DISTRICT WISE NEWS

अंबेडकरनगर अमरोहा अमेठी अलीगढ़ आगरा इटावा इलाहाबाद उन्नाव एटा औरैया कन्नौज कानपुर कानपुर देहात कानपुर नगर कासगंज कुशीनगर कौशांबी कौशाम्बी गाजियाबाद गाजीपुर गोंडा गोण्डा गोरखपुर गौतमबुद्ध नगर गौतमबुद्धनगर चंदौली चन्दौली चित्रकूट जालौन जौनपुर ज्योतिबा फुले नगर झाँसी झांसी देवरिया पीलीभीत फतेहपुर फर्रुखाबाद फिरोजाबाद फैजाबाद बदायूं बरेली बलरामपुर बलिया बस्ती बहराइच बाँदा बांदा बागपत बाराबंकी बिजनौर बुलंदशहर बुलन्दशहर भदोही मऊ मथुरा महराजगंज महोबा मिर्जापुर मीरजापुर मुजफ्फरनगर मुरादाबाद मेरठ मैनपुरी रामपुर रायबरेली लखनऊ लखीमपुर खीरी ललितपुर लख़नऊ वाराणसी शामली शाहजहाँपुर श्रावस्ती संतकबीरनगर संभल सहारनपुर सिद्धार्थनगर सीतापुर सुलतानपुर सुल्तानपुर सोनभद्र हमीरपुर हरदोई हाथरस हापुड़

Saturday, January 31, 2026

सुप्रीम कोर्ट : सभी स्कूलों में सैनेटरी पैड मुफ्त मिले, सुप्रीम कोर्ट ने 'मासिक धर्म स्वास्थ्य' को मौलिक अधिकार करार दिया, लापरवाही पर स्कूलों की मान्यता निरस्त होगी

सुप्रीम कोर्ट : सभी स्कूलों में  सैनेटरी पैड मुफ्त मिले, सुप्रीम कोर्ट ने 'मासिक धर्म स्वास्थ्य' को मौलिक अधिकार करार दिया, लापरवाही पर स्कूलों की मान्यता निरस्त होगी

 126 पन्नों के फैसले में राज्यों-केंद्र शासित प्रदेशों को को आदेश

कक्षा 6 से 12 तक की छात्राओं को निशुल्क सैनिटरी पैड देना होगा

तीन माह के भीतर जारी दिशा-निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने का आदेश


नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में 'मासिक धर्म स्वास्थ्य' को मौलिक अधिकार करार दिया। साथ ही देश के सभी स्कूलों (चाहे सरकारी हों या निजी) में कक्षा 6 से 12 तक की छात्राओं को निशुल्क सैनिटरी पैड देने का आदेश दिया। अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को किशोर लड़कियों के लिए सभी स्कूलों में केंद्र सरकार की राष्ट्रीय नीति यानी 'स्कूल जाने वाली लड़कियों के लिए मासिक धर्म स्वच्छता नीति' को प्रभावी तरीके से लागू करने के निर्देश दिए हैं।


जस्टिस जेबी पारदीवाला और आर महादेवन की पीठ ने 126 पन्नों के फैसले में कहा, अनुच्छेद 21 के तहत मासिक धर्म स्वास्थ्य का अधिकार, जीवन के अधिकार का हिस्सा है। पीठ ने देश के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के सभी स्कूलों में किशोरियों को मुफ्त बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराने का आदेश देने के साथ-साथ स्कूलों में छात्र-छात्राओं के लिए सुविधाओं से युक्त शौचालयों की व्यवस्था करने का निर्देश दिया है। 

अदालत ने 2022 में जया ठाकुर की ओर से दाखिल जनहित याचिका पर यह फैसला सुनाया, जिसमें देशभर में स्कूली छात्राओं को निशुल्क सैनिटरी पैड उपलब्ध कराने और स्वच्छ शौचालयों की व्यवस्था करने की मांग की गई थी। जस्टिस पारदीवाला ने कहा, यह घोषणा सिर्फ कानूनी तंत्र से जुड़े लोगों के लिए नहीं, बल्कि उन कक्षाओं के लिए भी है जहां लड़कियां मदद मांगने में हिचकिचाती हैं। यह उन शिक्षकों के लिए भी है, जो मदद करना चाहते हैं लेकिन संसाधनों की कमी के कारण असमर्थ हैं। 

शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि वह यह नहीं कह रही है कि मौजूदा समय में कुछ राज्य सरकारों द्वारा उठाए गए कदमों को इन निर्देशों के मद्देनजर बंद कर दिया जाए, बल्कि ये निर्देश केंद्र सरकार द्वारा तैयार मासिक धर्म स्वच्छता नीति के साथ मिलकर अनिवार्य मानकों के रूप में काम करेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को 3 महीने की अवधि के भीतर जारी दिशा-निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने का आदेश दिया है।


राज्य-केंद्र शासित प्रदेशों के लिए जारी दिशा-निर्देश

शहरी-ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों में एएसटीएम डी-6954 मानकों के अनुसार निर्मित ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन मुफ्त में उपलब्ध कराए जाएं।

नैपकिन शौचालय परिसर के भीतर वेंडिंग मशीनों से या किसी निर्दिष्ट स्थान के जरिए आसानी उपलब्ध कराए जाएं।

हर स्कूल में मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन कॉर्नर स्थापित किए जाएं। इसमें अतिरिक्त अंडरवियर यूनिफॉर्म, पैड आदि होना चाहिए।

सभी स्कूलों में छात्र-छात्राओं के लिए अलग-अलग शौचालय हों, जिनमें हर समय पानी उपलब्ध हो।

स्कूलों में सभी मौजूदा और नए शौचालय ऐसे डिजाइन किए जाएं, कि गोपनीयता, पहुंच सुनिश्चित हो सके, जिसमें दिव्यांग बच्चों की जरूरत भी पूरी की जा सके।

सभी स्कूलों के शौचालयों में हर समय साबुन और पानी की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए



संविधान में समानता के अधिकार का उल्लंघन

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, स्कूलों में लड़के-लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालयों की अनुपलब्धता और पैड तक पहुंच न होना किशोर लड़कियों के समानता के अधिकार का उल्लंघन है। पीठ ने कहा, जागरूकता का अभाव न केवल लड़की के शिक्षा में भाग लेने के अधिकार में बाधा डालता है, बल्कि प्रतिस्पर्धा, क्षमता साकार के अधिकार में रुकावट पैदा करता है।


जीवन का अधिकार है...

पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में मासिक धर्म स्वास्थ्य का अधिकार भी है। कहा गया कि सुरक्षित, स्वच्छ मासिक धर्म प्रबंधन उपायों की अनुपस्थिति किशोर छात्राओं को या तो कक्षा से अनुपस्थित रहने या असुरक्षित तरीके अपनाने या दोनों के लिए मजबूर करती है, जिससे गरिमापूर्ण अस्तित्व प्रभावित होता है और यह मासिक धर्म से गुजर रही लड़की की शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन है।




No comments:
Write comments