर्थियों को परीक्षा का अतिरिक्त अवसर न देने पर राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एससीईआरटी) की निदेशक सरिता तिवारी व अन्य अधिकारियों को अवमानना का दोषी मानते हुए 16 फरवरी को तलब किया है। कोर्ट ने कहा कि किसी आदेश के खिलाफ अपील लंबित होना, उसके अनुपालन में छूट का आधार नहीं बन जाता, जब तक उस पर कोई स्थगन आदेश न हो।


यह आदेश न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल की एकल पीठ ने याची शीतल की ओर से दाखिल अवमानना याचिका पर दिया है। मामला उन डीएलएड अभ्यर्थियों से जुड़ा है जो पहले परीक्षा में शामिल होने से वंचित रह गए थे। 6 जुलाई 2023 को हाईकोर्ट की एकल पीठ ने याची साक्षी की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए परीक्षा से वंचित अभ्यर्थियों को अतिरिक्त अवसर देने का आदेश दिया था।

अधिकारियों ने आश्वासन दिया था कि इसके लिए पोर्टल खोला जाएगा और आवेदन स्वीकार किए जाएंगे, लेकिन महीनों बीतने के बाद भी पोर्टल नहीं खोला गया। इसके खिलाफ याचियों ने अवमानना याचिका दाखिल की। अधिकारियों की ओर से तर्क दिया गया कि आदेश के खिलाफ अपील दाखिल की गई है।

हालांकि, कोर्ट ने इस तर्क को मानने से इन्कार कर दिया। कोर्ट ने इसे प्रथम दृष्टया अवमानना का मामला मानते हुए अधिकारियों को ने तलब किया है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया है कि अगर अगली सुनवाई से पहले आदेश का अनुपालन कर दिया जाता है तो अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से पेश नहीं होना पड़ेगा। उन्हें केवल अनुपालन हलफनामा दाखिल करना होगा।

सुप्रीम कोर्ट : सभी स्कूलों में सैनेटरी पैड मुफ्त मिले, सुप्रीम कोर्ट ने 'मासिक धर्म स्वास्थ्य' को मौलिक अधिकार करार दिया, लापरवाही पर स्कूलों की मान्यता निरस्त होगी

सुप्रीम कोर्ट : सभी स्कूलों में  सैनेटरी पैड मुफ्त मिले, सुप्रीम कोर्ट ने 'मासिक धर्म स्वास्थ्य' को मौलिक अधिकार करार दिया, लापरवाही पर स्कूलों की मान्यता निरस्त होगी

 126 पन्नों के फैसले में राज्यों-केंद्र शासित प्रदेशों को को आदेश

कक्षा 6 से 12 तक की छात्राओं को निशुल्क सैनिटरी पैड देना होगा

तीन माह के भीतर जारी दिशा-निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने का आदेश


नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में 'मासिक धर्म स्वास्थ्य' को मौलिक अधिकार करार दिया। साथ ही देश के सभी स्कूलों (चाहे सरकारी हों या निजी) में कक्षा 6 से 12 तक की छात्राओं को निशुल्क सैनिटरी पैड देने का आदेश दिया। अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को किशोर लड़कियों के लिए सभी स्कूलों में केंद्र सरकार की राष्ट्रीय नीति यानी 'स्कूल जाने वाली लड़कियों के लिए मासिक धर्म स्वच्छता नीति' को प्रभावी तरीके से लागू करने के निर्देश दिए हैं।


जस्टिस जेबी पारदीवाला और आर महादेवन की पीठ ने 126 पन्नों के फैसले में कहा, अनुच्छेद 21 के तहत मासिक धर्म स्वास्थ्य का अधिकार, जीवन के अधिकार का हिस्सा है। पीठ ने देश के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के सभी स्कूलों में किशोरियों को मुफ्त बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराने का आदेश देने के साथ-साथ स्कूलों में छात्र-छात्राओं के लिए सुविधाओं से युक्त शौचालयों की व्यवस्था करने का निर्देश दिया है। 

अदालत ने 2022 में जया ठाकुर की ओर से दाखिल जनहित याचिका पर यह फैसला सुनाया, जिसमें देशभर में स्कूली छात्राओं को निशुल्क सैनिटरी पैड उपलब्ध कराने और स्वच्छ शौचालयों की व्यवस्था करने की मांग की गई थी। जस्टिस पारदीवाला ने कहा, यह घोषणा सिर्फ कानूनी तंत्र से जुड़े लोगों के लिए नहीं, बल्कि उन कक्षाओं के लिए भी है जहां लड़कियां मदद मांगने में हिचकिचाती हैं। यह उन शिक्षकों के लिए भी है, जो मदद करना चाहते हैं लेकिन संसाधनों की कमी के कारण असमर्थ हैं। 

शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि वह यह नहीं कह रही है कि मौजूदा समय में कुछ राज्य सरकारों द्वारा उठाए गए कदमों को इन निर्देशों के मद्देनजर बंद कर दिया जाए, बल्कि ये निर्देश केंद्र सरकार द्वारा तैयार मासिक धर्म स्वच्छता नीति के साथ मिलकर अनिवार्य मानकों के रूप में काम करेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को 3 महीने की अवधि के भीतर जारी दिशा-निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने का आदेश दिया है।


राज्य-केंद्र शासित प्रदेशों के लिए जारी दिशा-निर्देश

शहरी-ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों में एएसटीएम डी-6954 मानकों के अनुसार निर्मित ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन मुफ्त में उपलब्ध कराए जाएं।

नैपकिन शौचालय परिसर के भीतर वेंडिंग मशीनों से या किसी निर्दिष्ट स्थान के जरिए आसानी उपलब्ध कराए जाएं।

हर स्कूल में मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन कॉर्नर स्थापित किए जाएं। इसमें अतिरिक्त अंडरवियर यूनिफॉर्म, पैड आदि होना चाहिए।

सभी स्कूलों में छात्र-छात्राओं के लिए अलग-अलग शौचालय हों, जिनमें हर समय पानी उपलब्ध हो।

स्कूलों में सभी मौजूदा और नए शौचालय ऐसे डिजाइन किए जाएं, कि गोपनीयता, पहुंच सुनिश्चित हो सके, जिसमें दिव्यांग बच्चों की जरूरत भी पूरी की जा सके।

सभी स्कूलों के शौचालयों में हर समय साबुन और पानी की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए



संविधान में समानता के अधिकार का उल्लंघन

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, स्कूलों में लड़के-लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालयों की अनुपलब्धता और पैड तक पहुंच न होना किशोर लड़कियों के समानता के अधिकार का उल्लंघन है। पीठ ने कहा, जागरूकता का अभाव न केवल लड़की के शिक्षा में भाग लेने के अधिकार में बाधा डालता है, बल्कि प्रतिस्पर्धा, क्षमता साकार के अधिकार में रुकावट पैदा करता है।


जीवन का अधिकार है...

पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में मासिक धर्म स्वास्थ्य का अधिकार भी है। कहा गया कि सुरक्षित, स्वच्छ मासिक धर्म प्रबंधन उपायों की अनुपस्थिति किशोर छात्राओं को या तो कक्षा से अनुपस्थित रहने या असुरक्षित तरीके अपनाने या दोनों के लिए मजबूर करती है, जिससे गरिमापूर्ण अस्तित्व प्रभावित होता है और यह मासिक धर्म से गुजर रही लड़की की शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन है।




Friday, January 30, 2026

आर्थिक सर्वेक्षण ने शिक्षा को नए रास्ते पर चलने की दिखाई राह, ड्रॉप आउट खत्म करना होगी बड़ी चुनौती, स्कूली शिक्षा 15 वर्ष करने की सलाह

स्कूली शिक्षा 15 वर्ष करने की सलाह

नई दिल्ली । आर्थिक सर्वेक्षण में चेतावनी देते हुए भारत में अपेक्षित स्कूली शिक्षा अवधि को मौजूदा 13 से बढ़ाकर 15 वर्ष करने की सलाह दी गई है। 2024 में भारत की 27% आबादी स्कूल जाने की उम्र (3–18 वर्ष) में थी। 2047 तक भी यह हिस्सा 20% से ज्यादा बना रहेगा। भारत का शिक्षा सूचकांक अब भी वैश्विक स्तर पर कमजोर है। वजह है बच्चों की औसत अपेक्षित पढ़ाई के साल, जो भारत में कई विकसित व उभरती अर्थव्यवस्थाओं से कम हैं।

भारत में अभी औसत अपेक्षित पढ़ाई 13 वर्ष है। जबकि चीन में 15.5 वर्ष , ब्राजील में 15.8 वर्ष, जापान में 15.5 वर्ष , जर्मनी में 17.3 वर्ष और अमेरिका में 15.9 वर्ष है। रूस में 13.2 और इंडोनेशिया में औसत अपेक्षित स्कूलिंग 13.3 वर्ष है। यह दोनों देश भारत से थोड़ा बेहतर हैं जबकि अन्य देशों की तुलना में भारत को लंबी छलांग लगाने की जरूरत है।

सर्वे में कहा गया कि स्कूल शिक्षा विकसित भारत 2047 की ओर देश के विकास पथ को आकार देने में महत्वपूर्ण है। तेजी से बढ़ती एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के अनुभव साफ दिखाते हैं कि शिक्षा, कौशल विकास और टेक्नोलॉजी में लगातार निवेश से उत्पादकता में काफी सुधार हो सकता है और आर्थिक बदलाव में तेजी आ सकती है।

सर्वे में कहा गया है कि अगर स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता और बच्चों की पढ़ाई की निरंतरता नहीं बढ़ाई गई, तो युवा आबादी का यह लाभ भविष्य में चुनौती भी बन सकता है।


आर्थिक सर्वेक्षण ने शिक्षा को नए रास्ते पर चलने की दिखाई राह, ड्रॉप आउट खत्म करना होगी बड़ी चुनौती

आर्थिक सर्वेक्षण ने शिक्षा क्षेत्र की चुनौतियों पर प्रकाश डाला है, जिसमें उच्च ड्रॉपआउट दर और उच्च शिक्षा में कम जीईआर शामिल हैं। प्राथमिक स्तर पर 1.9% से माध्यमिक स्तर पर 14.1% तक ड्रॉपआउट चिंताजनक है, जबकि उच्च शिक्षा का जीईआर 28% है। सर्वेक्षण 2030 और 2035 के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रयासों में तेजी लाने, संस्थानों की क्षमता बढ़ाने और बहु-विषयक शिक्षा पर जोर देता है।

प्राथमिक स्तर पर 1.9% और माध्यमिक पर 14.1% ड्रॉपआउट दर।

उच्च शिक्षा का सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) अभी भी 28%।

2030-35 तक जीईआर लक्ष्य हेतु प्रयास तेज करने की जरूरत।


नई दिल्ली। सबको अच्छी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने की दिशा में भले ही केंद्र व राज्य सरकारों ने पिछले सालों में कई बड़े कदम उठाए हैं, लेकिन इसके बाद भी स्कूली शिक्षा के सामने ड्राप आउट खत्म करने और उच्च शिक्षा के सामने अपने जीईआर को बढ़ाने की बड़ी चुनौती अभी भी बरकरार है।

मौजूदा समय में प्राथमिक स्तर पर ड्रापआउट की दर 1.9 प्रतिशत, उच्च प्राथमिक स्तर पर 5.2 प्रतिशत व माध्यमिक स्तर पर 14.1 प्रतिशत है। वहीं उच्च शिक्षा का सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) अभी भी करीब 28 प्रतिशत है।

क्या चिंता जताई गई?
आर्थिक सर्वेक्षण में यह चिंता तब जताई गई है, जब 2030 तक स्कूली शिक्षा के जीईआर को सभी स्तरों तक शत -प्रतिशत करने और उच्च शिक्षा के जीईआर को 2035 तक 50 प्रतिशत करने का लक्ष्य है। ऐसे में सर्वेक्षण में इस दिशा में रफ्तार तेज करने की जरूरत जताई गई है।

सर्वेक्षण के मुताबिक अभी भी स्कूली शिक्षा में बारहवीं का जीईआर 58.4 प्रतिशत है वहीं पहली से पांचवीं कक्षा तक की जीईआर 90.9 प्रतिशत है। इससे साफ है कि बड़ी संख्या में बच्चे बारहवीं तक आते-आते पढ़ाई अभीभी छोड़ देते है। इसका कारण बोर्ड परीक्षाओं में फेल होने सहित बड़ी संख्या में बच्चों की आर्थिक स्थिति का ठीक न होना भी होता है।

ऐसे में वह मेहनत-मजदूरी जैसे कामों में लग जाते हैं। शिक्षा मंत्रालय इस समस्या से निपटने की दिशा में काम कर रहा है, लेकिन सर्वेक्षण में उनके प्रयासों को नाकाफी बताते हुए इनमें और तेजी लाने की राह दिखाई गई है।इसी तरह उच्च शिक्षा के जीईआर को भी 50 प्रतिशत करने के लिए उच्च शिक्षण संस्थानों की क्षमता बढ़ाने की पहल तेज हुई है।


IIT जैसे संस्थानों ने की पहल
2040 तक सभी उच्च शिक्षण संस्थानों को बहु विषयक संस्थान के रूप में तैयार करने पर जोर दिया गया है। इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट या सिर्फ शिक्षक शिक्षा देने वाले संस्थानों को सभी विषयों से जुड़े कोर्स शुरूकरने के लिए कहा गया है।

इस दिशा में आइआइटी जैसे संस्थानों में पहल भी की है, हालांकि इसके लिए संस्थानों को बड़ा इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करना होगा। सर्वेक्षण में इनमें भी तेजी लाने की जरूरत बताई गई है। सर्वेक्षण में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति ( एनईपी) आने के बाद शिक्षा क्षेत्र में सुधार की दिशा में उठाए गए कदमों पर संतोष जताया गया है।

UPTET परीक्षा की संरचना और पाठ्यक्रम जारी, 150 अंक की होगा पेपर, सहायक अध्यापक भर्ती परीक्षा का पाठ्‌यक्रम भी जारी, करें डाउनलोड

UPTET परीक्षा की संरचना और पाठ्यक्रम जारी, 150 अंक की होगा पेपर, सहायक अध्यापक भर्ती परीक्षा का पाठ्‌यक्रम भी जारी


🛑 UPESSC : उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग द्वारा परीक्षा संरचना और पाठ्यक्रम करें डाउनलोड 





 प्रयागराज । उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग ने शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) 2026 के आयोजन की तिथि दो, तीन व चार जुलाई निर्धारित करने के बाद अब परीक्षा आयोजन के लिए उसकी संरचना और पाठ्यक्रम भी निर्धारित कर दिया है। इसे आयोग की वेबसाइट पर https://www.upessc.up.gov.in जारी कर दिया गया है। प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तर की टीईटी आयोजन की अवधि ढाई-ढाई घंटे होगी। दोनों में बहुविकल्पीय प्रश्न पूछे जाएंगे। कुल 150 प्रश्न होंगे, जो एक-एक अंक के रहेंगे। इस तरह 150-150 अंक की परीक्षा होगी। मूल्यांकन में निगेटिव मार्किंग नहीं की जाएगी।

प्राथमिक स्तर (कक्षा एक से पांच तक के लिए) की टीईटी के लिए पांच खंड यानी बाल विकास एवं शिक्षण विधि, भाषा प्रथम (हिंदी), भाषा द्वितीय (अंग्रेजी/उर्दू /संस्कृत), गणित तथा पर्यावरणीय विषय से प्रश्न पूछे जाएंगे। प्रत्येक खंड से 30-30 प्रश्न होंगे और सभी अनिवार्य होंगे। इस तरह कुल 150 प्रश्न पूछे जाएंगे। इसके अलावा उच्च प्राथमिक स्तर (कक्षा छह से आठ तक के लिए) की टीईटी में चार खंड से प्रश्न पूछे जाएंगे। इसमें भी प्राथमिक स्तर की तरह बाल विकास एवं शिक्षण विधि के साथ-साथ भाषा से जुड़े 30-30 प्रश्न होंगे, जो एक-एक अंक के रहेंगे। चौथे खंड में (क) गणित एवं विज्ञान शिक्षक के लिए गणित/विज्ञान, (ख) सामाजिक अध्ययन या सामाजिक विज्ञान शिक्षक के लिए सामाजिक अध्ययन तथा अन्य किसी शिक्षक के लिए (क अथवा ख खंड से) 60 प्रश्न होंगे।


सहायक अध्यापक भर्ती परीक्षा का पाठ्‌यक्रम भी जारी: शिक्षा सेवा चयन आयोग ने सुपर टेट (सहायक अध्यापकों की भर्ती परीक्षा) की संरचना व विषयवस्तु भी वेबसाइट पर जारी किया है। प्राथमिक स्तर के लिए भर्ती परीक्षा ढाई घंटे को होगी, जिसमें 150 प्रश्न पूछे जाएंगे। सभी प्रश्न एक सही उत्तर के साथ चार विकल्प वाले होंगे। प्रत्येक प्रश्न एक अंक का होगा। प्रश्नपत्र अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषा में होंगे। आयोग के उप सचिव/जनसंपर्क अधिकारी संजय कुमार सिंह ने बताया कि उच्च प्राथमिक की भर्ती के पाठ्यक्रम का अनुमोदन अभी आयोग से नहीं हुआ है।

समस्त स्टेकहोल्डर विभागों द्वारा राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा माह को "जीरो फैटेलिटी माह के रूप में मनाए जाने के सम्बन्ध में दिशा निर्देश निर्गत

राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा माह (दिनांक 01 जनवरी, 2026 से दिनांक 31 जनवरी, 2026 तक) आयोजित किये जाने के सम्बन्ध में।

समस्त स्टेकहोल्डर विभागों द्वारा राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा माह को "जीरो फैटेलिटी माह के रूप में मनाए जाने के सम्बन्ध में दिशा निर्देश निर्गत 




Thursday, January 29, 2026

तदर्थ और कार्यवाहक प्रधानाचार्यों को प्रधानाचार्य पद का वेतन देय नहीं – हाईकोर्ट, देखें कोर्ट ऑर्डर

तदर्थ और कार्यवाहक प्रधानाचार्यों को प्रधानाचार्य पद का वेतन देय नहीं – हाईकोर्ट,  देखें कोर्ट ऑर्डर 

तदर्थ प्रधानाचार्यों को मिल चुके वेतन की वसूली नहीं लेकिन आगे नहीं मिलेगा

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि तदर्थ और कार्यवाहक प्रधानाचार्यों को प्रधानाचार्य पद का वेतन देय नहीं है क्योंकि नए अधिनियम में कोई प्रावधान नहीं है।

 कोर्ट ने कहा कि 1982 के अधिनियम की धारा 18 में उल्लिखित पूर्व-शर्तों का पालन किया जाना अनिवार्य है। उन शर्तों के पूरा होने के बाद ही ऐसा तदर्थ पदोन्नत व्यक्ति प्रधानाचार्य के पद के वेतन का हकदार होगा। यह भी कहाकि पहले नियुक्त तदर्थ प्रधानाचार्यों से वेतन की वापसी न की जाए। यह आदेश न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी ने इस मुद्दे को लेकर समिता सहित कई अन्य की याचिकाओं पर उठे कानूनी प्रश्न और संदर्भ का निस्तारण करते हुए दिया है।

सभी याचिकाएं निरस्त
कोर्ट ने याचिकाएं निस्तारित करते हुए निर्देश दिया कि संबंधित डीआईओएस हर मामले के तथ्य जांचेंगे। कोर्ट ने आगे कहा कि यदि रिक्ति अधिसूचित नहीं की गई थी तो ऐसा तदर्थ प्रधानाचार्य उस पद के वेतन का हकदार नहीं होगा। ऐसे मामले में कॉलेज इस निर्णय की तिथि से चार सप्ताह के भीतर रिक्ति को अधिसूचित करेगा।

नए नियम लागूः कोर्ट

 कोर्ट ने कहा कि अब उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन नियमावली 2023  लागू हो गई है और 1982 का अधिनियम निरस्त कर दिया गया है। 2023 के अधिनियम में तदर्थ प्रधानाचार्यों के लिए कोई प्रावधान नहीं है। 1921 के अधिनियम और उसके नियमों के तहत तदर्थ प्रधानाचार्य को वेतन देने का कोई प्रावधान नहीं है इसलिए इसके कानूनी परिणाम लागू होंगे।


देखें कोर्ट ऑर्डर के कार्यकारी हिस्से 👇


Wednesday, January 28, 2026

स्कूल की मान्यता रद्द होने पर शिक्षक अन्य स्कूलों में समायोजन का दावा नहीं कर सकते : हाईकोर्ट

स्कूल की मान्यता रद्द होने पर शिक्षक अन्य स्कूलों में समायोजन का दावा नहीं कर सकते : हाईकोर्ट


प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि स्कूल की मान्यता रद्द होने पर कार्यरत शिक्षक और कर्मचारी किसी अन्य संस्थान में समायोजन या स्थानांतरण का दावा नहीं कर सकते। यह टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने स्कूल की मान्यता रद्द होने पर समायोजन की मांग को लेकर कर्मचारियों की ओर से दायर याचिका का निस्तारण कर दिया। यह आदेश न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकलपीठ ने चंद्र प्रकाश सिंह और चार अन्य की याचिका पर दिया है।


गोरखपुर के बाबा सूर्य नारायण दास लघु माध्यमिक विद्यालय का भवन और खेल मैदान ग्राम सभा की भूमि पर होने के चलते वर्ष 2018 में इसकी मान्यता रद्द कर दी गई थी। शिक्षकों व कर्मचारियों ने अन्य सहायता प्राप्त स्कूलों में समायोजित करने और उनका रुका हुआ वेतन जारी करने की मांग की। संबंधित अधिकारियों ने कोई सुनवाई नहीं की तो उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

याची अधिवक्ता ने दलील दी कि ऐसे ही अन्य मामलों में शिक्षकों को समायोजित किया गया है। ऐसे में समानता के आधार पर उन्हें भी समायोजित किया जाना चाहिए। कोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद कहा कि किसी एक मामले में हुई अवैधता या गलती दूसरे व्यक्ति को वैसा ही लाभपाने का कानूनी अधिकार नहीं देती। नियमानुसार मान्यता रद्द होने की स्थिति में शिक्षकों के स्थानांतरण या समायोजन का कोई प्रावधान नहीं है। 


हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को जारी किया निर्देश : हाईकोर्ट ने प्रमुख सचिव (बेसिक शिक्षा) उप्र को निर्देश दिया है कि वह सर्कुलर जारी करें कि मान्यता खो चुके स्कूलों के शिक्षकों का समायोजन कोई निहित अधिकार नहीं है। स्कूलों की मान्यता रद्द होने के बाद शिक्षकों को अन्य स्कूलों में समायोजित करने के मामलों की जांच करने को कहा गया है। साथ ही कहा है कि कोई समायोजन नियमों के विरुद्ध पाया जाता है तो कानून के अनुसार आवश्यक सुधारात्मक कार्रवाई की जाए।

Monday, January 26, 2026

कक्षा में पढ़ाई संग कमाई की तैयारी, प्रशिक्षण लेकर 89 हजार से अधिक विद्यार्थी आत्मनिर्भर बनने की राह में

कक्षा में पढ़ाई संग कमाई की तैयारी, प्रशिक्षण लेकर 89 हजार से अधिक विद्यार्थी आत्मनिर्भर बनने की राह में


लखनऊ: माध्यमिक विद्यालयों में अब पढ़ाई सिर्फ किताबों और परीक्षा तक सीमित नहीं रही। प्रदेश के राजकीय और सहायता प्राप्त विद्यालयों में संचालित व्यावसायिक शिक्षा कार्यक्रम छात्रों को पढ़ाई के साथ कमाई के लिए भी तैयार कर रहा है। सिलाई, प्लंबरिंग, आटो सर्विसिंग, डेटा एंट्री, ब्यूटी वेलनेस, डेयरी और खाद्य प्रसंस्करण जैसे रोजगारोन्मुख कार्यक्रम में प्रशिक्षण लेकर 89 हजार से अधिक विद्यार्थी आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।


 प्रदेश सरकार की यह कौशल विकास आधारित पहल माध्यमिक स्तर पर ही छात्रों को रोजगार से जुड़कर  आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से चलाई जा रही है। योजना के तहत कक्षा में सैद्धांतिक पढ़ाई के साथ प्रयोगशालाओं और वर्कशाप में व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है। प्रशिक्षक विद्यार्थियों को वास्तविक कार्य परिस्थितियों से परिचित करा रहे हैं, जिससे वे आगे नौकरी या स्वरोजगार के लिए पूरी तरह तैयार हो सकें। 


शैक्षिक सत्र 2025-26 में योजना का दायरा और बढ़ाया गया। इसमें प्रदेश के 1701 माध्यमिक विद्यालयों को व्यावसायिक शिक्षा से जोड़ा गया है, जहां विभिन्न ट्रेड्स में प्रशिक्षण चल रहा है। माध्यमिक शिक्षा निदेशक डा. महेंद्र देव के अनुसार इन विद्यालयों में संचालित सभी वोकेशनल कोर्स जनवरी तक पूरे कर लिए जाएंगे। इससे पहले 2022-23 में 289, 2023-24 में 356 और 2024-25 में 208 विद्यालयों में योजना लागू हुई थी, जहां 100 प्रतिशत कोर्स सफलतापूर्वक पूरे किए, गए। 


कार्यक्रम के तहत विद्यार्थियों को 16 ट्रेड्स और 18 जाब रोल्स में प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जिनमें सहायक राजमिस्त्री, प्लंबर, सिलाई मशीन आपरेटर, ब्यूटी थैरेपिस्ट, खाद्य एवं पेय सेवा सहायक, डेयरी कर्मी, आटो सेवा तकनीशियन, डेटा एंट्री आपरेटर, रिटेल सहायक, सुरक्षा गार्ड, ऊर्जा मीटर तकनीशियन, माइक्रो फाइनेंस सहित कई रोजगारपरक विकल्प शामिल हैं। योजना की निगरानी लाइट हाउस पोर्टल के जरिये रियल टाइम में की जा रही है, जिससे प्रशिक्षण की गुणवत्ता, उपस्थिति और प्रगति पर लगातार नजर रखी जा सके।

यूपी के राजकीय और सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालयों को ढाई दशक में भी नहीं मिले कंप्यूटर शिक्षक

यूपी के राजकीय और सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालयों को ढाई दशक में भी नहीं मिले कंप्यूटर शिक्षक

4512 सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षक नहीं

2460 राजकीय माध्यमिक विद्यालयों में भी नहीं हुई नियुक्ति

यूपी बोर्ड ने वर्ष 2000 में शुरू कराई थी कंप्यूटर की पढ़ाई

प्रयागराज। प्रदेश के 4512 सरकारी सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों और 2460 राजकीय माध्यमिक विद्यालयों में कंप्यूटर की पढ़ाई शुरू होने के ढाई दशक बाद भी कंप्यूटर शिक्षकों की तैनाती नहीं हो सकी है। गिने-चुने एडेड कॉलेजों में जहां निजी संसाधन से शिक्षक रखकर किसी तरह कंप्यूटर की पढ़ाई कराई जा रही है। वहीं राजकीय विद्यालयों में दूसरे विषय के शिक्षक इतने महत्वपूर्ण विषय की कक्षाएं ले रहे हैं। 22 हजार से अधिक निजी स्कूलों में स्थिति और भी बदतर है।


यूपी बोर्ड ने कंप्यूटर विषय के पाठ्यक्रम में हैकिंग, रोबोटिक्स, एआई, ड्रोन टेक्नोलॉजी, पायथन लैंग्वेंज समेत अन्य आधुनिक टॉपिक को शामिल कर रखा है। शिक्षा निदेशालय की ओर से पिछले चार-पांच साल में कई बार कंप्यूटर शिक्षकों की कमी को दूर करने के संबंध में शासन को प्रस्ताव भेजा है लेकिन अब तक नियुक्ति नहीं हो सकी है। 890 राजकीय स्कूलों में जेम पोर्टल के माध्यम से आउटसोर्स पर कंप्यूटर शिक्षकों को रखने के लिए वित्तीय वर्ष 2022-23 में बजट का प्रावधान भी किया गया था।

केंद्र सरकार की गाइडलाइन के अनुरूप 25 हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय पर शिक्षकों की नियुक्ति होनी थी। एडेड माध्यमिक विद्यालयों में पूर्व से स्वीकृत विषय जो अब अप्रासंगिक हो गए हैं, उनके शिक्षकों को आवश्यक प्रशिक्षण देते हुए कंप्यूटर शिक्षण की जिम्मेदारी देने या फिर संविदा पर कम्प्यूटर शिक्षकों को रखने का सुझाव दिया गया था। एडेड कॉलेजों में एक दशक पहले आईसीटी योजना के तहत कंप्यूटर शिक्षा शुरू की गई थी।

प्रत्येक स्कूल को 10-10 कम्प्यूटर देने के साथ निजी एजेंसियों के माध्यम से आउटसोर्स पर कंप्यूटर शिक्षक 15 हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय पर रखे गए थे लेकिन पांच साल बाद योजना बंद हो गई। वर्तमान में अधिकांश स्कूलों की कंप्यूटर लैब पर ताला पड़ा है। कुछ स्कूलों में प्राइवेट शिक्षक हैं जिनके मानदेय का भुगतान बच्चों से फीस किया जाता है। स्कूलों में लंबा समय दे चुके संविदा कंप्यूटर शिक्षक नियमित होने की उम्मीद पाले हैं लेकिन उनकी भी सुनवाई नहीं हो रही।


कंप्यूटर शिक्षक न होने से बच्चे भी निराश

स्कूलों में कंप्यूटर शिक्षक नहीं होने से बच्चे भी निराश हैं। कक्षा नौ में बच्चे कंप्यूटर विषय ले लेते हैं लेकिन दो साल बाद ही इस विषय से मोहभंग हो जा रहा है। जबकि 12वीं के बाद बीटेक में सर्वाधिक मांग कंप्यूटर साइंस की है। यूपी बोर्ड की हाईस्कूल परीक्षा 2026 में 61757 छात्र-छात्राओं ने कंप्यूटर विषय लिया है जबकि इंटरमीडिएट में यह संख्या एक तिहाई से भी कम 18530 है। 2024 की बोर्ड परीक्षा में भी 10वीं में 62162 परीक्षार्थी थे जबकि 12वीं में 16587 परीक्षार्थियों ने कंप्यूटर विषय लिया था। 2023 में 10वीं में 67033 जबकि 12वीं में 18783 बच्चे कंप्यूटर विषय में पंजीकृत थे।

Sunday, January 25, 2026

एडेड स्कूलों को छात्र संख्या पर मिलेगी सूरत संवारने को रकम, माध्यमिक शिक्षा विभाग की ओर से प्रोजेक्ट अलंकार के तहत नियमों में बदलाव किया

एडेड स्कूलों को छात्र संख्या पर मिलेगी सूरत संवारने को रकम, माध्यमिक शिक्षा विभाग की ओर से प्रोजेक्ट अलंकार के तहत नियमों में बदलाव किया

40 साल पुराने स्कूलों को भी भवन निर्माण में मदद

स्कूलों के सर्वे के लिए जिलों में बनाई जाएगी कमेटी

25 लाख ₹ से 1.25 करोड़ ₹ तक की वित्तीय सहायता


लखनऊ । यूपी के जर्जर अशासकीय सहायता प्राप्त (एडेड) माध्यमिक स्कूलों को संवारने के लिए छात्र संख्या के हिसाब से अब वित्तीय मदद दी जाएगी। यह मदद 25 लाख से लेकर 1.25 करोड़ रुपये तक होगी। अभी तक 75 साल साल पुराने स्कूलों को ही मदद मिल रही थी। अब 14 अक्तूबर 1986 तक 40 वर्ष पुराने जर्जर विद्यालयों को भी मदद मिलेगी।


माध्यमिक शिक्षा विभाग की ओर से प्रोजेक्ट अलंकार के तहत नियमों में बदलाव किया गया है। करीब 4500 एडेड माध्यमिक स्कूल हैं और इसमें से बड़ी संख्या में विद्यालयों के भवन जर्जर हैं। अभी तक 75 साल पुराने विद्यालयों के जर्जर भवन की जगह नवनिर्माण पर खर्च होने वाली कुल रकम का 75 प्रतिशत राज्य सरकार व 25 प्रतिशत प्रबंधतंत्र को देना होता है। 

अब 40 साल पुराने विद्यालयों को भी आर्थिक मदद दी जाएगी। दूसरा यह कि छात्र संख्या के अनुसार यह वित्तीय मदद 25 लाख से लेकर 1.25 करोड़ तक मिलेगी। छात्र संख्या 300 से लेकर 500 तक होने पर स्कूल को 25 लाख तक की वित्तीय मदद सरकार देगी और अगर छात्र संख्या 2001 से अधिक है, तो यह सहायता 1.25 करोड़ तक होगी। यही नहीं कुल खर्च में जो 25 प्रतिशत हिस्सा प्रबंधतंत्र को खर्च करना होगा, वह उसे सांसद-विधायक निधि और कंपनियों से सीएसआर के तहत ले सकेंगे। 

प्रत्येक जिले में इसके लिए डीएम की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय कमेटी बनाई जाएगी, जिसमें मुख्य विकास अधिकारी, अधिशाषी अभियंता प्रांतीय खंड लोक निर्माण विभाग और वित्त एवं लेखाधिकारी माध्यमिक शिक्षा सदस्य होंगे।


पोर्टल की मदद से स्कूलों से आवेदन लिए जाएंगे

पोर्टल की मदद से सहायता चाहने वाले स्कूलों से ऑनलाइन आवेदन लिए जाएंगे। वहीं स्कूलों के सर्वे व सत्यापन के लिए उपजिलाधिकारी की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय कमेटी बनाई जाएगी। उप्र माध्यमिक शिक्षक संघ (चंदेल गुट) के प्रदेश मंत्री संजय द्विवेदी व उप्र माध्यमिक शिक्षक संघ के प्रदेशीय उपाध्यक्ष डॉ. आरपी मिश्रा ने सरकार से मांग की है कि वह स्कूलों की खस्ता वित्तीय स्थिति को देखते हुए पूरी शत-प्रतिशत मदद करें।



Saturday, January 24, 2026

माध्यमिक शिक्षा : गणतंत्र दिवस समारोह, 26 जनवरी 2026 को गरिमापूर्ण ढंग से मनाए जाने हेतु आदेश और निर्देश जारी

माध्यमिक शिक्षा : गणतंत्र दिवस समारोह, 26 जनवरी 2026 को गरिमापूर्ण ढंग से मनाए जाने हेतु आदेश और निर्देश जारी 




गणतंत्र दिवस 26 जनवरी को मनाए जाने हेतु उत्तर प्रदेश शासन का आदेश जारी, करें डाउनलोड




यूपी प्रमाण पोर्टल पर कॉलेजों का रिपोर्ट कार्ड, हर महीने 44 मानकों की कसौटी पर कसेंगे, लापरवाह कॉलेजों के खिलाफ होगी कार्रवाई

यूपी प्रमाण पोर्टल पर कॉलेजों का रिपोर्ट कार्ड, हर महीने 44 मानकों की कसौटी पर कसेंगे, लापरवाह कॉलेजों के खिलाफ होगी कार्रवाई


लखनऊ। डिग्री कॉलेजों में गुणवत्तापरक शिक्षा व उच्च स्तरीय शोध सुनिश्चित करने के लिए यूपी प्रमाण पोर्टल तैयार किया गया है। अब इस पोर्टल के माध्यम से डिग्री कॉलेजों की निगरानी होगी, उनका मूल्यांकन और रैंकिंग की जाएगी। 44 मानकों की कसौटी पर कॉलेजों को कसा जाएगा और फिर रिपोर्ट कार्ड तैयार होगा। लापरवाह कॉलेजों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। पहली बार ऐसी व्यवस्था की जा रही है।


राज्य स्तरीय क्वालिटी एश्योरेंस सेल (एसएलक्यूएसी) के माध्यम से इस पोर्टल पर नजर रखी जाएगी। सभी सरकारी व एडेड डिग्री कॉलेजों को इस पर अनिवार्य रूप से पंजीकरण कराना होगा। सभी डिग्री कॉलेज प्रमाण पोर्टल https://updcs.crispindia.net पर अपना पंजीकरण कराएंगे। जिस पर कॉलेज की पूरी प्रोफाइल के साथ साथ उनकी रैंकिंग भी प्रदर्शित होगी। 

हर महीने कॉलेजों को 44 मानकों पर अपने प्रदर्शन की रिपोर्ट खुद भरनी होगी। छात्रों व शिक्षकों की बॉयोमीट्रिक उपस्थिति, इंस्टीट्यूट इनोवेशन काउंसिल में पंजीकरण, एनआईआरएफ रैंकिंग, रिसर्च, रिसर्च प्रोजेक्ट, आईएसओ सर्टीफिकेशन, एल्युमिनाई एसोसिएशन, कितने छात्र अप्रेंटिशसिप कर रहे हैं, एकेडमिक कैलेंडर का पालन व वन नेशन वन सब्सक्रिप्शन और स्वयं पोर्टल के माध्यम से छात्रों को कराए जा रहे ऑनलाइन पाठ्यक्रम से संबंधित जानकारी देनी होगी। 100 अंकों में कॉलेजों का मूल्यांकन किया जाएगा। हर तीन-तीन महीने पर इसका रिपोर्ट कार्ड जारी होगा। लापरवाह कॉलेजों पर कार्रवाई की जाएगी।


अब ग्रीन कैंपस भी बनाना होगाः डिग्री कॉलेजों ने अपने यहां हरियाली बढ़ाने और ग्रीन कैंपस बनाने के लिए क्या पहल की इसके अंक भी शामिल किए गए हैं यानी कॉलेजों में पेड़-पौधे लगाने और हरा-भरा परिसर बनाने को भी इसके माध्यम से बढ़ावा दिया जाएगा। सभी कॉलेजों को इसके लिए तैयारी करनी होगी वरना वह रैंकिंग में फिसल जाएंगे। उन्हें अधिक से अधिक पौधे लगाने को प्रेरित किया जाएगा।


साहित्यिक चोरी रोकने के लिए करेंगे उपाय
शोध कार्यों व प्रोजेक्ट वर्क में साहित्यिक चोरी रोकने के लिए सॉफ्टवेयर का उपयोग कर रहे हैं या नहीं यह भी बताना होगा। अगर वह साहित्यिक चोरी रोकने के लिए उपाय नहीं कर रहे तो आगे उन्हें इसका प्रयोग करना ही होगा। जिससे कॉलेजों के शोध कार्यों व प्रोजेक्ट वर्क में मौलिकता बढ़ेगी। अभी कॉलेजों में इस तरह के उपाय नहीं किए जा रहे। आगे करना होगा।

ARP के चयन में कई जिले पिछड़े, शैक्षिक गुणवत्ता हो रही प्रभावित, देखें चयन में सबसे अच्छे और फिसड्डी जिलों के नाम

ARP के चयन में कई जिले पिछड़े, शैक्षिक गुणवत्ता हो रही प्रभावित, देखें चयन में सबसे अच्छे और फिसड्डी जिलों के नाम 

शिक्षकों को सहयोग और निपुण भारत मिशन को गति देने पर भी असर

लखनऊ, गोंडा, गोरखपुर समेत एक दर्जन से अधिक जिलों में पद खाली


लखनऊ। परिषदीय विद्यालयों में शैक्षिक गुणवत्ता सुधारने, शिक्षकों को सहयोग और निपुण भारत मिशन को गति देने के उद्देश्य से एकेडमिक रिसोर्स पर्सन (एआरपी) का चयन किया जाता है। यह चयन शिक्षकों के बीच से ही परीक्षा के माध्यम से होता है। हालांकि, इस वर्ष आधा सत्र बीत जाने के बावजूद कई जिलों में एआरपी के पद खाली हैं, जिससे शैक्षिक गतिविधियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।


लखनऊ, गोंडा, गोरखपुर जैसे एक दर्जन से अधिक जिलों में 40 फीसदी से अधिक एआरपी के पद खाली हैं। इससे विद्यालयों का पर्यवेक्षण और उनमें सुधार के कार्य बाधित हो रहे हैं। एआरपी के माध्यम से प्रेरणा एप से होने वाली निगरानी, शिक्षक-शिक्षण सामग्री के प्रदर्शन, दीक्षा एप का प्रचार-प्रसार और बच्चों को उपचारात्मक शिक्षण देने जैसे कार्य प्रभावित हो रहे हैं।

इसके अतिरिक्त शिक्षकों को शिक्षण विधियों में मदद करना, उनकी समस्याओं का समाधान, लर्निंग गैप को पूरा करना, डिजिटल संसाधनों का प्रचार, अभिभावकों व स्कूल प्रबंधन समितियों से सुझाव लेना, शैक्षिक वीडियो बनाना, कार्यशालाएं आयोजित करना व प्रशिक्षण देना भी इन रिक्तियों के कारण प्रभावित हो रहा है।


चयन में दस अच्छे जिले
कुछ जिलों ने एआरपी चयन में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है। गौतमबुद्धनगर और कौशांबी में शत-प्रतिशत पद भरे हुए हैं। वहीं, बस्ती (95%), सिद्धार्थनगर (94%), बाराबंकी (93%), गाजियाबाद (92%), रामपुर और वाराणसी (91%), अंबेडकरनगर और फतेहपुर (90-90%) जैसे जिलों में भी बड़ी संख्या में पद भरे गए हैं। बांदा, बागपत, उन्नाव, औरैया और देवरिया में भी एआरपी भ्रमण की स्थिति बेहतर पाई गई है।

चयन में खराब दस जिले
इसके विपरीत, कई जिले चयन में पिछड़ गए हैं। मथुरा में 62 फीसदी, हरदोई में 59 फीसदी, कासगंज में 57 फीसदी, मऊ में 52 फीसदी, गोंडा में 49 फीसदी, मेरठ में 48 फीसदी, बरेली में 45 फीसदी, तथा लखनऊ, गोरखपुर और हमीरपुर में 43 फीसदी एआरपी पद अभी भी खाली हैं। कानपुर, हापुड़ और फर्रुखाबाद में भी एआरपी भ्रमण की स्थिति अपेक्षाकृत खराब मिली है।

अपर मुख्य सचिव ने जताई थी नाराजगी
हाल ही में हुई एक समीक्षा बैठक में बेसिक शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव पार्थ सारथी सेन ने इस स्थिति पर नाराजगी व्यक्त की। उन्होंने 10 फरवरी तक एआरपी चयन की प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया है। साथ ही, उन्होंने शिक्षकों को एआरपी चयन के लिए अधिक से अधिक आवेदन करने हेतु प्रोत्साहित करने और अच्छा प्रदर्शन करने वाले एआरपी, एसआरजी और डायट मेंटर को सम्मानित करने पर भी जोर दिया।

Friday, January 23, 2026

छुट्टियों में नहीं हुआ तबादला तो बेसिक शिक्षक विरोध में जुटे, प्रादेशिक स्थानांतरण समिति का गठन कर सोशल मीडिया से लेकर ज्ञापन देने का चलाएंगे अभियान

छुट्टियों में नहीं हुआ तबादला तो बेसिक शिक्षक विरोध में जुटे, प्रादेशिक स्थानांतरण समिति का गठन कर सोशल मीडिया से लेकर ज्ञापन देने का चलाएंगे अभियान


लखनऊ। प्रदेश में इस साल जाड़े की छुट्टियों में जिले के अंदर और एक से दूसरे जिले में तबादला नहीं किया गया। इसे लेकर अब तक उम्मीद लगाए बेसिक के शिक्षक अब विरोध में जुट गए हैं। उन्होंने प्रादेशिक स्थानांतरण समिति का गठन करते हुए चरणबद्ध आंदोलन की घोषणा की है। यह आंदोलन शुक्रवार से शुरू हो रहा है।


शिक्षकों ने कहा कि विभाग ने पूर्व में जारी शासनादेश में खुद कहा है कि वह गर्मी व जाड़े की छुट्टियों में जिले के अंदर और एक से दूसरे जिले में परस्पर तबादला करेगा। इसके बाद भी इस जाड़े की छुट्टियों में कोई प्रक्रिया नहीं की गई। जबकि शिक्षकों ने इसके लिए विभागीय अधिकारियों को ज्ञापन भी दिया था। ऐसे में अब उनके सामने विरोध-प्रदर्शन के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है।


प्रादेशिक स्थानांतरण समिति के राजीव गौड़ ने बताया कि तबादले के लिए चरणबद्ध आंदोलन की रूपरेखा तैयार की गई है। इसके तहत पहले चरण में शिक्षक 23 जनवरी को ट्वीटर व फेसबुक के माध्यम से डिजिटल अभियान चलाएंगे। दूसरे चरण में संबंधित अधिकारियों से संवाद और ज्ञापन दिया जाएगा। इसके बाद भी मांग न पूरी हुई तो बेसिक शिक्षा मंत्री आवास व निदेशालय पर धरना दिया जाएगा।


कैशलेस चिकित्सा की जल्द मिले सुविधाः मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा पांच सितंबर को शिक्षक दिवस पर की गई घोषणा के चार महीने बाद भी शिक्षकों, शिक्षामित्रों व अनुदेशकों को कैशलेस चिकित्सा की सुविधा नहीं मिली है। इसे लेकर शिक्षक संगठनों ने नाराजगी जताते हुए इसे जल्द लागू करने की मांग की है। उत्तर प्रदेश बीटीसी शिक्षक संघ ने इसके साथ ही शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) अनिवार्यता मामले में जल्द राहत देने की मांग की है। संघ के प्रदेश अध्यक्ष अनिल यादव ने कहा कि इस पर अब तक कोई सकारात्मक निर्णय न होने से देश व प्रदेश के शिक्षकों में नाराजगी है।

Thursday, January 22, 2026

परिवार पर विपदा सदस्य की उम्र देखकर नहीं आती, अनुकंपा नियुक्ति के नियमों को लचीला बनाएं – हाईकोर्ट

परिवार पर विपदा सदस्य की उम्र देखकर नहीं आती, अनुकंपा नियुक्ति के नियमों को लचीला बनाएं

हाईकोर्ट ने कहा-परिवार आर्थिक तंगी में है तो केवल अधिक आयु के आधार पर अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य अचानक आए आर्थिक संकट से परिवार को उबारना है। परिवार पर विपदा सदस्य की उम्र देखकर नहीं आती है। भर्ती नियमों की कठोरता को इसके उद्देश्यों को विफल करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इसकी नियुक्ति में आयु सीमा की बाधा को दूर करें और नियमों को लचीला बनाएं।

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) की अनुकंपा नियुक्ति समिति की एकल पीठ के खिलाफ दायर विशेष अपील पर की। कोर्ट ने समिति को निर्देश दिया है कि वह याचिकाकर्ता की आयु में छूट के अनुरोध पर एक महीने के भीतर विचार करे।

प्रतिवादी/याची एन. शांगबनाबी देवी की बहन की 2015 में बीएचयू में सेवा के दौरान मौत हो गई थी। उन्होंने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया था, जिसे विवि ने खारिज कर दिया। कहा कि उनकी आयु घटना के समय 37 वर्ष थी, जो ओबीसी श्रेणी के लिए निर्धारित अधिकतम आयु सीमा (33 वर्ष) से अधिक थी। इसे याची ने हाईकोर्ट में चुनौती दी तो एकल पीठ ने उनके पक्ष में आदेश दिया। 

इस पर बीएचयू ने एकल पीठ के पांच फरवरी 2025 के आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में विशेष अपील दायर की। कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद बीएचयू की उस दलील को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि कार्यकारी परिषद ने केवल विधवाओं या तलाकशुदा महिलाओं को आयु में छूट देने का प्रस्ताव पारित किया है। कहा कि जब तक मूल अनुकंपा नियमों में संशोधन नहीं होता, तब तक ऐसे प्रशासनिक प्रस्ताव किसी अन्य आश्रित (जैसे वहन) के अधिकार को कम नहीं कर सकते। 

कोर्ट ने कहा कि परिवार वास्तव में आर्थिक तंगी में है तो केवल अधिक आयु के आधार पर उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता। मुकदमेबाजी के दौरान हुई देरी को भी नजरअंदाज करने का निर्देश दिया है।





बीएचयू को याची की नियुक्ति के संबंध में विचार कर एक महीने में निर्णय लेने का निर्देश

भर्ती नियमों के तहत सीमित नहीं की जा सकती अनुकंपा नियुक्ति – हाईकोर्ट 


प्रयागराजः इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि अनुकंपा नियुक्ति सामान्य भर्ती प्रक्रिया का अपवाद है और इसे भर्ती नियमों से आच्छादित मानकर अस्वीकार नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह तथा न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने सुश्री नामीराकपन शांगबनाश्री देवी की नियुक्ति मामले में विचार करने संबंधी एकलपीठ के आदेश के खिलाफ दायर काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) वाराणसी की विशेष अपील निस्तारित करते हुए यह टिप्पणी की है।

कोर्ट ने कहा है कि अनुकंपा नियुक्ति के लिए मूल याची के दावे पर विचार करने से पहले देरी के मुद्दे की जांच करना आवश्यक है। कोर्ट ने बीएचयू की अनुकंपा नियुक्ति समिति को निर्देश दिया है कि वह पहले मूल याची की उम्र में छूट के अनुरोध पर विचार करे, वह भर्ती नियमों के अनुसार नहीं, बल्कि अनुकंपा नियमों के अनुसार। इसके बाद उसके दावे पर विचार किया जाए, जिसमें पारिवारिक सदस्यों की निर्भरता, वित्तीय कठिनाई और अन्य प्रासंगिक परिस्थितियों को ध्यान रखा जाए। यह निर्णय एक महीने में के भीतर करने का निर्देश दिया गया है।

कोर्ट ने कहा है कि भर्ती नियम संविधान के अनुच्छेद 16 की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए हैं, जबकि अनुकंपा नियुक्ति नियम इसके अपवाद हैं और इनका उद्देश्य वित्तीय संकट में आए पीड़ित परिवार को तात्कालिक सहायता प्रदान करना है। अनुकंपा नियुक्ति नियमों को भर्ती नियमों के तहत सीमित नहीं किया जा सकता है। इसका मतलब यह है कि अगर कोई आवेदक भर्ती नियमों की कुछ शर्तों को पूरा नहीं करता है तो भी उसकी अनुकंपा नियुक्ति के लिए बिचार किया जा सकता है बशर्ते उसके परिवार को सहायता मिलती हो। 

हाई कोर्ट की एकलपीठ के पांच फरवरी 2025 के उस आदेश को इस अपील में चुनौती दी गई थी, जिसमें बीएचयू का नौ मार्च 2018 का अनुकंपा नियुक्ति देने से इन्कार करने वाला आदेश रद कर दिया गया था। एकल न्यायाधीश ने यह भी कहा था कि भर्ती नियम अनुकंपा नियुक्ति पर लागू नहीं होते। विश्वविद्यालय का तर्क था कि अनुकंपा नियुक्ति के नियमों में भर्ती नियमों के अनुसार पात्रता शर्तें शामिल हैं। मृतक की बहन की उम्र 37 वर्ष थी, जो अधिकतम आयु सीमा से चार वर्ष अधिक है। 

यूनिवर्सिटी के कार्यकारी परिषद ने एक अन्य मामले में फैसला दिया था कि उम्र में छूट भर्ती नियमों के अनुसार ही दी जाएगी। याची की तरफ से कहा गया है कि अनुकंपा नियमों में उम्र में छूट का प्रविधान है और कार्यकारणी परिषद का फैसला इन नियमों को ओवरराइड नहीं कर सकता। भर्ती नियम केवल अन्य पात्रता शर्तों पर लागू होते हैं, न कि उम्र पर।

अटल आवासीय विद्यालय के छात्रों को भी मिलेगा कौशल प्रशिक्षण, 18 आवासीय विद्यालयों के 9 से 11 के छात्रों को मिलेगा लाभ

अटल आवासीय विद्यालय के छात्रों को भी मिलेगा कौशल प्रशिक्षण, 18 आवासीय विद्यालयों के 9 से 11 के छात्रों को मिलेगा लाभ

कौशल विकास मिशन की बैठक में लिया गया निर्णय


लखनऊ। प्रदेश में प्रोजेक्ट प्रवीण का विस्तार करते हुए अब अटल आवासीय विद्यालयों के छात्रों को भी कौशल प्रशिक्षण दिया जाएगा। कौशल विकास मिशन की बुधवार को हुई बैठक में तय किया गया कि अटल आवासीय विद्यालयों में विद्यार्थियों के लिए व्यावसायिक व कौशल विकास प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किया जाएगा।


इस नई पहल के तहत सभी 18 अटल आवासीय विद्यालयों के कक्षा 9, 10 और 11 के छात्रों को कौशल प्रशिक्षण दिया जाएगा। यह प्रशिक्षण स्वास्थ्य सेवा, ब्यूटी एवं वेलनेस, फूड प्रोसेसिंग, आईटी एवं आईटीईएस और परिधान क्षेत्र में दिया जाएगा। हर कक्षा के 140 छात्रों का सर्वे किया जाएगा। ताकि वे अपनी पसंद के ट्रेड का चयन कर सकें। इससे उन्हें व्यक्तिगत और भविष्य की जरूरत के अनुरूप कौशल विकास का रास्ता मिलेगा। 


मिशन निदेशक पुलकित खरे की अध्यक्षता में हुई बैठक में प्रशिक्षण की कार्य योजना, पाठ्यक्रम, प्रशिक्षकों की उपलब्धता व प्रशिक्षण की गुणवत्ता मानकों पर चर्चा की गई। बैठक में पूजा यादव, अपर मिशन निदेशक प्रिया सिंह, संयुक्त निदेशक मयंक गंगवार आदि उपस्थित थे। 

विवाहित पुत्री भी मृतक आश्रित कोटे में नियुक्ति पाने की हकदारः हाईकोर्ट

विवाहित पुत्री भी मृतक आश्रित कोटे में नियुक्ति पाने की हकदारः हाईकोर्ट

कोर्ट ने सिद्धार्थनगर के बीएसए को दो माह में आदेश पारित करने का दिया निर्देश


प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मृतक आश्रित कोटे में नियुक्ति को लेकर महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा है कि विवाहित पुत्री भी नियुक्ति पाने की पात्र है। कोर्ट ने सिद्धार्थनगर के बीएसए को निर्देश दिया है कि वह परिवार की आर्थिक स्थिति और आश्रितों की संख्या को ध्यान में रखते हुए दो माह में निर्णय लेकर आदेश पारित करें। यह आदेश न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकल पीठ ने नीतू अनिता देवी की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया।


अधिवक्ता ने दलील दी कि याची के पिता सिद्धार्थनगर के इटवा गौरा में प्राथमिक विद्यालय में प्रधानाध्यापक के पद पर कार्यरत थे। सेवाकाल के दौरान आठ जनवरी 2020 को उनका निधन हो गया। परिवार में केवल बेटी थी, जिसने मृतक आश्रित कोटे में नियुक्ति के लिए आवेदन किया। निर्णय न होने पर याची ने हाईकोर्ट में अपील की थी। जिस पर हाईकोर्ट ने पहले ही बीएसए को आदेश पारित करने का निर्देश दिया था, लेकिन इसके बाद बीएसए ने यह कहते हुए नियुक्ति से इन्कार कर दिया कि विवाहित पुत्री परिवार की सदस्य नहीं है।

इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। याची ने दलील दी कि विमला श्रीवास्तव सहित कई मामलों में हाईकोर्ट पहले ही विवाहिता बेटी को परिवार का सदस्य मान चुका है। साथ ही 12 नवंबर 2021 की अधिसूचना के जरिये सरकार ने नियमावली से अविवाहित शब्द हटा दिया है। कोर्ट ने सक्षम प्राधिकारी को दो माह में निर्णय लेने का आदेश दिया है।

Wednesday, January 21, 2026

जूनियर एडेड प्रधानाध्यापक भर्ती में अनुभव प्रमाणपत्र से छूट की मांग को लेकर अभ्यर्थियों में बने दो गुट

जूनियर एडेड प्रधानाध्यापक भर्ती में अनुभव प्रमाणपत्र से छूट की मांग को लेकर अभ्यर्थियों में बने दो गुट

प्रयागराजअशासकीय सहायता प्राप्त (एडेड) जूनियर हाईस्कूल की वर्ष 2021 की शिक्षक भर्ती में प्रधानाध्यापक पद के अनुभव प्रमाणपत्र को लेकर अभ्यर्थियों में दो गुट बन गए हैं। कटआफ सूची में रिक्त पदों के सापेक्ष जारी क्रमांक में ऊपरी क्रम के अभ्यर्थी विद्यालय द्वारा अनुमोदन नहीं लिए जाने के कारण अनुभव प्रमाणपत्र से राहत की मांग कर रहे हैं तो नीचे क्रम के अभ्यर्थी अनुभव प्रमाणपत्र की अनिवार्यता को सही बता रहे हैं। 

प्रधानाध्यापक के 253 पदों पर चयन के लिए काउंसलिंग कराई जा चुकी है, जिसमें करीब 100 अभ्यर्थियों ने बीएसए द्वारा जारी अनुभव प्रमाणपत्र लगाए हैं। इसके आधार पर चयन किए जाने पर शेष बचे पदों के लिए द्वितीय काउंसलिंग में निचले क्रम के अनुभव प्रमाणपत्रधारी अभ्यर्थियों को नियुक्ति मिलने की उम्मीद है।

प्रधानाध्यापक पद के लिए 15, 16, 17 व 19 जनवरी को काउंसलिंग कराई गई। 253 पदों के सापेक्ष 506 अभ्यर्थियों को काउंसलिंग के लिए बुलाया गया था। ज्यादा संख्या में अभ्यर्थियों ने अनुभव प्रमाणपत्र नहीं लगाए गए हैं। अभ्यर्थियों का कहना है कि चयन का अनुमोदन कराने की जिम्मेदारी संबंधित वित्तविहीन विद्यालयों की थी, लेकिन न तो विद्यालयों ने ध्यान दिया और न ही विभाग और शासन ने। 

ऐसे में पांच वर्ष से ज्यादा समय तक वित्तविहीन विद्यालयों में पढ़ाने वालों की कोई गलती नहीं है। कुछ ऐसे वित्तविहीन विद्यालय हैं, जिन्होने विज्ञापन जारी कर आवेदन लेकर चयन प्रक्रिया पूरी की और उसका अनुमोदन बीएसए से कराया, जिसके कारण उन्हें अनुभव प्रमाणपत्र जारी किया गया है। अभ्यर्थियों का दावा है कि करीब 100 अभ्यर्थियों ने काउंसलिंग के समय अनुभव प्रमाणपत्र प्रस्तुत किए हैं। ऐसे में मांग की गई है कि रिक्त रह जाने वाले पदों पर नियुक्ति के लिए नीचे के क्रम के अनुभव प्रमाणपत्र वाले अभ्यर्थियों का चयन काउंसलिंग के माध्यम से किया जाए।



एडेड जूनियर हाईस्कूल शिक्षक भर्ती में विवाद, विशेष वर्गों में आरक्षण की अनदेखी पर हाईकोर्ट पहुंचे बेरोजगार

2021 की जानेयर एडेड शिक्षक भर्ती में क्षैतिज आरक्षण का पालन न करने से नाराज

शिक्षा निदेशालय में अफर शिक्षा निदेशक बेसिक कार्यालय के बाहर किया प्रदर्शन

प्रयागराज । सहायता प्राप्त जूनियर हाईस्कूलों में सहायक अध्यापकों के 1262 पदों पर भर्ती में आरक्षण की अनदेखी के खिलाफ अभ्यर्थियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। बेसिक शिक्षा विभाग की ओर से हिन्दी, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान और सामाजिक विज्ञान विषयों के 1262 पदों में से 1051 पद (83 फीसदी) अनारक्षित वर्ग के है। 115 पद ओबीसी और 96 एससी वर्ग के लिए आरक्षित हैं। 

भूतपूर्व सैनिक नागेन्द्र पांडेय और 17 अन्य की ओर से दायर याचिका में 12 जनवरी को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने राज्य सरकार के अधिवक्ता को दो सप्ताह में जवाब दाखिल करने का समय देते हुए, 27 जनवरी को अगली सुनवाई की तारीख तय की है। ओबीसी, एससी के साथ ही विशेष आरक्षण वर्ग के अभ्यर्थियों का कहना है कि उनके साथ अन्याय हुआ है।

इंडब्ल्यूएस, एसटी और क्षैतिज आरक्षण (पूर्व सैनिक, दिव्यांग एवं स्वतंत्रता सेनानी आश्रित) का आरक्षण एकदम शून्य घोषित कर दिया गया है। वहीं ओबीसी और अनुसूचित जातियों का आरक्षण एकदम कम दिखाया जा रहा है। अफसरों का तर्क है कि स्कूल को इकाई मानने के कारण कई वर्गों का आरक्षण नहीं मिल पा रहा है वहीं अभ्यर्थियों का कहना है कि अशासकीय सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों की प्रशिक्षित स्नातक (टीजीटी) और प्रवक्ता (पीजीटी) भर्ती में भी स्कूल को इकाई मानने के बावजूद सभी वर्ग को आरक्षण मिलता है। 

जब एक ही माध्यमिक शिक्षा विभाग में कक्षा नौ से 12 तक के स्कूलों में आरक्षण नियमों का पालन हो रहा है तो बेसिक शिक्षा विभाग के एडेड जूनियर हाईस्कूलों में आरक्षण की अनदेखी समझ से परे है। 19 सितंबर को जारी संयुक्त सचिव के आदेश में भी वर्तमान व्यवस्था के अनुसार ही आरक्षण देने की बात कही गई थी।


भूतपूर्व सैनिकों व स्वतंत्रता सेनानी आश्रितों ने मांगा शिक्षक भर्ती में आरक्षण

प्रयागराज ।  जूनियर एडेड शिक्षक भर्ती-2021 में सैन्ज अरक्ष्य नहीं देर जाने से भूतपूर्व सैनिक, स्वत्त्रत संग्राम सेनानी के अश्रिले व दिव्यांग अभ्यर्थियों का आरक्षण शून्य हो गय है। भर्ती के लिए जाउसलिंग प्रक्रिन्य चल रही है, लेकिन क्षैतिज आरक्षन के मन्कों का पालन की किए जाने लाभ से बचेत अभ्यर्थियों ने सेम्बर ओ शक्ष निदेशालय प्रयागरज में अपर शेक्ष निदेशक (बेसिक) के कार्यात्रय ने बाहर प्रदर्शन कर मोर की कि क्षैतिज आरक्षन का उन्हें भी लाम देया जाए।

नेदेशल्य में प्रदर्शन जरने पहुंचे रहुल पासवान, पूर्व सैनेक विजय शंकर नष्डेय, पूर्व सैन्कि कृष्ण रजभर, सुनीता यादव, प्रियंका पुरवर, उपेंद्र सिंह, पूर्णिमा चौरसिय, शिकुमार आदि ने अरो लगया कि इस भर्ती में अरक्षण नियमों को अवहेलना में गई है। इस भर्ती में सहायक अध्यापक के कुल 1362 पद दिए जा रहे हैं। इसमें ऊर्जाकार (बर्टकल) आरक्षण में अनारक्षिर के 1051 पद, 115 ओबेंसी, इन्ची के 95 पद सृजित है, जबकि टी व इंडज्यूएस के न्द शून्य हो ग हैं इसके अलब क्षैरिज (होरेजेंटल) आरक्षण के ननक का पालन नहीं किए जाने से भूतपूर्व सैनिक, स्वतंत्रता संग्राम सेनन के अधित्व दिल्यांग के पद शून्य हे गए है इसके विपरीत वर्तमान अरक्षण नियनों के अनुसार क्षेतेज आरक्षण में भूतपूर्व सैनिक के पांच प्रतिशत आरक्षण के अनुपात में भूतपूर्व सैनिक के 53 नद. स्वतंत्रता संगमनाने के आश्रितों में 25 पद तथ देयांन के चार प्रतिश्त आरक्षण के अनुपात में 50 पद होने चाहिए। अभ्यर्देयों ने आरक्षण में नियनानुसार नेर्धारित हेने वाले पदों के विवरन के साथ पंचायते राज था अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री ओमप्रकाश राजभर को में नत्र भेजकर अनुन्य आरक्षण देलार जाने के मंर को है। नामले पर जूनैयर एडेड शिक्षक भर्ती संघ के प्रदेश अब्यअ नगेंद्र पाप्डेय ने कहा कि आरक्षण निर्धारण में नियमों की अनदेखी कर अभ्यर्थियों के साथ अन्याय क्रिय ग्या है। उन्होंने आरक्षण क निर्धारण न हिरे से कर न्याय दिलाए जाने के मांग की है

शिक्षा निदेशालय में पीड़ितों ने किया प्रदर्शन

एडेड जूनियर शिक्षक भर्ती में आरक्षण की अनदेखी पर पीड़ित अभ्यर्थियों ने सोमवार को शिक्षा निदेशालय में अपर शिक्षा निदेशक बेसिक कार्यालय के बाहर प्रदर्शन कर नियमानुसार आरक्षण देने की मांग की। कृष्णा कुमार राजभर, जितेन्द्र कुमार शुक्ला, राहुल, पूर्णिमा चौरसिया, विजय सिंह यादव, रोमन कुमार, कृपा शंकर, विपिन कुमार आदि ने चेतावनी दी कि नियमानुसार आरक्षण मिलने तक उनका आंदोलन जारी रहेगा।


अनुभव प्रमाणपत्र के लिए सीएम से लगाई गुहार

प्रयागराज। जूनियर एडेड शिक्षक भर्ती 2021 के तहत प्रधानाध्यापक के 253 पदो पर नियुक्ति में अनुभव प्रमाणपत्र का मामला मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक पहुंच गया है। अभ्यर्थी ज्ञानवेन्द्र सिंह बंटी ने सोमवार को मुख्यमंत्री से लखनऊ में मुलाकात कर समस्या बताई। कहा कि लगभग 99 प्रतिशत अभ्यर्थियों ने वित्तविहीन विद्यालय में पांच साल या अधिक वर्ष तक सहायक अध्यापक के रूप में शिक्षण कार्य किया है और वे प्रधानाध्यापक पद के लिए अनुभव की योग्यता रखते हैं। अब जब इस भर्ती की काउंसिलिंग कराई जा रही है तब कई जिलों के बेसिक शिक्षा अधिकारी यह कहते हुए अनुभव प्रमाणपत्र निरस्त कर रहे है कि उस पद के सापेक्ष अनुमोदन नहीं लिया गया था। 

यह तब है जबकि अभ्यर्थियों का नाम यू-डायस पोर्टल पर पांच साल या अधिक समय से मौजूद है। सभी योग्यता पूरी करने के बावजूद हमारे अनुभव प्रमाणपत्र पर संकट मंडरा रहा है। बेसिक शिक्षा विभाग के अफसरों ने यूपी में जुलाई 2011 में आरटीई लागू होने के 14 साल में कभी अनुमोदन नहीं दिया और अब परेशान किया जा रहा है। मुख्यमंत्री ने उचित कार्रवाई का आश्वासन दिया है।